{1:1} इस समय दाऊद बहुत अधिक बूढ़ा हो गया था। वह अपनी गरमाई खो चुका था। उसके सेवक उसे कम्बल ओढ़ाते थे किन्तु वह फिर भी ठंडा रहता था। {1:2} इसलिये उसके सेवकों ने उससे कहा, “हम आपकी देखभाल के लिये एक युवती की खोज करेंगे। वह आपके समीप लेटेगी और आपको गरम रखेगी।” {1:3} इसलिये राजा के सेवकों ने इस्राएल प्रदेश में चारों ओर एक युवती की खोज आरम्भ की। वे राजा को गरम रखने के लिये एक सुन्दर लकड़ी की खोज कर रहे थे। उन्हें अबीशग नाम की एक लड़की मिली। वह शूनेमिन नगर की थी। वे युवती को राजा के पास ले आए। {1:4} लड़की बहुत सुन्दर थी। उसने राजा की देख — रेख और सेवा की। किन्तु राजा दाऊद ने उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं किया। {1:5} राजा दाऊद का पुत्र अदोनिय्याह बहुत घमण्डी हो गया। उसने घोषणा की, “मैं राजा बनूँगा।” अदोनिय्याह की माँ का नाम हग्गीत था। अदोनिय्याह राजा बनने का बहुत इच्छुक था। इसलिये वह अपने लिये एक रथ, घोड़े और आगे दौड़ने वाले पाँच सौ {1:6} व्यक्तियों को लाया। राजा ने अपने पुत्र अदोनिय्याह को कभी सुधारा नहीं। दाऊद ने उससे कभी यह नहीं पूछा, “तुम ये कार्य क्यों कर रहे हो” अदोनिय्याह वह पुत्र था जो अबशालोम के बाद उत्पन्न हुआ था। अदोनिय्याह एक बहुत सुन्दर व्यक्ति था। {1:7} अदोनिय्याह ने सरुयाह के पुत्र योआब और याजक एब्यातार से बातें कीं। उन्होंने उसकी सहायता की। {1:8} किन्तु बहुत से लोग उन कामों को ठीक नहीं समझते थे जिन्हें अदोनिय्याह कर रहा था। वे नहीं समझते थे कि वह राजा होने के योग्य हो गया है। ये लोग याजक सादोक, यहोयादा का पुत्र बनायाह, नातान नबी, शिमी, रेई और राजा दाऊद के विशेष रक्षक थे। इसलिये ये लोग अदोनिय्याह के साथ नहीं हुए। {1:9} तब अदोनिय्याह ने कुछ जानवरों को मेलबलि के लिये मारा। उसने कुछ भेड़ों, कुछ गायों और कुछ मोटे बछड़ों को मारा। अदोनिय्याह ने एनरोगेल के पास जोहेलेत की चट्टान पर ये बलियाँ चढ़ाईं। अदोनिय्याह ने इस विशेष उपासना में अपने साथ आने के लिये उनेक व्यक्तियों को आमन्त्रित किया। अदोनिय्याह ने अपने सभी भाईयों, (राजा के अन्य पुत्रों) तथा यहूदा के समस्त राज्य कर्मचारियों को आमन्त्रित किया। {1:10} किन्तु अदोनिय्याह ने नातान नबी, या बनायाह या अपने पिता के विशेष रक्षक या अपने भाई सुलैमान को आमन्त्रित नहीं किया। {1:11} जब नातान ने इसके बारे में सुना, वह सुलैमान की माँ बतशेबा के पास गया। नातान ने उससे पूछा, “क्या तुमने सुना है कि हग्गीत का पुत्र अदोनिय्याह क्या कर रहा है उसने अपने को राजा बना लिया है और वास्तविक राजा दाऊद इसके बारे में कुछ नहीं जानता। {1:12} तुम्हारा जीवन और तुम्हारे पुत्र सुलैमान का जीवन खतरे में पड़ सकता है। किन्तु मैं तुम्हें बताऊँगा कि अपने को बचाने के लिये तुम्हें क्या करना चाहिए। {1:13} राजा दाऊद के पास जाओ और उससे कहो, ‘मेरे राजा, आपने मुझे वचन दिया था कि आपके बाद मेरा पुत्र सुलैमान अगला राजा होगा। फिर, अदोनिय्याह राजा क्यों बन गया है’ {1:14} तब, जब तुम उससे बात कर ही रही होगी, मैं अन्दर आऊँगा। जब तुम चली जाओगी तब मैं जो कुछ घटित हुआ है उसके बारे में राजा को बातऊँगा। इससे यह प्रदर्शित होगा कि तुमने अदोनिय्याह के बारे में जो कुछ कहा है, वह सत्य है।” {1:15} अत: बतशेबा राजा के सोने के कमरे में अन्दर उससे मिलने गई। राजा बहुत अधिक बूढ़ा था। शूनेमिन से आई लड़की अबीशग वहाँ उसकी देख — रेख कर रही थी। {1:16} बतशेबा राजा के सामने प्रणाम करने झुकी। राजा ने पूछा, “तुम क्या चाहती हो” {1:17} बतशेबा ने उत्तर दिया, “मेरे राजा, आपने अपने परमेश्वर, यहोवा का नाम लेकर मुझसे प्रतिज्ञा की थी। आपने कहा था, ‘तुम्हारा पुत्र सुलैमान मेरे बाद राजा होगा। मेरे सिंहासन पर सुलैमान शासन करेगा।’ {1:18} किन्तु अब अदोनिय्याह राजा हो गया है और आप इसे जानते भी नहीं। {1:19} अदोनिय्याह ने मेलबलि के लिये कई जानवरों को मार डाला है। उसने बहुत से बैलों, मोटे बछड़ों और भेड़ों को मारा है और उसने आपके सभी पुत्रों को आमन्त्रित किया है। उसने याजक एब्यातार और आपकी सेना के सेनापति योआब को भी आमन्त्रित किया है। किन्तु उसने आपके पुत्र सुलैमान को आमन्त्रित नहीं किया, जो आपकी सेवा करता है। {1:20} मेरे राजा, इस्राएल के सभी लोगों की आँखें आप पर लगी हैं। वे आपके इस निर्णय की प्रतीक्षा कर रहै हैं कि आपके बाद कौन राजा होगा। {1:21} जब आप मेरेंगे तो आप अपने पूर्वजों के साथ दफनाये जायेंगे। उस समय लोग यही कहेंगे कि मैं और सुलैमान अपराधी हैं।” {1:22} जब बतशेबा राजा से बातें कर रही थी, नातान नबी उससे मिलने आया। {1:23} सेवकों ने राजा से कहा, “नातान नबी आये हैं।” अत: नातान ने प्रवेश किया और राजा के पास गया। नातान राजा के सामने धरती तक झुका। {1:24} तब नातान ने कहा, “मेरे राजा, क्या आपने यह घोषणा कर दी है कि आपके बाद अदोनिय्याह नया राजा होगा क्या आपने यह निर्णय कर लिया है कि आपके बाद अदोनिय्याह लोगों पर शासन करेगा। {1:25} आज उसने घाटी में विशेष मेलबलियाँ भेंट की हैं। उसने कई बैलों, मोटे बछड़ों और भेड़ों को मारा है और उसने आपके अन्य सभी पुत्रों, सेना के सेनापति और याजक एब्यातार को आमन्त्रित किया है। अब वे उनके साथ खा रहे हैं और पी रहे हैं और वे कह रहे हैं, ‘राजा अदोनिय्याह दीर्घायु हो!’ {1:26} किन्तु उसने मुझे या याजक सादोक, यहोयादा के पुत्र बनायाह या आपके पुत्र सुलैमान को आमन्त्रित नहीं किया। {1:27} क्या यह आपने किया है हम आपकी सेवा और आपकी आज्ञा का पालन करते हैं। आपने हम लोगों से पहले ही क्यों नहीं कहा कि आपने उसे अपने बाद होने वाला राजा चुना है” {1:28} तब राजा दाऊद ने कहा, “बतशेबा से अन्दर आने को कहो!” अत: बतशेबा अन्दर राजा के सामने आई। {1:29} तब राजा ने एक प्रतिज्ञा की “यहोवा परमेश्वर ने मुझे हर एक खतरे से बचाया है और यहोवा परमेश्वर शाश्वत है। मैं तुम से प्रतिज्ञा करता हूँ। {1:30} मैं आज वह कार्य करूँगा जिसका वचन मैंने इसके पूर्व तुम्हें दिया था। मैंने यह प्रतिज्ञा यहोवा इस्राएल के परमेश्वर की शक्ति से की थी। मैंने प्रतिज्ञा की थी कि तुम्हारा पुत्र सुलैमान मेरे बाद राजा होगा और मेरे बाद सिंहासन पर मेरा स्थान वही लेगा। मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करुँगा।” {1:31} तब बतशेबा राजा के सामने प्रणाम करने धरती तक झुकी। उसने कहा, “राजा दाऊद दीर्घायु हो!” {1:32} तब राजा दाऊद ने कहा, “याजक सादोक, नातान नबी और यहोयादा के पुत्र बनायाह से यहाँ अन्दर आने को कहो।” अत: तीनों व्यक्ति राजा के सामने आये। {1:33} तब राजा ने उनसे कहा, “मेरे अधिकारियों को अपने साथ लो और मेरे पुत्र सुलैमान को मेरे निजी खच्चर पर बिठाओ। उसे गीहोन सोते पर ले जाओ। {1:34} उस स्थान पर याजक सादोक और नातान नबी, इस्राएल के राजा के रूप में उसका अभिषेक करें। तुम लोग तुरही बजाओगे और यह घोषणा करो, ‘यह सुलैमान नया राजा है।’ {1:35} तब इसके बाद उसके साथ यहाँ लौट आओ। सुलैमान मेरे सिंहासन पर बैठेगा और हमारे स्थान पर नया राजा होगा। मैंने सुलैमान को इस्राएल और यहूदा का शासक होने के लिये चुना है।” {1:36} यहोयादा के पुत्र बनायाह ने राजा को उत्तर दिया, “आमीन! यहोवा परमेश्वर ने स्वयं यह कहा है! {1:37} मेरे स्वामी राजा, यहोवा ने हमेशा आपकी सहायता की है। यहोवा सुलैमान की भी सहायता करे और राजा सुलैमान आपसे भी बड़े राजा बनें।” {1:38} अत: सादोक, नातान, बनायाह और राजा के अधिकारियों ने राजा दाऊद की आज्ञा का पालन किया। उन्होंने सुलैमान को राजा दाऊद के खच्चर पर चढ़ाया और उसके साथ गीहोन के सोते पर गये। {1:39} याजक सादोक ने पवित्र तम्बू से तेल लिया। सादोक ने, यह दिखाने के लिये कि सुलैमान राजा है, उसके सिर पर तेल डाला। उन्होंने तुरही बजाई और सभी लोगों ने उद्घोष किया, “राजा सुलैमान दीर्घायु हों!” {1:40} सभी लोग नगर में सुलैमान के पीछे आए। वे बीन बजा रहे थे और उल्लास के नारे लगा रहे थे। वे इतना उद्घोष कर रहे थे कि धरती काँप उठी। {1:41} इस समय अदोनिय्याह और उसके साथ के सभी अतिथि अपना भोजन समाप्त कर रहे थे। उन्होंने तुरही की आवाज सुनी। योआब ने पूछा, “यह शोर कैसा है नगर में क्या हो रहा है” {1:42} जब योआब बोल ही रहा था, याजक एब्यातार का पुत्र योनातन वहाँ आया। अदोनिय्याह ने कहा, “यहाँ आओ! तुम अच्छे व्यक्ति हो। अत: तुम मेरे लिये शुभ सूचना अवश्य लाये होगे।” {1:43} किन्तु योनातन ने उत्तर दिया, “नहीं! यह तुम्हारे लिये शुभ सूचना नहीं है! हमारे राजा दाऊद ने सुलैमान को नया राजा बनाया है {1:44} और राजा दाऊद ने याजक सादोक, नातान नबी, यहोयादा के पुत्र बनायाह और राजा के सभी अधिकारियों को उसके साथ भेजा है। उन्होंने सुलैमान को राजा के निजी खच्चर पर बिठाया। {1:45} तब याजक सादोक और नातान नबी ने गीहोन सोते पर सुलैमान का अभिषेक किया और तब वे नगर में गये। लोगों ने उनका अनुसरण किया और अब नगर में लोग बहुत प्रसन्न हैं। यह शोर जो तुम सुनते हो, उसी का है। {1:46} सुलैमान अब राजा के सिंहासन पर बैठा है। राजा के सभी सेवक राजा दाऊद से यह कहने आये हैं कि आपने यह अच्छा कार्य किया है। वे कह रहे हैं, ‘राजा दाऊद, आप एक महान राजा हैं और अब हम प्रार्थना करते हैं कि आपका परमेश्वर, {1:47} सुलैमान को भी महान राजा बनाएगा। आपका परमेश्वर सुलैमान को आपसे भी अधिक प्रसिद्ध राजा बनाए और उसे आप जितने महान राजा थे उससे भी अधिक महान राजा होने दे।’ यहाँ तक कि राजा दाऊद भी वहाँ थे, और राजा दाऊद अपने बिस्तर पर लेटे हुए थे। {1:48} राजा दाऊद ने कहा, ‘इस्राएल के परमेश्वर यहोवा की स्तुति करो। यहोवा ने मेरे पुत्रों से एक को मेरे सिंहासन पर बिठाया है और इसे मुझे देखने दिया है।’” {1:49} तब अदोनिय्याह के सभी अतिथि डर गए और शीघ्रता से चले गए। {1:50} अदोनिय्याह भी सुलैमान से डर गया था। इसलिये वह वेदी तक गया और वेदी के सींगों को उसने पकड़ लिया। {1:51} तब किसी ने सुलैमान से कहा, “अदोनिय्याह तुमसे बहुत भयभीत है। अदोनिय्याह वेदी के पास है। उसने वेदी के सीगों को पकड़ रखा है और छोड़ने से इन्कार करता है। अदोनिय्याह कहता है, ‘राजा सुलैमान से यह प्रतिज्ञा करने को कहो कि वह मुझे मारेगा नहीं।’” {1:52} इसलिये सुलैमान ने उत्तर दिया, “यदि अदोनिय्याह यह प्रमाणित करता है कि वह एक अच्छा आदमी है तो मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि उसके सिर का एक बाल भी बाँका नहीं होगा। किन्तु यदि वह कुछ बुरा करेगा तो मार दिया जायेगा।” {1:53} तब रजा सुलैमान ने कुछ व्यक्तियों को अदोनिय्याह को लाने के लिये भेजा। वे व्यक्ति अदोनिय्याह को सुलैमान के सामने ले आए। अदोनिय्याह राजा सुलैमान के सामने आया और झुककर प्रणाम किया। तब सुलैमान ने कहा, “घर जाओ।” {2:1} दाऊद के मरने का समय लगभग आ पहुँचा। इसलिये दाऊद ने सुलैमान से बातें कीं और उससे कहा, {2:2} “मेरे मरने का समय निकट आ गया है। जैसे हर एक व्यक्ति का आता है। लेकिन तुम एक शक्तिशाली पुरुष बन रहे हो। {2:3} उन सभी आदेशों का सावधानी पूर्वक पालन करो जिन्हें यहोवा परमेश्वर ने हमें दिया है। सावधानीपूर्वक उसके सभी नियमों का पालन करो, और वे कार्य करो जो उसने हमें कहा है। सावधानी से उन नियमों का पालन करो जो मूसा की व्यवस्था की किताब में लिखे हैं। यदि तुम इन सभी का पालन करोगे तो तुम जो कुछ करोगे और जहाँ कहीं जाओगे, सफल होगे {2:4} और यदि तुम यहोवा की आज्ञा का पालन करते रहोगे तो यहोवा मेरे लिये की गई प्रतिज्ञाओं का पालन करेगा। मेरे लिये यहोवा ने जो प्रतिज्ञा की, वह यह है, ‘तुम्हारे पुत्रों को मेरी आज्ञा का पालन करना चाहिये और उन्हें वैसे रहना चाहिये जैसा रहने के लिये मैं कहूँ। तुम्हारे पुत्रों को पूरे हृदय और आत्मा से मुझमें विश्वास रखना चाहिये। यदि तुम्हारे पुत्र यह करेंगे तो तुम्हारे परिवार का एक व्यक्ति सदा इस्राएल के लोगों का शासक होगा।’” {2:5} दाऊद ने यह भी कहा, “तुम यह भी याद रखो कि सरुयाह के पुत्र योआब ने मेरे लिये क्या किया। उसने इस्राएल की सेना के दो सेनापतियों को मार डाला। उसने नेर के पुत्र अब्नेर और येतेर के पुत्र अमासा को मारा। तुम्हें याद होगा कि उसने उन्हें बदले की भावना से प्रेरित होकर शान्ति के समय इसलिये मारा क्योंकि उन्होंने दूसरों को युद्ध में मारा था। इन व्यक्तियों के रक्त का दाग उसकी तलवार की मूठ और उसके पहने हुए सैनिकों के जूतों पर लगा हुआ था। इसलिये मैं उसे अवश्य दण्ड दूँगा। {2:6} किन्तु अब राजा तुम हो। अत: तुम्हें उसे इस प्रकार दण्ड देना चाहिये जिसे तुम सबसे अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण समझो। किन्तु तुम्हें यह निश्चय कर लेना चाहिये कि वह मार डाला जाये। उसे बुढ़ापे की शान्तिपूर्ण मृत्यु न पाने दो! {2:7} “गिलाद के, बर्जिल्लै के बच्चों पर दयालु रहो। उन्हें अपना मित्र होने दो और अपनी मेज पर भोजन करने दो। उन्होंने मेरी तब सहायता की, जब मैं तुम्हारे भाई अबशालोम से भाग खड़ा हुआ था। {2:8} “और याद रखो गेरा का पुत्र शिमी तुम्हारे साथ यहाँ है। वह बहूरीम के बिन्यामीन परिवार समूह का है। याद रखो कि उसने, उस दिन मेरे विरुद्ध बहुत बुरी बातें कीं, जिस दिन मैं महनैम को भाग गया था। तब वह मुझसे मिलने यरदन नदी पर आया था। किन्तु मैंने यहोवा के समाने प्रतिज्ञा की थी, ‘शिमी मैं तुम्हें नहीं मारूँगा।’ {2:9} परन्तु शिमी को दण्ड दिये बिना न रहने दो। तुम बुद्धिमान व्यक्ति हो, तुम समझ जाओगे कि उसके साथ क्या करना चाहिये। किन्तु उसे बुढ़ापे की शान्तिपूर्ण मृत्यु न पाने दो।” {2:10} तब दाऊद मर गया। वह दाऊद नगर में दफनाया गया। {2:11} दाऊद ने इस्राएल पर चालीस वर्ष तक शासन किया। उसने हब्रोन में सात वर्ष और यरूशलेम में तैंतीस वर्ष तक शासन किया। {2:12} अब सुलैमान अपने पिता दाऊद के सिंहासन पर शासन करने लगा और इसमें कोई सन्देह नहीं था कि वह राजा है। {2:13} इस समय हग्गीत का पुत्र अदोनिय्याह सुलैमान की माँ बतशेबा के पास गया। बतशेबा ने उससे पूछा, “क्या तुम शान्ति के भाव से आए हो” अदोनिय्याह ने उत्तर दिया, “हाँ! यह शान्तिपूर्ण आगमन है। {2:14} मुझे आपसे कुछ कहना है।” बतशेबा ने कहा, “तो कहो।” {2:15} अदोनिय्याह ने कहा, “तुम्हें याद है कि एक समय राज्य मेरा था। इस्राएल के सभी लोग समझते थे कि मैं उनका राजा हूँ। किन्तु स्थिति बदल गई। अब मेरा भाई राजा है। यहोवा ने उसे राजा होने के लिये चुना। {2:16} इसलिये मैं तुमसे एक चीज़ माँगता हूँ। कृपया इन्कार न करें।” बतशेबा ने पूछा, “तुम क्या चाहते हो” {2:17} अदोनिय्याह ने उत्तर दिया, “मैं जानता हूँ कि राजा सुलैमान वह सब कुछ करेंगे जो तुम कहोगी। अत: कृपया उनसे शूनेमिन स्त्री अबीशग को मुझे देने को कहो। मैं उससे विवाह करना चाहता हूँ।” {2:18} तब बतशेबा ने कहा, “ठीक है, मैं तुम्हारे लिये राजा से बात करूँगी।” {2:19} अत: बतशेबा राजा सुलैमान के पास उससे बात करने गई। राजा सुलैमान ने उसे देखा और वह उससे मिलने के लिये खड़ा हुआ। तब वह उसके सामने प्रणाम करने झुका और सिंहासन पर बैठ गया। उसने सेवकों से, अपनी माँ के लिये दूसरा सिंहासन लाने को कहा। तब वह उसकी दायीं ओर बैठ गई। {2:20} बतशेबा ने उससे कहा, “मैं तुमसे एक छोटी चीज माँगती हूँ। कृपया इन्कार न करना।” राजा ने उत्तर दिया, “माँ तुम जो चाहो, माँग सकती हो। मैं तुम्हें मना नहीं करूँगा।” {2:21} अत: बतशेबा ने कहा, “शूनेमिन स्त्री अबीशग को, अपने भाई अदोनिय्याह के साथ विवाह करने दो।” {2:22} राजा सुलैमान ने अपनी माँ से कहा, “तुम अबीशग को उसे देने के लिये मुझसे क्यों कहती हो तुम मुझसे यह क्यों नहीं कहती कि मैं उसे राजा भी बना दूँ क्योंकि वह मेरा बड़ा भाई है याजक एब्यातार और योआब उसका समर्थन करेंगे।” {2:23} तब सुलैमान ने यहोवा से एक प्रतिज्ञा की। उसने कहा, “मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मुझसे यह माँग करने के लिये मैं अदोनिय्याह से भुगतान कराऊँगा। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि उसे इसका मूल्य अपने जीवन से चुकाना पड़ेगा। {2:24} यहोवा ने मुझे इस्राएल का राजा होने दिया है। उसने वह सिंहासन मुझे दिया है जो मेरे पिता दाऊद का है। यहोवा ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की है और राज्य मुझे और मेरे परिवार को दिया है। मैं शाश्वत परमेश्वर के सामने, प्रतिज्ञा करता हूँ कि अदोनिय्याह आज मरेगा!” {2:25} राजा सुलैमान ने बनायाह को आदेश दिया। बनायाह बाहर गया और उसने अदोनिय्याह को मार डाला। {2:26} तब राजा सुलैमान ने याजक एब्यातार से कहा, “मुझे तुमको मार डालना चाहिये, किन्तु मैं तुम्हें अपने घर अनातोत में लौट जाने देता हूँ। मैं तुम्हें अभी मारूँगा नहीं क्योंकि मेरे पिता दाऊद के साथ चलते समय तुमने पवित्र सन्दूक को ले चलने में सहायता की थी जब तुम मेरे पिता दाऊद के साथ थे और मैं जानता हूँ कि उन सभी विपत्तियों के समय में मेरे पिता के समान तुमने भी हाथ बटाया।” {2:27} सुलैमान ने एब्यातार से कहा कि तुम याजक के रूप में यहोवा की सेवा करते नहीं रह सकते। यह सब वैसे ही हुआ, जैसा यहोवा ने होने के लिये कहा था। परमेश्वर ने याजक एली और उसके परिवार के बारे में शीलो में यह कहा था और एब्यातार एली के परिवार से था। {2:28} योआब ने इस बारे में सुना और वह डर गया। उसने अदोनिय्याह का समर्थन किया था, किन्तु अबशालोम का नहीं। योआब यहोवा के तम्बू की ओर दौड़ा और वेदी के सींगो को पकड़ लिया। {2:29} किसी ने राजा सुलैमान से कहा कि योआब यहोवा के तम्बू में वेदी के पास है। इसलिये सुलैमान ने बनायाह को जाने और उसे मार डालने का आदेश दिया। {2:30} बनायाह यहोवा के तम्बू में गया और योआब से कहा, “राजा कहते हैं, ‘बाहर आओ!’” किन्तु योआब ने उत्तर दिया, “नहीं मैं यहीं मरूँगा।” अत: बनायाह राजा के पास वापस गया और उससे वही कहा जो योआब ने कहा था। {2:31} तब राजा ने बनायाह को आदेश दिया, “वैसा ही करो जैसा वह कहता है। उसे वहीं मार डालो। तब उसे दफना दो। तब हमारा परिवार और हम योआब के दोष से मुक्त होंगे। यह अपराध इसलिये हुआ कि योआब ने निरपराध लोगों को मारा था। {2:32} योआब ने दो व्यक्तियों को मार डाला था जो उससे बहुत अधिक अच्छे थे। ये नेर का पुत्र अब्नेर और येतेर का पुत्र अमासा थे। अब्नेर इस्राएल की सेना का सेनापति था और उस समय मेरे पिता दाऊद यह नहीं जानते थे कि योआब ने उन्हें मार डाला था। इसलिये यहोवा योआब को उन व्यक्तियों के लिये दण्ड देगा जिन्हें उसने मार डाला था। {2:33} वह उनकी मृत्यु के लिये अपराधी होगा और उसका परिवार भी सदा के लिये दोषी होगा। किन्तु परमेश्वर की ओर से दाऊद को, उसके वंशजों, उसके राज परिवार और सिंहासन को सदा के लिये शान्ति मिलेगी।” {2:34} इसलिये यहोयादा के पुत्र बनायाह ने योआब को मार डाला। योआब मरुभूमि में अपने घर के पास दफनाया गया। {2:35} सुलैमान ने तब यहोयादा के पुत्र बनायाह को योआब के स्थान पर सेनापति बनाया। सुलैमान ने एब्यातार के स्थान पर सादोक को महायाजक बनाया। {2:36} इसके बाद रजा ने शिमी को बुलवाया। राजा ने उससे कहा, “यहाँ यरूशलेम में तुम अपने लिये एक घर बनाओ, उसी घर में रहो और नगर को मत छोड़ो। {2:37} यदि तुम नगर को छोड़ोगे और किद्रोन के नाले के पार जाओगे तो तुम मार डाले जाओगे और यह तुम्हारा दोष होगा।” {2:38} अत: शिमी ने उत्तर दिया, “मेरे राजा, आपने जो कहा, है ठीक है। मैं आपके आदेश का पालन करूँगा।” अत: शिमी यरूशलेम में बहुत समय तक रहा। {2:39} किन्तु तीन वर्ष बाद शिमी के दो सेवक भाग गए। वे गत के राजा के पास पहुँचे। उसका नाम आकीश था जो माका का पुत्र था। शिमी ने सुना कि उसके सेवक गत में हैं। {2:40} इसलिये शिमी ने अपनी काठी अपने खच्चर पर रखी और गत में राजा आकीश के पास गया। वह अपने सेवकों को प्राप्त करने गया। उसने उन्हें ढूँढ लिया और अपने घर वापस लाया। {2:41} किन्तु किसी ने सुलैमान से कहा, कि शिमी यरूशलेम से गत गया था और लौट आया है। {2:42} इसलिये सुलैमान ने उसे बुलवाया। सुलैमान ने कहा, “मैंने यहोवा के नाम पर तुमसे यह प्रतिज्ञा की थी कि यदि तुम यरूशलेम छोड़ोगे, तो मारे जाओगे। मैंने चेतावनी दी थी कि यदि तुम अन्य कहीं जाओगे तो तुम्हारे मारे जाने का दोष तुम्हारा होगा और मैंने जो कुछ कहा था तुमने उसे स्वीकार किया था। तुमने कहा कि तुम मेरी आज्ञा का पालन करोगे। {2:43} तुमने अपनी प्रतिज्ञा भंग क्यों की तुमने मेरे आदेश का पालन क्यों नहीं किया {2:44} तुम जानते हो कि तुमने मेरे पिता दाऊद के विरूद्ध बहुत से गलत काम किये, अब यहोवा उन गलत कामों के लिये तुम्हें दण्ड देगा। {2:45} किन्तु यहोवा मुझे आशीर्वाद देगा। वह दाऊद के सिंहासन की सदैव सुरक्षा करेगा।” {2:46} तब राजा ने बनायाह को शिमी को मार डालने का आदेश दिया और उसने इसे पूरा किया। अब सुलैमान अपने राज्य पर पूर्ण नियन्त्रण कर चुका था। {i3:1} राजा सुलैमान {3:1} सुलैमान ने मिस्र के राजा फ़िरौन की पुत्री के साथ विवाह करके उसके साथ सन्धि की। सुलैमान उसे दाऊद नगर को ले आया। इस समय अभी भी सुलैमान अपना महल तथा यहोवा का मन्दिर बनवा रहा था। सुलैमान यरूशलेम की चहारदीवारी भी बनवा रहा था। {3:2} मन्दिर अभी तक पूरा नहीं हुआ था। इसलिये लोग अभी भी उच्चस्थानों पर जानवरों की