{i1:1} याक़ूब का ख़ानदान मिस्र में {1:1} ज़ैल में उन बेटों के नाम हैं जो अपने बाप याक़ूब और अपने ख़ानदानों समेत मिस्र में आए थे: {1:2} रूबिन, शमाऊन, लावी, यहूदाह, {1:3} इश्कार, ज़बूलून, बिनयमीन, {1:4} दान, नफ़्ताली, जद और आशर। {1:5} उस वक़्त याक़ूब की औलाद की तादाद 70 थी। यूसुफ़ तो पहले ही मिस्र आ चुका था। {1:6} मिस्र में रहते हुए बहुत दिन गुज़र गए। इतने में यूसुफ़, उस के तमाम भाई और उस नस्ल के तमाम लोग मर गए। {1:7} इस्राईली फले फूले और तादाद में बहुत बढ़ गए। नतीजे में वह निहायत ही ताक़तवर हो गए। पूरा मुल्क उन से भर गया। {i1:8} इस्राईलियों को दबाया जाता है {1:8} होते होते एक नया बादशाह तख़्तनशीन हुआ जो यूसुफ़ से नावाक़िफ़ था। {1:9} उस ने अपने लोगों से कहा, “इस्राईलियों को देखो। वह तादाद और ताक़त में हम से बढ़ गए हैं। {1:10} आओ, हम हिक्मत से काम लें, वर्ना वह मज़ीद बढ़ जाएंगे। ऐसा न हो कि वह किसी जंग के मौक़े पर दुश्मन का साथ दे कर हम से लड़ें और मुल्क को छोड़ जाएँ।” {1:11} चुनाँचे मिस्रियों ने इस्राईलियों पर निगरान मुक़र्रर किए ताकि बेगार में उन से काम करवा कर उन्हें दबाते रहें। उस वक़्त उन्हों ने पितोम और रामसीस के शहर तामीर किए। इन शहरों में फ़िरऔन बादशाह के बड़े बड़े गोदाम थे। {1:12} लेकिन जितना इस्राईलियों को दबाया गया उतना ही वह तादाद में बढ़ते और फैलते गए। आख़िरकार मिस्री उन से दह्शत खाने लगे, {1:13} और वह बड़ी बेरहमी से उन से काम करवाते रहे। {1:14} इस्राईलियों का गुज़ारा निहायत मुश्किल हो गया। उन्हें गारा तय्यार करके ईंटें बनाना और खेतों में मुख़्तलिफ़ क़िस्म के काम करना पड़े। इस में मिस्री उन से बड़ी बेरहमी से पेश आते रहे। {i1:15} दाइयाँ अल्लाह की राह पर चलती हैं {1:15} इस्राईलियों की दो दाइयाँ थीं जिन के नाम सिफ़्रा और फ़ूआ थे। मिस्र के बादशाह ने उन से कहा, {1:16} “जब इब्रानी औरतें तुम्हें मदद के लिए बुलाएँ तो ख़बरदार रहो। अगर लड़का पैदा हो तो उसे जान से मार दो, अगर लड़की हो तो उसे जीता छोड़ दो।” {1:17} लेकिन दाइयाँ अल्लाह का ख़ौफ़ मानती थीं। उन्हों ने मिस्र के बादशाह का हुक्म न माना बल्कि लड़कों को भी जीने दिया। {1:18} तब मिस्र के बादशाह ने उन्हें दुबारा बुला कर पूछा, “तुम ने यह क्यूँ किया? तुम लड़कों को क्यूँ जीता छोड़ देती हो?” {1:19} उन्हों ने जवाब दिया, “इब्रानी औरतें मिस्री औरतों से ज़्यादा मज़बूत हैं। बच्चे हमारे पहुँचने से पहले ही पैदा हो जाते हैं।” {1:20} चुनाँचे अल्लाह ने दाइयों को बरकत दी, और इस्राईली क़ौम तादाद में बढ़ कर बहुत ताक़तवर हो गई। {1:21} और चूँकि दाइयाँ अल्लाह का ख़ौफ़ मानती थीं इस लिए उस ने उन्हें औलाद दे कर उन के ख़ानदानों को क़ाइम रखा। {1:22} आख़िरकार बादशाह ने अपने तमाम हमवतनों से बात की, “जब भी इब्रानियों के लड़के पैदा हों तो उन्हें दरया-ए-नील में फैंक देना। सिर्फ़ लड़कियों को ज़िन्दा रहने दो।” {i2:1} मूसा की पैदाइश और बचाओ {2:1} उन दिनों में लावी के एक आदमी ने अपने ही क़बीले की एक औरत से शादी की। {2:2} औरत हामिला हुई और बच्चा पैदा हुआ। माँ ने देखा कि लड़का ख़ूबसूरत है, इस लिए उस ने उसे तीन माह तक छुपाए रखा। {2:3} जब वह उसे और ज़्यादा न छुपा सकी तो उस ने आबी नर्सल से टोकरी बना कर उस पर तारकोल चढ़ाया। फिर उस ने बच्चे को टोकरी में रख कर टोकरी को दरया-ए-नील के किनारे पर उगे हुए सरकंडों में रख दिया। {2:4} बच्चे की बहन कुछ फ़ासिले पर खड़ी देखती रही कि उस का क्या बनेगा। {2:5} उस वक़्त फ़िरऔन की बेटी नहाने के लिए दरया पर आई। उस की नौकरानियाँ दरया के किनारे टहलने लगीं। तब उस ने सरकंडों में टोकरी देखी और अपनी लौंडी को उसे लाने भेजा। {2:6} उसे खोला तो छोटा लड़का दिखाई दिया जो रो रहा था। फ़िरऔन की बेटी को उस पर तरस आया। उस ने कहा, “यह कोई इब्रानी बच्चा है।” {2:7} अब बच्चे की बहन फ़िरऔन की बेटी के पास गई और पूछा, “क्या मैं बच्चे को दूध पिलाने के लिए कोई इब्रानी औरत ढूँड लाऊँ?” {2:8} फ़िरऔन की बेटी ने कहा, “हाँ, जाओ।” लड़की चली गई और बच्चे की सगी माँ को ले कर वापस आई। {2:9} फ़िरऔन की बेटी ने माँ से कहा, “बच्चे को ले जाओ और उसे मेरे लिए दूध पिलाया करो। मैं तुम्हें इस का मुआवज़ा दूँगी।” चुनाँचे बच्चे की माँ ने उसे दूध पिलाने के लिए ले लिया। {2:10} जब बच्चा बड़ा हुआ तो उस की माँ उसे फ़िरऔन की बेटी के पास ले गई, और वह उस का बेटा बन गया। फ़िरऔन की बेटी ने उस का नाम मूसा यानी ‘निकाला गया’ रख कर कहा, “मैं उसे पानी से निकाल लाई हूँ।” {i2:11} मूसा फ़रार होता है {2:11} जब मूसा जवान हुआ तो एक दिन वह घर से निकल कर अपने लोगों के पास गया जो जबरी काम में मसरूफ़ थे। मूसा ने देखा कि एक मिस्री मेरे एक इब्रानी भाई को मार रहा है। {2:12} मूसा ने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई। जब मालूम हुआ कि कोई नहीं देख रहा तो उस ने मिस्री को जान से मार दिया और उसे रेत में छुपा दिया। {2:13} अगले दिन भी मूसा घर से निकला। इस दफ़ा दो इब्रानी मर्द आपस में लड़ रहे थे। जो ग़लती पर था उस से मूसा ने पूछा, “तुम अपने भाई को क्यूँ मार रहे हो?” {2:14} आदमी ने जवाब दिया, “किस ने आप को हम पर हुक्मरान और क़ाज़ी मुक़र्रर किया है? क्या आप मुझे भी क़त्ल करना चाहते हैं जिस तरह मिस्री को मार डाला था?” तब मूसा डर गया। उस ने सोचा, “हाय, मेरा भेद खुल गया है!” {2:15} बादशाह को भी पता लगा तो उस ने मूसा को मरवाने की कोशिश की। लेकिन मूसा मिदियान के मुल्क को भाग गया। वहाँ वह एक कुएँ के पास बैठ गया। {2:16} मिदियान में एक इमाम था जिस की सात बेटियाँ थीं। यह लड़कियाँ अपनी भेड़-बकरियों को पानी पिलाने के लिए कुएँ पर आईं और पानी निकाल कर हौज़ भरने लगीं। {2:17} लेकिन कुछ चरवाहों ने आ कर उन्हें भगा दिया। यह देख कर मूसा उठा और लड़कियों को चरवाहों से बचा कर उन के रेवड़ को पानी पिलाया। {2:18} जब लड़कियाँ अपने बाप रऊएल के पास वापस आईं तो बाप ने पूछा, “आज तुम इतनी जल्दी से क्यूँ वापस आ गई हो?” {2:19} लड़कियों ने जवाब दिया, “एक मिस्री आदमी ने हमें चरवाहों से बचाया। न सिर्फ़ यह बल्कि उस ने हमारे लिए पानी भी निकाल कर रेवड़ को पिला दिया।” {2:20} रऊएल ने कहा, “वह आदमी कहाँ है? तुम उसे क्यूँ छोड़ कर आई हो? उसे बुलाओ ताकि वह हमारे साथ खाना खाए।” {2:21} मूसा रऊएल के घर में ठहरने के लिए राज़ी हो गया। बाद में उस की शादी रऊएल की बेटी सफ़्फ़ूरा से हुई। {2:22} सफ़्फ़ूरा के बेटा पैदा हुआ तो मूसा ने कहा, “इस का नाम जैर्सोम यानी ‘अजनबी मुल्क में परदेसी’ हो, क्यूँकि मैं अजनबी मुल्क में परदेसी हूँ।” {2:23} काफ़ी अर्सा गुज़र गया। इतने में मिस्र का बादशाह इन्तिक़ाल कर गया। इस्राईली अपनी ग़ुलामी तले कराहते और मदद के लिए पुकारते रहे, और उन की चीख़ें अल्लाह तक पहुँच गईं। {2:24} अल्लाह ने उन की आहें सुनीं और उस अह्द को याद किया जो उस ने इब्राहीम, इस्हाक़ और याक़ूब से बांधा था। {2:25} अल्लाह इस्राईलियों की हालत देख कर उन का ख़याल करने लगा। {i3:1} जलती हुई झाड़ी {3:1} मूसा अपने सुसर यित्रो की भेड़-बकरियों की निगहबानी करता था (मिदियान का इमाम रऊएल यित्रो भी कहलाता था)। एक दिन मूसा रेवड़ को रेगिस्तान की परली जानिब ले गया और चलते चलते अल्लाह के पहाड़ होरिब यानी सीना तक पहुँच गया। {3:2} वहाँ रब का फ़रिश्ता आग के शोले में उस पर ज़ाहिर हुआ। यह शोला एक झाड़ी में भड़क रहा था। मूसा ने देखा कि झाड़ी जल रही है लेकिन भस्म नहीं हो रही। {3:3} मूसा ने सोचा, “यह तो अजीब बात है। क्या वजह है कि जलती हुई झाड़ी भस्म नहीं हो रही? मैं ज़रा वहाँ जा कर यह हैरतअंगेज़ मन्ज़र देखूँ।” {3:4} जब रब ने देखा कि मूसा झाड़ी को देखने आ रहा है तो उस ने उसे झाड़ी में से पुकारा, “मूसा, मूसा!” मूसा ने कहा, “जी, मैं हाज़िर हूँ।” {3:5} रब ने कहा, “इस से ज़्यादा क़रीब न आना। अपनी जूतियाँ उतार, क्यूँकि तू मुक़द्दस ज़मीन पर खड़ा है। {3:6} मैं तेरे बाप का ख़ुदा, इब्राहीम का ख़ुदा, इस्हाक़ का ख़ुदा और याक़ूब का ख़ुदा हूँ।” यह सुन कर मूसा ने अपना मुँह ढाँक लिया, क्यूँकि वह अल्लाह को देखने से डरा। {3:7} रब ने कहा, “मैं ने मिस्र में अपनी क़ौम की बुरी हालत देखी और ग़ुलामी में उन की चीख़ें सुनी हैं, और मैं उन के दुखों को ख़ूब जानता हूँ। {3:8} अब मैं उन्हें मिस्रियों के क़ाबू से बचाने के लिए उतर आया हूँ। मैं उन्हें मिस्र से निकाल कर एक अच्छे वसी मुल्क में ले जाऊँगा, एक ऐसे मुल्क में जहाँ दूध और शहद की कस्रत है, गो इस वक़्त कनआनी, हित्ती, अमोरी, फ़रिज़्ज़ी, हिव्वी और यबूसी उस में रहते हैं। {3:9} इस्राईलियों की चीख़ें मुझ तक पहुँची हैं। मैं ने देखा है कि मिस्री उन पर किस तरह का ज़ुल्म ढा रहे हैं। {3:10} चुनाँचे अब जा। मैं तुझे फ़िरऔन के पास भेजता हूँ, क्यूँकि तुझे मेरी क़ौम इस्राईल को मिस्र से निकाल कर लाना है।” {3:11} लेकिन मूसा ने अल्लाह से कहा, “मैं कौन हूँ कि फ़िरऔन के पास जा कर इस्राईलियों को मिस्र से निकाल लाऊँ?” {3:12} अल्लाह ने कहा, “मैं तो तेरे साथ हूँगा। और इस का सबूत कि मैं तुझे भेज रहा हूँ यह होगा कि लोगों के मिस्र से निकलने के बाद तुम यहाँ आ कर इस पहाड़ पर मेरी इबादत करोगे।” {3:13} लेकिन मूसा ने एतिराज़ किया, “अगर मैं इस्राईलियों के पास जा कर उन्हें बताऊँ कि तुम्हारे बापदादा के ख़ुदा ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है तो वह पूछेंगे, ‘उस का नाम क्या है?’ फिर मैं उन को क्या जवाब दूँ?” {3:14} अल्लाह ने कहा, “मैं जो हूँ सो मैं हूँ। उन से कहना, ‘मैं हूँ ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। {3:15} रब जो तुम्हारे बापदादा का ख़ुदा, इब्राहीम का ख़ुदा, इस्हाक़ का ख़ुदा और याक़ूब का ख़ुदा है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।’ यह अबद तक मेरा नाम रहेगा। लोग यही नाम ले कर मुझे नस्ल-दर-नस्ल याद करेंगे। {3:16} अब जा और इस्राईल के बुज़ुर्गों को जमा करके उन को बता दे कि रब तुम्हारे बापदादा इब्राहीम, इस्हाक़ और याक़ूब का ख़ुदा मुझ पर ज़ाहिर हुआ है। वह फ़रमाता है, ‘मैं ने ख़ूब देख लिया है कि मिस्र में तुम्हारे साथ क्या सुलूक हो रहा है। {3:17} इस लिए मैं ने फ़ैसला किया है कि तुम्हें मिस्र की मुसीबत से निकाल कर कनआनियों, हित्तियों, अमोरियों, फ़रिज़्ज़ियों, हिव्वियों और यबूसियों के मुल्क में ले जाऊँ, ऐसे मुल्क में जहाँ दूध और शहद की कस्रत है।’ {3:18} बुज़ुर्ग तेरी सुनेंगे। फिर उन के साथ मिस्र के बादशाह के पास जा कर उस से कहना, ‘रब इब्रानियों का ख़ुदा हम पर ज़ाहिर हुआ है। इस लिए हमें इजाज़त दें कि हम तीन दिन का सफ़र करके रेगिस्तान में रब अपने ख़ुदा के लिए क़ुर्बानियाँ चढ़ाएँ।’ {3:19} लेकिन मुझे मालूम है कि मिस्र का बादशाह सिर्फ़ इस सूरत में तुम्हें जाने देगा कि कोई ज़बरदस्ती तुम्हें ले जाए। {3:20} इस लिए मैं अपनी क़ुदरत ज़ाहिर करके अपने मोजिज़ों की मारिफ़त मिस्रियों को मारूँगा। फिर वह तुम्हें जाने देगा। {3:21} उस वक़्त मैं मिस्रियों के दिलों को तुम्हारे लिए नर्म कर दूँगा। तुम्हें ख़ाली हाथ नहीं जाना पड़ेगा। {3:22} तमाम इब्रानी औरतें अपनी मिस्री पड़ोसनों और अपने घर में रहने वाली मिस्री औरतों से चाँदी और सोने के ज़ेवरात और नफ़ीस कपड़े माँग कर अपने बच्चों को पहनाएँगी। यूँ मिस्रियों को लूट लिया जाएगा।” {4:1} मूसा ने एतिराज़ किया, “लेकिन इस्राईली न मेरी बात का यक़ीन करेंगे, न मेरी सुनेंगे। वह तो कहेंगे, ‘रब तुम पर ज़ाहिर नहीं हुआ’।” {4:2} जवाब में रब ने मूसा से कहा, “तू ने हाथ में क्या पकड़ा हुआ है?” मूसा ने कहा, “लाठी।” {4:3} रब ने कहा, “उसे ज़मीन पर डाल दे।” मूसा ने ऐसा किया तो लाठी साँप बन गई, और मूसा डर कर भागा। {4:4} रब ने कहा, “अब साँप की दुम को पकड़ ले।” मूसा ने ऐसा किया तो साँप फिर लाठी बन गया। {4:5} रब ने कहा, “यह देख कर लोगों को यक़ीन आएगा कि रब जो उन के बापदादा का ख़ुदा, इब्राहीम का ख़ुदा, इस्हाक़ का ख़ुदा और याक़ूब का ख़ुदा है तुझ पर ज़ाहिर हुआ है। {4:6} अब अपना हाथ अपने लिबास में डाल दे।” मूसा ने ऐसा किया। जब उस ने अपना हाथ निकाला तो वह बर्फ़ की मानिन्द सफ़ेद हो गया था। कोढ़ जैसी बीमारी लग गई थी। {4:7} तब रब ने कहा, “अब अपना हाथ दुबारा अपने लिबास में डाल।” मूसा ने ऐसा किया। जब उस ने अपना हाथ दुबारा निकाला तो वह फिर सेहतमन्द था। {4:8} रब ने कहा, “अगर लोगों को पहला मोजिज़ा देख कर यक़ीन न आए और वह तेरी न सुनें तो शायद उन्हें दूसरा मोजिज़ा देख कर यक़ीन आए। {4:9} अगर उन्हें फिर भी यक़ीन न आए और वह तेरी न सुनें तो दरया-ए-नील से कुछ पानी निकाल कर उसे ख़ुश्क ज़मीन पर उंडेल दे। यह पानी ज़मीन पर गिरते ही ख़ून बन जाएगा।” {4:10} लेकिन मूसा ने कहा, “मेरे आक़ा, मैं माज़रत चाहता हूँ, मैं अच्छी तरह बात नहीं कर सकता बल्कि मैं कभी भी यह लियाक़त नहीं रखता था। इस वक़्त भी जब मैं तुझ से बात कर रहा हूँ मेरी यही हालत है। मैं रुक रुक कर बोलता हूँ।” {4:11} रब ने कहा, “किस ने इन्सान का मुँह बनाया? कौन एक को गूँगा और दूसरे को बहरा बना देता है? कौन एक को देखने की क़ाबिलियत देता है और दूसरे को इस से महरूम रखता है? क्या मैं जो रब हूँ यह सब कुछ नहीं करता? {4:12} अब जा! तेरे बोलते वक़्त मैं ख़ुद तेरे साथ हूँगा और तुझे वह कुछ सिखाऊँगा जो तुझे कहना है।” {4:13} लेकिन मूसा ने इल्तिजा की, “मेरे आक़ा, मेहरबानी करके किसी और को भेज दे।” {4:14} तब रब मूसा से सख़्त ख़फ़ा हुआ। उस ने कहा, “क्या तेरा लावी भाई हारून ऐसे काम के लिए हाज़िर नहीं है? मैं जानता हूँ कि वह अच्छी तरह बोल सकता है। देख, वह तुझ से मिलने के लिए निकल चुका है। तुझे देख कर वह निहायत ख़ुश होगा। {4:15} उसे वह कुछ बता जो उसे कहना है। तुम्हारे बोलते वक़्त मैं तेरे और उस के साथ हूँगा और तुम्हें वह कुछ सिखाऊँगा जो तुम्हें करना होगा। {4:16} हारून तेरी जगह क़ौम से बात करेगा जबकि तू मेरी तरह उसे वह कुछ बताएगा जो उसे कहना है। {4:17} लेकिन यह लाठी भी साथ ले जाना, क्यूँकि इसी के ज़रीए तू यह मोजिज़े करेगा।” {i4:18} मूसा मिस्र को लौट जाता है {4:18} फिर मूसा अपने सुसर यित्रो के घर वापस चला गया। उस ने कहा, “मुझे ज़रा अपने अज़ीज़ों के पास वापस जाने दें जो मिस्र में हैं। मैं मालूम करना चाहता हूँ कि वह अभी तक ज़िन्दा हैं कि नहीं।” यित्रो ने जवाब दिया, “ठीक है, सलामती से जाएँ।” {4:19} मूसा अभी मिदियान में था कि रब ने उस से कहा, “मिस्र को वापस चला जा, क्यूँकि जो आदमी तुझे क़त्ल करना चाहते थे वह मर गए हैं।” {4:20} चुनाँचे मूसा अपनी बीवी और बेटों को गधे पर सवार करके मिस्र को लौटने लगा। अल्लाह की लाठी उस के हाथ में थी। {4:21} रब ने उस से यह भी कहा, “मिस्र जा कर फ़िरऔन के सामने वह तमाम मोजिज़े दिखा जिन का मैं ने तुझे इख़तियार दिया है। लेकिन मेरे कहने पर वह अड़ा रहेगा। वह इस्राईलियों को जाने की इजाज़त नहीं देगा। {4:22} उस वक़्त फ़िरऔन को बता देना, ‘रब फ़रमाता है कि इस्राईल मेरा पहलौठा है। {4:23} मैं तुझे बता चुका हूँ कि मेरे बेटे को जाने दे ताकि वह मेरी इबादत करे। अगर तू मेरे बेटे को जाने से मना करे तो मैं तेरे पहलौठे को जान से मार दूँगा’।” {4:24} एक दिन जब मूसा अपने ख़ानदान के साथ रास्ते में किसी सराय में ठहरा हुआ था तो रब ने उस पर हम्ला करके उसे मार देने की कोशिश की। {4:25} यह देख कर सफ़्फ़ूरा ने एक तेज़ पत्थर से अपने बेटे का ख़तना किया और काटे हुए हिस्से से मूसा के पैर छुए। उस ने कहा, “यक़ीनन तुम मेरे ख़ूनी दूल्हा हो।” {4:26} तब अल्लाह ने मूसा को छोड़ दिया। सफ़्फ़ूरा ने उसे ख़तने के बाइस ही ‘ख़ूनी दूल्हा’ कहा था। {4:27} रब ने हारून से भी बात की, “रेगिस्तान में मूसा से मिलने जा।” हारून चल पड़ा और अल्लाह के पहाड़ के पास मूसा से मिला। उस ने उसे बोसा दिया। {4:28} मूसा ने हारून को सब कुछ सुना दिया जो रब ने उसे कहने के लिए भेजा था। उस ने उसे उन मोजिज़ों के बारे में भी बताया जो उसे दिखाने थे। {4:29} फिर दोनों मिल कर मिस्र गए। वहाँ पहुँच कर उन्हों ने इस्राईल के तमाम बुज़ुर्गों को जमा किया। {4:30} हारून ने उन्हें वह तमाम बातें सुनाईं जो रब ने मूसा को बताई थीं। उस ने मज़कूरा मोजिज़े भी लोगों के सामने दिखाए। {4:31} फिर उन्हें यक़ीन आया। और जब उन्हों ने सुना कि रब को तुम्हारा ख़याल है और वह तुम्हारी मुसीबत से आगाह है तो उन्हों ने रब को सिज्दा किया। {i5:1} मूसा और हारून फ़िरऔन के दरबार में {5:1} फिर मूसा और हारून फ़िरऔन के पास गए। उन्हों ने कहा, “रब इस्राईल का ख़ुदा फ़रमाता है, ‘मेरी क़ौम को रेगिस्तान में जाने दे ताकि वह मेरे लिए ईद मनाएँ’।” {5:2} फ़िरऔन ने जवाब दिया, “यह रब कौन है? मैं क्यूँ उस का हुक्म मान कर इस्राईलियों को जाने दूँ? न मैं रब को जानता हूँ, न इस्राईलियों को जाने दूँगा।” {5:3} हारून और मूसा ने कहा, “इब्रानियों का ख़ुदा हम पर ज़ाहिर हुआ है। इस लिए मेहरबानी करके हमें इजाज़त दें कि रेगिस्तान में तीन दिन का सफ़र करके रब अपने ख़ुदा के हुज़ूर क़ुर्बानियाँ पेश करें। कहीं वह हमें किसी बीमारी या तलवार से न मारे।” {5:4} लेकिन मिस्र के बादशाह ने इन्कार किया, “मूसा और हारून, तुम लोगों को काम से क्यूँ रोक रहे हो? जाओ, जो काम हम ने तुम को दिया है उस पर लग जाओ! {5:5} इस्राईली वैसे भी तादाद में बहुत बढ़ गए हैं, और तुम उन्हें काम करने से रोक रहे हो।” {i5:6} जवाब में फ़िरऔन का सख़्त दबाओ {5:6} उसी दिन फ़िरऔन ने मिस्री निगरानों और उन के तहत के इस्राईली निगरानों को हुक्म दिया, {5:7} “अब से इस्राईलियों को ईंटें बनाने के लिए भूसा मत देना, बल्कि वह ख़ुद जा कर भूसा जमा करें। {5:8} तो भी वह उतनी ही ईंटें बनाएँ जितनी पहले बनाते थे। वह सुस्त हो गए हैं और इसी लिए चीख़ रहे हैं कि हमें जाने दें ताकि अपने ख़ुदा को क़ुर्बानियाँ पेश करें। {5:9} उन से और ज़्यादा सख़्त काम कराओ, उन्हें काम में लगाए रखो। उन के पास इतना वक़्त ही न हो कि वह झूटी बातों पर ध्यान दें।” {5:10} मिस्री निगरान और उन के तहत के इस्राईली निगरानों ने लोगों के पास जा कर उन से कहा, “फ़िरऔन का हुक्म है कि तुम्हें भूसा न दिया जाए। {5:11} इस लिए ख़ुद जाओ और भूसा ढूँड कर जमा करो। लेकिन ख़बरदार! उतनी ही ईंटें बनाओ जितनी पहले बनाते थे।” {5:12} यह सुन कर इस्राईली भूसा जमा करने के लिए पूरे मुल्क में फैल गए। {5:13} मिस्री निगरान यह कह कर उन पर दबाओ डालते रहे कि उतनी ईंटें बनाओ जितनी पहले बनाते थे। {5:14} जो इस्राईली निगरान उन्हों ने मुक़र्रर किए थे उन्हें वह पीटते और कहते रहे, “तुम ने कल और आज उतनी ईंटें क्यूँ नहीं बनवाईं जितनी पहले बनवाते थे?” {5:15} फिर इस्राईली निगरान फ़िरऔन के पास गए। उन्हों ने शिकायत करके कहा, “आप अपने ख़ादिमों के साथ ऐसा सुलूक क्यूँ कर रहे हैं? {5:16} हमें भूसा नहीं दिया जा रहा और साथ साथ यह कहा गया है कि उतनी ईंटें बनाओ जितनी पहले बनाते थे। नतीजे में हमें मारा पीटा भी जा रहा है हालाँकि ऐसा करने में आप के अपने लोग ग़लती पर हैं।” {5:17} फ़िरऔन ने जवाब दिया, “तुम लोग सुस्त हो, तुम काम करना नहीं चाहते। इस लिए तुम यह जगह छोड़ना और रब को क़ुर्बानियाँ पेश करना चाहते हो। {5:18} अब जाओ, काम करो। तुम्हें भूसा नहीं दिया जाएगा, लेकिन ख़बरदार! उतनी ही ईंटें बनाओ जितनी पहले बनाते थे।” {5:19} जब