बलि भेंट कर रहे थे। {3:3} सुलैमान ने दिखाया कि वह यहोवा से प्रेम करता है। उसके अपने पिता दाऊद ने जो कुछ करने को कहा था, उसने उन सब का पालन किया किन्तु सुलैमान ने कुछ ऐसा भी किया जिसे करने के लिये दाऊद ने नहीं कहा था। सुलैमान अभी तक उच्चस्थानों का उपयोग बलिभेंट और सुगन्धि जलाने के लिये करता रहा। {3:4} राजा सुलैमान बलिभेंट करने गिबोन गया। वह वहाँ इसलिये गया क्योंकि वह सर्वाधिक महत्वपूर्ण उच्च स्थान था। सुलैमान ने एक हजार बलियाँ उस वेदी पर भेंट कीं। {3:5} जब सुलैमान गिबोन में था उस रात को उसके पास स्वपन में यहोवा आया। परमेश्वर ने कहा, “जो चाहते हो तुम माँगो, मैं उसे तुम्हें दूँगा।” {3:6} सुलैमान ने उत्तर दिया, “तू अपने सेवक मेरे पिता दाऊद पर बहुत दयालु रहा। उसने तेरा अनुसरण किया। वह अच्छा था और सच्चाई से रहा और तूने उसके प्रति तब सबसे बड़ी कृपा की जब तूने उसके पुत्र को उसके सिंहासन पर शासन करने दिया। {3:7} यहोवा मेरा परमेशवर, तूने मुझे अपने पिता के स्थान पर राजा होने दिया है। किन्तु मैं एक छोटे बालक के समान हूँ। मेरे पास, मुझे जो करना चाहिए उसे करने के लिये बुद्ध नहीं है। {3:8} तेरा सेवक, मैं यहाँ तेरे चुने लोगों, में हूँ। यहाँ बहुत से लोग हैं। वे इतने अधिक हैं कि गिने नहीं जा सकते। अत: शासक को उनके बीच अनेकों निर्णय लेने पड़ेंगे। {3:9} इसलिये मैं तुझसे माँगता हूँ कि तू मुझे बुद्धि दे जिससे मैं सच्चाई से लोगों पर शासन और उनका न्याय कर सकूँ। इससे मैं सही और गलत के अन्तर को जान सकूँगा। इस श्रेष्ठ बुद्धि के बिना इन महान लोगों पर शासन करना असंभव है।” {3:10} यहोवा प्रसन्न हुआ कि सुलैमान ने उससे यह माँगा। {3:11} इसलिये परमेश्वर ने उससे कहा, “तुमने अपने लिये दीर्घायु नहीं माँगी। तुमने अपने लिये सम्पत्ति नहीं माँगी। तुमने अपने शत्रुओं की मृत्यु नहीं माँगी। {3:12} इसलिये मैं तुम्हें वही दूँगा जो तुमने माँगा। मैं तुम्हें बुद्धिमान और विवेकी बनाऊँगा। मैं तुम्हारी बुद्धि को इतना महान बनाऊँगा कि बीते समय में कभी तुम्हारे जैसा कोई व्यक्ति नहीं हुआ है और भविष्य में तुम्हारे जैसा कभी कोई नहीं होगा। {3:13} और तुम्हें पुरस्कृत करने के लिये मैं तुम्हें वे चीजें भी दूँगा जिन्हें तुमने नहीं माँगी। तुम्हारे पूरे जीवन में सम्पत्ति और प्रतिष्ठा बनी रहेगी। संसार में तुम्हारे जैसा महान राजा दूसरा कोई नहीं होगा। {3:14} मैं तुमसे चाहता हूँ कि तुम मेरा अनुसरण करो और मेरे नियमों एवं आदेशों का पालन करो। यह उसी प्रकार करो जिस प्रकार तुम्हारे पिता दाऊद ने किया। यदि तुम ऐसा करोगे तो मैं तुम्हें दीर्घायु भी करूँगा।” {3:15} सुलैमान जाग गया। वह जान गया कि परमेश्वर ने उसके साथ स्वप्न में बातें की हैं। तब सुलैमान यरूशलेम गया और यहोवा के साक्षीपत्र के सन्दूक के सामने खड़ा हुआ। सुलैमान ने एक होमबलि यहोवा को चढ़ाई और उसने यहोवा को मेलबलि दी। इसके बाद उसने उन सभी प्रमुखों और अधिकारियों को दावत दी जो शासन करने में उसकी सहायता करते थे। {3:16} एक दिन दो स्त्रियाँ जो वेश्यायें थीं, सुलैमान के पास आईं। वे राजा के सामने खड़ी हुईं। {3:17} स्त्रियों में से एक ने कहा, “महाराज, यह स्त्री और मैं एक ही घर में रहते हैं। हम दोनों गर्भवती हुए और अपने बच्चों को जन्म देने ही वाले थे। मैंने अपने बच्चे को जन्म दिया जब यह वहाँ मेरे साथ थी। {3:18} तीन दिन बाद इस स्त्री ने भी अपने बच्चे को जन्म दिया। हम लोगों के साथ कोई अन्य व्यक्ति घर में नहीं था। केवल हम दोनों ही थे।। {3:19} एक रात जब यह स्त्री अपने बच्चे के साथ सो रही थी, बच्चा मर गया। {3:20} अत: रात को जब मैं सोई थी, इसने मेरे पुत्र को मेरे बिस्तर से ले लिया। यह उसे अपने बिस्तर पर ले गई। तब इसने मरे बच्चे को मेरे बिस्तर पर डाल दिया। {3:21} अगली सुबह मैं जागी और अपने बच्चे को दूध पिलाने वाली थी। किन्तु मैंने देखा कि बच्चा मरा हुआ है। तब मैंने उसे अधिक निकट से देखा। मैंने देखा कि यह मेरा बच्चा नहीं है।” {3:22} किन्तु दूसरी स्त्री ने कहा, “नहीं! जीवित बच्चा मेरा है। मरा बच्चा तुम्हारा है!” किन्तु पहली स्त्री ने कहा, “नहीं! तुम गलत हो! मरा बच्चा तुम्हारा है और जीवित बच्चा मेरा है।” इस प्रकार दोनों स्त्रियों ने राजा के सामने बहस की। {3:23} तब राजा सुलैमान ने कहा, “तुम दोनों कहती हो कि जीवित बच्चा हमारा अपना है और तुम में से हर एक कहती है कि मरा बच्चा दूसरी का है।” {3:24} तब राजा सुलैमान ने अपने सेवक को तलवार लाने भेजा {3:25} और राजा सुलैमान ने कहा, “हम यही करेंगे। जीवित बच्चे के दो टुकड़े कर दो। हर एक स्त्री को आधा बच्चा दे दो।” {3:26} दूसरी स्त्री ने कहा, “यह ठीक है। बच्चे को दो टुकड़ों में काट डालो। तब हम दोनों में से उसे कोई नहीं पाएगा।” किन्तु पहली स्त्री, जो सच्ची माँ थी, अपने बच्चे के लिये प्रेम से भरी थी। उसने राजा से कहा, “कृपया बच्चे को न मारें! इसे उसे ही दे दें।” {3:27} तब राजा सुलैमान ने कहा, “बच्चे को मत मारो! इसे, पहली स्त्री को दे दो। वही सच्ची माँ है।” {3:28} इस्राएल के लोगों ने राजा सुलैमान के निर्णय को सुना। उन्होंने उसका बहुत आदर और सम्मान किया क्योंकि वह बुद्धिमान था। उन्होंने देखा कि ठीक न्याय करने में उसके पास परमेश्वर की बुद्धि थी। {4:1} राजा सुलैमान इस्राएल के सभी लोगों पर शासन करता था। {4:2} ये प्रमुख अधिकारियों के नाम हैं जो शासन करने में उसकी सहायता करते थे: सादोक का पुत्र अजर्याह याजक था। {4:3} शीशा के पुत्र एलीहोरेप और अहिय्याह उस विवरण को लिखने का कार्य करते थे जो न्यायालय में होता था। अहीलूद का पुत्र यहोशापात, यहोशापात लोगों के इतिहास का विवरण लिखता था। {4:4} यहोयादा का पुत्र बनायाह सेनापति था, सादोक और एब्यातार याजक थे। {4:5} नातान का पुत्र अजर्याह जनपद — प्रशासकों का अधीक्षक था। नातान का पुत्र जाबूद याजक और राजा सुलैमान का एक सलाहकार था। {4:6} अहीशार राजा के घर की हर एक चीज़ का उत्तरदायी था। अब्दा का पुत्र अदोनीराम दासों का अधीक्षक था। {4:7} इस्राएल बारह क्षेत्रों में बँटा था जिन्हें जनपद कहते थे। सुलैमान हर जनपद पर शासन करने के लिये प्रशासकों को चुनता था। इन प्रशासकों को आदेश था कि वे अपने जनपद से भोजन सामग्री इकट्ठा करें और उसे राजा और उसके परिवार को दें। हर वर्ष एक महीने की भोजन सामग्री राजा को देने का उत्तरदायित्व बारह प्रशासकों में से हर एक का था। {4:8} बारह प्रशासकों के नाम ये हैं: बेन्हूर, एप्रैम के पर्वतीय प्रदेश का प्रशासक था। {4:9} बेन्देकेर, माकस, शाल्बीम, बेतशेमेश और एलोनबेथानान का प्रशासक था। {4:10} बेन्हेसेद, अरुब्बोत, सौको और हेपेर का प्रशासक था। {4:11} बेनबीनादाब, नपोत दोर का प्रशासक था। उसका विवाह सुलैमान की पुत्री तापत से हुआ था। {4:12} अहीलूद का पुत्र बाना, तानाक, मगिद्दो से लेकर और सारतान से लगे पूरे बेतशान का प्रशासक था। यह यिज्रेल के नीचे, बेतशान से लेकर आबेलमहोला तक योकमाम के पार था। {4:13} बेनगेबेर, रामोत गिलाद का प्रशासक था वह गिलाद में मनश्शे के पुत्र याईर के सारे नगरों और गाँवों का भी प्रशासक था। वह बाशान में अर्गोब के जनपद का भी प्रशासक था। इस क्षेत्र में ऊँची चहारदीवारी वाले साठ नगर थे। इन नगरों के फाटकों में काँसे की छड़ें भी लगी थीं। {4:14} इद्दो का पुत्र अहीनादाब, महनैम का प्रशासक था। {4:15} अहीमास, नप्ताली का प्रशासक था। उसका विवाह सुलैमान की पुत्री बासमत से हुआ था। {4:16} हूशै का पुत्र बाना, आशेर और आलोत का प्रशासक था। {4:17} पारूह का पुत्र यहोशापात, इस्साकार का प्रशासक था। {4:18} एला का पुत्र शिमी, बिन्यामीन का प्रशासक था। {4:19} ऊरी का पुत्र गेबेर गिलाद का प्रशासक था। गिलाद वह प्रदेश था जहाँ एमोरी लोगों का राजा सीहोन और बाशान का राजा ओग रहते थे। किन्तु केवल गेबेर ही उस जनपद का प्रशासक था। {4:20} यहूदा और इस्राएल में बहुत बड़ी संख्या में लोग रहते थे। लोगों की संख्या समुद्र तट के बालू के कणों जितनी थी। लोग सुखमय जीवन बिताते थेः वे खाते पीते और आनन्दित रहते थे। {4:21} सुलैमान परात नदी से लेकर पलिश्ती लोगों के प्रदेश तक सभी राज्यों पर शासन करता था। उसका राज्य मिस्र की सीमा तक फैला था। ये देश सुलैमान को भेंट भेजते थे और उसके पूरे जीवन तक उसकी आज्ञा का पालन करते रहे। {4:22} यह भोजन सामग्री है जिसकी आवश्यकता प्रतिदिन सुलैमान को स्वयं और उसकी मेज पर सभी भोजन करने वालों के लिये होती थी: डेढ़ सौ बुशल महीन आटा, {4:23} तीन सौ बुशल आटा, अच्छा अन्न खाने वाली दस बैल, मैदानों में पाले गये बीस बैल और सौ भेड़ें, तीन भिन्न प्रकार के हिरन और विशेष पक्षी भी। {4:24} सुलैमान परात नदी के पश्चिम के सभी देशों पर शासन करता था। यह प्रदेश तिप्सह से अज्जा तक था और सुलैमान के राज्य के चारों ओर शान्ति थी। {4:25} सुलैमान के जीवन काल में इस्राएल और यहूदा के सभी लोग लगातार दान से लेकर बेर्शेबा तक शान्ति और सुरक्षा में रहते थे। लोग शान्तिपूर्वक अपने अंजीर के पेड़ों और अंगूर की बेलों के नीचे बैठते थे। {4:26} सुलैमान के पास उसके रथों के लिये चार हजार घोड़ों के रखने के स्थान और उसके पास बारह हजार घुड़सवार थे। {4:27} प्रत्येक महीने बारह जनपद शासकों में से एक सुलैमान को वे सब चीज़ें देता था जिसकी उसे आवश्यकता पड़ती थी। यह राजा के मेज पर खाने वाले हर एक व्यक्ति के लिये पर्याप्त होता था। {4:28} जनपद प्रशासक राजा को रथों के घोड़ों और सवारी के घोड़ों के लिये पर्याप्त चारा और जौ भी देते थे। हर एक व्यक्ति इस अन्न को निश्चित स्थान पर लाता था। {4:29} परमेश्वर ने सुलैमान को उत्तम बुद्धि दी। सुलैमान अनेकों बातें समझ सकता था। उसकी बुद्धि कल्पना के परे तीव्र थी। {4:30} सुलैमान की बुद्धि पूर्व के सभी व्यक्तियों की बुद्धि से अधिक तीव्र थी और उसकी बुद्धि मिस्र में रहने वाले सभी व्यक्तियों की बुद्धि से अधिक तीव्र थी। {4:31} वह पृथ्वी के किसी भी व्यक्ति से अधिक बुद्धिमान था। वह एज्रेही एतान से भी अधिक बुद्धिमान था। वह हेमान, कलकोल तथा दर्दा से अधिक बुद्धिमान था। ये माहोल के पुत्र थे। राजा सुलैमान इस्राएल और यहूदा के चारों ओर के सभी देशों में प्रसिद्ध हो गया। {4:32} अपने जीवन काल में राजा सुलैमान ने तीन हजार बुद्धिमत्तापूर्ण उपदेश लिखे। उसने पन्द्रह सौ गीत भी लिखे। {4:33} सुलैमान प्रकृति के बारे में भी बहुत कुछ जानता था। सुलैमान ने लबानोन के विशाल देवदारु वृक्षों से लेकर दीवारों में उगने वाली जूफा के विभिन्न प्रकार के पेड़े — पौधों में से हर एक के विषय में शिक्षा दी। राजा सुलैमान ने जानवरों, पक्षियों और रेंगने वाले जन्तुओं और मछलियों की चर्चा की है। {4:34} सुलैमान की बुद्धिमत्तापूर्ण बातों को सुनने के लिये सभी राष्ट्रों से लोग आते थे। सभी राष्ट्रों के राजा अपने बुद्धिमान व्यक्तियों को राजा सुलैमान की बातों को सुनने के लिये भेजते थे। {i5:1} सुलैमान मन्दिर बनाता है {5:1} हीराम सोर का राजा था। हीराम सदैव दाऊद का मित्र रहा। अतः जब हीराम को मालूम हुआ कि सुलैमान दाऊद के बाद नया राजा हुआ है तो उसने सुलैमान के पास अपने सेवक भेजे। {5:2} सुलैमान ने हीराम राजा से जो कहा, वह यह है: {5:3} “तुम्हें याद है कि मेरे पिता राजा दाऊद को अपने चारों ओर अनेक युद्ध लड़ने पड़े थे। अत: वह यहोवा अपने परमेश्वर का मन्दिर बनवाने में समर्थ न हो सका। राजा दाऊद तब तक प्रतीक्षा करता रहा जब तक यहोवा ने उसके सभी शत्रुओं को उससे पराजित नहीं हो जाने दिया। {5:4} किन्तु अब यहोवा मेरे परमेश्वर ने मेरे देश के चारों ओर मुझे शान्ति दी है। अब मेरा कोई शत्रु नहीं है। मेरी प्रजा अब किसी खतरे में नहीं है। {5:5} “यहोवा ने मेरे पिता दाऊद के साथ एक प्रतिज्ञा की थी। यहोवा ने कहा था, ‘मैं तुम्हारे पुत्र को तुम्हारे बाद राजा बनाऊँगा और तुम्हारा पुत्र मेरा सम्मान करने के लिये एक मन्दिर बनाएगा।’ अब मैंने, यहोवा अपने परमेश्वर का सम्मान करने के लिये वह मन्दिर बनाने की योजना बनाई है {5:6} और इसलिये मैं तुमसे सहायता माँगता हूँ। अपने व्यक्तियों को लबानोन भेजो। वहाँ वे मेरे लिये देवदारू के वृक्षों को काटेंगे। मेरे सेवक तुम्हारे सेवकों के साथ काम करेंगे। मैं वह कोई भी मजदूरी भुगतान करूँगा जो तुम अपने सेवकों के लिये तय करोगे। किन्तु मुझे तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है। मेरे बढ़ई सीदोन के बढ़ईयों की तरह अच्छे नहीं हैं।” {5:7} जब हीराम ने, जो कुछ सुलैमान ने माँगा, वह सुना तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। राजा हीराम ने कहा, “आज मैं यहोवा को धन्यवाद देता हूँ कि उसने दाऊद को इस विशाल राष्ट्र का शासक एक बुद्धिमान पुत्र दिया है।” {5:8} तब हीराम ने सुलैमान को एक संदेश भेजा। संदेश यह था, “तुमने जो माँग की है, वह मैंने सुनी है। मैं तुमको सारे देवदारु के पेड़ और चीड़ के पेड़ दूँगा, जिन्हें तुम चाहते हो। {5:9} मेरे सेवक लबानोन से उन्हें समुद्र तक लाएंगे। तब मैं उन्हें एक साथ बाँध दूँगा और उन्हें समुद्र तट से उस स्थान की ओर बहा दूँगा जहाँ तुम चाहते हो। वहाँ मैं लट्ठों को अलग कर दूँगा और पेड़ों को तुम ले सकोगे।” {5:10} सुलैमान ने हीराम को लगभग एक लाख बीस हजार बुशल गेहूँ और लगभग एक लाख {5:11} बीस हजार गैलन शुद्ध जैतून का तेल प्रति वर्ष उसके परिवार के भोजन के लिये दिया। {5:12} यहोवा ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार सुलैमान को बुद्धि दी और सुलैमान और हीराम के मध्य शान्ति रही। इन दोनों राजाओं ने आपस में एक सन्धि की। {5:13} राजा सुलैमान ने इस काम में सहायता के लिये इस्राएल के तीस हजार व्यक्तियों को विवश किया। {5:14} राज सुलैमान ने अदोनीराम नामक एक व्यक्ति को उनके ऊपर अधिकारी बनाया। सुलैमान ने उन व्यक्तियों को तीन टुकड़ियों में बाँटा। हर एक टुकड़ी में दस हजार व्यक्ति थे। हर समूह एक महीने लबानोन में काम करता था और तब दो महीने के लिये अपने घर लौटता था। {5:15} सुलैमान ने अस्सी हजार व्यक्तियों को भी पहाड़ी प्रदेश में काम करने के लिये विवश किया। इन मनुष्यों का काम चट्टानों को काटना था और वहाँ सत्तर हजार व्यक्ति पत्थरों को ढोने वाले थे {5:16} और तीन हजार तीन सौ व्यक्ति थे जो काम करने वाले व्यक्तियों के ऊपर अधिकारी थे। {5:17} राजा सुलैमान ने, मन्दिर की नींव के लिये विशाल और कीमती चट्टानों को काटने का आदेश दिया। ये पत्थर सावधानी से काटे गये। {5:18} तब सुलैमान के कारीगरों और हीराम के कारीगरों तथा गबाली के व्यक्तियों ने पत्थरों पर नक्काशी का काम किया। उन्होंने मन्दिर को बनाने के लिये पत्थरों और लट्ठों को तैयार किया। {i6:1} सुलैमान मन्दिर बनाता है {6:1} तब सुलैमान ने मन्दिर बनाना आरम्भ किया। यह इस्राएल के लोगों द्वारा मिस्र छोड़ने के चार सौ अस्सीवाँ वर्ष बाद था। यह राजा सुलैमान के इस्राएल पर शासन के चौथे वर्ष में था। यह वर्ष के दूसरे महीने जिव के माह में था। {6:2} मन्दिर नब्बे फुट लम्बा, तीस फुट चौड़ा और पैंतालीस फुट ऊँचा था। {6:3} मन्दिर का द्वार मण्डप तीस फुट लम्बा और पन्द्रह फुट चौड़ा था। यह द्वारमण्डप मन्दिर के ही मुख्य भाग के सामने तक फैला था। इसकी लम्बाई मन्दिर की चौड़ाई के बराबर थी। {6:4} मन्दिर में संकरी खिड़कियाँ थीं। ये खिड़कियाँ बाहर की ओर संकरी और भीतर की ओर चौड़ी थीं। {6:5} तब सुलैमान ने मन्दिर के मुख्य भाग के चारों ओर कमरों की एक पंक्ति बनाई। ये कमरे एक दूसरे की छत पर बने थे। कमरों की यह पंक्ति तीन मंजिल ऊँची थी। {6:6} कमरे मन्दिर की दीवार से सटे थे किन्तु उनकी शहतीरें उसकी दीवार में नहीं घुसी थीं। शिखर पर, मन्दिर की दीवार पतली हो गई थी। इसलिये उन कमरों की एक ओर की दीवार उसके नीचे की दीवार से पतली थी। नीचे की मंजिल के कमरे साढ़े सात फुट चौड़े थे। बीच की मंजिल के कमरे नौ फुट चौड़े थे। उसके ऊपर के कमरे दस — बारह फुट चौड़े थे। {6:7} कारीगरों ने दीवारों को बनाने के लिये बड़े पत्थरों का उपयोग किया। कारीगरों ने उसी स्थान पर पत्थरों को काटा जहाँ उन्होंने उन्हें जमीन से निकाला। इसलिए मन्दिर में हथौड़ी, कुल्हाड़ियों और अन्य किसी भी लोहे के औजार की खटपट नहीं हुई। {6:8} नीचे के कमरों का प्रवेश द्वार मन्दिर के दक्षिण की ओर था। भीतर सीढ़ियाँ थीं जो दूसरे मंजिल के कमरों और तब तीसरे मंजिल के कमरों तक जाती थी। {6:9} इस प्रकार सुलैमान ने मन्दिर बनाना पूरा किया। मन्दिर का हर एक भाग देवदारु के तख्तों से मढ़ा गया था। {6:10} सुलैमान ने मन्दिर के चारों ओर कमरों का बनाना भी पूरा किया। हर एक मंजिल साढ़े सात फुट ऊँची थी। उन कमरों की शहतीरें मन्दिर को छूती थीं। {6:11} यहोवा ने सुलैमान से कहा, {6:12} “यदि तुम मेरे सभी नियमों और आदेशों का पालन करोगे तो मैं वह सब करूँगा जिसके लिये मैंने तुम्हारे पिता दाऊद से प्रतिज्ञा की थी {6:13} और मैं इस्राएल के लोगों को कभी छोड़ूँगा नहीं।” {6:14} इस प्रकार सुलैमान ने मन्दिर का निर्माण पूरा किया। {6:15} मन्दिर के भीतर पत्थर की दीवारें, देवदारु के तख्तों से मढ़ी गई थीं। देवदारु के तख्ते फर्श से छत तक थे। पत्थर का फर्श चीड़ के तख्तों से ढका था। {6:16} उन्होंने मन्दिर के पिछले गहरे भाग में एक कमरा तीस फुट लम्बा बनाया। उन्होंने इस कमरे की दीवारों को देवदारु के तख्तों से मढ़ा। देवदारू के तख्ते फर्श से छत तक थे। यह कमरा सर्वाधिक पवित्र स्थान कहा जाता था। {6:17} सर्वाधिक पवित्र स्थान के सामने मन्दिर का मुख्या भाग था। यह कमरा साठ फुट लम्बा था। {6:18} उन्होंने इस कमरे की दीवारों को देवदारू के तख्तों से मढ़ा, दीवार का कोई भी पत्थर नहीं देखा जा सकता था। उन्होंने फूलों और कद्दू के चित्र देवदारु के तख्तों में नक्काशी की। {6:19} सुलैमान ने मन्दिर के पीछे भीतर गहरे कमरे को तैयार किया। यह कमरा यहोवा के साक्षीपत्र के सन्दूक के लिये था। {6:20} यह कमरा तीस फुट लम्बा तीस फुट चौड़ा और तीस फुट ऊँचा था। {6:21} सुलैमान ने इस कमरे को शुद्ध सोने से मढ़ा। उसने इस कमरे के सामने एक सुगन्ध वेदी बनाई। उसने वेदी को सोने से मढ़ा और उसके चारों ओर सोने की जंजीरें लपेटीं। {6:22} सारा मन्दिर सोने से मढ़ा था और सर्वाधिक पवित्र स्थान के सामने वेदी सोने से मढ़ी गई थी। {6:23} कारीगरों ने पंख सहित दो करूब (स्वर्गदूतों) की मूर्तियाँ बनाईं। कारीगरों ने जैतून की लकड़ी से मूर्तियाँ बनाई। ये करूब (स्वर्गदूत) सर्वाधिक पवित्र स्थान में रखे गये। हर एक स्वर्गदूत पन्द्रह फुट ऊँचा था। {6:24} वे दोनों करुब(स्वर्गदूत) एक ही माप के थे और एक ही शैली में बने थे। हर एक {6:25} करूब(स्वर्गदूत) के दो पंख थे। हर एक पंख साढ़े सात फुट लम्बा था। एक पंख के सिरे {6:26} से दूसरे पंख के सिरे तक पन्द्रह फुट था और हर एक करूब(स्वर्गदूत) पन्द्रह फुट ऊँचा था। {6:27} ये करूब (स्वर्गदूत) सर्वाधिक पवित्र स्थान में रखे गए थे। वे एक दूसरे की बगल में खड़े थे। उनके पंख एक दूसरे को कमरे के मध्य में छूते थे। अन्य दो पंख हर एक बगल की दीवार को छूते थे। {6:28} दोनों करूब(स्वर्गदूत) सोने से मढ़े गए थे। {6:29} मुख्य कक्ष और भीतरी कक्ष के चारों ओर की दीवारों पर करूब (स्वर्गदूतों) ताड़ के वृक्षों और फूल के चित्र उकेरे गए थे। {6:30} दोनों कमरों की फर्श सोने से मढ़ी गई थी। {6:31} कारीगरों ने जैतून की लकड़ी के दो दरवाजे बनाये। उन्होंने उन दोनों दरवाजों को सर्वाधिक पवित्र स्थान के प्रवेश द्वार में लगाया। दरवाजों के चारों ओर की चौखट पाँच पहलदार बनी थी। {6:32} उन्होंने दोनों दरवाजों को जैतून की लकड़ी का बनाया। कारीगरों ने दरवाजों पर करूब (स्वर्गदूतों), ताड़ के वृक्षों और फूलों के चित्रों को उकेरा। तब उन्होंने दरवाजों को सोने से मढ़ा। {6:33} उन्होंने मुख्य कक्ष में प्रवेश के लिये भी दरवाजे बनाये। उन्होंने एक वर्गाकार दरवाजे की चौखट बनाने के लिये जैतून की लकड़ी का उपयोग किया। {6:34} तब उन्होने दरवाजा बनाने के लिये चीड़ की लकड़ी का उपयोग किया। {6:35} वहाँ दो दरवाजे थे। हर एक दरवाजे के दो भाग थे, अत: दोनों दरवाजे मुड़कर बन्द होते थे। उन्होंने दरवाजों पर करूब (स्वर्गदूत) ताड़ के वृक्षों और फूलों के चित्रों को उकेरा। तब उन्होंने उन्हें सोने से मढ़ा। {6:36} तब उन्होंने भीतरी आँगन बनाया। उन्होंने इस आँगन के चारों ओर दीवारें बनाईं। हर एक दीवार कटे पत्थरों की तीन पँक्तियों और देवदारू की लकड़ी की एक पंक्ति से बनाई गई। {6:37} उन्होंने वर्ष के दूसरे महीने जिब माह में मन्दिर का निर्माण आरम्भ किया। इस्राएल के लोगों पर सुलैमान के शासन के चौथे वर्ष में यह हुआ। {6:38} मन्दिर का निर्माण वर्ष के आठवें महीने बूल माह मे पूरा हुआ। लोगों पर सुलैमान के शासन के ग्यारहवे वर्ष में यह हुआ था। मन्दिर के निर्माण में सात वर्ष लगे। मन्दिर ठीक उसी प्रकार बना था जैसा उसे बनाने की योजना थी। {i7:1} सुलैमान का महल {7:1} राजा सुलैमान ने अपने लिये एक महल भी बनवाया। सुलैमान के महल के निर्माण को पूरा करने में तेरह वर्ष लगे। {7:2} उसने उस इमारत को भी बनाया जिसे, “लबानोन का वन” कहा जाता है। यह डेढ़ सौ फुट लम्बा, पचहत्तर फुट चौड़ा, और पैंतालीस फुट ऊँचा था। इसमें देवदारू के स्तम्भों की चार पंक्तियाँ थीं। हर एक पंक्ति के सिरे पर एक देवदारु का शीर्ष था। {7:3} स्तम्भों की पंक्तियों के आर पार जाती हुई देवदारु की शहतीरें थीं। उन्होंने देवदारू के तख्तों को छत के लिये इन शहतीरों पर रखा था। स्तम्भों के हर एक विभाग के लिये पन्द्रह शहतीरें थीं। सब मिलाकर पैंतालीस शहतीरें थीं। {7:4} बगल की हर एक दीवार में खिड़कियों की तीन पंक्तियाँ थीं। खिड़कियाँ परस्पर आमने — सामने थीं। {7:5} हर एक के अन्त में तीन दरवाजें थे। सभी दरवाजों के द्वार और चौखटे वर्गाकार थें। {7:6} सुलैमान ने “स्तम्भों का प्रवेश द्वार मण्डप” भी बनाया। यह पच्हत्तर फुट लम्बा और पैंतालीस फुट चौड़ा था। प्रवेश द्वारा मण्डप के साथ साथ स्तम्भों पर टिकी एक छत थी। {7:7} सुलैमान ने एक सिंहासन कक्ष बनाया जहाँ वह लोगों का न्याय करता था। वह इसे “न्याय महाकक्ष” कहता था। कक्ष फर्श से लेकर छत तक देवदारू से मढ़ा था। {7:8} जिस भवन में सुलैमान रहता था, वह न्याय महाकक्ष के पीछ दूसरे आँगन में था। यह महल वैसे ही बना था जैसा न्याय महाकक्ष बना था। उसने अपनी पत्नी जो मिस्र के राजा की पुत्री थी, के लिये भी वैसा ही महल बनाया। {7:9} ये सभी इमारतें बहुमूल्य पत्थर के टुकडों से बनी थीं। ये पत्थर समुचित आकार में आरे से काटे गये थे। ये बहुमूल्य पत्थर नींव से लेकर दीवार की ऊपरी तह तक लगे थे। आँगन के चारों ओर की दीवार भी बहुमूल्य पत्थर के टुकड़ों से बनी थी। {7:10} नींव विशाल बहुमूल्य पत्थरों से बनीं थीं। कुछ पत्थर पन्द्रह फुट लम्बे थे, और अन्य बारह फुट लम्बे थे। {7:11} उन पत्थरों के शीर्ष पर अन्य बहुमूल्य पत्थर और देवदारू की शहतीरें थीं। {7:12} महल के आँगन, मन्दिर के आँगन और मन्दिर के प्रवेश द्वार मण्डप के चारों ओर दीवारें थीं। वे दीवारें पत्थर की तीन पंक्तियों और देवदारु लकड़ी की एक पंक्ति से बनीं थीं। {7:13} राजा सुलैमान ने हीराम नामक व्यक्ति के पास सोर में संदेश भेजा। सुलैमान हीराम को यरूशलेम लाया। {7:14} हीराम की माँ नप्ताली परिवार समूह से इस्राएली थी। उसका मृत पिता सोर का था। हीराम काँसे से चीज़ें बनाता था। वह बहुत कुशल और अनुभवी कारीगर था। अत: राजा सुलैमान ने उसे आने के लिये कहा और हीराम ने उसे स्वीकार किया। इसलिये राजा सुलैमान ने हीराम को काँसे के सभी कामों का अधीक्षक बनाया। हीराम ने काँसे से निर्मित सभी चीज़ों को बनाया। {7:15} हीराम ने काँसे के दो स्तम्भ बनाए। हर एक स्तम्भ सत्ताईस फुट लम्बा और अट्ठारह फुट गोलाई वाला था। स्तम्भ खोखले थे और धातु तीन इंच मोटी थी। {7:16} हीराम ने दो काँसे के शीर्ष भी बनाए जो साढ़े सात फुट ऊँचे थे। हीराम ने इन शीर्षों को स्तम्भों के सिरों पर रखा। {7:17} तब उसने दोनों स्तम्भों के ऊपर के शीर्षों को ढकने के लिये जंजीरों के दो जाल बनाए। {7:18} तब उसने अलंकरण की दो पंक्तियाँ बनाईं जो अनार की तरह दिखते थे। उन्होंने इन काँसे के अनारों को हर एक स्तम्भ के जालों में, स्तम्भों के सिरों के शीर्षों को ढकने के लिये रखा। {7:19} साढ़े सात फुट ऊँचे स्तम्भों के सिरों के शीर्ष फूल के आकार के बने थे। {7:20} शीर्ष स्तम्भों के सिरों पर थे। वे कटोरे के आकार के जाल के ऊपर थे। उस स्थान पर शीर्षों के चारों ओर पंक्तियों में बीस अनार थे। {7:21} हीराम ने इन दोनों काँसे के स्तम्भों को मन्दिर के प्रवेश द्वार पर खड़ा किया। द्वार के दक्षिण की ओर एक स्तम्भ तथा द्वार के उत्तर की ओर दूसरा स्तम्भ खड़ा किया गया। दक्षिण के स्तम्भ का नाम याकीन रखा गया। उत्तर के स्तम्भ का नाम बोआज रखा गया। {7:22} उन्होंने फूल के आकार के शीर्षों को स्तम्भों के ऊपर रखा। इस प्रकार दोनों स्तम्भों पर काम पूरा हुआ। {7:23} तब हीराम ने काँसे का एक गोल हौज बनाया। उन्होंने इस हौज को “सागर” कहा। हौज लगभग पैंतालीस फुट गोलाई में था। यह आर — पार पन्द्रह फुट और साढ़े सात फुट गहरा था। {7:24} हौज के बाहरी सिरे पर एक बारी थी। इस बारी के नीचे काँसे के कद्दूओं की दो कतारें हौज को घेरे हुए थीं। काँसे के कद्दू हौज के हिस्से के रूप में एक इकाई में बने थे। {7:25} हौज बारह काँसे के बैलों की पीठों पर टिका था। ये बारहों बैल तालाब से दूर बाहर को देख रहे थे। तीन उत्तर को, तीन पूर्व को, तीन दक्षिण को और तीन पश्चिम को देख रहे थे। {7:26} हौज की दीवारें चार इंच मोटी थीं। तालाब के चारों ओर की किनारी एक प्याले की किनारी या फूल की पंखुड़ियों की तरह थी। तालाब की क्षमता लगभग ग्यारह हजार गैलन थी। {7:27} तब हीराम ने दस काँसे की गाड़ीयाँ बनाईं। हर एक छः फुट लम्बी, छः फुट चौड़ी और साढ़े चार फुट ऊँची थी। {7:28} गाड़ियाँ वर्गाकार तख्तों को चौखटों में मढ़कर बनायी गयी थीं। {7:29} तख्तों और चौखटों पर काँसे के सिंह, बैल और करूब (स्वर्गदूत) थे। सिंह और बैलों के ऊपर और नीचे फूलों के आकार हथौड़े से काँसे में उभारे गए थे। {7:30} हर एक गाड़ी में चार काँसे के पहिये काँसे की धुरी के साथ थे। कोनों पर विशाल कटोरे के लिए काँसे के आधार बने थे। आधारों पर हथौड़े से फूलों के आकर काँसे में उभारे गए थे। {7:31} कटोरे के लिये ऊपरी सिरे पर एक ढाँचा बना था। यह कटोरों से ऊपर को अट्ठारह इंच ऊँचा था। कटोरे का खुला हुआ गोल भाग सत्ताईस ईंच व्यास वाला था। ढाँचे पर काँसे में आकार उकेरे गए थे। ढाँचा चौकोर था, गोल नहीं। {7:32} ढाँचे के नीचे चार पहिये थे। पहिये सत्ताईस इंच व्यास वाले थे। पहिये के मध्य के धुरे गाड़ी के साथ एक इकाई के रूप में बने थे। {7:33} पहिये रथ के पहियों के समान थे। पहियों की हर एक चीज़ — धुरे, परिधि, तीलियाँ और नाभि काँसे की बनी थी। {7:34} हर एक गाड़ी के चारों कोनों पर चार आधार थे। वे गाड़ी के साथ एक इकाई के रूप में बने थे। {7:35} हर एक गाड़ी के ऊपरी सिरे के चारों ओर एक काँसे की पट्टी थी। यह गाड़ी के साथ एक इकाई में बनीं थी। {7:36} गाड़ी की बगल और ढाँचे पर करूब (स्वर्गदूतों), सिंहों और ताड़ के वृक्षों के चित्र काँसे में उकेरे गए थे। ये चित्र गाड़ियों पर सर्वत्र, जहाँ भी स्थान था, उकेरे गए थे और गाड़ी के चारों ओर के ढाँचे पर फूल उकेरे गए थे। {7:37} हीराम ने दस गाड़ियाँ बनाईं और वे सभी एक सी थीं। हर एक गाड़ी काँसे की बनी थीं। काँसे को गलाया गया था और साँचे में ढाला गया था। अत: सभी गाड़ियाँ एक ही आकार और एक ही रूप की थीं। {7:38} हीराम ने दस कटोरे भी बनाये। एक — एक कटोरा दस गाड़ियों में से हर एक के लिये था। हर एक कटोरा छ: फुट व्यास वाला था और हर एक कटोरे में दो सौ तीस गैलन आ सकता था। {7:39} हीराम ने पाँच गाड़ियों को मन्दीर के दक्षिण और अन्य पाँच गाड़ियों को मन्दिर के उत्तर में रखा। उसने विशाल तालाब को मन्दिर के दक्षिण पूर्व कोने में रखा। {7:40} हीराम ने बर्तन, छोटे बेल्चे, और छोटे कटोरे भी बनाए। हीराम ने उन सारी चीजों को बनाना पूरा किया जिन्हें राजा सुलैमान उससे {7:41} बनवाना चाहता था। हीराम ने यहोवा के मन्दिर के लिये जो कुछ बनाईं उसकी सूची यह है: दो स्तम्भ, स्तम्भों के सिरों के {7:42} लिये कटोरे के आकार के दो शीर्ष, शीर्षों के चारों ओर लगाए जाने वले दो जाल। दो जालों के लिये चार सौ अनार {7:43} स्तम्भों के सिरों पर शीर्षों के दोनों कटोरों को ढकने के लिये; हर एक जाल के वास्ते अनारों की दो पंक्तियाँ थीं। वहाँ {7:44} दस गाड़ियाँ थी, हर गाड़ी पर एक कटोरा था, एक विशाल तालाब जो बारह बैलों पर टिका था, बर्तन, छोटे बेल्चे, छोटे कटोरे, {7:45} और यहोवा के मन्दिर के लिये सभी तश्तरियाँ। हीराम ने वे सभी चीज़ें बनाई जिन्हें राजा सुलैमान चाहता था। वे सभी झलकाए हुए काँसे से बनी थीं। {7:46} सुलैमान ने उस काँसे को कभी नहीं तोला जिसका उपयोग इन चीज़ों को बनाने के लिये हुआ था। यह इतना अधिक था कि इसका तौलना सम्भव नहीं था इसलिये सारे काँसे के तौल का कुल योग {7:47} कभी मलूम नहीं हुआ। राजा ने इन चीज़ों को सुक्कोत और सारतान के बीच यरदन नदी के समीप बनाने का आदेश दिया। उन्होंने इन चीज़ों को, काँसे को गलाकर और जमीन में बने साँचों में ढालकर, बनाया। {7:48} सुलैमान ने यह भी आदेश दिया कि मन्दिर के लिये सोने की बहुत सी चीज़ें बनाई जायें। सुलैमान ने मन्दिर के लिये सोने से जो चीज़ें बनाईं, वे ये हैं: सुनहली वेदी, सुनहली मेज (परमेश्वर {7:49} को भेंट चढ़ाई गई विशेष रोटी इस मेज पर रखी जाती थी) शुद्ध सोने के दीपाधार (सर्वाधिक पवित्र स्थान के सामने ये पाँच दक्षिण की ओर, और पाँच उत्तर की ओर थे।) सुनहले फूल, दीपक {7:50} और चिमटे, प्याले, दीपक को पूरे प्रकाश से जलता रखने के लिये औजार, कटोरे, कड़ाहियाँ, कोयला ले चलने के लिये उपयोग में आने वाली शुद्ध सोने की तश्तरियाँ और मन्दिर के प्रवेश द्वार के दरवाजे। {7:51} इस प्रकार सुलैमान ने, यहोवा के मन्दिर के लिये जो काम वह करना चाहता था, पूरा किया। तब सुलैमान ने वे सभी चीज़ें लीं जिन्हें उसके पिता दाऊद ने इस उद्देश के लिये सुरक्षित रखी थीं। वह इन चीज़ों को मन्दिर में लाया। उसने चाँदी और सोना यहोवा के मन्दिर के कोषागारों में रखा। {i8:1} मन्दिर में साक्षीपत्र का सन्दूक {8:1} तब राजा सुलैमान ने इस्राएल के सभी अग्रजों, परिवार समूहों के प्रमुखों तथा इस्राएल के परिवारों के प्रमुखों को एक साथ यरूशलेम में बुलाया। सुलैमान चाहता था कि वे साक्षीपत्र के सन्दूक को दाऊद नगर से मन्दिर में लायें। {8:2} इसलिये इस्राएल के सभी लोग राजा सुलैमान के साथ आये। यह एतानीम महीने में विशेष त्यौहार (आश्रयों का त्यौहार) के समय हुआ। (यह वर्ष का सातवाँ महीना था)। {8:3} इस्राएल के सभी अग्रज स्थान पर आए। तब याजकों ने पवित्र सन्दूक उठाया। {8:4} वे पवित्र तम्बू और तम्बू में की सभी चीज़ों सहित यहोवा के पवित्र सन्दूक को ले आए। लेवीवंशियों ने याजकों की साहायता इन चीज़ों को ले चलने में की। {8:5} राजा सुलैमान और इस्राएल के सभी लोग साक्षीपत्र के सन्दूक के सामने इकट्ठे हुए। उन्होंने अनेक बलि भेंट की। उन्होंने इतनी अधिक भेड़ें और पशु मारे कि कोई व्यक्ति उन सभी को गिनने में समर्थ नहीं था। {8:6} तब याजकों ने यहोवा के साक्षीपत्र के सन्दूक को उसके उचित स्थान पर रखा। यह मन्दिर के भीतर सर्वाधिक पवित्र स्थान में था। साक्षीपत्र का सन्दूक करूब (स्वर्गदूतों) के पंखों के नीचे रखा गया। {8:7} करूब (स्वर्गदूतों) के पंख पवित्र सन्दूक के ऊपर फैले थे। वे पवित्र सन्दूक और उसको ले चलने में सहायक बल्लियों को ढके थे। {8:8} ये सहायक बल्लियाँ बहुत लम्बी थीं। यदि कोई व्यक्ति पवित्र स्थान में सर्वाधिक पवित्र स्थान के सामने खड़ा हो, तो वह बल्लियों के सिरों को देख सकता था। किन्तु बाहर को कोई भी उन्हें नहीं देख सकता था। वे बल्लियाँ आज भी वहाँ अन्दर हैं। {8:9} पवित्र सन्दूक के भीतर केवल दो अभिलिखित शिलायें थीं। वे दो अभिलिखित शिलायें वही थीं, जिन्हें मूसा ने होरेब नामक स्थान पर पवित्र सन्दूक में रखा था। होरेब वह स्थान था जहाँ यहोवा ने इस्राएल के लोगों के साथ उनके मिस्र से बाहर आने के बाद वाचा की। {8:10} याजकों ने सन्दूक को सर्वाधिक पवित्र स्थान में रखा। जब याजक पवित्र स्थान से बाहर आए तो बादल यहोवा के मन्दिर में भर गया। {8:11} याजक अपना काम करते न रह सके क्योंकि मन्दिर यहोवा के प्रताप से भर गया था। {8:12} तब सुलैमान ने कहा: “यहोवा ने गगन में सूर्य को चमकाया, किन्तु उसने काले बादलों में रहना पसन्द किया। {8:13} मैंने तेरे लिए एक अद्भुत मन्दिर बनाया, एक निवास, जिसमें तू सदैव रहेगा।” {8:14} इस्राएल के सभी लोग वहाँ खड़े थे। इसलिये सुलैमान उनकी ओर मुड़ा और परमेश्वर ने उन्हें आशीर्वाद देने को कहा। {8:15} तब राजा सुलैमान ने यहोवा से एक लम्बी प्रार्थना की। जो उसने प्रार्थना की वह यह है: “इस्राएल का यहोवा परमेश्वर महान है। यहोवा ने मेरे पिता दाऊद से जो कुछ कहा — उन्हें उसने स्वयं पूरा किया है। यहोवा ने मेरे पिता से कहा, {8:16} ‘मैं अपने लोगों इस्राएलियों को मिस्र से बाहर लाया। लेकिन मैंने अभी तक इस्राएल परिवार समूह से किसी नगर को नहीं चुना है, कि मुझे सम्मान देने के लिये मन्दिर — निर्माण करे। और मैंने अपने लोग, इस्राएलियों का मार्ग दर्शक कौन व्यक्ति हो, उसे नहीं चुना है। किन्तु अब मैंने यरूशलेम को चुना है जहाँ मैं सम्मानित होता रहूँगा। किन्तु अब, दाऊद को मैंने चुना है। मेरे इस्राएली लोगों पर शासन करने के लिये।’ {8:17} “मेरे पिता दाऊद बहुत अधिक चाहते थे कि वे यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर के सम्मान के लिये मन्दिर बनाएं। {8:18} किन्तु यहोवा ने मेरे पिता दाऊद से कहा, “मैं जानता हूँ कि तुम मेरे सम्मान के लिये मन्दिर बनाने की प्रबल इच्छा रखते हो और यह अच्छा है कि तुम मेरा मन्दिर बनाना चाहते हो। {8:19} किन्तु तुम वह व्यक्ति नहीं हो जिसे मैंने मन्दिर बनाने के लिये चुना है। तुम्हारा पुत्र मेरा मन्दिर बनाएगा।” {8:20} “इस प्रकार यहोवा ने जो प्रतिज्ञा की थी उसे पूरी कर दी है। अब मैं अपने पिता दाऊद के स्थान पर राजा हूँ। अब मैं यहोवा की प्रतिज्ञा के अनुसार इस्राएल के लोगों पर शासन कर रहा हूँ और मैंने इस्राएल के परमेश्वर के लिये मन्दिर बनाया है। {8:21} मैंने मन्दिर में एक स्थान पवित्र सन्दूक के लिये बनाया है। उस पवित्र सन्दूक में वह साक्षीपत्र है जो वाचा यहोवा ने हमारे पूर्वजों के साथ किया था। यहोवा ने वह वाचा तब की जब वह हमारे पूर्वजों को मिस्र से बाहर ले आया था।” {8:22} तब सुलैमान यहोवा की वेदी के सामने खड़ा हुआ। सभी लोग उसके सामने खड़े थे। राजा सुलैमान ने अपने हाथों को फैलाया और आकाश की ओर देखा। {8:23} उसने कहा, “हे यहोवा इस्राएल के परमेश्वर तेरे समान धरती पर या आकाश में कोई ईश्वर नहीं है। तूने अपने लोगों के साथ वाचा की क्योंकि तू उनसे प्रेम करता है और तूने अपनी वाचा को पूरा किया। तू उन लोगों के प्रति दयालू और स्नेहपूर्ण है जो तेरा अनुसरण करते हैं। {8:24} तूने अपने सेवक मेरे पिता दाऊद से, एक प्रतिज्ञा की थी और तूने वह पूरी की है। तूने वह प्रतिज्ञा स्वयं अपने मुँह से की थी और तूने अपनी महान शक्ति से उस प्रतिज्ञा को आज सत्य घटित होने दिया है। {8:25} अब, यहोवा इस्राएल का परमेश्वर, उन अन्य प्रतिज्ञाओं को पूरा कर जो तूने अपने सेवक, मेरे पिता दाऊद से की थीं। तूने कहा था, ‘दाऊद जैसा तुमने किया वैसे ही तुम्हारी सन्तानों को मेरी आज्ञा का पालन सावाधानी से करना चाहिये। यदि वे ऐसा करेंगे तो सदा कोई न कोई तुम्हारे परिवार का व्यक्ति इस्राएल के लोगों पर शासन करेगा’ {8:26} और हे यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर, मैं फिर तुझसे माँगता हूँ कि तू कृपया मेरे पिता के साथ की गई प्रतिज्ञा को पूरी करता रहे। {8:27} “किन्तु परमेस्वर, क्या तू सचमुच इस पृथ्वी पर हम लोगों के साथ रहेगा तुझको सारा आकाश और स्वर्ग के उच्चतम स्थान भी धारण नहीं कर सकते। निश्चय ही यह मन्दिर भी, जिसे मैंने बनाया है, तुझको धारण नहीं कर सकता। {8:28} किन्तु तू मेरी प्रार्थना और मेरे निवेदन पर ध्यान दे। मैं तेरा सेवक हूँ और तू मेरा यहोवा परमेश्वर है। इस प्रार्थना को तू स्वीकार कर जिसे आज मैं तुझसे कर रहा हूँ। {8:29} बीते समय में तूने कहा था, ‘मेरा वहाँ सम्मान किया जायेगा।’ इसलिये कृपया इस मन्दिर की देख रेख दिन — रात कर। उस प्रार्थना को तू स्वीकार कर, जिसे मैं तुझसे इस समय मन्दिर में कह रहा हूँ। {8:30} यहोवा, मैं और तेरे इस्राएल के लोग इस मन्दिर में आएंगे और प्रार्थना करेंगे। कृपया इन प्रार्थनाओं पर ध्यान दे। हम जानते हैं कि तू स्वर्ग में रहता है। हम तुझसे वहाँ से अपनी प्रार्थना सुनने और हमें क्षमा करने की याचना करते हैं। {8:31} “यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के विरुद्ध कोई अपराध करेगा तो वह यहाँ तेरी वेदी के पास लाया जायेगा। यदि वह व्यक्ति दोषी नहीं है तो वह एक शपथ लेगा। वह शपथ लेगा कि वह निर्दोष है। {8:32} उस समय तू स्वर्ग में सुन और उस व्यक्ति के साथ न्याय कर। यदि वह व्यक्ति अपराधी है तो कृपया हमें स्पष्ट कर कि वह अपराधी है और यदि व्यक्ति निरपराध है तो हमें स्पष्ट कर कि वह अपराधी नहीं है। {8:33} “कभी — कभी तेरे इस्राएल के लोग तेरे विरुद्ध पाप करेंगे और उनके शत्रु उन्हें पराजित करेंगे। तब लोग तेरे पास लौटेंगे और वे लोग इस मन्दिर में तेरी प्रार्थना करेंगे। {8:34} कृपया स्वर्ग से उनकी प्रार्थना को सुन। तब अपने इस्राएली लोगों के पापों को क्षमा कर और उनकी भूमि उन्हें फिर से प्राप्त करने दे। तूने यह भूमि उनके पूर्वजों को दी थी। {8:35} “कभी — कभी वे तेरे विरुद्ध पाप करेंगे, और तू उनकी भूमि पर वर्षा होना बन्द कर देगा। तब वे इस स्थान की ओर मुँह करके प्रार्थना करेंगे और तेरे नाम की स्तुति करेंगे। तू उनको कष्ट सहने देगा और वे अपने पापों के लिये पश्चाताप करेंगे। {8:36} इसलिये कृपया स्वर्ग में उनकी प्रार्थना को सुन। तब हम लोगों को हमारे पापों के लिये क्षमा कर। लोगों को सच्चा जीवन बिताने की शिक्षा दे। हे यहोवा तब कृपया तू उस भूमि पर वर्षा कर जिसे तूने उन्हें दिया है। {8:37} “भूमि बहुत अधिक सूख सकती है और उस पर कोई अन्न उग नहीं सकेगा या संभव है लोगों में महामारी फैले। संभव है सारा पैदा हुआ अन्न कीड़े मकोड़ों द्वारा नष्ट कर दिया जाये या तेरे लोग अपने शत्रुओं के आक्रमण के शिकार बनें या तेरे अनेक लोग बीमार पड़ जायें। {8:38} जब इनमें से कुछ भी घटित हो, और एक भी व्यक्ति अपने पापों के लिये पश्चाताप करे, और अपने हाथों को इस मन्दिर की ओर प्रार्थना में फैलाये तो {8:39} कृपया उसकी प्रार्थना को सुन। उसकी प्रार्थना को सुन जब तू अपने निवास स्थान स्वर्ग में है। तब लोगों को क्षमा कर और उनकी सहायता कर। केवल तू यह जानता है कि लोगों के मन में सचमुच क्या है अतः हर एक साथ न्याय कर और उनके प्रति न्यायशील रह। {8:40} यह इसलिये कर कि तेरे लोग डरें और तेरा सम्मान तब तक सदैव करें जब तक वे इस भूमि पर रहें जिसे तूने हमारे पूर्वजों को दिया था। {8:41} “अन्य स्थानों के लोग तेरी महानता और तेरी शक्ति के बारे {8:42} में सुनेंगे। वे बहुत दूर से इस मन्दिर में प्रार्थना करने आएंगे। {8:43} कृपया अपने निवास स्थान, स्वर्ग से उनकी प्रार्थना सुन। कृपया तू वह सब कुछ प्रदान कर जिसे अन्य स्थानों के लोग तुझसे माँगें। तब वे लोग भी इस्राएली लोगों की तरह ही तुझसे डरेंगे और तेरा सम्मान करेंगे। {8:44} “कभी — कभी तू अपने लोगों को अपने शत्रुओं के विरुद्ध जाने और उनसे युद्ध करने का आदेश देगा। तब तेरे लोग तेरे चुने हुए इस नगर और मेरे बनाये हुए मन्दिर की ओर अभिमुख होंगे। जिसे मैंने तेरे सम्मान में बनाया है और वे तेरी प्रार्थना करेंगे। {8:45} उस समय तू अपने निवास स्थान स्वर्ग से उनकी प्रार्थनाओं को सुन और उनकी सहायता कर। {8:46} “तेरे लोग तेरे विरुद्ध पाप करेंगे। मैं इसे इसलिये जानता हूँ क्योंकि हर एक व्यक्ति पाप करता है और तू अपने लोगों पर क्रोधित होगा। तू उनके शत्रुओं को उन्हें हराने देगा। उनके शत्रु उन्हें बनदी बनाएंगे और उन्हें किसी बहुत दूर के देश में ले जाएंगे। {8:47} उस दूर के देश में तेरे लोग समझेंगे कि क्या हो गया है। वे अपने पापों के लिये पश्चाताप करेंगे और तुझसे प्रार्थना करेंगे। वे कहेंगे, ‘हमने पाप और अपराध किया है।’ {8:48} वे उस दूर के देश में रहेंगे। किन्तु यदि वे इस देश जिसे तूने उनके पूर्वजों को दिया और तेरे चुने नगर और इस मन्दिर जिसे मैंने तेरे सम्मान में बनाया है। उसकी ओर मुख करके तुझसे प्रार्थना करेंगे। {8:49} तो तू कृपया अपने निवास स्थान स्वर्ग से उनकी सुन। {8:50} अपने लोगों को सभी पापों के लिये क्षमा कर दे और तू अपने विरोध में हुए पाप के लिये उन्हें क्षमा कर उनके शत्रुओं को उनके प्रति दयालु बना। {8:51} याद रख कि वे तेरे लोग हैं, याद रख कि तू उन्हें मिस्र से बाहर लाया। यह वैसा ही था जैसा तूने जलती भट्टी से उन्हें पकड़ कर खींच लिया हो! {8:52} “यहोवा परमेश्वर, कृपया मेरी प्रार्थना और अपने इस्राएली लोगों की प्रार्थना सुन। उनकी प्रार्थना, जब कभी वे तेरी सहायता के लिये करें, सुन। {8:53} तूने उन्हें पृथ्वी के सारे मनुष्यों में से अपना विशेष लोग होने के लिये चुना है। यहोवा तूने उसे हमारे लिये करने की प्रतिज्ञा की है। तूने हमारे पूर्वजों को मिस्र से बाहर लाते समय यह प्रतिज्ञा अपने सेवक मूसा के माध्यम से की थी।” {8:54} सुलैमान ने परमेश्वर से यह प्रार्थना की। वह वेदी के सामने अपने घुटनों के बल था। सुलैमान ने स्वर्ग की ओर भुजायें उठाकर प्रार्थना की। तब सुलैमान ने प्रार्थना पूरी की और वह उठ खड़ा हुआ। {8:55} तब उसने उच्च स्वर में इस्राएल के सभी लोगों को आशीर्वाद देने के लिये परमेश्वर से याजना की। सुलैमान ने कहा: {8:56} “यहोवा की स्तुति करो! उसने प्रतिज्ञा की, कि वह अपने इस्राएल के लोगों को शान्ति देगा और उसने हमें शान्ति दी है! यहोवा ने अपने सेवक मूसा का उपयोग किया और इस्राएल के लोगों के लिये बहुत सी अच्छी प्रतिज्ञायें कीं और यहोवा ने उन हर एक प्रतिज्ञाओं को पूरा किया है। {8:57} मैं प्रार्थना करता हूँ कि यहोवा, हमारा परमेश्वर हम लोगों के साथ उसी तरह रहेगा जैसे वह हमारे पूर्वजों के साथ रहा। मैं प्रार्थना करता हूँ कि यहोवा हमे कभी नहीं त्यागेगा। {8:58} मैं प्रार्थना करता हूँ कि हम उसकी ओर अभिमुख होंगे और उसका अनुसरण करेंगे। तब हम लोग उसके सभी नियमों, निर्णयों और आदेशों का पालन करेंगे जिन्हें उसने हमारे पूर्वजों को दिया। {8:59} मैं आशा करता हूँ कि यहोवा हमारा परमेश्वर सदैव इस प्रार्थना को और जिन वस्तुओं की मैंने याचना की है, याद रखेगा। मैं प्रार्थना करता हूँ कि यहोवा अपने सेवक राजा और अपने लोग इस्राएल के लिये ये सब कुछ करेगा। मैं प्रार्थना करता हूँ कि वह प्रतिदिन यह करेगा। {8:60} यदि यहोवा इन कामों को करेगा तो संसार के सभी व्यक्ति यह जानेंगे कि मात्र यहोवा ही सत्य परमेश्वर है। {8:61} ऐ लोगो, तुम्हें यहोवा, हमारे परमेश्वर का भक्त और उसके प्रति सच्चा होना चाहिये। तुम्हें उसके सभी नियमों और आदेशों का अनुसरण और पालन करना चाहिये। तुम्हें इस समय की तरह, भविष्य में भी उसकी आज्ञा का पालन करते रहना चाहिये।” {8:62} तब राजा सुलैमान और उसके साथ के इस्राएल के लोगों ने यहोवा को बलि — भेंट की। {8:63} सुलैमान ने बाईस हजार पशुओं और एक लाख बीस हजार भेड़ों को मारा। ये सहभागिता भेटों के लिये थीं। यही पद्धति थी जिससे राजा और इस्राएल के लोगों ने मन्दिर का समर्पण किया अर्थात् उन्होंने यह प्रदर्शित किया कि उन्होंने मन्दिर को यहोवा को अर्पित किया। {8:64} उसी दिन राजा सुलैमान ने मन्दिर के सामने का आँगन समर्पित किया। उसने होमबलि, अन्नबलि और मेलबलि के रूप में काम आये जानवरों की चर्बी की भेंटें चढ़ाई। राजा सुलैमान ने ये भेंटें आँगन में चढ़ाई। उसने यह इसलिये किया कि इन सारी भेंटों को धारण करने के लिये यहोवा के सामने की काँसे की वेदी अत्याधिक छोटी थी। {8:65} इस प्रकार मन्दिर में राजा सुलैमान और इस्राएल के सारे लोगों ने पर्व मनाया। सारा इस्राएल, उत्तर में हमात दर्रे से लेकर दक्षिण में मिस्र की सीमा तक, वहाँ था। वहाँ असंख्य लोग थे। उन्होंने खाते पीते, सात दिन यहोवा के साथ मिलकर आनन्द मनाया। तब वे अगले सात दिनों तक वहाँ ठहरे। उन्होंने सब मिलाकर चौदह दिनों तक उत्सव मनाया। {8:66} अगले दिन सुलैमान ने लोगों से घर जाने को कहा। सभी लोगों ने राजा को धन्यवाद दिया, विदा ली और वे घर चले गये। वे प्रसन्न थे क्योंकि यहोवा ने अपने सेवक दाऊद के लिये और इस्राएल के लोगों के लिये बहुत सारी अच्छी चीज़ें की थीं। {i9:1} परमेश्वर सुलैमान के पास पुन: आता है {9:1} इस प्रकार सुलैमान ने यहोवा के मन्दिर और अपने महल का बनाना पूरा किया। सुलैमान ने उन सभी को बनाया जिनका निर्माण वह करना चाहता था। {9:2} तब यहोवा सुलैमान के सामने पुनः वैसे ही प्रकट हुआ जैसे वह इसके पहले गिबोन में हुआ था। {9:3} यहोवा ने उससे कहा: “मैंने तुम्हारी प्रार्थना सुनी। मैंने तुम्हारे निवेदन भी सुने जो तुम मुझसे करवाना चाहते हो। तुमने इस मन्दिर को बनाया और मैंने इसे एक पवित्र स्थान बनाया है। अतः यहाँ मेरा सदैव सम्मान होगा। मैं इस पर अपनी दृष्टि रखूँगा और इसके विषय में सदैव ध्यान रखूँगा। {9:4} तुम्हें मेरी सेवा वैसे ही करनी चाहिये जैसी तुम्हारे पिता दाऊद ने की। वह निष्पक्ष और निष्कपट था और तुम्हें मेरे नियमों और उन आदेशों का पालन करना चाहिये जिन्हें मैंने तुम्हें दिया है। {9:5} यदि तुम यह सब कुछ करते रहोगे तो मैं यह निश्चित देखूँगा कि इस्राएल का राजा सदैव तुम्हारे परिवार में से ही कोई हो। यही प्रतिज्ञा है जिसे मैंने तुम्हारे पिता दाऊद से की थी। मैंने उससे कहा था कि इस्राएल पर सदैव उसके वंशजों में से एक का शासन होगा। {9:6} “किन्तु यदि तुम या तुम्हारी सन्तानें मेरा अनुसरण करना छोड़ते हो, मेरे दिये गए नियमों और आदेशों का पालन नहीं करते और तुम दूसरे देवता की सेवा और पूजा करते हो तो मैं इस्राएल को वह देश छोड़ने को विवश करूँगा जिसे मैंने उन्हें दिया {9:7} है। इस्राएल अन्य लोगों के लिये उदाहरण होगा। अन्य लोग इस्राएल का मजाक उड़ाएंगे। मैंने मन्दिर को पवित्र किया है। यह वह स्थान है जहाँ लोग मेरा सम्मान करते हैं। किन्तु यदि तुम मेरी आज्ञा का पालन नहीं करते तो इसे मैं नष्ट कर दूँगा। {9:8} यह मन्दिर नष्ट कर दिया जायेगा। हर एक व्यक्ति जो इसे देखेगा चकित होगा। वे पूछेंगे, ‘यहोवा ने इस देश के प्रति और इस मन्दिर के लिये इतना भयंकर कदम क्यों उठाया’ {9:9} अन्य लोग उत्तर देंगे, ‘यह इसलिये हुआ कि उन्होंने यहोवा अपने परमेश्वर को त्याग दिया। वह उनके पूर्वजों को मिस्र से बाहर लाया था। किन्तु उन्होंने अन्य देवताओं का अनुसरण करने का निश्चय किया। उन्होंने उन देवताओं की सेवा और पूजा करनी आरम्भ की। यही कारण है कि यहोवा ने उनके लिये इतना भयंकर कार्य किया।’” {9:10} यहोवा का मन्दिर और अपना महल बनाने में सुलैमान को बीस वर्ष लगे {9:11} और बीस वर्ष के बाद राजा सुलैमान ने सोर के राजा हीराम को गलील में बीस नगर दिये। सुलैमान ने राजा हीराम को वे नगर दिये क्योंकि हीराम ने मन्दिर और महल बनाने में सुलैमान की सहायता की। हीराम ने सुलैमान को उतने सारे देवदारु और चीड़ के वृक्ष तथा सोना दिया। जितना उसने चाहा। {9:12} इसलिये हीराम ने सोर से इन नगरों को देखने के लिये यात्रा की, जिन्हें सुलैमान ने उसे दिये। जब हीराम ने उन नगरों को देखा तो वह प्रसन्न नहीं हुआ। {9:13} राजा हीराम ने कहा, “मेरे भाई जो नगर तुम ने मुझे दिये हैं वे हैं ही क्या” राजा हीराम ने उस प्रदेश का नाम कबूल प्रदेश रखा और वह क्षेत्र आज भी कबूल कहा जाता है। {9:14} हीराम ने सुलैमान के पास लगभग नौ हजार पौंड सोना मन्दिर को बनाने में उपयोग करने के लिये भेजा था। {9:15} राजा सुलैमान ने दासों को अपने मन्दिर और महल बनाने के लिये काम करने के लिये विवश किया। तब राजा सुलैमान ने इन दासों का उपयोग बहुत सी चीजों को बनाने में किया। उसने मिल्लो बनाया। उसने यरूशलेम नगर के चारों ओर चहारदीवारी भी बनाई। तब उसने हासोर, मगिद्दो और गेजेर नगरों को पुन: बनाया। {9:16} बीते समय में मिस्र का राजा गेजेर नगर के विरुद्ध लड़ा था और उसे जला दिया था। उसने उन कनानी लोगों को मार डाला जो वहाँ रहते थे। सुलैमान ने फिरौन की पुत्री से विवाह किया। इसलिये फिरौन ने उस नगर को सुलैमान के लिये विवाह की भेंट के रूप में दिया। {9:17} सुलैमान ने उस नगर को पुनः बनाया। सुलैमान ने निचले बथोरेन नगर को भी बनाया। {9:18} राजा सुलैमान ने जुदैन मरुभूमि में बालात और तामार नगरों को भी बनाया। {9:19} राजा सुलैमान ने वे नगर भी बनाये जहाँ वह अन्य और चीज़ों का भण्डार बना सकता था और उसने अपने रथों और घोड़ों के लिये भी स्थान बनाये। सुलैमान ने अन्य बहुत सी चीज़ें भी बनाईं जिन्हें वह यरूशलेम, लबानोन और अपने शासित अन्य सभी स्थानों में चाहता था। {9:20} देश में ऐसे लोग भी थे जो इस्राएली नहीं थे। वे लोग एमोरी, हित्ती, परिज्जी, हिब्बी और यबूसी थे। {9:21} इस्राएली उन लोगों को नष्ट नहीं कर सके थे। किन्तु सुलैमान ने उन्हें दास के रूप में अपने लिये काम करने को विवश किया। वे अभी तक दास हैं। {9:22} सुलैमान ने किसी ईस्राएली को अपना दास होने के लिये विवश नहीं किया। इस्राएल के लोग सैनिक, राज्य कर्मचारी, अधिकारी, नायक और रथचालक थे। {9:23} सुलैमान की योजनाओं के साढ़े पाँच सौ पर्यवेक्षक थे। वे उन व्यक्तियों के ऊपर अधिकारी थे जो काम करते थे। {9:24} फिरौन की पुत्री दाऊद के नगर से वहाँ गई जहाँ सुलैमान ने उसके लिये विशाल महल बनाया। तब सुलैमान ने मिल्लों बनाया। {9:25} हर वर्ष तीन बार सुलैमान होमबलि और मेलबलि वेदी पर चढ़ाता था। यह वही वेदी थी जिसे सुलैमान ने यहोवा के लिये बनाया था। राजा सुलैमान यहोवा के सामने सुगन्धि भी जलाता था। अत: मन्दिर के लिये आवश्यक चीज़ें दिया करता था। {9:26} राजा सुलैमान ने एस्योन गेबेर में जहाज भी बनाये। यह नगर एदोम प्रदेश में लाल सागर के तट पर एलोत के पास था। {9:27} राजा हीराम के पास कुछ ऐसे व्यक्ति थे जो समुद्र के बारे में अच्छा ज्ञान रखते थे। वे व्यक्ति प्राय: जहाज से यात्रा करते थे। राजा हीराम ने उन व्यक्तियों को सुलैमान के नाविक बेड़े में सेवा करने और सुलैमान के व्यक्तियों के साथ काम करने के लिये भेजा। {9:28} सुलैमान के जहाज ओपोर को गये। वे जहाज एकतीस हजार पाँच सौ पौंड सोना आपोर से सुलैमान के लिये लेकर लौटे। {i10:1} शीबा की रानी सुलैमान से मिलने आती है {10:1} शीबा की रानी ने सुलैमान के बारे में सुना। अतः वह कठिन प्रशानों से उसकी परीक्षा लेने को आई। {10:2} उसने सेवकों की विशाल संख्या के साथ यरूशलेम की यात्रा की। अनेक ऊँट मसाले, रत्न, और बहुत सा सोना ढो रहे थे। वह सुलैमान से मिली और उसने उन सब प्रश्नों को पूछा जिन्हें वह सोच सकती थी। {10:3} सुलैमान ने सभी प्रश्नों के उत्तर दिये। उसका कोई भी प्रश्न उसके उत्तर देने के लिये अत्याधिक कठिन नहीं था। {10:4} शीबा की रानी ने समझ लिया कि सुलैमान बहुत बुद्धिमान है। उसने उस सुन्दर महल को भी देखा जिसे उसने बनाया था। {10:5} रानी ने राजा की मेज पर भोजन भी देखा। उसने उसके अधिकारियों को एक साथ मिलते देखा। उसने महल के सेवकों और जिन अच्छे वस्त्रों को उन्होंने पहन रखा था, उन्हें भी देखा। उसने उसकी दावतों और मन्दिर में चढ़ाई गई भेंटों को देखा। उन सभी चीजों ने वास्तव में उसे चकित कर दिया। उसकी साँस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गई! {10:6} इसलिये रानी ने राजा से कहा, “मैंने अपने देश में आपकी बुद्धिमानी और बहुत सी बातों के बारे में सुना जो आपने कीं। वे सभी बातें सत्य हैं! {10:7} मैं इन बातों में तब तक विश्वास नहीं करती थी जब तक मैं यहाँ नहीं आई और इन चीज़ों को अपनी आँखों से नहीं देखा। अब मैं देखती हूँ कि जितना मैंने सुन रखा था उससे भी अधिक यहाँ है। आपकी बुद्धिमत्ता और सम्पत्ति उससे बहुत अधिक है जितनी लोगों ने मुझको बतायी। {10:8} आपकी पत्नियाँ और आपके अधिकारी बहुत भाग्यशाली हैं। वे प्रतिदिन आपकी सेवा कर सकते हैं और आपकी बुद्धिमत्तापूर्ण बातें सुन सकते हैं। {10:9} आपका यहोवा परमेश्वर स्तुति योग्य है! आपको इस्राएल का राजा बनाने में उसे प्रसन्नता हुई। यहोवा परमेश्वर इस्राएल से प्रेम करता है। इसलिये उसने आपको राजा बनाया। आप नियमों का अनुसरण करते हैं और लोगों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करते हैं।” {10:10} तब शीबा की रानी ने राजा को लगभग नौ हजार पौंड सोना दिया। उसने उसे अनेक मसाले और रत्न भी दिये। जितनी मात्रा में शीबा की रानी ने राजा सुलैमान को मसाले उपहार में दिये, उतनी मात्रा में मसाले फिर कभी इस्राएल देश में नहीं आए। शीबा की रानी ने उससे अधिक मसाले सुलैमान को दिये जितने पहले कभी किसी ने इस्राएल को लाकर दिये थे। {10:11} हीराम के जहाज ओपोर से सोना ले आए। वे जहाज बहुत अधिक लकड़ी और रत्न भी लाए। {10:12} सुलैमान ने लकड़ी का उपयोग मन्दिर और महल को सम्भालने के लिये किया। उसने लकड़ी का उपयोग गायकों के लिये वीणा और बीन बनाने में भी किया। अन्य कोई भी व्यक्ति उस प्रकार की लकड़ी इस्राएल में कभी नहीं लाया, और किसी भी व्यक्ति ने तब से उस प्रकार की लकड़ी नहीं देखी। {10:13} तब राजा सुलैमान ने शीबा की रानी को वे भेंटें दीं जो कोई राजा किसी अन्य देश के शासक को सदैव देता है। तब उसने उसे वह सब दिया जो कुछ भी उसने माँगा। उसके बाद रानी सेवकों सहित अपने देश को वापस लौट गई। {10:14} राजा सुलैमान प्रति वर्ष लगभग उन्नासी हजार नौ सौ बीस पौंड सोना प्राप्त करता था। {10:15} व्यापारिक जहाजों से सोना लाये जाने के अतिरिक्त उसने बणिक, व्यापारियों और अरब के रजाओं तथा देश के प्रशासकों से भी सोना प्राप्त किया। {10:16} राजा सुलैमान ने दो सौ बड़ी ढालें सोने की परतों से बनाईं। हर एक ढाल में लगभग पन्द्रह पौंड सोना लगा था। {10:17} उसने सोने की पट्टियों की तीन सौ छोटी ढालें भी बनाईं। हर एक ढाल में लगभग चार पौंड सोना लगा था। राजा ने उन्हें उस भवन में रखा जिसे “लबानोन का वन” कहा जाता था। {10:18} राजा सुलैमान ने एक विशाल हाथी दाँत का सिंहासन भी बनाया। उसने उसे शुद्ध सोने से मढ़ा। {10:19} सिंहासन पर पहुँचने के लिये उसमें छ: पैड़ियाँ थीं। सिंहासन का पिछला भाग सिरे पर गोल था। कुर्सी के दोनों ओर हत्थे लगे थे और कुर्सी की बगल में दोनों हत्थों के नीचे सिंहों की तस्वीरें बनी थीं। {10:20} छ: पैड़ियों में से हर एक पर दो सिंह थे। हर एक के सिरे पर एक सिंह था। किसी भी अन्य राज्य में इस प्रकार का कुछ भी नहीं था। {10:21} सुलैमान के सभी प्याले और गिलास सोने के बने थे और “लबानोन का वन” नामक भवन में सभी अस्त्र — शस्त्र शुद्ध सोने के बने थे। महल में कुछ भी चाँदी का नहीं बना था। सुलैमान के समय में सोना इतना अधिक था कि लोग चाँदी को महत्वपूर्ण नहीं समझते थे। {10:22} राजा के पास बहुत से व्यापारिक जहाज भी थे जिन्हें वह अन्य देशों से वस्तुओं का व्यापार करने के लिये बाहर भेजता था। ये हीराम के जहाज थे। हर तीसरे वर्ष जहाज सोना, चाँदी, हाथी दाँत और पशु लाते थे। {10:23} सुलैमान पृथ्वी पर महानतम राजा था। वह सभी राजाओं से अधिक धन्वान और बुद्धिमान था। {10:24} सर्वत्र लोग राजा सुलैमान को देखना चाहते थे। वे परमेश्वर द्वारा दी गई उसकी बुद्धिमत्ता की बात सुनना चाहते थे। {10:25} प्रत्येक वर्ष लोग राजा का दर्शन करने आते थे और प्रत्येक व्यक्ति भेंट लाता था। वे सोने — चाँदी के बने बर्तन, कपड़े, अस्त्र — शस्त्र, मसाले, घोड़े और खच्चर लाते थे। {10:26} अत: सुलैमान के पास अनेक रथ और घोड़े थे। उसके पास चौदह सौ रथ और बारह हजार घोड़े थे। सुलैमान ने इन रथों के लिये विशेष नगर बनाये। अत: रथ उन नगरों में रखे जाते थे। राजा सुलैमान ने रथों में से कुछ को अपने पास यरूशलेम में भी रखा। {10:27} राजा ने इस्राएल को बहुत सम्पन्न बना दिया। यरूशलेम नगर में चाँदी इतनी सामान्य थी जितनी चट्टानें, देवदारू की लकड़ी और पहाडों पर उगने वाले असंख्य अंजीर के पेड़ सामान्य थे। {10:28} सुलैमान ने मिस्र और कुएँ से घोड़े मँगाए। उसके व्यापारी उन्हें कुएँ से लाते थे और फिर उन्हें इस्राएल में लाते थे। {10:29} मिस्र के एक रथ का मूल्य लगभग पन्द्रह पौंड चाँदी था और एक घोड़े का मूल्य पौने चार पौंड चाँदी था। सुलैमान घोड़े और रथ हित्ती और अरामी राजाओं के हाथ बेचता था। {i11:1} सुलैमान और उसकी बहुत सी पत्नियाँ {11:1} राजा सुलैमान स्त्रियों से प्रेम करता था। वह बहुत सी ऐसी स्त्रियों से प्रेम करता था जो इस्राएल राष्ट्र की नहीं थीं। इनमें फ़िरौन की पुत्री, हित्ती स्त्रियाँ और मोआबी, अम्मोनी, एदोमी और सीदोनी स्त्रियाँ थीं। {11:2} बीते समय में यहोवा ने इस्राएल के लोगों से कहा था, “तुम्हें अन्य राष्ट्रों की स्त्रियों से विवाह नहीं करना चाहिये। यदि तुम ऐसा करोगे तो वे लोग तुम्हें अपने देवताओं का अनुसरण करने के लिये बाध्य करेंगी।” किन्तु सुलैमान उन स्त्रियों के प्रेम पाश में पड़ा। {11:3} सुलैमान की सात सौ पत्नियाँ थीं। (ये सभी स्त्रियाँ अन्य राष्ट्रों के प्रमुखों की पुत्रियाँ थीं।) उसके पास तीन सौ दासियाँ भी थीं जो उसकी पत्नियों के समान थीं। उसकी पत्नियों ने उसे परमेश्वर से दूर हटाया। {11:4} जब सुलैमान बूढ़ा हुआ तो उसकी पत्नियों ने उससे अन्य देवताओं का अनुसरण कराया। सुलैमान ने उसी प्रकार पूरी तरह यहोवा का अनुसरण नहीं किया जिस प्रकार उसके पिता दाऊद ने किया था। {11:5} सुलैमान ने अशतोरेत की पूजा की। यह सीदोन के लोगों की देवी थी। सुलैमान मिल्कोम की पूजा करता था। यह अम्मोनियों का घृणित देवता था। {11:6} इस प्रकार सुलैमान ने यहोवा के प्रति अपराध किया। सुलैमान ने यहोवा का अनुसरण पूरी तरह उस प्रकार नहीं किया जिस प्रकार उसके पिता दाऊद ने किया था। {11:7} सुलैमान ने कमोश की पूजा के लिये स्थान बनाया। कमोश मोआबी लोगों की घृणास्पद देवमूर्ति थी । सुलैमान ने उसके उच्चस्थान को यरूशलेम से लगी पहाड़ी पर बनाया। सुलैमान ने उसी पहाड़ी पर मोलेक का उच्चस्थान भी बनाया। मोलेक अम्मोनी लोगों की घृणास्पद देवमूर्ति थी। {11:8} तब सुलैमान ने अन्य देशों की अपनी सभी पत्नियों के लिये वही किया। उसकी पत्नियाँ सुगन्धि जलाती थीं और अपने देवताओं को बलि — भेंट करती थीं। {11:9} सुलैमान यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर का अनुसरण करने से दूर हट गया। अत: यहोवा, सुलैमान पर क्रोधित हुआ। यहोवा सुलैमान के पास दो बार आया जब वह छोटा था। {11:10} यहोवा ने सुलैमान से कहा कि तुम्हें अन्य देवताओं का अनुसरण नहीं करना चाहिये। किन्तु सुलैमान ने यहोवा के आदेश का पालन नहीं किया। {11:11} इसलिये यहोवा ने सुलैमान से कहा, “तुमने मेरे साथ की गई अपनी वाचा को तोड़ना पसन्द किया है। तुमने मेरे आदेशों का पालन नहीं किया है। अत: मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं तुमसे तुम्हारा राज्य छीन लूँगा। मैं इसे तुम्हारे सेवकों में से एक को दूँगा। {11:12} किन्तु मैं तुम्हारे पिता दाऊद से प्रेम करता था। इसलिये जब तक तुम जीवित हो तब तक मैं तुम्हारा राज्य नहीं लूँगा। मैं तब तक प्रतीक्षा करूँगा जब तक तुम्हारा पुत्र राजा नहीं बन जाता । तब मैं उससे इसे लूँगा। {11:13} तो भी मैं तुम्हारे पुत्र से सारा राज्य नहीं छीनूँगा। मैं उसे एक परिवार समूह पर शासन करने दूँगा। यह मैं दाऊद के लिये करूँगा। वह एक अच्छा सेवक था और यह मैं अपने चुने हुये नगर यरूशलेम के लिये भी करूँगा।” {i11:14} सुलैमान के शत्रु {11:14} उस समय यहोवा ने एदोमी हदद को सुलैमान का शत्रु बनाया। हदद एदोम के राजा के परिवार से था। {11:15} यह इस प्रकार घटित हुआ। कुछ समय पहले दाऊद ने एदोम को हराया था। योआब दाऊद की सेना का सेनापति था। योआब एदोम में मरे व्यक्तियों को दफनाने गया। तब योआब ने वहाँ जीवित सभी व्यक्तियों को मार डाला। {11:16} योआब और सारे इस्राएली एदोम में छ: महीने तक ठहरे। उस समय के बीच उन्होंने एदोम के सभी पुरुषों को मार डाला। {11:17} किन्तु उस समय हदद अभी एक किशोर ही था। अतः हदद मिस्र को भाग निकला। उसके पिता के कुछ सेवक उसके साथ गए। {11:18} उन्होंने मिद्यान को छोड़ा और वे परान को गए। वे मिस्र के राजा फ़िरौन के पास गये और उससे सहायता माँगी। फ़िरौन ने हदद को एक घर और कुछ भूमि दी। फ़िरौन ने उसे सहायता भी दी और उसे खाने के लिये भोजन दिया। {11:19} फ़िरौन ने हदद को बहुत पसन्द किया। फ़िरौन ने हदद को एक पत्नी दी, स्त्री फ़िरौन की साली थी। (फ़िरौन की पत्नी तहपनेस थी।) {11:20} अत: तहपनेस की बहन हदद से ब्याही गई। उनका एक पुत्र गनूबत नाम का हुआ। रानी तहपनेस ने गनूबत को अपने बच्चों के साथ फ़िरौन के महल में बड़ा होने दिया। {11:21} मिस्र में हदद ने सुना कि दाऊद मर गया। उसने यह भी सुना कि सेनापति योआब मर गया। इसलिए हदद ने फ़िरौन से कहा, “मुझे अपने देश में अपने घर वापस लौट जाने दे।” {11:22} किन्तु फ़िरौन ने उत्तर दिया, “मैंने तुम्हें सारी चीज़, जिनकी तुम्हें यहाँ आवश्यकता है, दी है! तुम अपने देश में वापस क्यों जाना चाहते हो” हदद ने उत्तर दिया, “कृपया मुझे घर लौटने दें।” {11:23} यहोवा ने दूसरे व्यक्ति को भी सुलैमान के विरुद्ध शत्रु बनाया। यह व्यक्ति एल्यादा का पुत्र रजोन था। रजोन अपने स्वामी के यहाँ से भाग गया था। उसका स्वामी सोबा का राजा हददेजेर था। {11:24} दाऊद ने जब सोबा की सेना को हरा दिया तब उसके बाद रजोन ने कुछ व्यक्तियों को इकट्ठा किया और एक छोटी सेना का प्रमुख बन गया। रजोन दमिश्क गया और वहीं ठहरा। रजोन दमिश्क का राजा हो गया। {11:25} रजोन अराम पर शासन करता था। रजोन इस्राएल से घृणा करता था, इसलिये सुलैमान जब तक जीवित रहा वह पूरे समय इस्राएल का शत्रु बना रहा। रजोन और हदद ने इस्राएल के लिये बड़ी परेशानियाँ उतपन्न कीं। {11:26} नबात का पुत्र यारोबाम सुलैमान के सेवकों में से एक था। यारोबाम एप्रैम परिवार समूह से था। वह सरेदा नगर का था। यारोबाम की माँ का नाम सरूयाह था। उसका पिता मर चुका था। वह राजा के विरुद्ध हो गया। {11:27} यारोबाम राजा के विरुद्ध क्यों हुआ इसकी कहानी यह है: सुलैमान मिल्लो बना रहा था और अपने पिता दाऊद के नगर की दीवार को दृढ़ कर रहा था। {11:28} यारोबाम एक बलवान व्यक्ति था। सुलैमान ने देखा कि यह युवक एक अच्छा श्रमिक है। इसलिये सुलैमान ने उसे यूसुफ के परिवार समूह के श्रमिकों का अधिकारी बना दिया। {11:29} एक दिन यारोबाम यरूशलेम के बाहर यात्रा कर रहा था। शीलो का अहिय्याह नबी उससे सड़क पर मिला। अहिय्याह एक नया अंगरखा पहने था। ये दोनों व्यक्ति देश में अकेले थे। {11:30} अहिय्याह ने अपना नया अंगरखा लिया और इसे बारह टुकड़ों मे फाड़ डाला। {11:31} तब अहिय्याह ने यारोबाम से कहा, “इस अंगरखा के दस टुकड़े तुम अपने लिये ले लो। यहोवा इस्राएल का परमेश्वर कहता है: ‘मैं सुलैमान से राज्य को छीन लूँगा और मैं परिवार समूहों में से दस को, तुम्हें दूँगा {11:32} और मैं दाऊद के परिवार को केवल एक परिवार समूह पर शासन करने दूँगा। मैं उन्हें केवल इस समूह को लेने दूँगा। मैं यह अपने दाऊद और यरूशलेम के लिये ऐसा करने दूँगा। यरूशलेम वह नगर है जिसे मैंने सारे इस्राएल के परिवार समूह से चुना है। {11:33} मैं सुलैमान से राज्य ले लूँगा क्योंकि उसने मेरा अनुसरण करना छोड़ दिया। वह सीदोनी देवमूर्ती अश्तोरेत की पूजा करता है। वह