इस्राईली निगरानों को बताया गया कि ईंटों की मतलूबा तादाद कम न करो तो वह समझ गए कि हम फंस गए हैं। {5:20} फ़िरऔन के महल से निकल कर उन की मुलाक़ात मूसा और हारून से हुई जो उन के इन्तिज़ार में थे। {5:21} उन्हों ने मूसा और हारून से कहा, “रब ख़ुद आप की अदालत करे। क्यूँकि आप के सबब से फ़िरऔन और उस के मुलाज़िमों को हम से घिन आती है। आप ने उन्हें हमें मार देने का मौक़ा दे दिया है।” {i5:22} मूसा की शिकायत और रब का जवाब {5:22} यह सुन कर मूसा रब के पास वापस आया और कहा, “ऐ आक़ा, तू ने इस क़ौम से ऐसा बुरा सुलूक क्यूँ किया? क्या तू ने इसी मक़्सद से मुझे यहाँ भेजा है? {5:23} जब से मैं ने फ़िरऔन के पास जा कर उसे तेरी मर्ज़ी बताई है वह इस्राईली क़ौम से बुरा सुलूक कर रहा है। और तू ने अब तक उन्हें बचाने का कोई क़दम नहीं उठाया।” {6:1} रब ने जवाब दिया, “अब तू देखेगा कि मैं फ़िरऔन के साथ क्या कुछ करता हूँ। मेरी अज़ीम क़ुदरत का तजरिबा करके वह मेरे लोगों को जाने देगा बल्कि उन्हें जाने पर मज्बूर करेगा।” {6:2} अल्लाह ने मूसा से यह भी कहा, “मैं रब हूँ। {6:3} मैं इब्राहीम, इस्हाक़ और याक़ूब पर ज़ाहिर हुआ। वह मेरे नाम अल्लाह क़ादिर-ए-मुतलक़ से वाक़िफ़ हुए, लेकिन मैं ने उन पर अपने नाम रब का इन्किशाफ़ नहीं किया। {6:4} मैं ने उन से अह्द करके वादा किया कि उन्हें मुल्क-ए-कनआन दूँगा जिस में वह अजनबी के तौर पर रहते थे। {6:5} अब मैं ने सुना है कि इस्राईली किस तरह मिस्रियों की ग़ुलामी में कराह रहे हैं, और मैं ने अपना अह्द याद किया है। {6:6} चुनाँचे इस्राईलियों को बताना, ‘मैं रब हूँ। मैं तुम्हें मिस्रियों के जूए से आज़ाद करूँगा और उन की ग़ुलामी से बचाऊँगा। मैं बड़ी क़ुदरत के साथ तुम्हें छुड़ाऊँगा और उन की अदालत करूँगा। {6:7} मैं तुम्हें अपनी क़ौम बनाऊँगा और तुम्हारा ख़ुदा हूँगा। तब तुम जान लोगे कि मैं रब तुम्हारा ख़ुदा हूँ जिस ने तुम्हें मिस्रियों के जूए से आज़ाद कर दिया है। {6:8} मैं तुम्हें उस मुल्क में ले जाऊँगा जिस का वादा मैं ने क़सम खा कर इब्राहीम, इस्हाक़ और याक़ूब से किया है। वह मुल्क तुम्हारी अपनी मिलकियत होगा। मैं रब हूँ’।” {6:9} मूसा ने यह सब कुछ इस्राईलियों को बता दिया, लेकिन उन्हों ने उस की बात न मानी, क्यूँकि वह सख़्त काम के बाइस हिम्मत हार गए थे। {6:10} तब रब ने मूसा से कहा, {6:11} “जा, मिस्र के बादशाह फ़िरऔन को बता देना कि इस्राईलियों को अपने मुल्क से जाने दे।” {6:12} लेकिन मूसा ने एतिराज़ किया, “इस्राईली मेरी बात सुनना नहीं चाहते तो फ़िरऔन क्यूँ मेरी बात माने जबकि मैं रुक रुक कर बोलता हूँ?” {6:13} लेकिन रब ने मूसा और हारून को हुक्म दिया, “इस्राईलियों और मिस्र के बादशाह फ़िरऔन से बात करके इस्राईलियों को मिस्र से निकालो।” {i6:14} मूसा और हारून के आबा-ओ-अजदाद {6:14} इस्राईल के आबाई घरानों के सरबराह यह थे: इस्राईल के पहलौठे रूबिन के चार बेटे हनूक, फ़ल्लू, हस्रोन और कर्मी थे। इन से रूबिन की चार शाख़ें निकलीं। {6:15} शमाऊन के पाँच बेटे यमूएल, यमीन, उहद, यकीन, सुहर और साऊल थे। (साऊल कनआनी औरत का बच्चा था)। इन से शमाऊन की पाँच शाख़ें निकलीं। {6:16} लावी के तीन बेटे जैर्सोन, क़िहात और मिरारी थे। (लावी 137 साल की उम्र में फ़ौत हुआ)। {6:17} जैर्सोन के दो बेटे लिब्नी और सिमई थे। इन से जैर्सोन की दो शाख़ें निकलीं। {6:18} क़िहात के चार बेटे अम्राम, इज़हार, हब्रून और उज़्ज़ीएल थे। (क़िहात 133 साल की उम्र में फ़ौत हुआ)। {6:19} मिरारी के दो बेटे महली और मूशी थे। इन सब से लावी की मुख़्तलिफ़ शाख़ें निकलीं। {6:20} अम्राम ने अपनी फूफी यूकबिद से शादी की। उन के दो बेटे हारून और मूसा पैदा हुए। (अम्राम 137 साल की उम्र में फ़ौत हुआ)। {6:21} इज़हार के तीन बेटे क़ोरह, नफ़ज और ज़िक्री थे। {6:22} उज़्ज़ीएल के तीन बेटे मीसाएल, इल्सफ़न और सित्री थे। {6:23} हारून ने इलीसिबा से शादी की। (इलीसिबा अम्मीनदाब की बेटी और नह्सोन की बहन थी)। उन के चार बेटे नदब, अबीहू, इलीअज़र और इतमर थे। {6:24} क़ोरह के तीन बेटे अस्सीर, इल्क़ाना और अबियासफ़ थे। उन से क़ोरहियों की तीन शाख़ें निकलीं। {6:25} हारून के बेटे इलीअज़र ने फ़ूतीएल की एक बेटी से शादी की। उन का एक बेटा फ़ीन्हास था। यह सब लावी के आबाई घरानों के सरबराह थे। {6:26} रब ने अम्राम के दो बेटों हारून और मूसा को हुक्म दिया कि मेरी क़ौम को उस के ख़ानदानों की तरतीब के मुताबिक़ मिस्र से निकालो। {6:27} इन ही दो आदमियों ने मिस्र के बादशाह फ़िरऔन से बात की कि इस्राईलियों को मिस्र से जाने दे। {i6:28} रब दुबारा मूसा से हमकलाम होता है {6:28} मिस्र में रब ने मूसा से कहा, {6:29} “मैं रब हूँ। मिस्र के बादशाह को वह सब कुछ बता देना जो मैं तुझे बताता हूँ।” {6:30} मूसा ने एतिराज़ किया, “मैं तो रुक रुक कर बोलता हूँ। फ़िरऔन किस तरह मेरी बात मानेगा।” {7:1} लेकिन रब ने कहा, “देख, मेरे कहने पर तू फ़िरऔन के लिए अल्लाह की हैसियत रखेगा और तेरा भाई हारून तेरा पैग़म्बर होगा। {7:2} जो भी हुक्म मैं तुझे दूँगा उसे तू हारून को बता दे। फिर वह सब कुछ फ़िरऔन को बताए ताकि वह इस्राईलियों को अपने मुल्क से जाने दे। {7:3} लेकिन मैं फ़िरऔन को अड़ जाने दूँगा। अगरचे मैं मिस्र में बहुत से निशानों और मोजिज़ों से अपनी क़ुदरत का मुज़ाहरा करूँगा {7:4} तो भी फ़िरऔन तुम्हारी नहीं सुनेगा। तब मिस्रियों पर मेरा हाथ भारी हो जाएगा, और मैं उन को सख़्त सज़ा दे कर अपनी क़ौम इस्राईल को ख़ानदानों की तरतीब के मुताबिक़ मिस्र से निकाल लाऊँगा। {7:5} जब मैं मिस्र के ख़िलाफ़ अपनी क़ुदरत का इज़हार करके इस्राईलियों को वहाँ से निकालूँगा तो मिस्री जान लेंगे कि मैं रब हूँ।” {7:6} मूसा और हारून ने सब कुछ वैसा ही किया जैसा रब ने उन्हें हुक्म दिया। {7:7} फ़िरऔन से बात करते वक़्त मूसा 80 साल का और हारून 83 साल का था। {i7:8} मूसा की लाठी साँप बन जाती है {7:8} रब ने मूसा और हारून से कहा, {7:9} “जब फ़िरऔन तुम्हें मोजिज़ा दिखाने को कहेगा तो मूसा हारून से कहे कि अपनी लाठी ज़मीन पर डाल दे। इस पर वह साँप बन जाएगी।” {7:10} मूसा और हारून ने फ़िरऔन के पास जा कर ऐसा ही किया। हारून ने अपनी लाठी फ़िरऔन और उस के उह्देदारों के सामने डाल दी तो वह साँप बन गई। {7:11} यह देख कर फ़िरऔन ने अपने आलिमों और जादूगरों को बुलाया। जादूगरों ने भी अपने जादू से ऐसा ही किया। {7:12} हर एक ने अपनी लाठी ज़मीन पर फैंकी तो वह साँप बन गई। लेकिन हारून की लाठी ने उन की लाठियों को निगल लिया। {7:13} ताहम फ़िरऔन इस से मुतअस्सिर न हुआ। उस ने मूसा और हारून की बात सुनने से इन्कार किया। वैसा ही हुआ जैसा रब ने कहा था। {i7:14} पानी ख़ून में बदल जाता है {7:14} फिर रब ने मूसा से कहा, “फ़िरऔन अड़ गया है। वह मेरी क़ौम को मिस्र छोड़ने से रोकता है। {7:15} कल सुब्ह-सवेरे जब वह दरया-ए-नील पर आएगा तो उस से मिलने के लिए दरया के किनारे पर खड़े हो जाना। उस लाठी को थामे रखना जो साँप बन गई थी। {7:16} जब वह वहाँ पहुँचे तो उस से कहना, ‘रब इब्रानियों के ख़ुदा ने मुझे आप को यह बताने के लिए भेजा है कि मेरी क़ौम को मेरी इबादत करने के लिए रेगिस्तान में जाने दे। लेकिन आप ने अभी तक उस की नहीं सुनी। {7:17} चुनाँचे अब आप जान लेंगे कि वह रब है। मैं इस लाठी को जो मेरे हाथ में है ले कर दरया-ए-नील के पानी को मारूँगा। फिर वह ख़ून में बदल जाएगा। {7:18} दरया-ए-नील की मछलियाँ मर जाएँगी, दरया से बदबू उठेगी और मिस्री दरया का पानी नहीं पी सकेंगे’।” {7:19} रब ने मूसा से कहा, “हारून को बता देना कि वह अपनी लाठी ले कर अपना हाथ उन तमाम जगहों की तरफ़ बढ़ाए जहाँ पानी जमा होता है। तब मिस्र की तमाम नदियों, नहरों, जोहड़ों और तालाबों का पानी ख़ून में बदल जाएगा। पूरे मुल्क में ख़ून ही ख़ून होगा, यहाँ तक कि लकड़ी और पत्थर के बर्तनों का पानी भी ख़ून में बदल जाएगा।” {7:20} चुनाँचे मूसा और हारून ने फ़िरऔन और उस के उह्देदारों के सामने अपनी लाठी उठा कर दरया-ए-नील के पानी पर मारी। इस पर दरया का सारा पानी ख़ून में बदल गया। {7:21} दरया की मछलियाँ मर गईं, और उस से इतनी बदबू उठने लगी कि मिस्री उस का पानी न पी सके। मिस्र में चारों तरफ़ ख़ून ही ख़ून था। {7:22} लेकिन जादूगरों ने भी अपने जादू के ज़रीए ऐसा ही किया। इस लिए फ़िरऔन अड़ गया और मूसा और हारून की बात न मानी। वैसा ही हुआ जैसा रब ने कहा था। {7:23} फ़िरऔन पलट कर अपने घर वापस चला गया। उसे उस की परवा नहीं थी जो मूसा और हारून ने किया था। {7:24} लेकिन मिस्री दरया से पानी न पी सके, और उन्हों ने पीने का पानी हासिल करने के लिए दरया के किनारे किनारे गढ़े खोदे। {7:25} पानी के बदल जाने के बाद सात दिन गुज़र गए। {i8:1} मेंढ़क {8:1} फिर रब ने मूसा से कहा, “फ़िरऔन के पास जा कर उसे बता देना कि रब फ़रमाता है, ‘मेरी क़ौम को मेरी इबादत करने के लिए जाने दे, {8:2} वर्ना मैं पूरे मिस्र को मेंढ़कों से सज़ा दूँगा। {8:3} दरया-ए-नील मेंढ़कों से इतना भर जाएगा कि वह दरया से निकल कर तेरे महल, तेरे सोने के कमरे और तेरे बिस्तर में जा घुसेंगे। वह तेरे उह्देदारों और तेरी रिआया के घरों में आएँगे बल्कि तेरे तनूरों और आटा गूँधने के बर्तनों में भी फुदकते फिरेंगे। {8:4} मेंढ़क तुझ पर, तेरी क़ौम पर और तेरे उह्देदारों पर चढ़ जाएंगे’।” {8:5} रब ने मूसा से कहा, “हारून को बता देना कि वह अपनी लाठी को हाथ में ले कर उसे दरयाओं, नहरों और जोहड़ों के ऊपर उठाए ताकि मेंढ़क बाहर निकल कर मिस्र के मुल्क में फैल जाएँ।” {8:6} हारून ने मुल्क-ए-मिस्र के पानी के ऊपर अपनी लाठी उठाई तो मेंढ़कों के ग़ोल पानी से निकल कर पूरे मुल्क पर छा गए। {8:7} लेकिन