अश्तोरेत, सीदोनी देवता, मोआबी देवता कमोश और अम्मोनी देवता मिल्कोम की पूजा करता है। सुलैमान ने सच्चे और अच्छे कामों को करना छोड़ दिया है। वह मेरे नियमों और आदेशों का पालन नहीं करता। वह उस प्रकार नहीं रहता जिस प्रकार उसका पिता दाऊद रहता था। {11:34} इसलिये मैं राज्य को सुलैमान के परिवार से ले लूँगा। किन्तु मैं सुलैमान को उसके शेष जीवन भर उनका शासक रहने दूँगा। यह मैं अपने सेवक दाऊद के लिये करूँगा। मैंने दाऊद को इसलिये चुना था कि वह मेरे सभी आदेशों व नियमों का पालन करता था। {11:35} किन्तु मैं उसके पुत्र से राज्य ले लूँगा और यारोबाम मैं तुम्हें दस परिवार समूह पर शासन करने दूँगा। {11:36} मैं सुलैमान के पुत्र को एक परिवार समूह पर शासन करते हुए रहने दूँगा। मैं इसे इसलिए करूँगा कि मेरे सेवक दाऊद का शासन यरूशलेम में मेरे सामने सदैव रहेगा। यरूशलेम वह नगर है जिसे मैंने अपना निजी नगर चुना है। {11:37} किन्तु मैं तुम्हें उन सभी पर शासन करने दूँगा जिसे तुम चाहते हो। तुम पूरे इस्राएल पर शासन करोगे। {11:38} मैं यह सब तुम्हारे लिये करूँगा। यदि तुम सच्चाई के साथ रहोगे और मेरे सारे आदेशों का पालन करोगे तो मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। मैं तुम्हारे परिवार को राजाओं का परिवार वैसे ही बना दूँगा जैसे मैंने दाऊद को बनाया। मैं तुमको इस्राएल दूँगा। {11:39} मैं दाऊद की सन्तानों को उसका दण्ड दूँगा जो सुलैमान ने किया। किन्तु मैं सदैव के लिये उन्हें दण्ड नहीं दूँगा।’” {i11:40} सुलैमान की मृत्यु {11:40} सुलैमान ने यारोबाम को मार डालने का प्रयत्न किया। किन्तु यारोबाम मिस्र भाग गया। वह मिस्र के राजा शीशक के पास गया। यारोबाम वहाँ तब तक ठहरा जब तक सुलैमान मरा नहीं। {11:41} सुलैमान ने अपने शासन काल में बहुत बड़े और बुद्धिमत्तापूर्ण काम किये। जिनका विवरण सुलैमान के इतिहास — ग्रन्थ में लिखा है। {11:42} सुलैमान ने यरूशलेम में पूरे इस्राएल पर चालीस वर्ष तक शासन किया। {11:43} तब सुलैमान मरा और अपने पूर्वजों के साथ दफनाया गया। वह अपने पिता के दाऊद नगर में दफनाया गया, और उसका पुत्र रहूबियाम उसके स्थान पर राजा बना। {i12:1} गृह युद्ध {12:1} नबात का पुत्र यारोबाम तब भी मिस्र में था, जहाँ वह सुलैमान से भागकर पहुँचा था। जब उसने सुलैमान की मृत्यु की खबर सुनी तो वह एप्रैम की पहाड़ियों में अपने जेरदा नगर में वापस लौट आया। {12:2} राजा सुलैमान मरा और अपने पूर्वजों के साथ दफनाया गया। उसके बाद उसका पुत्र रहूबियाम नया राजा बना। {12:3} इस्राएल के सभी लोग शकेम गए। वे रहूबियाम को राजा बनाने गये। रहूबियाम भी राजा बनने के लिये शकेम गया। लोगों ने रहूबियाम से कहा, {12:4} “तुम्हारे पिता ने हम लोगों को बहुत कठोर श्रम करने के लिये विवश किया। अब तुम इसे हम लोगों के लिये कुछ सरल करो। उस कठिन काम को बन्द करो जिसे करने के लिये तुम्हारे पिता ने हमें विवश किया था। तब हम तुम्हारी सेवा करेंगे।” {12:5} रहूबियाम ने उत्तर दिया, “तीन दिन में मेरे पास वापस लौट कर आओ और मैं उत्तर दूँगा।” अत: लोग चले गये। {12:6} कुछ अग्रज लोग थे जो सुलैमान के जीवित रहते उसके निर्णय करने में सहायता करते थे। इसलिए राजा रहूबियाम ने इन व्यक्तियों से पूछा कि उसे क्या करना चाहिये। उसने कहा, “आप लोग क्या सोचते हैं, मुझे इन लोगों को क्या उत्तर देना चाहिये” {12:7} अग्रजों ने उत्तर दिया, “यदि आज तुम उनके सेवक की तरह रहोगे तो वे सच्चाई से तुम्हारी सेवा करेंगे। यदि तुम दयालुता के साथ उनसे बातें करोगे तब वे तुम्हारी सदा सेवा करेंगे।” {12:8} किन्तु रहूबियाम ने उनकी यह सलाह न मानी। उसने उन नवयुवकों से सलाह ली जो उसके मित्र थे। {12:9} रहूबियाम ने कहा, “लोग यह कहते हैं, ‘हमें उससे सरल काम दो जो तुम्हारे पिता ने दिया था।’ तुम क्या सोचते हो, मुझे लोगों को कैसे उत्तर देना चाहिये मैं उनसे क्या कहूँ” {12:10} राजा के युवक मित्रों ने कहा, “वे लोग तुम्हारे पास आए और उन्होंने तुमसे कहा, ‘तुम्हारे पिता ने हमें कठिन श्रम करने के लिये विवश किया। अब हम लोगों का काम सरल करें।’ अत: तुम्हें डींग मारनी चाहिये और उनसे कहना चाहिये, ‘मेरी छोटी उंगली मेरे पिता के पूरे शरीर से अधिक शक्तिशाली है। {12:11} मेरे पिता ने तुम्हें कठिन श्रम करने को विवश किया। किन्तु मैं उससे भी बहुत कठिन काम कराऊँगा! मेरे पिता ने तुमसे काम लेने के लिये कोड़ों का उपयोग किया था। मैं तुम्हें उन कोड़ों से पीटूँगा जिनमें धारदार लोहे के टुकड़े हैं, तुम्हें घायल करने के लिये!’” {12:12} रहूबियाम ने लोगों से कहा था, “तीन दिन में मेरे पास वापस आओ।” इसलिये तीन दीन बाद इस्राएल के सभी लोग रहूबियाम के पास लौटे। {12:13} उस समय राजा रहूबियाम ने उनसे कठोर शब्द कहे। उसने अग्रजों की सलाह न मानी। {12:14} उसने वही किया जो उसके मित्रों ने उसे करने को कहा। रहूबियाम ने कहा, “मेरे पिता ने तुम्हें कठिन श्रम करने को विवश किया। अत: मैं तुम्हें और अधिक काम दूँगा। मेरे पिता ने तुमको कोड़े से पीटा। किन्तु मैं तुम्हें उन कोड़ों से पीटूँगा जिनमें तुम्हें घायल करने के लिये धरादर लोहे के टुकड़े हैं।” {12:15} अत: राजा ने वह नहीं किया जिसे लोग चाहते थे। यहोवा ने ऐसा होने दिया। यहोवा ने यह अपनी उस प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिये किया जो उसने नाबात के पुत्र यारोबाम के साथ की थी। यहोवा ने अहिय्याह नबी का उपयोग यह प्रतिज्ञा करने के लिये किया था। अहिय्याह शीलो का था। {12:16} इस्राएल के सभी लोगों ने समझ लिया कि नये राजा ने उनकी बात अनसुनी कर दी है। इसलिये लोगों ने राजा से कहा, “क्या हम दाऊद के परिवार के अंग हैं नहीं! क्या हमें यिशै की भूमि में से कुछ मिला है नहीं! अत: इस्राएलियो हम अपने घर चलें। दाऊद के पुत्र को अपने लोगों पर शासन करने दो।” अत: इस्राएल के लोग अपने घर वापस गए। {12:17} किन्तु रहूबियाम फिर भी उन इस्राएलियों पर शासन करता रहा, जो यहूदा के नगरों में रहते थे। {12:18} अदोराम नामक एक व्यक्ति सब श्रमिकों का अधिकारी था। राजा रहूबियाम ने अदोराम को लोगों से बात चीत करने के लिये भेजा। किन्तु इस्राएल के लोगों ने उस पर तब तक पत्थर बरसाये जब तक वह मर नहीं गया। तब राजा रहूबियाम अपने रथ तक दौड़ा और यरूशलेम को भाग निकला। {12:19} इस प्रकर इस्राएल ने दाऊद के परिवार से विद्रोह कर दिया और वे अब भी आज तक दाऊद के परिवार के विरुद्ध हैं। {12:20} इस्राएल के सभी लोगों ने सुना कि यारोबाम वापस लौट आया है। इसलिये उन्होंने उसे एक सभा में आमन्त्रित किया और उसे पूरे इस्राएल का राजा बना दिया। केवल यहूदा का परिवार समूह ही एक मात्र परिवार समूह था जो दाऊद के परिवार का अनुसरण करता रहा। {12:21} रहूबियाम यरूशलेम को वापस गया। उसने यहूदा के परिवार समूह और बिन्यामीन के परिवार समूह को इकट्ठा किया। यह एक लाख अस्सी हजार पुरुषों की सेना थी। रहूबियाम इस्राएल के लोगों के विरुद्ध युद्ध लड़ना चाहता था। वह अपने राज्य को वापस लेना चाहता था। {12:22} किन्तु यहोवा ने परमेश्वर के एक व्यक्ति से बातें कीं। उसका नाम शमायाहा था। परमेश्वर ने कहा, {12:23} “यहूदा के राजा, सुलैमान के पुत्र, रहूबियाम और यहूदा तथा बिन्यामीन के सभी लोगों से बात करो। {12:24} उनसे कहो, ‘यहोवा कहता है कि तुम्हें अपने भाइयों इस्राएल के लोगों के विरुद्ध युद्ध में नहीं जाना चाहिये। तुम सबको घर लौट जाना चाहिये। मैंने इन सभी घटनाओं को घटित होने दिया है।’” अत: रहूबियाम की सेना के पुरुषों ने यहोवा का आदेश माना। वे, सभी अपने घर लौट गए। {12:25} शकेम, एप्रैम के पहाड़ी प्रदेश में एक नगर था। यारोबाम ने शकेम को एक सुदृढ़ नगर बनाया और उसमें रहने लगा। इसके बाद वह पनूएल नगर को गया और उसे भी सुदृढ़ किया। {12:26} यारोबाम ने अपने मन में सोचा, “यदि लोग यरूशलेम में यहोवा के मन्दिर को जाते रहे तो वे दाऊद के परिवार {12:27} द्वारा शासित होना चाहेंगे। लोग फिर यहूदा के राजा रहूबियाम का अनुसरण करना आरम्भ कर देंगे। तब वे मुझे मार डालेंगे।” {12:28} इसलिये राजा ने अपने सलाहकारों से पूछा कि उसे क्या करना चाहिये उन्होंने उसे अपनी सलाह दी। अत: यारोबाम ने दो सुनहले बछड़े बनाये। राजा यारोबाम ने लोगों से कहा, “तुम्हें उपासना करने यरूशलेम नहीं जाना चाहिये। इस्राएलियो, ये देवता हैं जो तुम्हें मिस्र से बाहर ले आए।” {12:29} राजा यारोबाम ने एक सुनहले बछड़े को बेतेल में रखा। उसने दूसरे सुनहले बछड़े को दान में रखा। {12:30} किन्तु यह बहुत बड़ा पाप था। इस्राएल के लोगों ने बेतेल और दान नगरों की यात्रा बछड़ों की पूजा करने के लिये की। किन्तु यह बहुत बड़ा पाप था। {12:31} यारोबाम ने उच्च स्थानों पर पूजागृह भी बनाए। उसने इस्राएल के विभिन्न परिवार समूहों से याजक भी चुने। (उसने केवल लेवी परिवार समूह से याजक नहीं चुने।) {12:32} और राजा यारोबाम ने एक नया पर्व आरम्भ किया। यह पर्व यहूदा के “फसहपर्व” की तरह था। किन्तु यह पर्व आठवें महीने के पन्द्रहवें दिन था — पहले महीने के पन्द्रहवें दिन नहीं। उस समय राजा बेतेल नगर की वेदी पर बलि भेंट करता था और वह बलि उन बछड़ों को भेंट करता था जिन्हें उसने बनवाया था। राजा यारोबाम ने बेतेल में उन उच्चस्थानों के लिये याजक भी चुने, जिन्हें उसने बनाया था। {12:33} इसलिये राजा यारोबाम इस्राएलियों के लिये पर्व के लिये अपना ही समय चुना। यह आठवें महीने का पन्द्रहवाँ दिन था। उन दिनों वह उस वेदी पर बलि भेंट करता था और सुगन्धि जलाता था जिसे उसने बनाया था। यह बेतेल नगर में था। {i13:1} परमेश्वर बेतेल के विरुद्ध घोषणा करता है {13:1} यहोवा ने यहूदा के निवासी परमेश्वर के एक व्यक्ति (नबी) को यहूदा से बेतेल नगर में जाने का आदेश दिया। राजा यारोबाम उस समय सुगन्धि भेंट करता हुआ वेदी के पास खड़ा था जिस समय परमेश्वर का व्यक्ति (नबी) वहाँ पहुँचा। {13:2} यहोवा ने उस परमेश्वर के व्यक्ति को आदेश दिया था कि तुम वेदी के विरुद्ध बोलना। उसने कहा, “वेदी, यहोवा तुमसे कहता है: ‘दाऊद के परिवार में एक पुत्र योशिय्याह नामक उत्पन्न होगा। ये याजक अब उच्च स्थानों पर पूजा कर रहे हैं। किन्तु वेदी, योशिय्याह उन याजकों को तुम पर रखेगा और वह उन्हें मार डालेगा। अब वे याजक तुम पर सुगन्धि जलाते हैं। किन्तु योशिय्याह तुम पर नर — अस्थियाँ जलायेगा। तब तुम्हारा उपयोग दुबारा नहीं हो सकेगा।’” {13:3} परमेश्वर के वयक्ति ने यह सब घटित होगा, इसका प्रमाण लोगों को दिया। उसने कहा, यहोवा ने जिसके विषय में मुझसे कहा है उसका प्रमाण यह है। यहोवा ने कहा, “यह वेदी दो टुकड़े हो जायेगी और इसकी राख जमीन पर गिर पड़ेगी।” {13:4} राजा यारोबाम ने परमेश्वर के व्यक्ति से बेतेल में वेदी के प्रति दिया सन्देश सुना। उसने वेदी से हाथ खींच लिया और व्यक्ति की ओर संकेत किया। उसने कहा, “इस व्यक्ति को बन्दी बना लो!” किन्तु राजा ने जब यह कहा तो उसके हाथ को लकवा मार गया। वह उसे हिला नहीं सका। {13:5} वेदी के भी टुकड़े — टुकड़े हो गए। उसकी सारी राख जमीन पर गिर पड़ी। यह इसका प्रमाण था कि परमेश्वर के व्यक्ति ने जो कहा वह परमेश्वर की तरफ से था। {13:6} तब राजा यारोबाम ने परमेश्वर के व्यक्ति से कहा, “कृपया यहोवा अपने परमेश्वर से मेरे लिये प्रार्थना करें। कि वह मेरी भुजा स्वस्थ कर दे।” अत: “परमेश्वर के व्यक्ति” ने यहोवा से प्रार्थना की और राजा की भुजा स्वस्थ हो गई। यह वैसी ही हो गई जैसी पहले थी। {13:7} तब राजा ने परमेश्वर के व्यक्ति से कहा, “कृपया मेरे साथ घर चलें। आएं और मेरे साथ भोजन करें मैं आपको एक भेंट दूँगा।” {13:8} किन्तु परमेश्वर के व्यक्ति ने राजा से कहा, “मैं आपके साथ घर नहीं जाऊँगा। यदि आप मुझे अपना आधा राज्य भी दें तो भी मैं नहीं जाऊँगा। मैं इस स्थान पर न कुछ खाऊँगा, न ही कुछ पीऊँगा। {13:9} यहोवा ने मुझे आदेश दिया है कि मैं कुछ न तो खाऊँ न ही पीऊँ। यहोवा ने यह भी आदेश दिया है कि मैं उस मार्ग से यात्रा न करूँ जिसका उपयोग मैंने यहाँ आते समय किया।” {13:10} इसलिये उसने भिन्न सड़क से यात्रा की। उसने उसी सड़क का उपयोग नहीं किया जिसका उपयोग उसने बेतेल को आते समय किया था। {13:11} बेतेल नगर में एक वृद्ध नबी रहता था। उसके पुत्र आए और उन्होंने उसे बताया कि परमेश्वर के व्यक्ति ने बेतेल में क्या किया। उन्होंने अपने पिता से वह भी कहा जो परमेश्वर के व्यक्ति ने राजा यारोबाम से कहा था। {13:12} वृद्ध नबी ने कहा, “जब वह चला तो किस सड़क से गया” अत: पुत्रों ने अपने पिता को वह सड़क दिखाई जिससे यहूदा से आने वाला परमेश्वर का व्यक्ति गया था। {13:13} वृद्ध नबी ने अपने पुत्रों से अपने गधे पर काठी रखने के लिये कहा। अत: उन्होंने काठी गधे पर डाली। तब नबी अपने गधे पर चल पड़ा। {13:14} वृद्ध नबी परमेश्वर के व्यक्ति के पीछे गया। वृद्ध नबी ने परमेश्वर के व्यक्ति को एक बांजवृक्ष के नीचे बैठे देखा। वृद्ध नबी ने पूछा, “क्या आप वही परमेश्वर के व्यक्ति हैं जो यहूदा से आए हैं” परमेश्वर के व्यक्ति ने उत्तर दिया, “हाँ, मैं ही हूँ।” {13:15} इसलिये वृद्ध नबी ने कहा, “कृपया घर चलें और मेरे साथ भोजन करें।” {13:16} किन्तु परमेश्वर के व्यक्ति ने उत्तर दिया, “मैं तुम्हारे साथ घर नहीं जा सकता। मैं इस स्थान पर तुम्हारे साथ खा — पी भी नहीं सकता। {13:17} यहोवा ने मुझसे कहा, ‘तुम उस स्थान पर कुछ खाना पीना नहीं और तुम्हें उसी सड़क से वापस लौटना भी नहीं है जिससे तुम वहाँ आए।’” {13:18} तब वृद्ध नबी ने कहा, “किन्तु मैं भी तुम्हारी तरह नबी हूँ।” तब वृद्ध नबी ने एक झूठ बोला। उसने कहा, “यहोवा के यहाँ से एक स्वर्गदूत मेरे पास आया। स्वर्गदूत ने मुझसे तुम्हें अपने घर लाने और तुम्हें मेरे साथ भोजन पानी करने की स्वीकृति दी है।” {13:19} इसलिये परमेश्वर का व्यक्ति वृद्ध नबी के घर गया और उसके साथ खाया — पीया। {13:20} जब वे मेज पर बैठे थे, यहोवा ने वृद्ध नबी से कहा। {13:21} और वृद्ध नबी ने यहूदा के निवासी परमेश्वर के व्यक्ति के साथ बातचीत की। उसने कहा, “यहोवा ने कहा, कि तुमने उसकी आज्ञा का पालन नहीं किया। तुमने वह नहीं किया जिसके लिये यहोवा का आदेश था। {13:22} यहोवा ने आदेश दिया था कि तुम्हें इस स्थान पर कुछ भी खाना या पीना नहीं चाहिये। किन्तु तुम वापस लौटे और तुमने खाया पीया। इसलिये तुम्हारा शव तुम्हारे परिवार की कब्रगाह में नहीं दफनाया जाएगा।” {13:23} परमेश्वर के व्यक्ति ने भोजन करना और पीना समाप्त किया। तब वृद्ध नबी ने उसके लिये गधे पर काठी कसी और वह चला गया। {13:24} घर की ओर यात्रा करते समय सड़क पर एक सिंह ने आक्रमण किया और परमेश्वर के व्यक्ति को मार डाला। नबी का शव सड़क पर पड़ा था। गधा और सिंह शव के पास खड़े थे। {13:25} कुछ अन्य व्यक्ति उस सड़क से यात्रा कर रहे थे। उन्होंने शव को देखा और शव के पास सिंह को खड़ा देखा। वे व्यक्ति उस नगर को आए जहाँ नबी रहता था और वहाँ वह बताया जो उन्होंने सड़क पर देखा था। {13:26} वृद्ध नबी ने उस व्यक्ति को धोखा दिया था और उसे वापस ले गया था। उसने जो कुछ हुआ था वह सुना और उसने कहा, “वह परमेश्वर का व्यक्ति है जिसने यहोवा के आदेश का पालन नहीं किया। इसलिये यहोवा ने उसे मारने के लिये एक सिंह भेजा। यहोवा ने कहा कि उसे यह करना चाहिये।” {13:27} तब नबी ने अपने पुत्रों से कहा, “मेरे गधे पर काठी डालो।” अत: उसके पुत्रों ने उसके गधे पर काठी डाली। {13:28} वृद्ध नबी गया और उसके शव को सड़क पर पड़ा पाया। गधा और सिंह तब भी उसके पास खड़े थे। सिंह ने शव को नहीं खाया था और गधे को चोट नहीं पहुँचाई थी। {13:29} वृद्ध नबी ने शव को अपने गधे पर रखा। वह शव को वापस ले गया जिससे उसके लिये रो सके और उसे दफना सके। {13:30} वृद्ध नबी ने उसे अपने परिवार की कब्रगाह में दफनाया। वृद्ध नबी उसके लिये रोया। वृद्ध नबी ने कहा, “ऐ मेरे भाई मैं तुम्हारे लिये दुःखी हूँ।” {13:31} इस प्रकार वृद्ध नबी ने शव को दफनाया। तब उसने अपने पुत्रों से कहा, “जब मैं मरुँ तो मुझे इसी कब्र में दफनाना। मेरी अस्थियों को उसकी अस्थियों के समीप रखना। {13:32} जो बातें यहोवा ने उसके द्वारा कहलवाई हैं वे निश्चित ही सत्य घटित होंगी। यहोवा ने उसका उपयोग बेतेल की वेदी और शोमरोन के अन्य नगरों में स्थित उच्च स्थानों के विरुद्ध बोलने के लिये किया।” {13:33} राजा यारोबाम ने अपने को नहीं बदला। वह पाप कर्म करता रहा। वह विभिन्न परिवार समूहों से लोगों को याजक बनने के लिये चुनता रहा। वे याजक उच्च स्थानों पर सेवा करते थे। जो कोई याजक होना चाहता था याजक बन जाने दिया जाता था। {13:34} यही पाप था जो उसके राज्य की बरबादी और विनाश का कारण बना। {i14:1} यारोबाम का पुत्र मर जाता है {14:1} उस समय यारोबाम का पुत्र अबिय्याह बहुत बीमार पड़ा। {14:2} यारोबाम ने अपनी पत्नी से कहा, “शीलो जाओ। जाओ और अहिय्याह नबी से मिलो। अहिय्याह वह व्यक्ति है जिसने कहा था कि मैं इस्राएल का राजा बनूँगा। अपने वस्त्र ऐसे पहनों कि कोई न समझे कि तुम मेरी पत्नी हो। {14:3} नबी को दस रोटियाँ, कुछ पुऐ और शहद का एक घड़ा दो। तब उससे पूछो कि हमारे पुत्र का क्या होगा। अहिय्याह नबी तुम्हें बतायेगा।” {14:4} इसलिये राजा की पत्नी ने वह किया जो उसने कहा। वह शीलो गई। वह अहिय्याह नबी के घर गई। अहिय्याह बहुत बूढ़ा और अन्धा हो गया था। {14:5} किन्तु यहोवा ने उससे कहा, “यारोबाम की पत्नी तुमसे अपने पुत्र के बारे में पूछने के लिये आ रही है। वह बीमार है।” यहोवा ने अहिय्याह को बताया कि उसे क्या कहना चाहिये। यारोबाम की पत्नी अहिय्याह के घर पहुँची। वह प्रयत्न कर रही थी कि लोग न जानें कि वह कौन है। {14:6} अहिय्याह ने उसके द्वार पर आने की आवाज सुनी। अत: अहिय्याह ने कहा, “यारोबाम की पत्नी, यहाँ आओ। तुम क्यों यह प्रयत्न कर रही हो कि लोग यह समझें कि तुम कोई अन्य हो मेरे पास तुम्हारे लिये कुछ बुरी सूचनायें हैं। {14:7} वापस लौटो और यारोबाम से कहो कि यहोवा इस्राएल का परमेश्वर, जो कहता है, वह यह है। यहोवा कहता है, ‘यारोबाम इस्राएल के सभी लोगों में से मैंने तुम्हें चुना। मैंने तुम्हें अपने लोगों का शासक बनाया। {14:8} दाऊद के परिवार ने इस्राएल पर शासन किया किन्तु मैंने उनसे राज्य ले लिये और उसे तुमको दे दिया। किन्तु तुम मेरे सेवक दाऊद के समान नहीं हो। उसने मेरे आदेशों का सदा पालन किया। उसने पूरे हृदय से मेरा अनुसरण किया। उसने वे ही काम किये जिन्हें मैंने स्वीकार किया। {14:9} किन्तु तुमने बहुत से भीषण पाप किये हैं। तुम्हारे पाप उन सभी के पापों से अधिक हैं जिन्होंने तुम से पहले शासन किया। तुमने मेरा अनुसरण करना बन्द कर दिया है। तुमने मूर्तियाँ और अन्य देवाता बनाये। इसने मूझे बहुत क्रोधित किया। इससे मैं बहुत क्रुद्ध हुआ हूँ। {14:10} अत: यारोबाम, मैं तुम्हारे परिवार पर विपत्ति लाऊँगा। मैं तुम्हारे परिवार के सभी पुरुषों को मार डालूँगा। मैं तुम्हारे परिवार को पूरी तरह वैसे ही नष्ट कर डालूँगा जैसे आग उपलों को नष्ट करती है। {14:11} तुम्हारे परिवार का जो कोई नगर में मरेगा उसे कुत्ते खायेंगे और तुम्हारे परिवार का जो कोई व्यक्ति मैदान में मरेगा उसे पक्षी खायेंगे। यहोवा ने यह कहा है।’” {14:12} तब अहिय्याह नबी यारोबाम की पत्नी से बात करता रहा। उसने कहा, “अब तुम घर जाओ। जैसे ही तुम अपने नगर में प्रवेश करोगी तुम्हारा पुत्र मरेगा। {14:13} सारा इस्राएल उसके लिये रोएगा और उसे दफनाएगा। मात्र तुम्हारा पुत्र ही यारोबाम के परिवार में ऐसा होगा जिसे दफनाया जाएगा। इसका कारण यह है कि यारोबाम के परिवार में केवल वही ऐसा व्यक्ति है जिसने यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर को प्रसन्न किया है। {14:14} यहोवा इस्राएल का एक नया राजा बनायेगा। वह नया राजा यारोबाम के परिवार को नष्ट करेगा। यह बहुत शीघ्र होगा। {14:15} तब यहोवा इस्राएल को चोट पहुँचायेगा। इस्राएल के लोग बहुत डर जायेंगे वे जल की लम्बी घास की तरह काँपेंगे। यहोवा इस्राएलियों को इस अच्छे प्रदेश से उखाड़ देगा। यह वही भूमि है जिसे उसने उनके पूर्वजों को दिया था। वह उनको फरात नदी की दूसरी ओर बिखेर देगा। यह होगा, क्योंकि यहोवा लोगों पर क्रोधित है। लोगों ने उसको तब क्रोधित किया जब उन्होंने अशेरा की पूजा के लिये विशेष स्तम्भ खड़े किये। {14:16} यारोबाम ने पाप किया और तब यारोबाम ने इस्राएल के लोगों से पाप करवाया। अत: यहोवा इस्राएल के लोगों को पराजित होने देगा।” {14:17} यारोबाम की पत्नी तिरजा को लौट गई। ज्यों ही वह घर में घुसी, लड़का मर गया। {14:18} पूरे इस्राएल ने उसको दफनाया और उसके लिये वे रोये। यह ठीक वैसे ही हुआ जैसा यहोवा ने होने को कहा था। यहोवा ने अपने सेवक अहिय्याह नबी का उपयोग ये बातें कहने के लिये किया। {14:19} राजा यारोबाम ने अन्य बहुत से काम किये। उसने युद्ध किये और लोगों पर शासन करता रहा। उसने जो कुछ किया वह सब इस्राएल के राजाओं के इतिहास नामक पुस्तक में लिखा हुआ है। {14:20} यारोबाम ने बाईस वर्ष तक राजा के रूप में शासन किया। तब वह मरा और अपने पूर्वजों के साथ दफनाया गया। उसका पुत्र नादाब उसके बाद नया राजा हुआ। {14:21} उस समय जब सुलैमान का लड़का रहूबियाम यहूदा का राजा बना, वह इकतालीस वर्ष का था। रहूबियाम ने यरूशलेम नगर मैं सत्रह वर्ष तक शासन किया। यह वही नगर है जिसमें यहोवा ने सम्मानित होना चुना। उसने इस्राएल के अन्य सभी नगरों में से इस नगर को चुना। रहूबियाम की नामा नामक माँ अम्मोन की थी। {14:22} यहूदा के लोगों ने भी पाप किये और उन कामों को किया जिन्हें यहोवा ने बुरा कहा था। लोगों ने अपने ऊपर यहोवा को क्रोधित करने के लिये और अधिक बुरे काम किये। वे लोग अपने उन पूर्वजों से भी बुरे थे जो उनके पहले वहाँ रहते थे। {14:23} लोगों ने उच्च स्थान, पत्थर के स्मारक और पवित्र स्तम्भ बनाये। उन्होंने उन्हें हर एक ऊँचे पहाड़ पर एवं प्रत्येक पेड़ के नीचे बनाये। {14:24} ऐसे भी लोग थे जिन्होंने अपने तन को शारीरिक सम्बन्धों के लिये बेचकर अन्य देवताओं की सेवा की। इस प्रकार यहूदा के लोगों ने अनेक बुरे काम किये। जो लोग उस देश में उनसे पहले रहते थे उन्होंने भी वे ही पापपूर्ण काम किये थे और परमेश्वर ने उन लोगों से वह देश ले लिया था और इस्राएल के लोगों को दे दिया था। {14:25} रहूबियाम के राज्य काल के पाँचवें वर्ष मिस्र का राजा शीशक यरूशलेम के विरुद्ध लड़ा। {14:26} शीशक ने यहोवा के मन्दिर और राजा के महल से खजाने ले लिये। उसने उन सुनहली ढालों को भी ले लिया जिन्हें दाऊद ने अराम के राजा हददजर के अधिकारियों से लिया था। दाऊद इन ढालों को यरूशलेम ले गया था। किन्तु शीशक ने सभी सुनहली ढालें ले लीं। {14:27} अत: राजा रहूबियाम ने उनके स्थान पर रखने के लिये अनेक ढालें बनवाई। किन्तु ये ढालें काँसे की थीं, सोने की नहीं। उसने ये ढालें उन पुरुषों को दीं जो महल के द्वारों की रक्षा करते थे। {14:28} जब कभी राजा यहोवा के मन्दिर को जाता था, द्वार रक्षक उसके साथ हर बार जाते थे। वे ढालें ले जाते थे। जब वे काम पूरा कर लेते थे तब वे रक्षक कक्ष में ढालों को लटका देते थे। {14:29} राजा रहूबियाम ने जो कुछ किया वह सब, यहूदा के राजाओं के इतिहास नामक पुस्तक में लिखा हुआ है। {14:30} रहूबियाम और यारोबाम सदैव एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध करते रहे। {14:31} रहूबियाम मरा और अपने पूर्वजों के साथ दफनाया गया। उसे उसके पूर्वजों के साथ दाऊद नगर में दफनाया गया। (उसकी माँ नामा, अम्मोन की थी।) रहूबियाम का पुत्र अबिय्याम उसके बाद नया राजा बना। {i15:1} यहूदा का राजा अबिय्याम {15:1} नाबात का पुत्र यारोबाम इस्राएल पर शासन कर रहा था। यारोबाम के राज्यकाल के अट्ठारहवें वर्ष, अबिय्याम यहूदा का नया राजा बना। {15:2} अबिय्याम ने तीन वर्ष तक शासन किया। उसकी माँ का नाम माका था। वह अबशालोम की पुत्री थी। {15:3} उसने वे सभी पाप किये जो उसके पिता ने उसके पहले किये थे। अबिय्याम अपने पितामह दाऊद की तरह यहोवा, अपने परमेश्वर का भक्त नहीं था। {15:4} यहोवा दाऊद से प्रेम करता था। अत: उसी के लिये यहोवा ने अबिय्याम को यरूशलेम में राज्य दिया और यहोवा ने उसे एक पुत्र दिया। यहोवा ने यरूशलेम को सुरक्षित भी रहने दिया। यह उसने दाऊद के लिये किया। {15:5} दाऊद ने सदैव ही उचित काम किये जिन्हें यहोवा चाहता था। उसने सदैव यहोवा के आदेशों का पालन किया था। केवल एक बार दाऊद ने यहोवा का आदेश नहीं माना था जब दाऊद ने हित्ती ऊरिय्याह के विरुद्ध पाप किया था। {15:6} रहूबियाम और यारोबाम हमेशा एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध लड़ते रहे। {15:7} जो कुछ अन्य काम अबिय्याम ने किये वह यहूदा के राजाओं के इतिहास नामक पुस्तक में लिखा है। उसे सारे समय में जब अबिय्याम राजा था, यारोबाम और अबिय्याम के बीच युद्ध चलता रहा। {15:8} जब अबिय्याम मरा तो उसे दाऊद नगर में दफनाया गया। अबिय्याम का पुत्र “आसा” उसके बाद नया राजा हुआ। {i15:9} यहूदा का राजा आसा {15:9} इस्राएल के ऊपर यारोबाम के राजा के रूप में शासन करने के बीसवें वर्ष में आसा यहूदा का राजा बना। {15:10} आसा ने यरूशलेम में इकतालीस वर्ष तक शासन किया। उसकी पितामही का नाम माका था और माका अबशालोम की पुत्री थी। {15:11} आसा ने अपने पूर्वज दाऊद की तरह उन कामों को किया जिन्हें यहोवा ने उचित कहा। {15:12} उन दिनों ऐसे लोग थे जो अपने तन को शारीरिक सम्बन्ध के लिये बेचकर अन्य देवताओं की सेवा करते थे। आसा ने उन लोगों को देश छोड़ने के लिये विवश किया। आसा ने उन देव मूर्तियों को भी दूर किया जो उसके पूर्वजों ने बनाईं थीं। {15:13} आसा ने अपनी पितामही माका को रानी पद से हटा दिया। माका ने देवी अशेरा की उन भंयकर मूर्तियों में से एक को बनाया था। उसने इस भंयकर मूर्ति को काट डाला। उसने उसे किद्रोन की घाटी में जलाया। {15:14} आसा ने उच्च स्थानों को नष्ट नहीं किया, किन्तु वह पूरे जीवन भर यहोवा का भक्त रहा। {15:15} आसा के पिता ने कुछ चीजें परमेश्वर को दी थीं। आसा ने भी परमेश्वर को कुछ भेंटे चढ़ाई थीं। उन्होंने, सोने चाँदी और अन्य चीजों की भेंटें दीं। आसा ने उन सभी चीजों को मन्दिर में जमा कर दिया। {15:16} जब तक राजा आसा यहूदा का राजा था, वह सदैव इस्राएल के राजा बाशा के विरुद्ध युद्ध करता रहा। {15:17} बाशा यहूदा के विरुद्ध लड़ता रहा। बाशा लोगों को, आशा के देश यहूदा से आने अथवा जाने से रोकना चाहता था। {15:18} अत: आसा ने यहोवा के मन्दिर और राजमहल के खजानों से सोना और चाँदी निकाला। उसने यह सोना — चाँदी अपने सेवकों को दिया और उन्हें अराम के राजा बेन्हदद के पास भेजा। बेन्हदद हेज्योन के पुत्र तब्रिम्मोन का पुत्र था। उसने दमिश्क नगर में शासन किया। {15:19} आसा ने यह सन्देश भेजा, “मेरे पिता और तुम्हारे पिता के मध्य एक शान्ति — सन्धि थी। अब मैं तुम्हारे और अपने बीच एक शान्ति — सन्धि करना चाहता हूँ। मैं तुम्हारे पास सोना — चाँदी की भेंट भेज रहा हूँ। इस्राएल के राजा बाशा के साथ अपनी सन्धि तोड़ दो। तब बाशा मेरे देश को छोड़ देगा।” {15:20} राजा बेन्हदद ने आसा के सन्देश को स्वीकार किया। अतः उसने इस्राएल के नगरों के विरुद्ध लड़ने के लिये अपनी सेना भेजी। बेन्हदद ने इय्योन, दान, आबेल्वेत्माका और गलीली झील के चारों ओर के नगरों को पराजित किया। उसने सारे नप्ताली क्षेत्र को हराया। {15:21} बाशा ने इन आक्रमणों के बारे में सुना। इसलिये उसने रामा को दृढ़ बनाना बन्द कर दिया। उसने उस नगर को छोड़ दिया और तिर्सा को लौट गया। {15:22} तब राजा आसा ने यहूदा के सभी लोगों को आदेश दिया कि हर एक व्यक्ति को सहायता देनी होगी। वे रामा को गए और उन्होंने उन पत्थरों और लकड़ियों को उठा लिया जिनका उपयोग बाशा नगर को दृढ़ बनाने के लिये कर रहा था। वे उन चीजों को बिन्यामीन प्रदेश में गेबा और मिस्पा को ले गए। तब आसा ने उन दोनों नगरों को बहुत अधिक दृढ़ बनाया। {15:23} आसा के बारे में अन्य बातें, व महान कार्य जो उसने किये और नगर जिन्हें उसने बनाया वह, यहुदा के राजाओं के इतिहास नामक पुस्तक में लिखा है। जब आसा बूढ़ा हुआ तो उसके पैर में एक रोग उत्पन्न हुआ। {15:24} आसा मरा और उसे उसके पूर्वज दाऊद के नगर में दफनाया गया। तब आसा का पुत्र यहोशापात उसके बाद नया राजा बना। {i15:25} इस्राएल का राजा नादाब {15:25} यहूदा पर आसा के राज्य काल के दूसरे वर्ष में यारोबाम का पुत्र नादाब इस्राएल का राजा हुआ। नादाब ने इस्राएल पर दो वर्ष तक शासन किया। {15:26} नादाब ने यहोवा के विरुद्ध बुरे काम किये। उसने वैसे ही पाप किये जैसे उसके पिता यारोबाम ने किये थे और यारोबाम ने इस्राएल के लोगों से भी पाप कराये थे। {15:27} बाशा अहिय्याह का पुत्र था। वे इस्साकार के परिवार समूह से थे। बाशा ने राजा नादाब को मार डालने की एक योजना बनाई। यह वह समय था जब नादाब और सारा इस्राएल गिब्बतोन नगर के विरुद्ध युद्ध में लड़ रहे थे। यह एक पलिश्ती नगर था। उस स्थान पर बाशा ने नादाब को मार डाला। {15:28} यह यहूदा पर आसा के रज्यकाल के तीसरे वर्ष में हुआ और बाशा इस्राएल का अगला राजा बना। {i15:29} इस्राएल का राजा बाशा {15:29} जब बाशा नया राजा हुआ तो उसने यारोबाम के परिवार के हर एक व्यक्ति को मार डाला। बाशा ने यारोबाम के परिवार में किसी व्यक्ति को जीवित नहीं छोड़ा। यह वैसे ही हुआ जैसा होने के लिये यहोवा ने कहा था। यहोवा ने शीलो के अपने सेवक अहिय्याह द्वारा यह कहा था। {15:30} यह हुआ, क्योंकि यारोबाम ने अनेक पाप किये थे और यारोबाम ने इस्राएल के लोगों से अनेक पाप कराये थे। यारोबाम ने यहोवा इस्राएल के परमेश्वर को बहुत क्रोधित कर दिया था। {15:31} नादाब ने जो अन्य काम किये वे इस्राएल के राजाओं के इतिहास नामक पुस्तक में लिखा हुआ है। {15:32} पूरे समय, जब तक बाशा इस्राएल का शासक था, वह यहूदा के राजा आसा के विरुद्ध युद्ध में लड़ता रहा। {15:33} अहिय्याह का पुत्र बाशा, यहोदा पर आसा के राज्य काल के तीसरे वर्ष में इस्राएल का राजा हुआ था। बाशा तिर्सा में चौबीस वर्ष तक राजा रहा। {15:34} किन्तु बाशा ने वे कार्य किये जिन्हें यहोवा ने बुरा बाताया था। उसने वे ही पाप किये जो उसके पूर्वज यारोबाम ने किये थे। यारोबाम ने इस्राएल के लोगों से पाप कराये थे। {16:1} तब यहोवा ने हनान के पुत्र येहू से बातें कीं। यहोवा राजा बाशा के विरुद्ध बातें कह रहा था। {16:2} “मैंने तुमको एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बनाया। मैंने तुमको अपने इस्राएल के लोगों के ऊपर राजा बनाया। किन्तु तुमने यारोबाम का अनुसरण किया है। तुमने मेरे लोगों, इस्राएलियों से पाप कराया है। उन्होंने अपने पापों से मुझे क्रोधित किया है। {16:3} इसलिए बाशा, मैं तुझे और तुम्हारे परिवार नष्ट करुँगा । मैं तुम्हारे साथ वही करूँगा जो मैंने नबात के पुत्र यारोबाम के परिवार के साथ किया। {16:4} तुम्हारे परिवार के लोग नगर की सड़कों पर मरेंगे और उनके शवों को कुत्ते खायेंगे। तुम्हारे परिवार के कुछ लोग मैदानों में मरेंगे और उनके शवों को पक्षी खायेंगे।” {16:5} बाशा के विषय में अन्य बातें और जो महान कार्य उसने किये सभी इस्राएल के राजाओं के इतिहास नामक पुस्तक में लिखा है। {16:6} बाशा मरा और तिर्सा में दफनाया गया। उसका पुत्र एला उसके बाद नया राजा बना। {16:7} अत: यहोवा ने येहू नबी को एक सन्देश दिया। यह सन्देश बाशा और उसके परिवार के विरुद्ध था। बाशा ने यहोवा के विरुद्ध बुरे कर्म किये थे। इससे यहोवा अत्यन्त क्रोधित हुआ। बाशा ने वही किया जो यारोबाम के परिवार ने उससे पहले किया था। यहोवा इसलिये भी क्रोधित था कि बाशा ने यारोबाम के पूरे परिवार को मार डाला था। {i16:8} इस्राएल का राजा एला {16:8} यहूदा पर आसा के राज्य काल के छब्बीसवें वर्ष में एला राजा हुआ। एला बाशा का पुत्र था। उसने तिर्सा में दो वर्ष तक शासन किया। {16:9} राजा एला के अधिकारियों में से जिम्री एक था। जिम्री एला के आधे रथों को आदेश देता था। किन्तु जिम्री ने एला के विरुद्ध योजना बनाई। राजा एला तिर्सा में था। वह अर्सा के घर में दाखमधु पी रहा था और मत्त हो रहा था। अर्सा, तिर्सा के महल का अधिकारी था। {16:10} जिम्री उस घर में गया और उसने राजा एला को मार डाला। यहूदा पर आसा के राज्य काल के सत्ताईसवें वर्ष में यह हुआ। तब एला के बाद इस्राएल का नया राजा जिम्री हुआ। {i16:11} इस्राएल का राजा जिम्री {16:11} जब जिम्री राजा हुआ तो उसने बाशा के पूरे परिवार को मार डाला। उसने बाशा के परिवार में किसी व्यक्ति को जीवित नहीं रहने दिया। जिम्री ने बाशा के मित्रों को भी मार डाला। {16:12} इस प्रकार जिम्री ने बाशा के परिवार को नष्ट किया। यह वैसे ही हुआ जैसा यहोवा ने, येहू नबी का उपयोग बाशा के विरूद्ध कहने को कहा था। {16:13} यह, बाशा और उसके पुत्र एला के, सभी पापों के कारण हुआ। उन्होंने पाप किया था और इस्राएल के लोगों से पाप कराया था। यहोवा क्रोधित था क्योंकि उन्होंने बहुत सी देवमूर्तियाँ रखी थीं। {16:14} इस्राएल के राजाओं के इतिहास नामक पुस्तक में ये अन्य सभी बातें लिखी हैं जो एला ने कीं। {16:15} यहूदा पर आसा के राज्य काल के सत्ताईसवें वर्ष में जिम्री इस्राएल का राजा बना। जिम्री ने तिर्सा में सात दिन शासन किया। जो कुछ हुआ, यह है: इस्राएल की सेना गिब्बतोन के पलिश्तियों के समीप डेरा डाले पड़ी थी। वे युद्ध के लिये तैयार थे। {16:16} पड़ाव में स्थित लोगों ने सुना कि जिम्री ने राजा के विरुद्ध गुप्त षड़यन्त्र रचा है। उन्होंने सुना कि उसने राजा को मार डाला। इसलिये सारे इस्राएल ने डेरे में, उस दिन ओम्री को इस्राएल का राजा बनाया। ओम्री सेनापति था। {16:17} इसलिये ओम्री और सारे इस्राएल ने गिब्बतोन को छोड़ा और तिर्सा पर आक्रमण कर दिया। {16:18} जिम्री ने देखा कि नगर पर अधिकार कर लिया गया है। अत: वह महल के भीतर चला गया और उसने आग लगानी आरम्भ कर दी। उसने महल और अपने को जला दिया। {16:19} इस प्रकार जिम्री मरा क्योंकि उसने पाप किया था। जिम्री ने उन कामों को किया जिन्हें यहोवा ने बुरा कहा था। उसने वैसे ही पाप किये जैसे यारोबाम ने किये थे और यारोबाम ने इस्राएल के लोगों से पाप कराया था। {16:20} इस्राएल के राजाओं के इतिहास नामक पुस्तक में जिम्री के गुप्त षड़यन्त्र और अन्य बातें लिखी हैं और जब जिम्री राजा एला के विरुद्ध हुआ, उस समय की घटनायें भी उसमें लिखी हैं। {i16:21} इस्राएल का राजा ओम्री {16:21} इस्राएली लोग दो दलों में बँट गये थे। आधे लोग गीनत के पुत्र तिब्नी का अनुसरण करते थे और उसे राजा बनाना चाहते थे। अन्य आधे लोग ओम्री के अनुयायी थे। {16:22} किन्तु ओम्री के अनुयायी गीनत के पुत्र तिब्नी के अनुयायियों से अधिक शक्तिशाली थे। अत: तिब्नी मारा गया और ओम्री राजा हुआ। {16:23} यहूदा पर आसा के राज्यकाल के इकतीसवें वर्ष में ओम्री इस्राएल का राजा हुआ। ओम्री ने इस्राएल पर बारह वर्ष तक शासन किया। उन वर्षों में से छ: वर्षों तक उसने तिर्सा नगर में शासन किया। {16:24} किन्तु ओम्री ने शोमरोन की पहाड़ी को खरीद लिया। उसने इसे लगभग डेढ़ सौ पौंड चाँदी शमेर से खरीदा। ओम्री ने उस पहाड़ी पर एक नगर बसाया। उसने इसके स्वामी शमेर के नाम पर इस नगर का नाम शोमरोन रखा। {16:25} ओम्री ने वे काम किये जिन्हें यहोवा ने बुरा घोषित किया था। ओम्री उन सभी राजाओं से बुरा था जो उसके पहले हो चुके थे। {16:26} उसने वे ही पाप किये जो नबात के पुत्र यारोबाम ने किये थे। यारोबाम ने इस्राएल के लोगों से पाप कराया था। इसलिये उन्होंने यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर को बहुत क्रोधित कर दिया था। यहोवा क्रोधत था, क्योंकि वे निरर्थक देवमूर्तियों की पूजा करते थे। {16:27} इस्राएल के राजाओं के इतिहास नामक पुस्तक में ओम्री के विषय में अन्य बातें और उसके किये महान कार्य लिखे गए हैं। {16:28} ओम्री मरा और शोमरोन में दफनाया गया। उसका पुत्र अहाब उसके बाद नया राजा बना। {i16:29} इस्राएल का राजा अहाब {16:29} यहूदा पर आसा के राज्य काल के अड़तीसवें वर्ष में ओम्री का पुत्र अहाब इस्राएल का राजा बना। {16:30} अहाब ने वे काम किये जिन्हें यहोवा ने बुरा बताया था और अहाब उन सभी राजाओं से भी बुरा था जो उसके पहले हुए थे। {16:31} अहाब के लिये इतना ही काफी नहीं था कि वह वैसे ही पाप करे जैसे नबात के पुत्र यारोबाम ने किये थे। अत: अहाब ने एतबाल की पुत्री ईजेबेल से विवाह किया। एतबाल सीदोन के लोगों का राजा था। तब अहाब ने बाल की सेवा और पुजा करनी आरम्भ की। {16:32} अहाब ने बाल की पूजा करने के लिये शोमरोन में पूजागृह बनाया। उसने पूजागृह में एक वेदी रखी। {16:33} अहाब ने अशेरा की पूजा के लिये एक विशेष स्तम्भ भी खड़ा किया। अहाब ने यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर को क्रोधित करने वाले बहुत से काम, उन सभी राजाओं से अधिक किये, जो उसके पहले थे। {16:34} अहाब के राज्य काल में बेतेल के हीएल ने यरीहो नगर को दुबारा बनाया। जिस समय हीएल ने नगर बनाने का काम आरम्भ किया, उसका बड़ा पुत्र अबीराम मर गया और जब हीएल ने नगर द्वार बनाये, उसका सबसे छोटा पुत्र सगूब मर गाय। यह ठीक वैसा ही हुआ जैसा यहोवा ने नून के पुत्र यहोशू से बातें करते हुए कहा था। {i17:1} एलिय्याह और अनावृष्टि का समय {17:1} एलिय्याह गिलाद में तिशबी नगर का एक नबी था। एलिय्याह ने राजा अहाब से कहा, “मैं यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर की सेवा करता हूँ। उसकी शक्ति के बल पर मैं भविष्यवाणी करता हूँ कि अगले कुछ वर्षों में न तो ओस गिरेगी, और न ही वर्षा होगी। वर्षा तभी होगी जब मैं उसके होने का आदेश दूँगा।” {17:2} तब यहोवा ने एलिय्याह से कहा {17:3} “इस स्थान को छोड़ दो और पूर्व की ओर चले जाओ। करीत नाले के पास छिप जाओ। यह नाला यरदन नदी के पूर्व में है। {17:4} तुम नाले से पानी पी सकते हो। मैंने कौवों को आदेश दिया है कि वे तुमको उस स्थान पर भोजन पहुँचायेंगे।” {17:5} अत: एलिय्याह ने वही किया जो यहोवा ने करने को कहा। वह यरदन नदी के पूर्व करीत नाले के समीप रहने चला गया। {17:6} हर एक प्रात: और सन्ध्या को कौवे एलिय्याह के लिये भोजन लाते थे। एलिय्याह नाले से पानी पीता था। {17:7} वर्षा नहीं हुई अत: कुछ समय उपरान्त नाला सूख गया। {17:8} तब यहोवा ने एलिय्याह से कहा, {17:9} “सीदोन में सारपत को जाओ। वहीं रहो। उस स्थान पर एक विधवा स्त्री रहती है। मैंने उसे तुम्हें भोजन देने का आदेश दिया है।” {17:10} अत: एलिय्याह सारपत पहुँचा। वह नगर द्वार पर पहुँचा और उसने एक स्त्री को देखा। उसका पति मर चुका था। वह स्त्री ईंधन के लिये लकड़ियाँ इकट्ठी कर रही थी। एलिय्याह ने उससे कहा, “क्या तुम एक प्याले में थोड़ा पानी दोगी जिसे मैं पी सकूँ” {17:11} वह स्त्री उसके लिये पानी लाने जा रही थी, तो एलिय्याह ने कहा, “कृपया मेरे लिये एक रोटी का छोटा टुकड़ा भी लाओ।” {17:12} उस स्त्री ने उत्तर दिया, “मैं यहोवा, तुम्हारे परमेश्वर की शपथ खाकर कहती हूँ कि मेरे पास रोटी नहीं है। मेरे पास बर्तन में मुट्ठी भर आटा और पीपे में थोड़ा सा जैतून का तेल है। इस स्थान पर मैं ईंधन के लिये दो चार लकड़ियाँ इकट्ठी करने आई थी। मैं इसे लेकर घर लौटूँगी और अपना आखिरी भोजन पकाऊँगी। मैं और मेरा पुत्र दोनों इसे खायेंगे और तब भूख से मर जाएंगे।” {17:13} एलिय्याह ने स्त्री से कहा, “परेशान मत हो। घर लौटो और जैसा तुमने कहा, अपना भोजन पकाओ। किन्तु तुम्हारे पास जो आटा है उसकी पहले एक छोटी रोटी बनाना। उस रोटी को मेरे पास लाना। तब अपने और अपने पुत्र के लिये पकाना। {17:14} इस्राएल का परमेश्वर, यहोवा कहता है, ‘उस आटे का बर्तन कभी खाली नहीं होगा। पीपे में तेल सदैव रहेगा। ऐसा तब तक होता रहेगा जिस दिन तक यहोवा इस भूमि पर पानी नहीं बरसाता।’” {17:15} अत: वह स्त्री अपने घर लौटी। उसने वही किया जो एलिय्याह ने उससे करने को कहा था। एलिय्याह, वह स्त्री और उसका पुत्र बहुत दिनों तक पर्याप्त भोजन पाते रहे। {17:16} आटे का बर्तन और तेल का पीपा दोनों कभी खाली नहीं हुए। यह वैसा ही हुआ जैसा यहोवा ने होने को कहा था। यहोवा ने एलिय्याह के द्वारा बातें की थीं। {17:17} कुछ समय बाद उस स्त्री का लड़का बीमार पड़ा। वह अधिक, और अधिक बीमार होता गया। अन्त में लड़के ने साँस लेना बन्द कर दिया। {17:18} और उस स्त्री ने एलिय्याह से कहा, “तुम परमेश्वर के व्यक्ति हो। क्या तुम मुझे सहायता दे सकते हो या क्या तुम मुझे सारे पापों को केवल याद कराने के लिये यहाँ आये हो क्या तुम यहाँ मेरे पुत्र को केवल मरवाने आये थे” {17:19} एलिय्याह ने उससे कहा, “अपना पुत्र मुझे दो।” एलिय्याह ने उसके लड़के को उससे लिया और सीढ़ीयों से ऊपर ले गया। उसने उसे उस कमरे में बिछौने पर लिटाया जिसमें वह रुका हुआ था। {17:20} तब एलिय्याह ने प्रार्थना की, “हे यहोवा, मेरे परमेश्वर, यह विधवा मुझे अपने घर में ठहरा रही है। क्या तू उसके साथ यह बुरा काम करेगा क्या तू उसके पुत्र को मरने देगा” {17:21} तब एलिय्याह लड़के के ऊपर तीन बार लेटा। एलिय्याह ने प्रार्थना की, “हे यहोवा, मेरे परमेश्वर! इस लड़के को पुनर्जीवित कर।” {17:22} यहोवा ने एलिय्याह की प्रार्थना स्वीकार की। लड़का पुन: साँस लेने लगा। वह जीवित हो गया। {17:23} एलिय्याह बच्चे को सीढ़ियों से नीचे ले गया। एलिय्याह ने उस लड़के को उसकी माँ को दिया और कहा, “देखो, तुम्हारा पुत्र जी उठा।” {17:24} उस स्त्री ने उत्तर दिया, “अब मुझे विश्वास हो गया कि तुम सच में परमेश्वर के यहाँ के व्यक्ति हो। मैं समझ गई हूँ कि सचमुच में यहोवा तुम्हारे माध्यम से बोलता है।” {i18:1} एलिय्याह और बाल के नबी {18:1} अनावृष्टि के तीसरे वर्ष यहोवा ने एलिय्याह से कहा, “जाओ, और राजा अहाब से मिलो। मैं शीघ्र ही वर्षा भेजूँगा।” {18:2} अत: एलिय्याह अहाब के पास गया। उस समय शोमरोन में भोजन नहीं रह गया था। {18:3} इसलिये राजा अहाब ने ओबद्याह से अपने पास आने को कहा। ओबद्याह राज महल का अधिकारी था। (ओबद्याह यहोवा का सच्चा अनुयायी था। {18:4} एक बार ईज़ेबेल यहोवा के सभी नबियों को जान से मार रही थी। इसलिये ओबद्याह ने सौ नबियों को लिया और उन्हें दो गुफाओं में छिपाया। ओबद्याह ने एक गुफा में पचास नबी और दूसरी गुफा में पचास नबी रखे। तब ओबद्याह उनके लिये पानी और भोजन लाया।) {18:5} राजा अहाब ने ओबद्याह से कहा, “मेरे साथ आओ। हम लोग इस प्रदेश के हर एक सोते और नाले की खोज करेंगे। हम लोग पता लगायेंगे कि क्या हम अपने घोड़ों और खच्चरों को जीवित रखने के लिये पर्याप्त