जादूगरों ने भी अपने जादू से ऐसा ही किया। वह भी दरया से मेंढ़क निकाल लाए। {8:8} फ़िरऔन ने मूसा और हारून को बुला कर कहा, “रब से दुआ करो कि वह मुझ से और मेरी क़ौम से मेंढ़कों को दूर करे। फिर मैं तुम्हारी क़ौम को जाने दूँगा ताकि वह रब को क़ुर्बानियाँ पेश करें।” {8:9} मूसा ने जवाब दिया, “वह वक़्त मुक़र्रर करें जब मैं आप के उह्देदारों और आप की क़ौम के लिए दुआ करूँ। फिर जो मेंढ़क आप के पास और आप के घरों में हैं उसी वक़्त ख़त्म हो जाएंगे। मेंढ़क सिर्फ़ दरया में पाए जाएंगे।” {8:10} फ़िरऔन ने कहा, “ठीक है, कल उन्हें ख़त्म करो।” मूसा ने कहा, “जैसा आप कहते हैं वैसा ही होगा। इस तरह आप को मालूम होगा कि हमारे ख़ुदा की मानिन्द कोई नहीं है। {8:11} मेंढ़क आप, आप के घरों, आप के उह्देदारों और आप की क़ौम को छोड़ कर सिर्फ़ दरया में रह जाएंगे।” {8:12} मूसा और हारून फ़िरऔन के पास से चले गए, और मूसा ने रब से मिन्नत की कि वह मेंढ़कों के वह ग़ोल दूर करे जो उस ने फ़िरऔन के ख़िलाफ़ भेजे थे। {8:13} रब ने उस की दुआ सुनी। घरों, सहनों और खेतों में मेंढ़क मर गए। {8:14} लोगों ने उन्हें जमा करके उन के ढेर लगा दिए। उन की बदबू पूरे मुल्क में फैल गई। {8:15} लेकिन जब फ़िरऔन ने देखा कि मसला हल हो गया है तो वह फिर अकड़ गया और उन की न सुनी। यूँ रब की बात दुरुस्त निकली। {i8:16} जूएँ {8:16} फिर रब ने मूसा से कहा, “हारून से कहना कि वह अपनी लाठी से ज़मीन की गर्द को मारे। जब वह ऐसा करेगा तो पूरे मिस्र की गर्द जूओं में बदल जाएगी।” {8:17} उन्हों ने ऐसा ही किया। हारून ने अपनी लाठी से ज़मीन की गर्द को मारा तो पूरे मुल्क की गर्द जूओं में बदल गई। उन के ग़ोल जानवरों और आदमियों पर छा गए। {8:18} जादूगरों ने भी अपने जादू से ऐसा करने की कोशिश की, लेकिन वह गर्द से जूएँ न बना सके। जूएँ आदमियों और जानवरों पर छा गईं। {8:19} जादूगरों ने फ़िरऔन से कहा, “अल्लाह की क़ुदरत ने यह किया है।” लेकिन फ़िरऔन ने उन की न सुनी। यूँ रब की बात दुरुस्त निकली। {i8:20} काटने वाली मक्खियाँ {8:20} फिर रब ने मूसा से कहा, “जब फ़िरऔन सुब्ह-सवेरे दरया पर जाए तो तू उस के रास्ते में खड़ा हो जाना। उसे कहना कि रब फ़रमाता है, ‘मेरी क़ौम को जाने दे ताकि वह मेरी इबादत कर सकें। {8:21} वर्ना मैं तेरे और तेरे उह्देदारों के पास, तेरी क़ौम के पास और तेरे घरों में काटने वाली मक्खियाँ भेज दूँगा। मिस्रियों के घर मक्खियों से भर जाएंगे बल्कि जिस ज़मीन पर वह खड़े हैं वह भी मक्खियों से ढाँकी जाएगी। {8:22} लेकिन उस वक़्त मैं अपनी क़ौम के साथ जो जुशन में रहती है फ़र्क़ सुलूक करूँगा। वहाँ एक भी काटने वाली मक्खी नहीं होगी। इस तरह तुझे पता लगेगा कि इस मुल्क में मैं ही रब हूँ। {8:23} मैं अपनी क़ौम और तेरी क़ौम में इम्तियाज़ करूँगा। कल ही मेरी क़ुदरत का इज़हार होगा’।” {8:24} रब ने ऐसा ही किया। काटने वाली मक्खियों के ग़ोल फ़िरऔन के महल, उस के उह्देदारों के घरों और पूरे मिस्र में फैल गए। मुल्क का सत्यानास हो गया। {8:25} फिर फ़िरऔन ने मूसा और हारून को बुला कर कहा, “चलो, इसी मुल्क में अपने ख़ुदा को क़ुर्बानियाँ पेश करो।” {8:26} लेकिन मूसा ने कहा, “यह मुनासिब नहीं है। जो क़ुर्बानियाँ हम रब अपने ख़ुदा को पेश करेंगे वह मिस्रियों की नज़र में घिनौनी हैं। अगर हम यहाँ ऐसा करें तो क्या वह हमें संगसार नहीं करेंगे? {8:27} इस लिए लाज़िम है कि हम तीन दिन का सफ़र करके रेगिस्तान में ही रब अपने ख़ुदा को क़ुर्बानियाँ पेश करें जिस तरह उस ने हमें हुक्म भी दिया है।” {8:28} फ़िरऔन ने जवाब दिया, “ठीक है, मैं तुम्हें जाने दूँगा ताकि तुम रेगिस्तान में रब अपने ख़ुदा को क़ुर्बानियाँ पेश करो। लेकिन तुम्हें ज़्यादा दूर नहीं जाना है। और मेरे लिए भी दुआ करना।” {8:29} मूसा ने कहा, “ठीक, मैं जाते ही रब से दुआ करूँगा। कल ही मक्खियाँ फ़िरऔन, उस के उह्देदारों और उस की क़ौम से दूर हो जाएँगी। लेकिन हमें दुबारा फ़रेब न देना बल्कि हमें जाने देना ताकि हम रब को क़ुर्बानियाँ पेश कर सकें।” {8:30} फिर मूसा फ़िरऔन के पास से चला गया और रब से दुआ की। {8:31} रब ने मूसा की दुआ सुनी। काटने वाली मक्खियाँ फ़िरऔन, उस के उह्देदारों और उस की क़ौम से दूर हो गईं। एक भी मक्खी न रही। {8:32} लेकिन फ़िरऔन फिर अकड़ गया। उस ने इस्राईलियों को जाने न दिया। {i9:1} मवेशियों में वबा {9:1} फिर रब ने मूसा से कहा, “फ़िरऔन के पास जा कर उसे बता कि रब इब्रानियों का ख़ुदा फ़रमाता है, ‘मेरी क़ौम को जाने दे ताकि वह मेरी इबादत कर सकें।’ {9:2} अगर आप इन्कार करें और उन्हें रोकते रहें {9:3} तो रब अपनी क़ुदरत का इज़हार करके आप के मवेशियों में भयानक वबा फैला देगा जो आप के घोड़ों, गधों, ऊँटों, गाय-बैलों, भेड़-बकरियों और मेंढों में फैल जाएगी। {9:4} लेकिन रब इस्राईल और मिस्र के मवेशियों में इम्तियाज़ करेगा। इस्राईलियों का एक भी जानवर नहीं मरेगा। {9:5} रब ने फ़ैसला कर लिया है कि वह कल ही ऐसा करेगा।” {9:6} अगले दिन रब ने ऐसा ही किया। मिस्र के तमाम मवेशी मर गए, लेकिन इस्राईलियों का एक भी जानवर न मरा। {9:7} फ़िरऔन ने कुछ लोगों को उन के पास भेज दिया तो पता चला कि एक भी जानवर नहीं मरा। ताहम फ़िरऔन अड़ा रहा। उस ने इस्राईलियों को जाने न दिया। {i9:8} फोड़े-फुंसियाँ {9:8} फिर रब ने मूसा और हारून से कहा, “अपनी मुट्ठियाँ किसी भट्टी की राख से भर कर फ़िरऔन के पास जाओ। फिर मूसा फ़िरऔन के सामने यह राख हवा में उड़ा दे। {9:9} यह राख बारीक धूल का बादल बन जाएगी जो पूरे मुल्क पर छा जाएगा। उस के असर से लोगों और जानवरों के जिस्मों पर फोड़े-फुंसियाँ फूट निकलेंगे।” {9:10} मूसा और हारून ने ऐसा ही किया। वह किसी भट्टी से राख ले कर फ़िरऔन के सामने खड़े हो गए। मूसा ने राख को हवा में उड़ा दिया तो इन्सानों और जानवरों के जिस्मों पर फोड़े-फुंसियाँ निकल आए। {9:11} इस मर्तबा जादूगर मूसा के सामने खड़े भी न हो सके क्यूँकि उन के जिस्मों पर भी फोड़े निकल आए थे। तमाम मिस्रियों का यही हाल था। {9:12} लेकिन रब ने फ़िरऔन को ज़िद्दी बनाए रखा, इस लिए उस ने मूसा और हारून की न सुनी। यूँ वैसा ही हुआ जैसा रब ने मूसा को बताया था। {i9:13} ओले {9:13} इस के बाद रब ने मूसा से कहा, “सुब्ह-सवेरे उठ और फ़िरऔन के सामने खड़े हो कर उसे बता कि रब इब्रानियों का ख़ुदा फ़रमाता है, ‘मेरी क़ौम को जाने दे ताकि वह मेरी इबादत कर सकें। {9:14} वर्ना मैं अपनी तमाम आफ़तें तुझ पर, तेरे उह्देदारों पर और तेरी क़ौम पर आने दूँगा। फिर तू जान लेगा कि तमाम दुनिया में मुझ जैसा कोई नहीं है। {9:15} अगर मैं चाहता तो अपनी क़ुदरत से ऐसी वबा फैला सकता कि तुझे और तेरी क़ौम को दुनिया से मिटा दिया जाता। {9:16} लेकिन मैं ने तुझे इस लिए बरपा किया है कि तुझ पर अपनी क़ुदरत का इज़हार करूँ और यूँ तमाम दुनिया में मेरे नाम का प्रचार किया जाए। {9:17} तू अभी तक अपने आप को सरफ़राज़ करके मेरी क़ौम के ख़िलाफ़ है और उन्हें जाने नहीं देता। {9:18} इस लिए कल मैं इसी वक़्त भयानक क़िस्म के ओलों का तूफ़ान भेज दूँगा। मिस्री क़ौम की इब्तिदा से ले कर आज तक मिस्र में ओलों का ऐसा तूफ़ान कभी नहीं आया होगा। {9:19} अपने बन्दों को अभी भेजना ताकि वह तेरे मवेशियों को और खेतों में पड़े तेरे माल को ला कर मह्फ़ूज़ कर लें। क्यूँकि जो भी खुले मैदान में रहेगा वह ओलों से मर जाएगा, ख़्वाह इन्सान हो या हैवान’।” {9:20} फ़िरऔन के कुछ उह्देदार रब का पैग़ाम सुन कर डर गए और भाग कर अपने जानवरों और ग़ुलामों को घरों में ले आए। {9:21} लेकिन दूसरों ने रब के पैग़ाम की परवा न की। उन के जानवर और ग़ुलाम बाहर खुले मैदान में रहे। {9:22} रब ने मूसा से कहा, “अपना हाथ आसमान की तरफ़ बढ़ा दे। फिर मिस्र के तमाम इन्सानों, जानवरों और खेतों के पौदों पर ओले पड़ेंगे।” {9:23} मूसा ने अपनी लाठी आसमान की तरफ़ उठाई तो रब ने एक ज़बरदस्त तूफ़ान भेज दिया। ओले पड़े, बिजली गिरी और बादल गरजते रहे। {9:24} ओले पड़ते रहे और बिजली चमकती रही। मिस्री क़ौम की इब्तिदा से ले कर अब तक ऐसे ख़तरनाक ओले कभी नहीं पड़े थे। {9:25} इन्सानों से ले कर हैवानों तक खेतों में सब कुछ बर्बाद हो गया। ओलों ने खेतों में तमाम पौदे और दरख़्त भी तोड़ दिए। {9:26} वह सिर्फ़ जुशन के इलाक़े में न पड़े जहाँ इस्राईली आबाद थे। {9:27} तब फ़िरऔन ने मूसा और हारून को बुलाया। उस ने कहा, “इस मर्तबा मैं ने गुनाह किया है। रब हक़ पर है। मुझ से और मेरी क़ौम से ग़लती हुई है। {9:28} ओले और अल्लाह की गरजती आवाज़ें हद से ज़्यादा हैं। रब से दुआ करो ताकि ओले रुक जाएँ। अब मैं तुम्हें जाने दूँगा। अब से तुम्हें यहाँ रहना नहीं पड़ेगा।” {9:29} मूसा ने फ़िरऔन से कहा, “मैं शहर से निकल कर दोनों हाथ रब की तरफ़ उठा कर दुआ करूँगा। फिर गरज और ओले रुक जाएंगे और आप जान लेंगे कि पूरी दुनिया रब की है। {9:30} लेकिन मैं जानता हूँ कि आप और आप के उह्देदार अभी तक रब ख़ुदा का ख़ौफ़ नहीं मानते।” {9:31} उस वक़्त सन के फूल निकल चुके थे और जौ की बालें लग गई थीं। इस लिए यह फ़सलें तबाह हो गईं। {9:32} लेकिन गेहूँ और एक और क़िस्म की गन्दुम जो बाद में पकती है बर्बाद न हुई। {9:33} मूसा फ़िरऔन को छोड़ कर शहर से निकला। उस ने रब की तरफ़ अपने हाथ उठाए तो गरज, ओले और बारिश का तूफ़ान रुक गया। {9:34} जब फ़िरऔन ने देखा कि तूफ़ान ख़त्म हो गया है तो वह और उस के उह्देदार दुबारा गुनाह करके अकड़ गए। {9:35} फ़िरऔन अड़ा रहा और इस्राईलियों को जाने न दिया। वैसा ही हुआ जैसा रब ने मूसा से कहा था। {i10:1} टिड्डियाँ {10:1} फिर रब ने मूसा से कहा, “फ़िरऔन के पास जा, क्यूँकि मैं ने उस का और उस के दरबारियों का दिल सख़्त कर दिया है ताकि उन के दरमियान अपने मोजिज़ों और अपनी क़ुदरत का इज़हार कर सकूँ {10:2} और तुम अपने बेटे-बेटियों और पोते-पोतियों को सुना सको कि मैं ने मिस्रियों के साथ क्या सुलूक किया है और उन के दरमियान किस तरह के मोजिज़े करके अपनी क़ुदरत का इज़हार किया है। यूँ तुम जान लोगे कि मैं रब हूँ।” {10:3} मूसा और हारून फ़िरऔन के पास गए। उन्हों ने उस से कहा, “रब इब्रानियों के ख़ुदा का फ़रमान है, ‘तू कब तक मेरे सामने हथियार डालने से इन्कार करेगा? मेरी क़ौम को मेरी इबादत करने के लिए जाने दे, {10:4} वर्ना मैं कल तेरे मुल्क में टिड्डियाँ लाऊँगा। {10:5} उन के ग़ोल ज़मीन पर यूँ छा जाएंगे कि ज़मीन नज़र ही नहीं आएगी। जो कुछ ओलों ने तबाह नहीं किया उसे वह चट कर जाएँगी। बचे हुए दरख़्तों के पत्ते भी ख़त्म हो जाएंगे। {10:6} तेरे महल, तेरे उह्देदारों और बाक़ी लोगों के घर उन से भर जाएंगे। जब से मिस्री इस मुल्क में आबाद हुए हैं तुम ने कभी टिड्डियों का ऐसा सख़्त हम्ला नहीं देखा होगा’।” यह कह कर मूसा पलट कर वहाँ से चला गया। {10:7} इस पर दरबारियों ने फ़िरऔन से बात की, “हम कब तक इस मर्द के जाल में फंसे रहें? इस्राईलियों को रब अपने ख़ुदा की इबादत करने के लिए जाने दें। क्या आप को अभी तक मालूम नहीं कि मिस्र बर्बाद हो गया है?” {10:8} तब मूसा और हारून को फ़िरऔन के पास बुलाया गया। उस ने उन से कहा, “जाओ, अपने ख़ुदा की इबादत करो। लेकिन यह बताओ कि कौन कौन साथ जाएगा?” {10:9} मूसा ने जवाब दिया, “हमारे जवान और बूढ़े साथ जाएंगे। हम अपने बेटे-बेटियों, भेड़-बकरियों और गाय-बैलों को भी साथ ले कर जाएंगे। हम सब के सब जाएंगे, क्यूँकि हमें रब की ईद मनानी है।” {10:10} फ़िरऔन ने तन्ज़न कहा, “ठीक है, जाओ और रब तुम्हारे साथ हो। नहीं, मैं किस तरह तुम सब को बाल-बच्चों समेत जाने दे सकता हूँ? तुम ने कोई बुरा मन्सूबा बनाया है। {10:11} नहीं, सिर्फ़ मर्द जा कर रब की इबादत कर सकते हैं। तुम ने तो यही दरख़्वास्त की थी।” तब मूसा और हारून को फ़िरऔन के सामने से निकाल दिया गया। {10:12} फिर रब ने मूसा से कहा, “मिस्र पर अपना हाथ उठा ताकि टिड्डियाँ आ कर मिस्र की सरज़मीन पर फैल जाएँ। जो कुछ भी खेतों में ओलों से बच गया है उसे वह खा जाएँगी।” {10:13} मूसा ने अपनी लाठी मिस्र पर उठाई तो रब ने मशरिक़ से आँधी चलाई जो सारा दिन और सारी रात चलती रही और अगली सुब्ह तक मिस्र में टिड्डियाँ पहुँचाईं। {10:14} बेशुमार टिड्डियाँ पूरे मुल्क पर हम्ला करके हर जगह बैठ गईं। इस से पहले या बाद में कभी भी टिड्डियों का इतना सख़्त हम्ला न हुआ था। {10:15} उन्हों ने ज़मीन को यूँ ढाँक लिया कि वह काली नज़र आने लगी। जो कुछ भी ओलों से बच गया था चाहे खेतों के पौदे या दरख़्तों के फल थे उन्हों ने खा लिया। मिस्र में एक भी दरख़्त या पौदा न रहा जिस के पत्ते बच गए हों। {10:16} तब फ़िरऔन ने मूसा और हारून को जल्दी से बुलवाया। उस ने कहा, “मैं ने तुम्हारे ख़ुदा का और तुम्हारा गुनाह किया है। {10:17} अब एक और मर्तबा मेरा गुनाह मुआफ़ करो और रब अपने ख़ुदा से दुआ करो ताकि मौत की यह हालत मुझ से दूर हो जाए।” {10:18} मूसा ने महल से निकल कर रब से दुआ की। {10:19} जवाब में रब ने हवा का रुख़ बदल दिया। उस ने मग़रिब से तेज़ आँधी चलाई जिस ने टिड्डियों को उड़ा कर बहर-ए-क़ुल्ज़ुम में डाल दिया। मिस्र में एक भी टिड्डी न रही। {10:20} लेकिन रब ने होने दिया कि फ़िरऔन फिर अड़ गया। उस ने इस्राईलियों को जाने न दिया। {i10:21} अंधेरा {10:21} इस के बाद रब ने मूसा से कहा, “अपना हाथ आसमान की तरफ़ उठा तो मिस्र पर अंधेरा छा जाएगा। इतना अंधेरा होगा कि बन्दा उसे छू सकेगा।” {10:22} मूसा ने अपना हाथ आसमान की तरफ़ उठाया तो तीन दिन तक मिस्र पर गहरा अंधेरा छाया रहा। {10:23} तीन दिन तक लोग न एक दूसरे को देख सके, न कहीं जा सके। लेकिन जहाँ इस्राईली रहते थे वहाँ रौशनी थी। {10:24} तब फ़िरऔन ने मूसा को फिर बुलवाया और कहा, “जाओ, रब की इबादत करो! तुम अपने साथ बाल-बच्चों को भी ले जा सकते हो। सिर्फ़ अपनी भेड़-बकरियाँ और गाय-बैल पीछे छोड़ देना।” {10:25} मूसा ने जवाब दिया, “क्या आप ही हमें क़ुर्बानियों के लिए जानवर देंगे ताकि उन्हें रब अपने ख़ुदा को पेश करें? {10:26} यक़ीनन नहीं। इस लिए लाज़िम है कि हम अपने जानवरों को साथ ले कर जाएँ। एक खुर भी पीछे नहीं छोड़ा जाएगा, क्यूँकि अभी तक हमें मालूम नहीं कि रब की इबादत के लिए किन किन जानवरों की ज़रूरत होगी। यह उस वक़्त ही पता चलेगा जब हम मन्ज़िल-ए-मक़सूद पर पहुँचेंगे। इस लिए ज़रूरी है कि हम सब को अपने साथ ले कर जाएँ।” {10:27} लेकिन रब की मर्ज़ी के मुताबिक़ फ़िरऔन अड़ गया। उस ने उन्हें जाने न दिया। {10:28} उस ने मूसा से कहा, “दफ़ा हो जा। ख़बरदार! फिर कभी अपनी शक्ल न दिखाना, वर्ना तुझे मौत के हवाले कर दिया जाएगा।” {10:29} मूसा ने कहा, “ठीक है, आप की मर्ज़ी। मैं फिर कभी आप के सामने नहीं आऊँगा।” {i11:1} आख़िरी सज़ा का एलान {11:1} तब रब ने मूसा से कहा, “अब मैं फ़िरऔन और मिस्र पर आख़िरी आफ़त लाने को हूँ। इस के बाद वह तुम्हें जाने देगा बल्कि तुम्हें ज़बरदस्ती निकाल देगा। {11:2} इस्राईलियों को बता देना कि हर मर्द अपने पड़ोसी और हर औरत अपनी पड़ोसन से सोने-चाँदी की चीज़ें माँग ले।” {11:3} (रब ने मिस्रियों के दिल इस्राईलियों की तरफ़ माइल कर दिए थे। वह फ़िरऔन के उह्देदारों समेत ख़ासकर मूसा की बड़ी इज़्ज़त करते थे)। {11:4} मूसा ने कहा, “रब फ़रमाता है, ‘आज आधी रात के वक़्त मैं मिस्र में से गुज़रूँगा। {11:5} तब बादशाह के पहलौठे से ले कर चक्की पीसने वाली नौकरानी के पहलौठे तक मिस्रियों का हर पहलौठा मर जाएगा। चौपाइयों के पहलौठे भी मर जाएंगे। {11:6} मिस्र की सरज़मीन पर ऐसा रोना पीटना होगा कि न माज़ी में कभी हुआ, न मुस्तक़बिल में कभी होगा। {11:7} लेकिन इस्राईली और उन के जानवर बचे रहेंगे। कुत्ता भी उन पर नहीं भौंकेगा। इस तरह तुम जान लोगे कि रब इस्राईलियों की निस्बत मिस्रियों से फ़र्क़ सुलूक करता है’।” {11:8} मूसा ने यह कुछ फ़िरऔन को बताया फिर कहा, “उस वक़्त आप के तमाम उह्देदार आ कर मेरे सामने झुक जाएंगे और मिन्नत करेंगे, ‘अपने पैरोकारों के साथ चले जाएँ।’ तब मैं चला ही जाऊँगा।” यह कह कर मूसा फ़िरऔन के पास से चला गया। वह बड़े ग़ुस्से में था। {11:9} रब ने मूसा से कहा था, “फ़िरऔन तुम्हारी नहीं सुनेगा। क्यूँकि लाज़िम है कि मैं मिस्र में अपनी क़ुदरत का मज़ीद इज़हार करूँ।” {11:10} गो मूसा और हारून ने फ़िरऔन के सामने यह तमाम मोजिज़े दिखाए, लेकिन रब ने फ़िरऔन को ज़िद्दी बनाए रखा, इस लिए उस ने इस्राईलियों को मुल्क छोड़ने न दिया। {i12:1} फ़सह की ईद {12:1} फिर रब ने मिस्र में मूसा और हारून से कहा, {12:2} “अब से यह महीना तुम्हारे लिए साल का पहला महीना हो।” {12:3} इस्राईल की पूरी जमाअत को बताना कि इस महीने के दसवें दिन हर ख़ानदान का सरपरस्त अपने घराने के लिए लेला यानी भेड़ या बकरी का बच्चा हासिल करे। {12:4} अगर घराने के अफ़राद पूरा जानवर खाने के लिए कम हों तो वह अपने सब से क़रीबी पड़ोसी के साथ मिल कर लेला हासिल करें। इतने लोग उस में से खाएँ कि सब के लिए काफ़ी हो और पूरा जानवर खाया जाए। {12:5} इस के लिए एक साल का नर बच्चा चुन लेना जिस में नुक़्स न हो। वह भेड़ या बकरी का बच्चा हो सकता है। {12:6} महीने के 14वें दिन तक उस की देख-भाल करो। उस दिन तमाम इस्राईली सूरज के ग़ुरूब होते वक़्त अपने लेले ज़बह करें। {12:7} हर ख़ानदान अपने जानवर का कुछ ख़ून जमा करके उसे उस घर के दरवाज़े की चौखट पर लगाए जहाँ लेला खाया जाएगा। यह ख़ून चौखट के ऊपर वाले हिस्से और दाएँ बाएँ के बाज़ूओं पर लगाया जाए। {12:8} लाज़िम है कि लोग जानवर को भून कर उसी रात खाएँ। साथ ही वह कड़वा साग-पात और बेख़मीरी रोटियाँ भी खाएँ। {12:9} लेले का गोश्त कच्चा न खाना, न उसे पानी में उबालना बल्कि पूरे जानवर को सर, पैरों और अन्दरूनी हिस्सों समेत आग पर भूनना। {12:10} लाज़िम है कि पूरा गोश्त उसी रात खाया जाए। अगर कुछ सुब्ह तक बच जाए तो उसे जलाना है। {12:11} खाना खाते वक़्त ऐसा लिबास पहनना जैसे तुम सफ़र पर जा रहे हो। अपने जूते पहने रखना और हाथ में सफ़र के लिए लाठी लिए हुए तुम उसे जल्दी जल्दी खाना। रब के फ़सह की ईद यूँ मनाना। {12:12} मैं आज रात मिस्र में से गुज़रूँगा और हर पहलौठे को जान से मार दूँगा, ख़्वाह इन्सान का हो या हैवान का। यूँ मैं जो रब हूँ मिस्र के तमाम देवताओं की अदालत करूँगा। {12:13} लेकिन तुम्हारे घरों पर लगा हुआ ख़ून तुम्हारा ख़ास निशान होगा। जिस जिस घर के दरवाज़े पर मैं वह ख़ून देखूँगा उसे छोड़ता जाऊँगा। जब मैं मिस्र पर हम्ला करूँगा तो मोहलक वबा तुम तक नहीं पहुँचेगी। {12:14} आज की रात को हमेशा याद रखना। इसे नस्ल-दर-नस्ल और हर साल रब की ख़ास ईद के तौर पर मनाना। {i12:15} बेख़मीरी रोटी की ईद {12:15} सात दिन तक बेख़मीरी रोटी खाना है। पहले दिन अपने घरों से तमाम ख़मीर निकाल देना। अगर कोई इन सात दिनों के दौरान ख़मीर खाए तो उसे क़ौम में से मिटाया जाए। {12:16} इस ईद के पहले और आख़िरी दिन मुक़द्दस इजतिमा मुनअक़िद करना। इन तमाम दिनों के दौरान काम न करना। सिर्फ़ एक काम की इजाज़त है और वह है अपना खाना तय्यार करना। {12:17} बेख़मीरी रोटी की ईद मनाना लाज़िम है, क्यूँकि उस दिन मैं तुम्हारे मुतअद्दिद ख़ानदानों को मिस्र से निकाल लाया। इस लिए यह दिन नस्ल-दर-नस्ल हर साल याद रखना। {12:18} पहले महीने के 14वें दिन की शाम से ले कर 21वें दिन की शाम तक सिर्फ़ बेख़मीरी रोटी खाना। {12:19} सात दिन तक तुम्हारे घरों में ख़मीर न पाया जाए। जो भी इस दौरान ख़मीर खाए उसे इस्राईल