घास कहीं पा सकते हैं। तब हमें अपना कोई जानवर खोना नहीं पड़ेगा।” {18:6} हर एक व्यक्ति ने देश का एक भाग चुना जहाँ वे पानी की खोज कर सकें। तब दोनों व्यक्ति पूरे देश में घूमें। अहाब एक दिशा में अकेले गया। ओबद्याह दूसरी दिशा में अकेले गया। {18:7} जब ओबद्याह यात्रा कर रहा था तो उस समय वह एलिय्याह को पहचान लिया। ओबद्याह एलिय्याह के सामने प्रणाम करने झुका उसने कहा, “एलिय्याह! क्या स्वामी सचमुच आप हैं” {18:8} एलिय्याह ने उत्तर दिया, “हाँ, मैं ही हूँ। जाओ और अपने स्वामी राजा से कहो कि मैं यहाँ हूँ।” {18:9} तब ओबद्याह ने कहा, “यदि मैं अहाब से कहूँगा कि मैं जानता हूँ कि तुम कहाँ हो, तो वह मुझे मार डालेगा! मैंने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा है। तुम क्यों चाहते हो कि मैं मर जाऊँ {18:10} यहोवा, तुम्हारे परमेश्वर की सत्ता जैसे निश्चित है, वैसे ही यह निश्चित है, कि राजा तुम्हारी खोज कर रहा है। उसने हर एक देश में तुम्हारा पता लगाने के लिये आदमी भेज रखे हैं। यदि किसी देश के राजा ने यह कहा कि तुम उसके देश में नहीं हो, तो अहाब ने उसे यह शपथ खाने को विवश किया कि तुम उसके देश में नहीं हो। {18:11} अब तुम चाहते हो कि मैं जाऊँ और उससे कहूँ कि तुम यहाँ हो {18:12} यदि मैं जाऊँ और रजा अहाब से कहूँ कि तुम यहाँ हो तो यहोवा तुम्हें किसी अन्य स्थान पर पहुँचा सकता है। राजा अहाब यहाँ आयेगा और वह तुम्हें नहीं पा सकेगा। तब वह मुझे मार डालेगा। मैंने यहोवा का अनुसरण तब से किया है जब मैं एक बालक था। {18:13} तुमने सुना है कि मैंने क्या किया था। ईजेबेल यहोवा के नबियों को मार रही थी और मैंने सौ नबियों को गुफाओं में छिपाया था। मैंने एक गुफा में पचास नबियों और दूसरी गुफा में पचास नबियों को रखा था। मैं उसके लिये अन्न — पानी लाया। {18:14} अब तुम चाहते हो कि मैं जाऊँ और राजा से कहूँ कि तुम यहाँ हो। रजा मुझे मार डालेगा।” {18:15} एलिय्याह ने उत्तर दिया, “जितनी सर्वशक्तिमान यहोवा की सत्ता निश्चित है उतना ही निश्चित यह है कि मैं आज राजा के सामने खड़ा होऊँगा।” {18:16} इसलिये ओबद्याह राजा अहाब के पास गया। उसने बताया कि एलिय्याह वहाँ है। राजा अहाब एलिय्याह से मिलने गया। {18:17} जब अहाब ने एलिय्याह को देखा तो उसने पूछा, “क्या एलिय्याह तुम्ही हो तुम्हीं वह व्यक्ति हो जो इस्राएल पर विपत्ति लाते हो।” {18:18} एलिय्याह ने उत्तर दिया, “मैंने इस्राएल पर विपत्ति नहीं ढाई। तुमने और तुम्हारे पिता के परिवार ने यह सारी विपत्ति ढाई है। तुमने विपत्ति लानी तब आरम्भ की जब तुमने यहोवा के आदेशों का पालन करना बन्द कर दिया और असत्य देवताओं का अनुसरण आरम्भ किया। {18:19} अब सारे इस्राएलियों को कर्म्मेल पर्वत पर मुझसे मिलने को कहो। उस स्थान पर बाल के चार सौ पचास नबियों को भी लाओ और असत्य देवी अशेरा के चार सौ नबियों को लाओ रानी ईज़ेबेल उन नबियों का समर्थन करती है।” {18:20} अत: अहाब ने सभी इस्राएलियों और उन नबियों को कर्म्मेल पर्वत पर बुलाया। {18:21} एलिय्याह सभी लोगों के पास आया। उसने कहा, “आप लोग कब निर्णय करेंगे कि आपको किसका अनुसरण करना है यदि यहोवा सच्चा परमेश्वर है तो आप लोगों को उसका अनुयायी होना चाहिये। किन्तु यदि बाल सत्य परमेश्वर है तो तुम्हें उसका अनुयायी होना चाहिये।” लोगों ने कुछ भी नहीं कहा। {18:22} अत: एलिय्याह ने कहा, “मैं यहाँ यहोवा का एकमात्र नबी हूँ। मैं अकेला हूँ। किन्तु यहाँ बाल के चार सौ पचास नबी हैं। {18:23} इसलिये दो बैल लाओ। बाल के नबी को एक बैल लेने दो। उन्हें उसे मारने दो और उसके टुकड़े करने दो और तब उन्हें, माँस को लकड़ी पर रखने दो। किन्तु वे आग लगाना आरम्भ न करें। तब मैं वही काम दूसरे बैल को लेकर करूँगा और मैं आग लगाना आरम्भ नहीं करूँगा। {18:24} बाल के नबी! बाल से प्रार्थना करेंगे और मैं यहोवा से प्रार्थना करुँगा। जो ईश्वर प्रार्थना को स्वीकार करे और अपनी लकड़ी को जलाना आरम्भ कर दे, वही सच्चा परमेश्वर है।” सभी लोगों ने स्वीकार किया कि यह उचित विचार है। {18:25} तब एलिय्याह ने बाल के नबियों से कहा, “तुम बड़ी संख्या में हो। अत: तुम लोग पहल करो। एक बैल को चुनो और उसे तैयार करो। किन्तु आग लगाना आरम्भ न करो।” {18:26} अत: नबियों ने उस बैल को लिया जो उन्हें दिया गया। उन्होंने उसे तैयार किया। उन्होंने दोपहर तक बाल से प्रार्थना की। उन्होंने प्रार्थना की, “बाल, कृपया हमें उत्तर दे!” किन्तु कोई आवाज नहीं आई। किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया। नबी उस वेदी के चारों ओर नाचते रहे जिसे उन्होंने बनाया था। किन्तु आग फिर भी नहीं लगी। {18:27} दोपहर को एलिय्याह ने उनका मजाक उड़ाना आरम्भ किया। एलिय्याह ने कहा, “यदि बाल सचमुच देवता है तो कदाचित् तुम्हें और अधिक जोर से प्रार्थना करनी चाहिये कदाचित् वह सोच रहा हो या कदाचित् वह बहुत व्यस्त हो, या कदाचित वह किसी यात्रा पर निकल गया हो। वह सोता रह सकता है। कदाचित् तुम लोग और अधिक जोर से प्रार्थना करो और जगाओ!” {18:28} उन्होंने और जोर से प्रार्थना की। उन्होंने अपने को तलवार और भालों से काटा छेदा। (यह उनकी पूजा — पद्धति थी।) उन्होंने अपने को इतना काटा कि उनके ऊपर खून बहने लगा। {18:29} तीसरा पहर बीता किन्तु तब तक आग नहीं लगी। नबी उन्मत्त रहे जब तक सन्ध्या की बलि — भेंट का समय नहीं आ पहुँचा। किन्तु तब तक भी बाल ने कोई उत्तर नही दिया। कोई अवाज नहीं आई। कोई नहीं सुन रहा था! {18:30} तब एलिय्याह ने सभी लोगों से कहा, “अब मेरे पास आओ।” अत: सभी लोग एलिय्याह के चारों ओर इकट्ठे हो गए। यहोवा की वेदी उखाड़ दी गई थी। अत: एलिय्याह ने इसे जमाया। {18:31} एलिय्याह ने बारह पत्थर प्राप्त किए। हर एक बारह परिवार समूहों के लिये एक पत्थर था। इन बारह परिवारों के नाम याकूब के बारह पुत्रों के नाम पर थे। याकूब वह व्यक्ति था जिसे यहोवा ने इस्राएल नाम दिया था। {18:32} एलिय्याह ने उन पत्थरों का उपयोग यहोवा को सम्मान देने के लिये वेदी के निर्माण में किया। एलिय्याह ने वेदी के चारों ओर एक छोटी खाई खोदी। यह इतनी चौड़ी और इतनी गहरी थी कि इसमें लगभग सात गैलन पानी आ सके। {18:33} तब एलिय्याह ने वेदी पर लकड़ियाँ रखीं। उसने बैल को टुकड़ों में काटा। उसने टुकड़ों को लकड़ियों पर रखा। {18:34} तब एलिय्याह ने कहा, “चार घड़ों को पानी से भरो। पानी को माँस के टुकड़ों और लकड़ियों पर डालो।” तब एलिय्याह ने कहा, “यही फिर करो।” तब उसने कहा, “इसे तीसरी बार करो।” {18:35} पानी वेदी से बाहर बहा और उससे खाई भर गई। {18:36} यह तीसरे पहर की बलि — भेंट का समय था। अत: एलिय्याह नबी वेदी के पास गया और प्रार्थना की “हे यहोवा इब्राहीम, इसहाक और याकूब के परमेश्वर! मैं तुझसे याचना करता हूँ कि तू प्रमाणित कर कि तू इस्राएल का परमेश्वर है और प्रमाणित कर कि मैं तेरा सेवक हूँ। इन लोगों के सामने यह प्रकट कर कि तूने यह सब करने का मुझे आदेश दिया है। {18:37} योहवा मेरी प्रार्थना का उत्तर दे। इन लोगों के सामने यह प्रकट कर कि हे यहोवा तू वास्तव में परमेश्वर है। तब लोग समझेंगे कि तू उन्हें अपने पास ला रहा है।” {18:38} अत: यहोवा ने नीचे आग भेजी। आग ने बलि, लकड़ी, पत्थरों और वेदी के चारों ओर की भूमि को जला दिया। आग ने खाई का सारा पानी भी सूखा दिया। {18:39} सभी लोगों ने यह होते देखा। लोग भूमि पर प्रणाम कहने झुके और करने लगे, “यहोवा परमेश्वर है! यहोवा परमेश्वर है!” {18:40} तब एलिय्याह ने कहा, “बाल के नबियों को पकड़ लो! उनमें से किसी को बच निकलने न दो!” अत: लोगों ने सभी नबियों को पकड़ा। तब एलिय्याह उन सभी को किशोन नाले तक ले गया। उस स्थान पर उसने सभी नबियों को मार डाला। {i18:41} वर्षा पुन: होती है {18:41} तब एलिय्याह ने राजा अहाब से कहा, “अब जाओ, खाओ, और पिओ। एक घनघोर वर्षा आ रही है।” {18:42} अत: राजा अहाब भोजन करने गया। उसी समय एलिय्याह कर्म्मेल पर्वत की चोटी पर चढ़ा। पर्वत की चोटी पर एलिय्याह प्रणाम करने झुका। उसने अपने सिर को अपने घुटनों के बीच में रखा। {18:43} तब एलिय्याह ने अपने सेवक से कहा, “समुद्र की ओर देखो।” सेवक उस स्थान तक गया जहाँ से वह समुद्र को देख सके। तब सेवक लौट कर आया और उसने कहा, “मैं ने कुछ नहीं देखा।” एलिय्याह ने उसे पुन: जाने और देखने को कहा। यह सात बार हुआ। {18:44} सातवीं बार सेवक लौट कर आया और उसने कहा, “मैंने एक छोटा बादल मनुष्य की मुट्ठी के बराबर देखा है। बादल समुद्र से आ रहा था।” एलिय्याह ने सेवक से कहा, “राजा अहाब के पास जाओ और उससे कहो कि वह अपना रथ तैयार कर ले और अब घर वापस जाये। यदि वह अभी नहीं जायेगा तो वर्षा उसे रोक लेगी।” {18:45} थोड़े समय के बाद आकाश काले मेघों से ढक गया। तेज हवायें चलने लगीं और घनघोर वर्षा होने लगी। अहाब अपने रथ में बैठा और यिज्रेल को वापस यात्रा करनी आरम्भ की। {18:46} एलिय्याह के अन्दर यहोवा की शक्ति आई। एलिय्याह ने अपने वस्त्रों को अपनी चारों ओर कसा, जिससे वह दौड़ सके। तब एलिय्याह यिज्रेल तक के पूरे मार्ग पर राजा अहाब से आगे दौड़ता रहा। {i19:1} सीनै पर्वत पर एलिय्याह {19:1} राजा अहाब ने ईज़ेबेल को वे सभी बातें बताईं जो एलिय्याह ने कीं। अहाब ने उसे बताया कि एलिय्याह ने कैसे सभी नबियों को एक ही तलवार से मौत के घाट उतारा। {19:2} इसलिये ईज़ेबेल ने एलियाह के पास एक दूत भेजा। ईज़ेबेल ने कहा, “मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि इस समय से पहले कल मैं तुमको वैसे ही मारूँगी जैसे तुमने नबियों को मारा। यदि मैं सफल नहीं होती तो देवता मुझे मार डालें।” {19:3} जब एलिय्याह ने यह सुना तो वह डर गया। अत: वह अपनी जान बचाने के लिये भाग गया। वह अपने साथ अपने सेवक को ले गया। वे बेर्शेबा पहुँचे जो यहूदा में है। एलिय्याह ने अपने सेवक को बेर्शेबा में छोड़ा। {19:4} तब एलिय्याह पूरे दिन मरूभूमि में चला। एलिय्याह एक झाड़ी के नीचे बैठा। उसने मृत्यु की याचना की। एलिय्याह ने कहा, “यहोवा यह मेरे लिये बहुत है मुझे मरने दे। मैं अपने पूर्वजों से अधिक अच्छा नहीं हूँ।” {19:5} तब एलिय्याह पेड़ के नीचे लेट गया और सो गया। एक स्वर्गदूत एलिय्याह के पास आया और उसने उसका स्पर्श किया। स्वर्गदूत ने कहा, “उठो, खाओ!” {19:6} एलिय्याह ने देखा कि उसके बहुत निकट कोयले पर पका एक पुआ और पानी भरा घड़ा है। एलिय्याह ने खाया पीया। तब वह फिर सो गया। {19:7} बाद में, यहोवा का स्वर्गदूत उसके पास फिर आया। स्वर्गदूत ने कहा, “उठो खाओ! यदि तुम ऐसा नहीं करते तो तुम इतने शक्तिशाली नहीं होगे, जिससे तुम लम्बी यात्रा कर सको।” {19:8} अत: एलिय्याह उठा। उसने खाया, पिया। भोजन ने उसे इतना शक्तिशाली बना दिया कि वह चालीस दिन और रात यात्रा कर सके। वह होरेब पर्वत तक गया जो परमेश्वर का पर्वत है। {19:9} वहाँ एलिय्याह एक गुफा में घुसा और सारी रात ठहरा। तब यहोवा ने एलिय्याह से बातें कीं। यहोवा ने कहा, “एलिय्याह, तुम यहाँ क्यों आए हो” {19:10} एलिय्याह ने उत्तर दिया, “यहोवा सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैंने तेरी सेवा सदैव की है। मैंने तेरी सेवा सर्वोत्तम रुप में सदैव यथासम्भव की है। किन्तु इस्राएल के लोगों ने तेरे साथ की गई वाचा तोड़ी है। उन्होंने तेरी वेदियों को नष्ट किया है। उन्होंने तेरे नबियों को मार डाला है। मैं एकमात्र ऐसा नबी हूँ जो जीवित बचा हूँ और अब वे मुझे मार डालना चाहते हैं!” {19:11} तब यहोवा ने एलिय्याह से कहा, “जाओ, मेरे सामने पर्वत पर खड़े होओ। मैं तुम्हारे बगल से निकलूँगा।” तब एक प्रचंड आँधी चली। आँधी ने पर्वतों को तोड़ गिराया। इसने यहोवा के सामने विशाल चट्टानों को तोड़ डाला। किन्तु वह आँधी यहोवा नहीं था। उस आँधी के बाद भूकम्प आया। किन्तु वह भूकम्प यहोवा नहीं था। {19:12} भूकम्प के बाद वहाँ अग्नि थी। किन्तु वह आग यहोवा नहीं थी। आग के बाद वहाँ एक शान्त और मद्धिम स्वर सुनाई पड़ा। {19:13} जब एलिय्याह ने वह स्वर सुना तो उसने अपने अंगरखे से अपना मुहँ ढक लिया। तब वह गया और गुफा के द्वार पर खड़ा हुआ। तब एक वाणी ने उससे कहा, “एलिय्याह, यहाँ तुम क्यों हो” {19:14} एलिय्याह ने उत्तर दिया, “यहोवा सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैंने सर्वोत्म यथासम्भव तेरी सेवा की है। किन्तु इस्राएल के लोगों ने तेरे साथ की गई अपनी वाचा तोड़ी है। उन्होंने तेरी वेदियाँ नष्ट कीं। उन्होंने तेरे नबियों को मारा। मैं एकमात्र ऐसा नबी हूँ जो अभी तक जीवित है और अब वे मुझे मार डालने का प्रयत्न कर रहे हैं।” {19:15} यहोवा ने कहा, “दमिश्क के चारों ओर की मरुभूमि को पहुँचाने वाली सड़क से वापस लौटो। दमिश्क में जाओ और हजाएल का अभिषेक अराम के राजा के रुप में करो। {19:16} तब निमशी के पुत्र येहू का अभिषेक इस्राएल के राजा के रूप में करो। उसके बाद आबेल महोला के शापात के पुत्र एलीशा का अभिषेक करो। वह तुम्हारे स्थान पर नबी बनेगा। {19:17} हजाएल अनेक बुरे लोगों को मार डालेगा। येहू किसी को भी मार डालेगा जो हजाएल की तलवार से बच निकलता है। {19:18} एलिय्याह! इस्राएल में तुम ही एक मात्र विश्वासपात्र व्यक्ति नहीं हो। वे पुरुष बहुत से लोगों को मार डालेंगे, किन्तु उसके बाद भी वहाँ इस्राएल में सात हजार लोग ऐसे होंगे जिन्होंने बाल को कभी प्रणाम नहीं किया। मैं उन सात हजार लोगों को जीवित रहने दूँगा, क्योंकि उन लोगों में से किसी ने कभी बाल की देवमूर्ति को चूमा तक नहीं।” {i19:19} एलीशा एक नबी बनता है {19:19} इसलिये एलिय्याह ने उस स्थान को छोड़ा और शापात के पुत्र एलीशा की खोज में निकला। एलीशा बारह एकड़ भूमि में हल चलाता था। एलीशा आखिरी एकड़ को जोत रहा था जब एलिय्याह वहाँ आया। एलिय्याह एलीशा के पास गया। तब एलिय्याह ने अपना अंगरखा एलीशा को पहना दिया। {19:20} एलीशा ने तुरन्त अपनी बैलों को छोड़ा और एलिय्याह के पीछे दौड़ गया। एलिशा ने कहा, “मुझे अपनी माँ को चूमने दो और पिता से विदा लेने दो। फिर मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।” एलिय्याह ने उत्तर दिया, “यह अच्छा है। जाओ, मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं।” {19:21} तब एलीशा ने अपने परिवार के साथ विशेष भोजन किया। एलीशा गया और अपने बैलों को मार डाला। उसने हल की लकड़ी का उपयोग आग जलाने के लिये किया। तब उसने माँस को पकाया और लोगों में बाँट दिया। लोगों ने माँस खाया। तब एलीशा गया और उसने एलिय्याह का अनुसरण किया। एलीशा एलिय्याह का सहायक बना। {i20:1} बेन्हदद और अहाब युद्ध में उतरते हैं {20:1} बेन्हदद अराम का राजा था। उसने अपनी सारी सेना इकट्ठी की। उसके साथ बत्तीस राजा थे। उनके पास घोड़े और रथ थे। उन्होंने शोमरोन पर आक्रमण किया और उसके विरुद्ध लड़े। {20:2} राजा ने नगर में इस्राएल के राजा अहाब के पास दूत भेजे। {20:3} सूचना यह थी, “बेन्हदद कहता है, ‘तुम्हें अपना सोना — चाँदी मुझे देना पड़ेगा। तुम्हें अपनी पत्नियाँ और बच्चे भी मुझको देने होंगे।’” {20:4} इस्राएल के राजा ने उत्तर दिया, “ऐ मेरे स्वामी राजा! मैं स्वीकार करता हूँ कि अब मैं आपके अधीन हूँ और जो कुछ मेरा है वह आपका है।” {20:5} तब दूत अहाब के पास वापस आया। उन्होंने कहा, “बेन्हदद कहता है, ‘मैंने पहले ही तुमसे कहा था कि तुम्हें सारा सोना चाँदी तथा अपनी स्त्रियों, बच्चों को मुझको देना पड़ेगा। {20:6} अब मैं अपने व्यक्तियों को भेजना चाहता हूँ जो महल में सर्वत्र और तुम्हारे आधीन शासन करने वाले और अधिकारियों के घरों में खोज करेंगे। मेरे व्यक्ति जो चाहेंगे लेंगे।’” {20:7} अत: राजा अहाब ने अपने देश के सभी अग्रजों (प्रमुखों) की एक बैठक बुलाई। अहाब ने कहा, “देखो बेन्हदद विपत्ति लाना चाहता है। प्रथम तो उसने मुझसे यह माँग की है कि मैं उसे अपनी पत्नियाँ, अपने बच्चे और अपना सोना — चाँदी दे दूँ। मैंने उसे वे चीजें देनी स्वीकार कर लीं और अब वह सब कुछ लेना चाहता है।” {20:8} किन्तु अग्रजों (प्रमुखों) और सभी लोगों ने कहा, “उसका आदेश न मानो। वह न करो जिसे करने को वह कहता है।” {20:9} इसलिये अहाब ने बेन्हदद को सन्देश भेजा। अहाब ने कहा, “मैं वह कर दूँगा जो तुमने पहले कहा था। किन्तु मैं तुम्हारे दूसरे आदेश का पालन नहीं कर सकता।” राजा बेन्हदद के दूत सन्देश राजा तक ले गये। {20:10} तब वे बेन्हदद के अन्य सन्देश के साथ लौटे। सन्देश यह था, “मैं शोमरोन को पूरी तरह नष्ट करूँगा। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि उस नगर का कुछ भी नहीं बचेगा। उस नगर का इतना कुछ भी नहीं बचेगा कि वह हमारे व्यक्तियों के लिये नगर की यादगार के रूप में अपने घर ले जाने को पर्याप्त हो। परमेश्वर मुझे नष्ट कर दे यदि मैं ऐसा करूँ।” {20:11} राजा अहाब ने उत्तर दिया, “बेन्हदद से कहो कि उस व्यक्ति को, जिसने अपना कवच धारण किया हो, उस व्यक्ति की तरह डींग नहीं हाँकनी चाहिये जो उसे उतारने के लिये लम्बा जीवन जीता है।” {20:12} राजा बेन्हदद अपने अन्य प्रशासकों के साथ अपने तम्बू में मदिरा पान कर रहा था। उसी समय दूत आया और उसने राजा अहाब का सन्देश दिया। राजा बेन्हदद ने अपने व्यक्तियों को नगर पर आक्रमण करने के लिये तैयार होने को कहा। अत: सैनिक युद्ध के लिये अपना स्थान लेने बढ़े। {20:13} इसी समय, एक नबी, राजा अहाब के पास पुहँचा। नबी ने कहा, “राजा अहाब यहोवा तुमसे कहता है, ‘क्या तुम उस बड़ी सेना को देखते हो! मैं यहोवा, आज तुम्हें उस सेना को हराने दूँगा। तब तुम जानोगे कि मैं यहोवा हूँ।’” {20:14} अहाब ने कहा, “उन्हें पराजित करने के लिये तुम किसका उपयोग करोगे” नबी ने उत्तर दिया, “यहोवा कहता है, ‘सरकारी अधिकारियों के युवक सहायक।’” तब राजा ने पूछा, “मुख्य सेना का सेनापतित्व कौन सम्भालेगा” नबी ने उत्तर दिया, “तुम सम्भालेगा।” {20:15} अत: अहाब ने सरकारी अधिकारियों के युवक सहायकों को इकट्ठा किया। सब मिलाकर ये दो सौ बत्तीस युवक थे। तब राजा ने इस्राएल की सेना को एक साथ बुलाया। सारी संख्या सात हजार थी। {20:16} दोपहर को, राजा बेन्हदद और उसके सहायक बत्तीस राजा अपने डेरे में मदिरा पान कर रहे थे और मद मत्त हो रहे थे। इसी समय राजा अहाब का आक्रमण आरम्भ हुआ। {20:17} युवक सहायकों ने प्रथम आक्रमण किया। बेन्हदद के व्यक्तियों ने उससे कहा कि सैनिक शोमरोन से बाहर निकल आये हैं। {20:18} अत: बेन्हदद ने कहा, “वे युद्ध करने के लिये आ रहे होंगे या वे शान्ति — सन्धि करने आ रहे होंगे। उन्हें जीवित पकड़ लो।” {20:19} राजा अहाब के युवक आक्रमण की पहल कर रहे थे। इस्राएल की सेना उनके पीछे चल रही थी। {20:20} किन्तु इस्राएल के हर एक व्यक्ति ने उस पुरुष को मार डाला जो उसके विरुद्ध आया। अत: अराम के सैनिकों ने भागना आरम्भ किया। इस्राएल की सेना ने उनका पीछा किया। राजा बेन्हदद अपने रथों के एक घोड़े पर बैठकर भाग निकला। {20:21} राजा अहाब सेना को लेकर आगे बढ़ा और उसने अराम की सेना के सारे घोड़ों और रथों को ले लिया। इस प्रकार राजा अहाब ने अरामी सेना को भारी पराजय दी। {20:22} तब नबी राजा अहाब के पास पहुँचा और कहा, “अराम का राजा बेन्हदद अगले बसन्त में तुमसे युद्ध करने के लिये फिर आयेगा। अत: तुम्हें अब घर लौट जाना चाहिये और अपनी सेना को पहले से अधिक शक्तिशाली बनाना चाहिये और उसके विरुद्ध सुरक्षा की सुनियोजित योजना बनानी चाहिये।” {i20:23} बेन्हदद पुन: आक्रमण करता है {20:23} राजा बेन्हदद के अधिकारियों ने उससे कहा, “इस्राएल के देवता पर्वतीय देवता है। हम लोग पर्वतीय क्षेत्र में लड़े थे। इसलिये इस्राएल के लोग विजयी हुए। अतः हम लोग उनसे समतल मैदान में युद्ध करें। तब हम विजय पाएंगे। {20:24} तुम्हें यही करना चाहिए। बत्तीस राजाओं को सेना का सेनापतित्व करने को अनुमति न दो। सेनापतियों को ही अपनी सेना का संचालन करने दो। {20:25} अब तुम वैसी ही सेना बनाओ जो नष्ट हुई सेना की तरह हो। उसी सेना की तरह घोड़े और रथ इकट्ठे करो। तब हम लोग इस्राएलियों से समतल मैदान में युद्ध करें। तब हम विजय प्राप्त करेंगे।” बेन्हदद ने उनकी सलाह मान ली। उसने वही किया जो उन्होंने कहा। {20:26} अत: बसन्त में बेन्हदद ने अराम के लोगों को इकट्ठा किया। वह इस्राएल के विरुद्ध युद्ध करने अपेक गया। {20:27} इस्राएलियों ने भी युद्ध की तैयारी की। इस्राएल के लोग अराम की सेना से लड़ने गये। उन्होंने अपने डेरे अराम के डेरे के सामने डाले। शुत्र की तुलना में इस्राएली बकरियों के दो छोटे झुण्डों के समान दिखाई पड़ते थे किन्तु अराम की सेना सारे क्षेत्र को ढकी थी। {20:28} परमेश्वर का एक व्यक्ति इस सन्देश के साथ इस्राएल के राजा के पास आया: “यहोवा ने कहा है, ‘अराम के लोगों ने कहा है कि मैं अर्थात् यहोवा पर्वतों का परमेश्वर हूँ। वे समझते हैं कि घाटियों का परमेश्वर मैं नहीं हूँ। इसलिए मैं तुम्हें इस विशाल सेना को पराजित करने दूँगा। तब तुम समझोगे कि मैं यहोवा सर्वत्र हूँ।’” {20:29} सेनायें सात दिन तक एक दूसरे के आमने सामने डेरा डाले रहीं। सातवें दिन युद्ध आरम्भ हुआ। इस्राएलियों ने एक दिन में अराम के एक लाख सैनिकों को मार डाला। {20:30} बचे हुए सैनिक अपेक नगर को भाग गए। नगर प्राचीर उन सत्ताईस हजार सैनिकों पर गिर पड़ी। बेन्हदद भी नगर को भाग गया। वह एक कमरे में छिप गया। {20:31} उसके सेवकों ने उससे कहा, “हम लोगों ने सुना है कि इस्राएल कुल के राजा लोग दयालु हैं। हम लोग मोटे वस्त्र पहने और सिर पर रस्सी डाले। तब हम लोग इस्राएल के राजा के पास चलें। सभंव है, वह हमें जीवित रहने दे।” {20:32} उन्होंने मोटे वस्त्र पहने और रस्सी सिर पर डाली। वे इस्राएल के राजा के पास आए। उन्होंने कहा, “तुम्हारा सेवक बेन्हदद कहता है, ‘कृपया मुझे जीवित रहने दे।’” अहाब ने उत्तर दिया, “क्या वह अभी तक जीवित है वह मेरा भाई है।” {20:33} बेन्हदद के व्यक्ति राजा अहाब से ऐसा कुछ कहलवाना चाहते थे, जिससे यह पता चले कि वह बेन्हदद को नहीं मारेगा। जब अहाब ने बेन्हदद को भाई कहा तो सलाहकारों ने तुरन्त कहा, “हाँ! बेन्हदद आपका भाई है।” अहाब ने कहा, “उसे मेरे पास लाओ।” अत: बेन्हदद राजा अहाब के पास आया। राजा अहाब ने अपने साथ उसे अपने रथ में बैठने को कहा। {20:34} बेन्हदद ने उससे कहा, “अहाब मैं उन नगरों को तुम्हें दे दूँगा जिन्हें मेरे पिता ने तुम्हारे पिता से ले लिये थे और तुम दमिश्क में वैसे ही दुकाने रख सकते हो जैसे मेरे पिता ने शोमरोन में रखी थीं।” अहाब ने उत्तर दिया, “यदि तुम इसे स्वीकार करते हो तो मैं तुम्हें जाने के लिये स्वतन्त्र करता हूँ।” अत: दोनों राजाओं ने एक शान्ति — सन्धि की। तब राजा अहाब ने बेन्हदद को जाने के लिये स्वतन्त्र कर दिया। {i20:35} एक नबी अहाब के विरुद्ध भविष्यवाणी करता है {20:35} नबियों में से एक ने दूसरे नबी से कहा, “मुझ पर चोट करो!” उसने उससे यह करने के लिये कहा क्योंकि यहोवा ने ऐसा आदेश दिया था। किन्तु दूसरे नबी ने उस पर चोट करने से इन्कार कर दिया। {20:36} इसलिये पहले नबी ने कहा, “तुमने यहोवा के आदेस का पालन नहीं किया। अत: जब तुम इस स्थान को छोड़ोगे, एक सिंह तुम्हें मार डालेगा।” दूसरे नबी ने उस स्थान को छोड़ा और उसे एक सिंह ने मार डाला। {20:37} प्रथम नबी दूसरे व्यक्ति के पास गया और कहा, “मुझ पर चोट करो।” उस व्यक्ति ने उस पर चोट की। नबी को चोट आई। {20:38} अत: नबी ने अपने चेहरे पर एक वस्र लपेट लिया। इस प्रकार कोई यह नहीं समझ सकता था कि वह कौन है। वह नबी गया और उसने सड़क के किनारे राजा की प्रतीक्षा आरम्भ की। {20:39} राजा उधर से निकला और नबी ने उससे कहा, “मैं युद्ध में लड़ने गया था। हमारे व्यक्तियों में से मेरे पास शत्रु सैनिक को लाया। उस व्यक्ति ने कहा, ‘इस व्यक्ति की पहरेदारी करो। यदि यह भाग गया तो इसके स्थान पर तुम्हें अपना जीवन देना होगा या तुम्हें पचहत्तर पौंड चाँदी जुर्माने में देनी होगी।’ {20:40} किन्तु मैं अन्य कामों में व्यस्त हो गया। अतः वह व्यक्ति भाग निकला।” इस्राएल के राजा ने कहा, “तुमने कहा है कि तुम सैनिक को भाग जाने देने के अपराधी हो। अत: तुमको उत्तर मालूम है। तुम्हें वही करना चाहिये जिसे करने को उस व्यक्ति ने कहा है।” {20:41} तब नबी ने अपने मुख से कपड़े को हटाया। इस्राएल के राजा ने देखा और यह जान लिया कि वह नबियों में से एक है। {20:42} तब नबी ने राजा से कहा, “यहोवा तुमसे यह कहता है, ‘तुमने उस व्यक्ति को स्वतन्त्र किया जिसे मैंने मर जाने को कहा। अत: उसका स्थान तुम लोगे, तुम मर जाओगे और तुम्हारे लोग दुश्मनों का स्थान लेंगे, तुम्हारे लोग मरेंगे।’” {20:43} तब राजा अपने घर शोमरोन लौट गया। वह बहुत परेशान और घबराया हुआ था। {i21:1} नाबोत के अंगूर का बाग {21:1} राजा अहाब का महल शोमरोन में था। महल के पास एक अंगूरों का बाग था। यिज्रेल नाबोत नामक व्यक्ति इस फलों के बाग का स्वामी था। {21:2} एक दिन अहाब ने नाबोत से कहा, “अपना यह फलों का बाग मुझ दे दो। मैं इसे सब्जियों का बाग बनाना चाहता हूँ। तुम्हारा बाग मेरे महल के पास है। मैं इसके बदले तुम्हें इससे अच्छा अंगूर का बाग दूँगा या, यदि तुम पसन्द करोगे तो इसका मूल्य मैं सिक्कों में चुकाऊँगा।” {21:3} नाबोत ने उत्तर दिया, “मैं अपनी भूमि तुम्हें कभी नहीं दूँगा। यह भूमि मेरे परिवार की है।” {21:4} अत: अहाब अपने घर गया। वह नाबोत पर क्रोधित और बिगड़ा हुआ था। उसने उस बात को पसन्द नहीं किया जो यिज्रेल के व्यक्ति ने कही थी। (नाबोत ने कहा था, “मैं अपने परिवार की भूमि तुम्हें नहीं दूँगा।”) अहाब अपने बिस्तर पर लेट गया। उसने अपना मुख मोड़ लिया और खाने से इन्कार कर दिया। {21:5} अहाब की पत्नी ईज़ेबेल उसके पास गई। ईज़ेबेल ने उससे कहा, “तुम घबराये क्यों हो तुमने खाने से इन्कार क्यों किया है” {21:6} अहाब ने उत्तर दिया, “मैंने यिज्रेल के नाबोत से उसकी भूमि माँगी। मैंने उससे कहा कि मैं उसकी पूरी कीमत चुकाऊँगा, या, यदि वह चाहेगा तो मैं उसे दूसरा बाग दूँगा। किन्तु नाबोत ने अपना बाग देने से इन्कार कर दिया।” {21:7} ईज़ेबेल ने उत्तर दिया, “किन्तु तुम तो पूरे इस्राएल के राजा हो अपने बिस्तर से उठो। कुछ भोजन करो, तुम अपने को स्वस्थ अनुभव करोगे। मैं नाबोत का बाग तुम्हारे लिये ले लूँगी।” {21:8} तब ईजेबेल ने कुछ पत्र लिखे। उसने पत्रों पर अहाब के हस्ताक्षर बनाये। उसने अहाब की मुहर पत्रों को बन्द करने के लिये उन पर लगाई। तब उसने उन्हें अग्रजों (प्रमुखों) और विशेष व्यक्तियों के पास भेजे जो उसी नगर में रहते थे जिसमें नाबोत रहता था। {21:9} पत्र में यह लिखा था: “यह घोषणा करो कि एक ऐसा दिन होगा जिस दिन लोग कुछ भी भोजन नहीं करेंगे। तब नगर के सभी लोगों की एक साथ एक बैठक बुलाओ। बैठक में हम नाबोत के बारे में बात करेंगे। {21:10} किसी ऐसे व्यक्ति का पता करो जो नाबोत के विषय में झूठ बोले। वे लोग यह कहें कि उन्होंने सुना कि नाबोत ने राजा और परमेश्वर के विरुद्ध कुछ बातें कहीं। तब नाबोत को नगर के बाहर ले जाओ और उसे पत्थरों से मार डालो।” {21:11} अतः यिज्रेल के अग्रजों (प्रमुखों) और विशेष व्यक्तियों ने उस आदेश का पालन किया। {21:12} प्रमुखों ने घोषणा की कि एक दिन ऐसा होगा जब सभी व्यक्ति कुछ भी भोजन नहीं करेंगे। उस दिन उन्होंने सभी लोगों की बैठक एक साथ बुलाई। उन्होंने नाबोत को विशेष स्थान पर लोगों के सामने रखा। {21:13} तब दो व्यक्तियों ने लोगों से कहा कि उन्होंने नाबोत को परमेश्वर और राजा के विरुद्ध बातें करते सुना है। अत: लोग नाबोत को नगर के बाहर ले गए। तब उन्होंने उसे पत्थरों से मार डाला। {21:14} तब प्रमुखों ने एक सन्देश ईज़ेबेल को भेजा। सन्देश था: “नाबोत पत्थरों से मार डाला गया।” {21:15} जब ईज़ेबले ने यह सुना तो उसने अहाब से कहा, “नाबोत मर गया। अब तुम जा सकते हो और उस बाग को ले सकते हो जिसे तुम चाहते थे।” {21:16} अत: अहाब अंगूरों के बाग में गया और उसे अपना बना लिया। {21:17} इस समय यहोवा ने एलिय्याह से बातें कीं। (एलिय्याह तिशबी का नबी था।) {21:18} यहोवा ने कहा, “राजा अहाब के पास शोमरोन को जाओ। अहाब नाबोत के अंगूरों के बाग में होगा। वह वहाँ पर उस बाग को अपना बनाने के लिये होगा। {21:19} अहाब से कहो, मैं यहोवा उससे कहता हूँ, ‘अहाब! तुमने नाबोत नामक व्यक्ति को मार डाला है। अब तुम उसकी भूमि ले रहे हो। अत: मैं तुमसे कहता हूँ, तुम भी उसी स्थान पर मरोगे जिस स्थान पर नाबोत मरा। जिन कुत्तों ने नाबोत के खून को चाटा, वे ही तुम्हारा खून उस स्थान पर चाटेंगे।’” {21:20} अत: एलिय्याह अहाब के पास गया। अहाब ने एलिय्याह को देखा और कहा, “तुमने मुझे फिर पा लिया है। तुम सदा मेरे विरुद्ध हो।” एलिय्याह ने उत्तर दिया, “हाँ, मैंने तुम्हें पुन: पा लिया है। तुमने सदा अपने जीवन का उपयोग यहोवा के विरुद्ध पाप करने में किया। {21:21} अत: यहोवा तुमसे कहता है, ‘मैं तुम्हें नष्ट कर दूँगा। {21:22} मैं तुम्हें और तुम्हारे परिवार के हर एक पुरुष सदस्य को मार डालूँगा। तुम्हारे परिवार की वही दशा होगी जो दशा नाबोत के पुत्र यारोबाम के परिवार की हुई और तुम्हारा परिवार बाशा के परिवार की तरह होगा। ये दोनों पूरी तरह नषट कर दिये गये थे। मैं तुम्हारे साथ यही करूँगा क्योंकि तुमने मुझे क्रोधित किया है। तुमने इस्राएल के लोगों से पाप कराया है,’ {21:23} और यहोवा यह भी कहता है, ‘तुम्हारी पत्नी ईजेबेल का शव यिज्रेल नगर में कुत्ते खायेंगे। {21:24} तुम्हारे परिवार के किसी भी सदस्य को जो नगर में मरेगा, कुत्ते खायेंग। जो व्यक्ति मैदानों में मरेगा वह पक्षियों द्वारा खाया जाएगा।’” {21:25} कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसने उतने बुरे काम या पाप किये हों जितने अहाब ने किये। उसकी पत्नी ईज़ेबेल ने उससे ये काम कराये। {21:26} अहाब ने बहुत बुरा पाप किया और उसने उन काष्ठ के कुंदों (देव मूर्तियों) को पूजा। यह वही काम था जिसे एमोरी लोग करते थे और यहोवा ने उनसे प्रदेश छीन लिया था और इस्राएल के लोगों को दे दिया था। {21:27} एलिय्याह के कथन के पूरा होने पर अहाब बहुत दुःखी हुआ। उसने अपने वस्त्रों को यह दिखाने के लिये फाड़ डाला कि उसे दुःख है। तब उसने शोक के विशेष वस्त्र पहन लिये। अहाब ने खाने से इन्कार कर दिया। वह उन्हीं विशेष वस्त्रों को पहने हुए सोया। अहाब बहुत दुःखी और उदास था। {21:28} यहोवा ने एलिय्याह नबी से कहा, {21:29} “मैं देखता हूँ कि अहाब मेरे सामने विनम्र हो गया है। अत: उसके जीवन काल में मैं उस पर विपत्ति नहीं आने दूँगा। मैं तब तक प्रतीक्षा करूँगा जब तक उसका पुत्र राजा नहीं बन जाता। तब मैं अहाब के परिवार पर विपत्ति आने दूँगा।” {i22:1} मीकायाह अहाब को चेतावनी देता है {22:1} अगले दो वर्षों के भीतर इस्राएल और अराम के बीच शान्ति रही। {22:2} तब तीसरे वर्ष यहूदा का राजा यहोशापात इस्राएल के राजा अहाब से मिलने गया। {22:3} इस समय अहाब ने अपने अधिकारियों से पूछा, “तुम जानते हो कि अराम के राजा ने गिलाद में रामोत को हम से ले लिया था। हम लोगों ने रामोत वापस लेने का कुछ भी प्रयत्न क्यों नहीं किया यह हम लोगों का नगर होना चाहिये।” {22:4} इसलिये अहाब ने यहोशापात से पूछा, “क्या आप हमारे साथ होंगे और रामोत में अराम की सेना के विरुद्ध युद्ध करेंगे” यहोशापात ने उत्तर दिया, “हाँ, मैं तुम्हारा साथ दूँगा। मेरे सैनिक और मेरे घोड़े तुम्हारी सेना के साथ मिलने के लिये तैयार हैं। {22:5} किन्तु पहले हम लोगों को यहोवा से सलाह ले लेनी चाहिये।” {22:6} अत: अहाब ने नबियों की एक बैठक बुलाई। उस समय लगभग चार सौ नबी थे। अहाब ने नबियों से पूछा, “क्या मैं जाऊँ और रामोत में अराम की सेना के विरुद्ध युद्ध करुँ या मैं किसी अन्य अवसर की प्रतीक्षा करुँ” नबियों ने उत्तर दिया, “तुम्हें अभी युद्ध करना चाहिये। यहोवा तुम्हें विजय पाने देगा।” {22:7} किन्तु यहोशापात ने कहा, “क्या यहाँ यहोवा के नबियों में से कोई अन्य नबी है यदि कोई है तो हमें उससे पूछना चाहिये कि परमश्वर क्या कहता है।” {22:8} राजा अहाब ने उत्तर दिया, “एक अन्य नबी है। वह यिम्ला का पुत्र मीकायाह है। किन्तु उससे मैं घृणा करता हूँ। जब कभी वह यहोवा का माध्यम बनता है तब वह मेरे लिये कुछ भी अच्छा नहीं कहता। वह सदैव वही कहता है जिसे मैं पसन्द नहीं करता।” यहोशापात ने कहा, “राजा अहाब, तुम्हें ये बातें नहीं कहनी चाहिये!” {22:9} अत: राजा अहाब ने अपने अधिकारियों में से एक से जाने और मीकायाह को खोज निकालने को कहा। {22:10} उस समय दोनों राजा अपना राजसी पोशाक पहने थे। वे सिंहासन पर बैठे थे। यह शोमरोन के द्वार के पास खुले स्थान पर था। सभी नबी उनके सामने खड़े थे। नबी भविष्यवाणी कर रहे थे। {22:11} नबियों में से एक सिदकिय्याह नामक व्यक्ति था। वह कनाना का पुत्र था। सिदकिय्याह ने कुछ लोहे की सींगें बनाईं। तब उसने अहाब से कहा, “यहोवा कहता है, ‘तुम लोहे की इन सींगों का उपयोग अराम की सेना के विरुद्ध लड़ने में करोगे। तुम उन्हें हराओगे और उन्हें नष्ट करोगे।’” {22:12} सभी अन्य नबियों ने असका समर्थन किया जो कुछ सिदकिय्याह ने कहा। नबियों ने कहा, “तुम्हारी सेना अभी कूच करे। उन्हें रामोत में अराम की सेना के साथ युद्ध करना चाहिये। तुम युद्ध जीतोगे। यहोवा तुम्हें विजय पाने देगा।” {22:13} जब यह हो रहा था तभी अधिकारी मीकायाह को खोजने गया। अधिकारी ने मीकायाह को खोज निकाला और उससे कहा, “सभी अन्य नबियों ने कहा है कि राजा को सफलता मिलेगी। अत: मैं यह कहता हूँ कि यही कहना तुम्हारे लिये सर्वाधिक अनुकूल होगा।” {22:14} किन्तु मीकायाह ने उत्तर दिया, “नहीं! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि यहोवा की शक्ति से वही कहूँगा जो कहने के लिये यहोवा कहेगा!” {22:15} तब मीकायाह राजा अहाब के सामने खड़ा हुआ। राजा ने उससे पुछा, “मीकायाह, क्या मुझे और राजा यहोशापात को अपनी सेनायें एक कर लेनी चाहिये और क्या हमें अराम की सेना से रामोत में युद्ध करने के लिये अभी कुछ करना चाहिये या नहीं” मीकायाह ने उत्तर दिया, “हाँ! तुम्हें जाना चाहिये और उनसे अभी युद्ध करना चाहिये। यहोवा तुम्हें विजय देगा।” {22:16} किन्तु अहाब ने पूछा, “तुम यहोवा की शक्ति से नहीं बता रहे हो। तुम अपनी निजी बात कह रहे हो। अत: मुझसे सत्य कहो। कितनी बार मुझे तुमसे कहना पड़ेगा मुझसे वह कहो जो यहोवा कहता है।” {22:17} अत: मीकायाह ने उत्तर दिया, “मैं जो कुछ होगा, देख सकता हुँ। इस्राएल की सेना पहाड़ियों में बिखर जायेगी। वे उन भेड़ों की तरह होंगी जिनका कोई भी संचालक न हो। यही यहोवा कहता है, ‘इन व्यक्तियों का दिशा निर्देशक कोई नहीं है। उन्हें घर जाना चाहिये और युद्ध नहीं करना चाहिये।’” {22:18} तब अहाब ने यहोशापात से कहा, “देख लो! मैंने तुम्हें बताया था! यह नबी मेरे बारे में कभी कोई अच्छी बात नहीं कहता। यह सदा वही बात कहता है जिसे मैं सनना नहीं चाहता।” {22:19} किन्तु मीकायाह यहोवा का माध्यम बना कहता ही रहा। उसने कहा, “सुनो! ये वे शब्द हैं जिन्हें यहोवा ने कहा है। मैंने यहोवा को स्वर्ग में अपने सिंहासन पर बैठे देखा। उसके दूत उसके समीप खड़े थे। {22:20} यहोवा ने कहा, ‘क्या तुममें से कोई राजा अहाब को चकमा दे सकता है मैं उसे रामोत में अराम की सेना के विरुद्ध युद्ध करने के लिये जाने देना चाहता हूँ। तब वह मारा जाएगा।’ स्वर्गदूतों को क्या करना चाहिये, इस पर वे सहमत न हो सके। {22:21} तब एक स्वर्गदूत यहोवा के पास गया और उसने कहा, ‘मैं उसे चकमा दूँगा!’ {22:22} यहोवा ने पूछा, ‘तुम राजा अहाब को चकमा कैसे दोगे’ स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, ‘मैं अहाब के सभी नबियों को भ्रमित कर दूँगा। मैं नबियों को अहाब से झूठ बोलने के लिये कहूँगा। नबियों के सन्देश झूठे होंगे।’ अत: यहोवा ने कहा, ‘बहुत अच्छा! जाओ और राजा अहाब को चकमा दो। तुम सफल होगे।’” {22:23} मीकायाह ने अपनी कथा पूरी की। तब उसने कहा, “अत: यहाँ यह सब हुआ। यहोवा ने तुम्हारे नबियों से तुम्हें झूठ बुलवा दिया है। योहवा ने स्वयं निर्णय लिया है कि तुम पर बड़ी भारी विपत्ति लाए।” {22:24} तब सिदकिय्याह नबी मीकायाह के पास गया। सिदकिय्याह ने मीकायाह के मुँह पर मारा। सिदकिय्याह ने कहा, “क्या तुम सचमुच विश्वास करते हो कि यहोवा की शक्ति ने मुझे छोड़ दिया है और वह तुम्हारे माध्यम से बात कर रहा है।” {22:25} मीकाया ने उत्तर दिया, “शीघ्र ही विपत्ति आएगी। उस समय तुम भागोगे और एक छोटे कमरे में छिपोगे और तब तुम समझोगे कि मैं सत्य कह रहा हूँ।” {22:26} तब राजा अहाब ने अपने अधिकारियों में से एक को मीकायाह को बन्दी बनाने का आदेश दिया। राजा अहाब ने कहा, “इसे बन्दी बना लो और इसे नगर के प्रसाशक आमोन और राजकुमार योआश के पास ले जाओ। {22:27} उनसे कहो कि मीकायाह को बन्दीगृह में डाल दे। उसे खाने को केवल रोटी और पानी दो। उसे वहाँ तब तक रखो जब तक मैं युद्ध से घर न आ जाऊँ।” {22:28} मीकायाह न जोर से कहा, “आप सभी लोग सुने जो मैं कहता हूँ। राजा अहाब, यदि तुम युद्ध से घर जीवित लौट आओगे, तो समझना कि योहवा ने मेरे मुँह से अपना वचन नहीं कहा था।” {22:29} तब राजा अहाब और राजा यहोशापात रामोत में अराम की सेना से युद्ध करने गए। यह गिलाद नामक क्षेत्र में था। {22:30} अहाब ने यहोशापात से कहा, “हम युद्ध की तैयारी करेंगे। मैं ऐसे वस्त्र पहनूँगा जो मुझे ऐसा रूप देंगे कि मैं ऐसा लगूँगा कि मैं राजा नहीं हूँ। किन्तु तुम अपने विशेष वस्त्र पहनो जिससे तुम ऐसे लगो कि तुम राजा हो।” इस प्रकार इस्राएल के राजा ने युद्ध का आरम्भ उस व्यक्ति की तरह वस्त्र पहनकर किया जो राजा न हो। {22:31} अराम के राजा के पास बत्तीस रथ — सेनापति थे। उस राजा ने इन बत्तीस रथ — सेनापतियों को आदेश दिया कि वे इस्राएल के राजा को खोज निकाले। अराम के राजा ने सेनापतियों से कहा कि उन्हें राजा को अवश्य मार डालना चाहिये। {22:32} अत: युद्ध के बीच इन सेनापतियों ने राजा यहोशापात को देखा। सेनापतियों ने समझा कि वही इस्राएल का राजा है। अत: वे उसे मारने गए। यहोशापत ने चिल्लाना आरम्भ किया। {22:33} सेनापतियों ने समझ लिया कि वह राजा अहाब नहीं है। अत: उन्होंने उसे नहीं मारा। {22:34} किन्तु एक सैनिक ने हवा में बाण छोड़ा, वह किसी विशेष व्यक्ति को अपना लक्ष्य नहीं बना रहा था। किन्तु उसका बाण इस्राएल के राजा अहाब को जा लगा। बाण ने राजा को उस छोटी जगह में बेधा, जो शरीर का भाग उसके कवच से ढका नहीं था। अत: राजा अहाब ने अपने सारथी से कहा, “मुझे एक बाण ने बेध दिया है! इस क्षेत्र से रथ को बाहर ले चलो। हमें युद्ध से दूर निकल जाना चाहिये।” {22:35} सेनायें युद्ध में लड़ती रहीं। राजा अहाब अपने रथ में ठहरा रहा। वह रथ के सहारे एक ओर झुका हुआ था। वह अराम की सेना को देख रहा था। उसका खून नीचे बहता रहा और उसने रथ के तले को ढक लिया। बाद में, शाम को राजा मर गया। {22:36} सन्ध्या के समय इस्राएल की सेना के सभी पुरुषों को अपने नगर और प्रदेश वापस लौटने का आदेश दिया गया। {22:37} अत: राजा अहाब इस प्रकार मरा। कुछ व्यक्ति उसके शव को शोमरोन ले आए। उन्होंने उसे वहीं दफना दिया। {22:38} लोगों ने अहाब के रथ को शोमरोन में जल के कुंड में धोया। राजा अहाब के खून को रथ से, कुत्तों ने चाटा और वेश्याओं ने पानी का उपयोग नहाने के लिये किया। ये बातें वैसे ही हुई जैसा यहोवा ने होने को कहा था। {22:39} अपने राज्यकाल में अहाब ने जो कुछ किया वह इस्राएल के राजाओं के इतिहास नामक पुस्तक में लिखा है। उसी पुस्तक में राजा ने अपने महल को अधिक सुन्दर बनाने के लिये जिस हाथी — दाँत का उपयोग किया था, उसके बारे में कहा गया है और उस पुस्तक में उन नगरों के बारे में भी लिखा गया है जिसे उसने बनाया था। {22:40} अहाब मरा, और अपने पूर्वजों के पास दफना दिया गया। उसका पुत्र अहज्याह राजा बना। {i22:41} यहूदा का राजा यहोशापात {22:41} इस्राएल के राजा अहाब के राज्यकाल के चौथे वर्ष यहोशापात यहूदा का राजा हुआ। यहोशापात आसा का पुत्र था। {22:42} यहोशापात जब राजा हुआ तब वह पैंतीस वर्ष का था। यहोशापात ने यरूशलेम में पच्चीस वर्ष तक राज्य किया। यहोशापात की माँ का नाम अजूबा था। अजूबा शिल्ही की पुत्री थी। {22:43} यहोशापात अच्छा व्यक्ति था। उसने अपने पूर्व अपने पिता के जैसे ही काम किये। वह उन सबका पालन करता था जो यहोवा चाहता था। किन्तु यहोशापात ने उच्च स्थानों को नष्ट नहीं किया। लोगों ने उन स्थानों पर बलि — भेंट करना और सुगन्धि जलाना जारी रखा। {22:44} यहोशापात ने इस्राएल के राजा के साथ एक शान्ति — सन्धि की। {22:45} यहोशापात बहुत वीर था और उसने कई युद्ध लड़े। जो कुछ उसने किया वह, यहूदा के राजाओं के इतिहास नामक पुस्तक में लिखा है। {22:46} यहोशापात ने उन स्त्री पुरुषों को, जो शारीरिक सम्बन्ध के लिये अपने शरीर को बेचते थे, पूजास्थानों को छोड़ने के लिये विवश किया। उन व्यक्तियों ने उन पूजास्थानों पर तब सेवा की थी जब उसका पिता आसा राजा था। {22:47} इस समय के बीच एदोम देश का कोई राजा न था। वह देश एक प्रशासक द्वारा शासित होता था। प्रशासक यहूदा के राजा द्वारा चुना जाता था। {22:48} राजा यहोशापात ने ऐसे जहाज बनाए जो महासागर में चल सकते थे। यहोशापात ने ओपीर प्रदेश में जहाजों को भेजा। वह चाहता था कि जहाज सोना लाएँ। किन्तु जहाज एश्योनगेबेर में नष्ट हो गए। जहाज कभी सोना प्राप्त करने में सफल न हो सके। {22:49} इस्राएल का राजा अहज्याह यहोशापात को सहायता देने गया। अहज्याह ने यहोशापात से कहा था कि वह कुछ ऐसे व्यक्तियों को उनके लिये प्राप्त करेगा जो जहाजी काम में कुशल हों। किन्तु यहोशापात ने अहज्याह के व्यक्तियों को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। {22:50} यहोशापात मरा और अपने पूर्वजों के साथ दफनाया गया। वह दाऊद नगर में अपने पूर्वजों के साथ दफनाया गया। तब उसका पुत्र यहोराम राजा बना। {i22:51} इस्राएल का राजा अहज्याह {22:51} अहज्याह अहाब का पुत्र था। वह राजा योहशापात के यहूदा पर राज्यकाल के सत्रहवें वर्ष में राजा बना। अहज्याह ने शोमरोन में दो वर्ष तक राज किया। {22:52} अहज्याह ने यहोवा के विरुद्ध पाप किये। उसने वे ही पाप किये जो उसके पिता अहाब उसकी माँ ईजेबेल और नबात के पुत्र यारोबाम ने किये थे। ये सभी शासक इस्राएल के लोगों को और अधिक पाप की ओर ले गए। {22:53} अहज्याह ने अपने से पूर्व अपने पिता के समान असत्य देवता बाल की पूजा और सेवा की। अत: अहज्याह ने यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर को बहुत अधिक क्रोधित किया। यहोवा अहज्याह पर वैसा ही क्रोधित हुआ जैसा उसके पहले वह उसके पिता पर क्रोधित हुआ था।