की जमाअत में से मिटाया जाए, ख़्वाह वह इस्राईली शहरी हो या अजनबी। {12:20} ग़रज़, इस ईद के दौरान ख़मीर न खाना। जहाँ भी तुम रहते हो वहाँ बेख़मीरी रोटी ही खाना है। {i12:21} पहलौठों की हलाकत {12:21} फिर मूसा ने तमाम इस्राईली बुज़ुर्गों को बुला कर उन से कहा, “जाओ, अपने ख़ानदानों के लिए भेड़ या बकरी के बच्चे चुन कर उन्हें फ़सह की ईद के लिए ज़बह करो। {12:22} ज़ूफ़े का गुच्छा ले कर उसे ख़ून से भरे हुए बासन में डुबो देना। फिर उसे ले कर ख़ून को चौखट के ऊपर वाले हिस्से और दाएँ बाएँ के बाज़ूओं पर लगा देना। सुब्ह तक कोई अपने घर से न निकले। {12:23} जब रब मिस्रियों को मार डालने के लिए मुल्क में से गुज़रेगा तो वह चौखट के ऊपर वाले हिस्से और दाएँ बाएँ के बाज़ूओं पर लगा हुआ ख़ून देख कर उन घरों को छोड़ देगा। वह हलाक करने वाले फ़रिश्ते को इजाज़त नहीं देगा कि वह तुम्हारे घरों में जा कर तुम्हें हलाक करे। {12:24} तुम अपनी औलाद समेत हमेशा इन हिदायात पर अमल करना। {12:25} यह रस्म उस वक़्त भी अदा करना जब तुम उस मुल्क में पहुँचोगे जो रब तुम्हें देगा। {12:26} और जब तुम्हारे बच्चे तुम से पूछें कि हम यह ईद क्यूँ मनाते हैं {12:27} तो उन से कहो, ‘यह फ़सह की क़ुर्बानी है जो हम रब को पेश करते हैं। क्यूँकि जब रब मिस्रियों को हलाक कर रहा था तो उस ने हमारे घरों को छोड़ दिया था’।” यह सुन कर इस्राईलियों ने अल्लाह को सिज्दा किया। {12:28} फिर उन्हों ने सब कुछ वैसा ही किया जैसा रब ने मूसा और हारून को बताया था। {12:29} आधी रात को रब ने बादशाह के पहलौठे से ले कर जेल के क़ैदी के पहलौठे तक मिस्रियों के तमाम पहलौठों को जान से मार दिया। चौपाइयों के पहलौठे भी मर गए। {12:30} उस रात मिस्र के हर घर में कोई न कोई मर गया। फ़िरऔन, उस के उह्देदार और मिस्र के तमाम लोग जाग उठे और ज़ोर ज़ोर से रोने और चीख़ने लगे। {i12:31} इस्राईलियों की हिज्रत {12:31} अभी रात थी कि फ़िरऔन ने मूसा और हारून को बुला कर कहा, “अब तुम और बाक़ी इस्राईली मेरी क़ौम में से निकल जाओ। अपनी दरख़्वास्त के मुताबिक़ रब की इबादत करो। {12:32} जिस तरह तुम चाहते हो अपनी भेड़-बकरियों को भी अपने साथ ले जाओ। और मुझे भी बरकत देना।” {12:33} बाक़ी मिस्रियों ने भी इस्राईलियों पर ज़ोर दे कर कहा, “जल्दी जल्दी मुल्क से निकल जाओ, वर्ना हम सब मर जाएंगे।” {12:34} इस्राईलियों के गूँधे हुए आटे में ख़मीर नहीं था। उन्हों ने उसे गूँधने के बर्तनों में रख कर अपने कपड़ों में लपेट लिया और सफ़र करते वक़्त अपने कंधों पर रख लिया। {12:35} इस्राईली मूसा की हिदायत पर अमल करके अपने मिस्री पड़ोसियों के पास गए और उन से कपड़े और सोने-चाँदी की चीज़ें माँगीं। {12:36} रब ने मिस्रियों के दिलों को इस्राईलियों की तरफ़ माइल कर दिया था, इस लिए उन्हों ने उन की हर दरख़्वास्त पूरी की। यूँ इस्राईलियों ने मिस्रियों को लूट लिया। {12:37} इस्राईली रामसीस से रवाना हो कर सुक्कात पहुँच गए। औरतों और बच्चों को छोड़ कर उन के 6 लाख मर्द थे। {12:38} वह अपने भेड़-बकरियों और गाय-बैलों के बड़े बड़े रेवड़ भी साथ ले गए। बहुत से ऐसे लोग भी उन के साथ निकले जो इस्राईली नहीं थे। {12:39} रास्ते में उन्हों ने उस बेख़मीरी आटे से रोटियाँ बनाईं जो वह साथ ले कर निकले थे। आटे में इस लिए ख़मीर नहीं था कि उन्हें इतनी जल्दी से मिस्र से निकाल दिया गया था कि खाना तय्यार करने का वक़्त ही न मिला था। {12:40} इस्राईली 430 साल तक मिस्र में रहे थे। {12:41} 430 साल के ऐन बाद, उसी दिन रब के यह तमाम ख़ानदान मिस्र से निकले। {12:42} उस ख़ास रात रब ने ख़ुद पहरा दिया ताकि इस्राईली मिस्र से निकल सकें। इस लिए तमाम इस्राईलियों के लिए लाज़िम है कि वह नस्ल-दर-नस्ल इस रात रब की ताज़ीम में जागते रहें, वह भी और उन के बाद की औलाद भी। {i12:43} फ़सह की ईद की हिदायात {12:43} रब ने मूसा और हारून से कहा, “फ़सह की ईद के यह उसूल हैं: किसी भी परदेसी को फ़सह की ईद का खाना खाने की इजाज़त नहीं है। {12:44} अगर तुम ने किसी ग़ुलाम को ख़रीद कर उस का ख़तना किया है तो वह फ़सह का खाना खा सकता है। {12:45} लेकिन ग़ैरशहरी या मज़दूर को फ़सह का खाना खाने की इजाज़त नहीं है। {12:46} यह खाना एक ही घर के अन्दर खाना है। न गोश्त घर से बाहर ले जाना, न लेले की किसी हड्डी को तोड़ना। {12:47} लाज़िम है कि इस्राईल की पूरी जमाअत यह ईद मनाए। {12:48} अगर कोई परदेसी तुम्हारे साथ रहता है जो फ़सह की ईद में शिर्कत करना चाहे तो लाज़िम है कि पहले उस के घराने के हर मर्द का ख़तना किया जाए। तब वह इस्राईली की तरह खाने में शरीक हो सकता है। लेकिन जिस का ख़तना न हुआ उसे फ़सह का खाना खाने की इजाज़त नहीं है। {12:49} यही उसूल हर एक पर लागू होगा, ख़्वाह वह इस्राईली हो या परदेसी।” {12:50} तमाम इस्राईलियों ने वैसा ही किया जैसा रब ने मूसा और हारून से कहा था। {12:51} उसी दिन रब तमाम इस्राईलियों को ख़ानदानों की तरतीब के मुताबिक़ मिस्र से निकाल लाया। {i13:1} यह ईद नजात की याद दिलाती {13:1} रब ने मूसा से कहा, {13:2} “इस्राईलियों के हर पहलौठे को मेरे लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस करना है। हर पहला नर बच्चा मेरा ही है, ख़्वाह इन्सान का हो या हैवान का।” {13:3} फिर मूसा ने लोगों से कहा, “इस दिन को याद रखो जब तुम रब की अज़ीम क़ुदरत के बाइस मिस्र की ग़ुलामी से निकले। इस दिन कोई चीज़ न खाना जिस में ख़मीर हो। {13:4} आज ही अबीब के महीने में तुम मिस्र से रवाना हो रहे हो। {13:5} रब ने तुम्हारे बापदादा से क़सम खा कर वादा किया है कि वह तुम को कनआनी, हित्ती, अमोरी, हिव्वी और यबूसी क़ौमों का मुल्क देगा, एक ऐसा मुल्क जिस में दूध और शहद की कस्रत है। जब रब तुम्हें उस मुल्क में पहुँचा देगा तो लाज़िम है कि तुम इसी महीने में यह रस्म मनाओ। {13:6} सात दिन बेख़मीरी रोटी खाओ। सातवें दिन रब की ताज़ीम में ईद मनाओ। {13:7} सात दिन ख़मीरी रोटी न खाना। कहीं भी ख़मीर न पाया जाए। पूरे मुल्क में ख़मीर का नाम-ओ-निशान तक न हो। {13:8} उस दिन अपने बेटे से यह कहो, ‘मैं यह ईद उस काम की ख़ुशी में मनाता हूँ जो रब ने मेरे लिए किया जब मैं मिस्र से निकला।’ {13:9} यह ईद तुम्हारे हाथ या पेशानी पर निशान की मानिन्द हो जो तुम्हें याद दिलाए कि रब की शरीअत को तुम्हारे होंटों पर रहना है। क्यूँकि रब तुम्हें अपनी अज़ीम क़ुदरत से मिस्र से निकाल लाया। {13:10} इस दिन की याद हर साल ठीक वक़्त पर मनाना। {i13:11} पहलौठों की मख़्सूसियत {13:11} रब तुम्हें कनआनियों के उस मुल्क में ले जाएगा जिस का वादा उस ने क़सम खा कर तुम और तुम्हारे बापदादा से किया है। {13:12} लाज़िम है कि वहाँ पहुँच कर तुम अपने तमाम पहलौठों को रब के लिए मख़्सूस करो। तुम्हारे मवेशियों के तमाम पहलौठे भी रब की मिलकियत हैं। {13:13} अगर तुम अपना पहलौठा गधा ख़ुद रखना चाहो तो रब को उस के बदले भेड़ या बकरी का बच्चा पेश करो। लेकिन अगर तुम उसे रखना नहीं चाहते तो उस की गर्दन तोड़ डालो। लेकिन इन्सान के पहलौठों के लिए हर सूरत में इवज़ी देना है। {13:14} आने वाले दिनों में जब तुम्हारा बेटा पूछे कि इस का क्या मतलब है तो उसे जवाब देना, ‘रब अपनी अज़ीम क़ुदरत से हमें मिस्र की ग़ुलामी से निकाल लाया। {13:15} जब फ़िरऔन ने अकड़ कर हमें जाने न दिया तो रब ने मिस्र के तमाम इन्सानों और हैवानों के पहलौठों को मार डाला। इस वजह से मैं अपने जानवरों का हर पहला बच्चा रब को क़ुर्बान करता और अपने हर पहलौठे के लिए इवज़ी देता हूँ’। {13:16} यह दस्तूर तुम्हारे हाथ और पेशानी पर निशान की मानिन्द हो जो तुम्हें याद दिलाए कि रब हमें अपनी क़ुदरत से मिस्र से निकाल लाया।” {i13:17} मिस्र से निकलने का रास्ता {13:17} जब फ़िरऔन ने इस्राईली क़ौम को जाने दिया तो अल्लाह उन्हें फ़िलिस्तियों के इलाक़े में से गुज़रने वाले रास्ते से ले कर न गया, अगरचे उस पर चलते हुए वह जल्द ही मुल्क-ए-कनआन पहुँच जाते। बल्कि रब ने कहा, “अगर उस रास्ते पर चलेंगे तो उन्हें दूसरों से लड़ना पड़ेगा। ऐसा न हो कि वह इस वजह से अपना इरादा बदल कर मिस्र लौट जाएँ।” {13:18} इस लिए अल्लाह उन्हें दूसरे रास्ते से ले कर गया, और वह रेगिस्तान के रास्ते से बहर-ए-क़ुल्ज़ुम की तरफ़ बढ़े। मिस्र से निकलते वक़्त मर्द मुसल्लह थे। {13:19} मूसा यूसुफ़ का ताबूत भी अपने साथ ले गया, क्यूँकि यूसुफ़ ने इस्राईलियों को क़सम दिला कर कहा था, “अल्लाह यक़ीनन तुम्हारी देख-भाल करके वहाँ ले जाएगा। उस वक़्त मेरी हड्डियों को भी उठा कर साथ ले जाना।” {13:20} इस्राईलियों ने सुक्कात को छोड़ कर एताम में अपने ख़ैमे लगाए। एताम रेगिस्तान के किनारे पर था। {13:21} रब उन के आगे आगे चलता गया, दिन के वक़्त बादल के सतून में ताकि उन्हें रास्ते का पता लगे और रात के वक़्त आग के सतून में ताकि उन्हें रौशनी मिले। यूँ वह दिन और रात सफ़र कर सकते थे। {13:22} दिन के वक़्त बादल का सतून और रात के वक़्त आग का सतून उन के सामने रहा। वह कभी भी अपनी जगह से न हटा। {i14:1} इस्राईल समुन्दर में से गुज़रता है {14:1} तब रब ने मूसा से कहा, {14:2} “इस्राईलियों को कह देना कि वह पीछे मुड़ कर मिज्दाल और समुन्दर के बीच यानी फ़ी-हख़ीरोत के नज़्दीक रुक जाएँ। वह बाल-सफ़ोन के मुक़ाबिल साहिल पर अपने ख़ैमे लगाएँ। {14:3} यह देख कर फ़िरऔन समझेगा कि इस्राईली रास्ता भूल कर आवारा फिर रहे हैं और कि रेगिस्तान ने चारों तरफ़ उन्हें घेर रखा है। {14:4} फिर मैं फ़िरऔन को दुबारा अड़ जाने दूँगा, और वह इस्राईलियों का पीछा करेगा। लेकिन मैं फ़िरऔन और उस की पूरी फ़ौज पर अपना जलाल ज़ाहिर करूँगा। मिस्री जान लेंगे कि मैं ही रब हूँ।” इस्राईलियों ने ऐसा ही किया। {14:5} जब मिस्र के बादशाह को इत्तिला दी गई कि इस्राईली हिज्रत कर गए हैं तो उस ने और उस के दरबारियों ने अपना ख़याल बदल कर कहा, “हम ने क्या किया है? हम ने उन्हें जाने दिया है, और अब हम उन की ख़िदमत से महरूम हो गए हैं।” {14:6} चुनाँचे बादशाह ने अपना जंगी रथ तय्यार करवाया और अपनी फ़ौज को ले कर निकला। {14:7} वह 600 बेहतरीन क़िस्म के रथ और मिस्र के बाक़ी तमाम रथों को साथ ले गया। तमाम रथों पर अफ़्सरान मुक़र्रर थे। {14:8} रब ने मिस्र के बादशाह फ़िरऔन को दुबारा अड़ जाने दिया था, इस लिए जब इस्राईली बड़े इख़तियार के साथ निकल रहे थे तो वह उन का ताक़्क़ुब करने लगा। {14:9} इस्राईलियों का पीछा करते करते फ़िरऔन के तमाम घोड़े, रथ, सवार और फ़ौजी उन के क़रीब पहुँचे। इस्राईली बहर-ए-क़ुल्ज़ुम के साहिल पर बाल-सफ़ोन के मुक़ाबिल फ़ी-हख़ीरोत के नज़्दीक ख़ैमे लगा चुके थे। {14:10} जब इस्राईलियों ने फ़िरऔन और उस की फ़ौज को अपनी तरफ़ बढ़ते देखा तो वह सख़्त घबरा गए और मदद के लिए रब के सामने चीख़ने-चिल्लाने लगे। {14:11} उन्हों ने मूसा से कहा, “क्या मिस्र में क़ब्रों की कमी थी कि आप हमें रेगिस्तान में ले आए हैं? हमें मिस्र से निकाल कर आप ने हमारे साथ क्या किया है? {14:12} क्या हम ने मिस्र में आप से दरख़्वास्त नहीं की थी कि मेहरबानी करके हमें छोड़ दें, हमें मिस्रियों की ख़िदमत करने दें? यहाँ आ कर रेगिस्तान में मर जाने की निस्बत बेहतर होता कि हम मिस्रियों के ग़ुलाम रहते।” {14:13} लेकिन मूसा ने जवाब दिया, “मत घबराओ। आराम से खड़े रहो और देखो कि रब तुम्हें आज किस तरह बचाएगा। आज के बाद तुम इन मिस्रियों को फिर कभी नहीं देखोगे। {14:14} रब तुम्हारे लिए लड़ेगा। तुम्हें बस, चुप रहना है।” {14:15} फिर रब ने मूसा से कहा, “तू मेरे सामने क्यूँ चीख़ रहा है? इस्राईलियों को आगे बढ़ने का हुक्म दे। {14:16} अपनी लाठी को पकड़ कर उसे समुन्दर के ऊपर उठा तो वह दो हिस्सों में बट जाएगा। इस्राईली ख़ुश्क ज़मीन पर समुन्दर में से गुज़रेंगे। {14:17} मैं मिस्रियों को अड़े रहने दूँगा ताकि वह इस्राईलियों का पीछा करें। फिर मैं फ़िरऔन, उस की सारी फ़ौज, उस के रथों और उस के सवारों पर अपना जलाल ज़ाहिर करूँगा। {14:18} जब मैं फ़िरऔन, उस के रथों और उस के सवारों पर अपना जलाल ज़ाहिर करूँगा तो मिस्री जान लेंगे कि मैं ही रब हूँ।” {14:19} अल्लाह का फ़रिश्ता इस्राईली लश्कर के आगे आगे चल रहा था। अब वह वहाँ से हट कर उन के पीछे खड़ा हो गया। बादल का सतून भी लोगों के आगे से हट कर उन के पीछे जा खड़ा हुआ। {14:20} इस तरह बादल मिस्रियों और इस्राईलियों के लश्करों के दरमियान आ गया। पूरी रात मिस्रियों की तरफ़ अंधेरा ही अंधेरा था जबकि इस्राईलियों की तरफ़ रौशनी थी। इस लिए मिस्री पूरी रात के दौरान इस्राईलियों के क़रीब न आ सके। {14:21} मूसा ने अपना हाथ समुन्दर के ऊपर उठाया तो रब ने मशरिक़ से तेज़ आँधी चलाई। आँधी तमाम रात चलती रही। उस ने समुन्दर को पीछे हटा कर उस की तह ख़ुश्क कर दी। समुन्दर दो हिस्सों में बट गया {14:22} तो इस्राईली समुन्दर में से ख़ुश्क ज़मीन पर चलते हुए गुज़र गए। उन के दाईं और बाईं तरफ़ पानी दीवार की तरह खड़ा रहा। {14:23} जब मिस्रियों को पता चला तो फ़िरऔन के तमाम घोड़े, रथ और घुड़सवार भी उन के पीछे पीछे समुन्दर में चले गए। {14:24} सुब्ह-सवेरे ही रब ने बादल और आग के सतून से मिस्र की फ़ौज पर निगाह की और उस में अब्तरी पैदा कर दी। {14:25} उन के रथों के पहिए निकल गए तो उन पर क़ाबू पाना मुश्किल हो गया। मिस्रियों ने कहा, “आओ, हम इस्राईलियों से भाग जाएँ, क्यूँकि रब उन के साथ है। वही मिस्र का मुक़ाबला कर रहा है।” {14:26} तब रब ने मूसा से कहा, “अपना हाथ समुन्दर के ऊपर उठा। फिर पानी वापस आ कर मिस्रियों, उन के रथों और घुड़सवारों को डुबो देगा।” {14:27} मूसा ने अपना हाथ समुन्दर के ऊपर उठाया तो दिन निकलते वक़्त पानी मामूल के मुताबिक़ बहने लगा, और जिस तरफ़ मिस्री भाग रहे थे वहाँ पानी ही पानी था। यूँ रब ने उन्हें समुन्दर में बहा कर ग़र्क़ कर दिया। {14:28} पानी वापस आ गया। उस ने रथों और घुड़सवारों को ढाँक लिया। फ़िरऔन की पूरी फ़ौज जो इस्राईलियों का ताक़्क़ुब कर रही थी डूब कर तबाह हो गई। उन में से एक भी न बचा। {14:29} लेकिन इस्राईली ख़ुश्क ज़मीन पर समुन्दर में से गुज़रे। उन के दाईं और बाईं तरफ़ पानी दीवार की तरह खड़ा रहा। {14:30} उस दिन रब ने इस्राईलियों को मिस्रियों से बचाया। मिस्रियों की लाशें उन्हें साहिल पर नज़र आईं। {14:31} जब इस्राईलियों ने रब की यह अज़ीम क़ुदरत देखी जो उस ने मिस्रियों पर ज़ाहिर की थी तो रब का ख़ौफ़ उन पर छा गया। वह उस पर और उस के ख़ादिम मूसा पर एतिमाद करने लगे। {i15:1} मूसा का गीत {15:1} तब मूसा और इस्राईलियों ने रब के लिए यह गीत गाया, “मैं रब की तम्जीद में गीत गाऊँगा, क्यूँकि वह निहायत अज़ीम है। घोड़े और उस के सवार को उस ने समुन्दर में पटख़ दिया है। {15:2} रब मेरी क़ुव्वत और मेरा गीत है, वह मेरी नजात बन गया है। वही मेरा ख़ुदा है, और मैं उस की तारीफ़ करूँगा। वही मेरे बाप का ख़ुदा है, और मैं उस की ताज़ीम करूँगा। {15:3} रब सूरमा है, रब उस का नाम है। {15:4} फ़िरऔन के रथों और फ़ौज को उस ने समुन्दर में पटख़ दिया तो बादशाह के बेहतरीन अफ़्सरान बहर-ए-क़ुल्ज़ुम में डूब गए। {15:5} गहरे पानी ने उन्हें ढाँक लिया, और वह पत्थर की तरह समुन्दर की तह तक उतर गए। {15:6} ऐ रब, तेरे दहने हाथ का जलाल बड़ी क़ुदरत से ज़ाहिर होता है। ऐ रब, तेरा दहना हाथ दुश्मन को चकनाचूर कर देता है। {15:7} जो तेरे ख़िलाफ़ उठ खड़े होते हैं उन्हें तू अपनी अज़मत का इज़हार करके ज़मीन पर पटख़ देता है। तेरा ग़ज़ब उन पर आन पड़ता है तो वह आग में भूसे की तरह जल जाते हैं। {15:8} तू ने ग़ुस्से में आ कर फूँक मारी तो पानी ढेर की सूरत में जमा हो गया। बहता पानी ठोस दीवार बन गया, समुन्दर गहराई तक जम गया। {15:9} दुश्मन ने डींग मार कर कहा, ‘मैं उन का पीछा करके उन्हें पकड़ लूँगा, मैं उन का लूटा हुआ माल तक़्सीम करूँगा। मेरी लालची जान उन से सेर हो जाएगी, मैं अपनी तलवार खैंच कर उन्हें हलाक करूँगा।’ {15:10} लेकिन तू ने उन पर फूँक मारी तो समुन्दर ने उन्हें ढाँक लिया, और वह सीसे की तरह ज़ोरदार मौजों में डूब गए। {15:11} ऐ रब, कौन सा माबूद तेरी मानिन्द है? कौन तेरी तरह जलाली और क़ुद्दूस है? कौन तेरी तरह हैरतअंगेज़ काम करता और अज़ीम मोजिज़े दिखाता है? कोई भी नहीं। {15:12} तू ने अपना दहना हाथ उठाया तो ज़मीन हमारे दुश्मनों को निगल गई। {15:13} अपनी शफ़्क़त से तू ने इवज़ाना दे कर अपनी क़ौम को छुटकारा दिया और उस की राहनुमाई की है, अपनी क़ुदरत से तू ने उसे अपनी मुक़द्दस सुकूनतगाह तक पहुँचाया है। {15:14} यह सुन कर दीगर क़ौमें काँप उठीँ, फ़िलिस्ती डर के मारे पेच-ओ-ताब खाने लगे। {15:15} अदोम के रईस सहम गए, मोआब के राहनुमाओं पर कपकपी तारी हो गई, और कनआन के तमाम बाशिन्दे हिम्मत हार गए। {15:16} दह्शत और ख़ौफ़ उन पर छा गया। तेरी अज़ीम क़ुदरत के बाइस वह पत्थर की तरह जम गए। ऐ रब, वह न हिले जब तक तेरी क़ौम गुज़र न गई। वह बेहिस्स-ओ-हरकत रहे जब तक तेरी ख़रीदी हुई क़ौम गुज़र न गई। {15:17} ऐ रब, तू अपने लोगों को ले कर पौदों की तरह अपने मौरूसी पहाड़ पर लगाएगा, उस जगह पर जो तू ने अपनी सुकूनत के लिए चुन ली है, जहाँ तू ने अपने हाथों से अपना मक़्दिस तय्यार किया है। {15:18} रब अबद तक बादशाह है!” {15:19} जब फ़िरऔन के घोड़े, रथ और घुड़सवार समुन्दर में चले गए तो रब ने उन्हें समुन्दर के पानी से ढाँक लिया। लेकिन इस्राईली ख़ुश्क ज़मीन पर समुन्दर में से गुज़र गए। {15:20} तब हारून की बहन मरियम जो नबिया थी ने दफ़ लिया, और बाक़ी तमाम औरतें भी दफ़ ले कर उस के पीछे हो लीं। सब गाने और नाचने लगीं। मरियम ने यह गा कर उन की राहनुमाई की, {15:21} “रब की तम्जीद में गीत गाओ, क्यूँकि वह निहायत अज़ीम है। घोड़े और उस के सवार को उस ने समुन्दर में पटख़ दिया है।” {i15:22} मारा और एलीम के चश्मे {15:22} मूसा के कहने पर इस्राईली बहर-ए-क़ुल्ज़ुम से रवाना हो कर दश्त-ए-शूर में चले गए। वहाँ वह तीन दिन तक सफ़र करते रहे। इस दौरान उन्हें पानी न मिला। {15:23} आख़िरकार वह मारा पहुँचे जहाँ पानी दस्तयाब था। लेकिन वह कड़वा था, इस लिए मक़ाम का नाम मारा यानी कड़वाहट पड़ गया। {15:24} यह देख कर लोग मूसा के ख़िलाफ़ बुड़बुड़ा कर कहने लगे, “हम क्या पिएँ?” {15:25} मूसा ने मदद के लिए रब से इल्तिजा की तो उस ने उसे लकड़ी का एक टुकड़ा दिखाया। जब मूसा ने यह लकड़ी पानी में डाली तो पानी की कड़वाहट ख़त्म हो गई। मारा में रब ने अपनी क़ौम को क़वानीन दिए। वहाँ उस ने उन्हें आज़माया भी। {15:26} उस ने कहा, “ग़ौर से रब अपने ख़ुदा की आवाज़ सुनो! जो कुछ उस की नज़र में दुरुस्त है वही करो। उस के अह्काम पर ध्यान दो और उस की तमाम हिदायात पर अमल करो। फिर मैं तुम पर वह बीमारियाँ नहीं लाऊँगा जो मिस्रियों पर लाया था, क्यूँकि मैं रब हूँ जो तुझे शिफ़ा देता हूँ।” {15:27} फिर इस्राईली रवाना हो कर एलीम पहुँचे जहाँ 12 चश्मे और खजूर के 70 दरख़्त थे। वहाँ उन्हों ने पानी के क़रीब अपने ख़ैमे लगाए। {i16:1} मन और बटेरें {16:1} इस के बाद इस्राईल की पूरी जमाअत एलीम से सफ़र करके सीन के रेगिस्तान में पहुँची जो एलीम और सीना के दरमियान है। वह मिस्र से निकलने के बाद दूसरे महीने के 15वें दिन पहुँचे। {16:2} रेगिस्तान में तमाम लोग फिर मूसा और हारून के ख़िलाफ़ बुड़बुड़ाने लगे। {16:3} उन्हों ने कहा, “काश रब हमें मिस्र में ही मार डालता! वहाँ हम कम अज़ कम जी भर कर गोश्त और रोटी तो खा सकते थे। आप हमें सिर्फ़ इस लिए रेगिस्तान में ले आए हैं कि हम सब भूके मर जाएँ।” {16:4} तब रब ने मूसा से कहा, “मैं आसमान से तुम्हारे लिए रोटी बरसाऊँगा। हर रोज़ लोग बाहर जा कर उसी दिन की ज़रूरत के मुताबिक़ खाना जमा करें। इस से मैं उन्हें आज़मा कर देखूँगा कि आया वह मेरी सुनते हैं कि नहीं। {16:5} हर रोज़ वह सिर्फ़ उतना खाना जमा करें जितना कि एक दिन के लिए काफ़ी हो। लेकिन छटे दिन जब वह खाना तय्यार करेंगे तो वह अगले दिन के लिए भी काफ़ी होगा।” {16:6} मूसा और हारून ने इस्राईलियों से कहा, “आज शाम को तुम जान लोगे कि रब ही तुम्हें मिस्र से निकाल लाया है। {16:7} और कल सुब्ह तुम रब का जलाल देखोगे। उस ने तुम्हारी शिकायतें सुन ली हैं, क्यूँकि असल में तुम हमारे ख़िलाफ़ नहीं बल्कि रब के ख़िलाफ़ बुड़बुड़ा रहे हो। {16:8} फिर भी रब तुम को शाम के वक़्त गोश्त और सुब्ह के वक़्त वाफ़िर रोटी देगा, क्यूँकि उस ने तुम्हारी शिकायतें सुन ली हैं। तुम्हारी शिकायतें हमारे ख़िलाफ़ नहीं बल्कि रब के ख़िलाफ़ हैं।” {16:9} मूसा ने हारून से कहा, “इस्राईलियों को बताना, ‘रब के सामने हाज़िर हो जाओ, क्यूँकि उस ने तुम्हारी शिकायतें सुन ली हैं’।” {16:10} जब हारून पूरी जमाअत के सामने बात करने लगा तो लोगों ने पलट कर रेगिस्तान की तरफ़ देखा। वहाँ रब का जलाल बादल में ज़ाहिर हुआ। {16:11} रब ने मूसा से कहा, {16:12} “मैं ने इस्राईलियों की शिकायत सुन ली है। उन्हें बता, ‘आज जब सूरज ग़ुरूब होने लगेगा तो तुम गोश्त खाओगे और कल सुब्ह पेट भर कर रोटी। फिर तुम जान लोगे कि मैं रब तुम्हारा ख़ुदा हूँ’।” {16:13} उसी शाम बटेरों के ग़ोल आए जो पूरी ख़ैमागाह पर छा गए। और अगली सुब्ह ख़ैमे के चारों तरफ़ ओस पड़ी थी। {16:14} जब ओस सूख गई तो बर्फ़ के गालों जैसे पतले दाने पाले की तरह ज़मीन पर पड़े थे। {16:15} जब इस्राईलियों ने उसे देखा तो एक दूसरे से पूछने लगे, “मन हू?” यानी “यह क्या है?” क्यूँकि वह नहीं जानते थे कि यह क्या चीज़ है। मूसा ने उन को समझाया, “यह वह रोटी है जो रब ने तुम्हें खाने के लिए दी है। {16:16} रब का हुक्म है कि हर एक उतना जमा करे जितना उस के ख़ानदान को ज़रूरत हो। अपने ख़ानदान के हर फ़र्द के लिए दो लिटर जमा करो।” {16:17} इस्राईलियों ने ऐसा ही किया। बाज़ ने ज़्यादा और बाज़ ने कम जमा किया। {16:18} लेकिन जब उसे नापा गया तो हर एक आदमी के लिए काफ़ी था। जिस ने ज़्यादा जमा किया था उस के पास कुछ न बचा। लेकिन जिस ने कम जमा किया था उस के पास भी काफ़ी था। {16:19} मूसा ने हुक्म दिया, “अगले दिन के लिए खाना न बचाना।” {16:20} लेकिन लोगों ने मूसा की बात न मानी बल्कि बाज़ ने खाना बचा लिया। लेकिन अगली सुब्ह मालूम हुआ कि बचे हुए खाने में कीड़े पड़ गए हैं और उस से बहुत बदबू आ रही है। यह सुन कर मूसा उन से नाराज़ हुआ। {16:21} हर सुब्ह हर कोई उतना जमा कर लेता जितनी उसे ज़रूरत होती थी। जब धूप तेज़ होती तो जो कुछ ज़मीन पर रह जाता वह पिघल कर ख़त्म हो जाता था। {16:22} छटे दिन जब लोग यह ख़ुराक जमा करते तो वह मिक़्दार में दुगनी होती थी यानी हर फ़र्द के लिए चार लिटर। जब जमाअत के बुज़ुर्गों ने मूसा के पास आ कर उसे इत्तिला दी {16:23} तो उस ने उन से कहा, “रब का फ़रमान है कि कल आराम का दिन है, मुक़द्दस सबत का दिन जो अल्लाह की ताज़ीम में मनाना है। आज तुम जो तनूर में पकाना चाहते हो पका लो और जो उबालना चाहते हो उबाल लो। जो बच जाए उसे कल के लिए मह्फ़ूज़ रखो।” {16:24} लोगों ने मूसा के हुक्म के मुताबिक़ अगले दिन के लिए खाना मह्फ़ूज़ कर लिया तो न खाने से बदबू आई, न उस में कीड़े पड़े। {16:25} मूसा ने कहा, “आज यही बचा हुआ खाना खाओ, क्यूँकि आज सबत का दिन है, रब की ताज़ीम में आराम का दिन। आज तुम्हें रेगिस्तान में कुछ नहीं मिलेगा। {16:26} छः दिन के दौरान यह ख़ुराक जमा करना है, लेकिन सातवाँ दिन आराम का दिन है। उस दिन ज़मीन पर खाने के लिए कुछ नहीं होगा।” {16:27} तो भी कुछ लोग हफ़्ते को खाना जमा करने के लिए निकले, लेकिन उन्हें कुछ न मिला। {16:28} तब रब ने मूसा से कहा, “तुम लोग कब तक मेरे अह्काम और हिदायात पर अमल करने से इन्कार करोगे? {16:29} देखो, रब ने तुम्हारे लिए मुक़र्रर किया है कि सबत का दिन आराम का दिन है। इस लिए वह तुम्हें जुमए को दो दिन के लिए ख़ुराक देता है। हफ़्ते को सब को अपने ख़ैमों में रहना है। कोई भी अपने घर से बाहर न निकले।” {16:30} चुनाँचे लोग सबत के दिन आराम करते थे। {16:31} इस्राईलियों ने इस ख़ुराक का नाम ‘मन’ रखा। उस के दाने धनिए की मानिन्द सफ़ेद थे, और उस का ज़ाइक़ा शहद से बने केक की मानिन्द था। {16:32} मूसा ने कहा, “रब फ़रमाता है, ‘दो लिटर मन एक मर्तबान में रख कर उसे आने वाली नस्लों के लिए मह्फ़ूज़ रखना। फिर वह देख सकेंगे कि मैं तुम्हें क्या खाना खिलाता रहा जब तुम्हें मिस्र से निकाल लाया’।” {16:33} मूसा ने हारून से कहा, “एक मर्तबान लो और उसे दो लिटर मन से भर कर रब के सामने रखो ताकि वह आने वाली नस्लों के लिए मह्फ़ूज़ रहे।” {16:34} हारून ने ऐसा ही किया। उस ने मन के इस मर्तबान को अह्द के सन्दूक़ के सामने रखा ताकि वह मह्फ़ूज़ रहे। {16:35} इस्राईलियों को 40 साल तक मन मिलता रहा। वह उस वक़्त तक मन खाते रहे जब तक रेगिस्तान से निकल कर कनआन की सरहद पर न पहुँचे। {16:36} (जो पैमाना इस्राईली मन के लिए इस्तेमाल करते थे वह दो लिटर का एक बर्तन था जिस का नाम ओमर था।) {i17:1} चटान से पानी {17:1} फिर इस्राईल की पूरी जमाअत सीन के रेगिस्तान से निकली। रब जिस तरह हुक्म देता रहा वह एक जगह से दूसरी जगह सफ़र करते रहे। रफ़ीदीम में उन्हों ने ख़ैमे लगाए। वहाँ पीने के लिए पानी न मिला। {17:2} इस लिए वह मूसा के साथ यह कह कर झगड़ने लगे, “हमें पीने के लिए पानी दो।” मूसा ने जवाब दिया, “तुम मुझ से क्यूँ झगड़ रहे हो? रब को क्यूँ आज़मा रहे हो?” {17:3} लेकिन लोग बहुत प्यासे थे। वह मूसा के ख़िलाफ़ बुड़बुड़ाने से बाज़ न आए बल्कि कहा, “आप हमें मिस्र से क्यूँ लाए हैं? क्या इस लिए कि हम अपने बच्चों और रेवड़ों समेत प्यासे मर जाएँ?” {17:4} तब मूसा ने रब के हुज़ूर फ़र्याद की, “मैं इन लोगों के साथ क्या करूँ? हालात ज़रा भी और बिगड़ जाएँ तो वह मुझे संगसार कर देंगे।” {17:5} रब ने मूसा से कहा, “कुछ बुज़ुर्ग साथ ले कर लोगों के आगे आगे चल। वह लाठी भी साथ ले जा जिस से तू ने दरया-ए-नील को मारा था। {17:6} मैं होरिब यानी सीना पहाड़ की एक चटान पर तेरे सामने खड़ा हूँगा। लाठी से चटान को मारना तो उस से पानी निकलेगा और लोग पी सकेंगे।” मूसा ने इस्राईल के बुज़ुर्गों के सामने ऐसा ही किया। {17:7} उस ने उस जगह का नाम मस्सा और मरीबा यानी ‘आज़माना और झगड़ना’ रखा, क्यूँकि वहाँ इस्राईली बुड़बुड़ाए और यह पूछ कर रब को आज़माया कि क्या रब हमारे दरमियान है कि नहीं? {i17:8} अमालीक़ियों की शिकस्त {17:8} रफ़ीदीम वह जगह भी थी जहाँ अमालीक़ी इस्राईलियों से लड़ने आए। {17:9} मूसा ने यशूअ से कहा, “लड़ने के क़ाबिल आदमियों को चुन लो और निकल कर अमालीक़ियों का मुक़ाबला करो। कल मैं अल्लाह की लाठी पकड़े हुए पहाड़ की चोटी पर खड़ा हो जाऊँगा।” {17:10} यशूअ मूसा की हिदायत के मुताबिक़ अमालीक़ियों से लड़ने गया जबकि मूसा, हारून और हूर पहाड़ की चोटी पर चढ़ गए। {17:11} और यूँ हुआ कि जब मूसा के हाथ उठाए हुए थे तो इस्राईली जीतते रहे, और जब वह नीचे थे तो अमालीक़ी जीतते रहे। {17:12} कुछ देर के बाद मूसा के बाज़ू थक गए। इस लिए हारून और हूर एक चटान ले आए ताकि वह उस पर बैठ जाए। फिर उन्हों ने उस के दाईं और बाईं तरफ़ खड़े हो कर उस के बाज़ूओं को ऊपर उठाए रखा। सूरज के ग़ुरूब होने तक उन्हों ने यूँ मूसा की मदद की। {17:13} इस तरह यशूअ ने अमालीक़ियों से लड़ते लड़ते उन्हें शिकस्त दी। {17:14} तब रब ने मूसा से कहा, “यह वाक़िआ यादगारी के लिए किताब में लिख ले। लाज़िम है कि यह सब कुछ यशूअ की याद में रहे, क्यूँकि मैं दुनिया से अमालीक़ियों का नाम-ओ-निशान मिटा दूँगा।” {17:15} उस वक़्त मूसा ने क़ुर्बानगाह बना कर उस का नाम ‘रब मेरा झंडा है’ रखा। {17:16} उस ने कहा, “रब के तख़्त के ख़िलाफ़ हाथ उठाया गया है, इस लिए रब की अमालीक़ियों से हमेशा तक जंग रहेगी।” {i18:1} यित्रो से मुलाक़ात {18:1} मूसा का सुसर यित्रो अब तक मिदियान में इमाम था। जब उस ने सब कुछ सुना जो अल्लाह ने मूसा और अपनी क़ौम के लिए किया है, कि वह उन्हें मिस्र से निकाल लाया है {18:2} तो वह मूसा के पास आया। वह उस की बीवी सफ़्फ़ूरा को अपने साथ लाया, क्यूँकि मूसा ने उसे अपने बेटों समेत मैके भेज दिया था। {18:3} यित्रो मूसा के दोनों बेटों को भी साथ लाया। पहले बेटे का नाम जैर्सोम यानी ‘अजनबी मुल्क में परदेसी’ था, क्यूँकि जब वह पैदा हुआ तो मूसा ने कहा था, “मैं अजनबी मुल्क में परदेसी हूँ।” {18:4} दूसरे बेटे का नाम इलीअज़र यानी ‘मेरा ख़ुदा मददगार है’ था, क्यूँकि जब वह पैदा हुआ तो मूसा ने कहा था, “मेरे बाप के ख़ुदा ने मेरी मदद करके मुझे फ़िरऔन की तलवार से बचाया है।” {18:5} यित्रो मूसा की बीवी और बेटे साथ ले कर उस वक़्त मूसा के पास पहुँचा जब उस ने रेगिस्तान में अल्लाह के पहाड़ यानी सीना के क़रीब ख़ैमा लगाया हुआ था। {18:6} उस ने मूसा को पैग़ाम भेजा था, “मैं, आप का सुसर यित्रो आप की बीवी और दो बेटों को साथ ले कर आप के पास आ रहा हूँ।” {18:7} मूसा अपने सुसर के इस्तिक़्बाल के लिए बाहर निकला, उस के सामने झुका और उसे बोसा दिया। दोनों ने एक दूसरे का हाल पूछा, फिर ख़ैमे में चले गए। {18:8} मूसा ने यित्रो को तफ़्सील से बताया कि रब ने इस्राईलियों की ख़ातिर फ़िरऔन और मिस्रियों के साथ क्या कुछ किया है। उस ने रास्ते में पेश आई तमाम मुश्किलात का ज़िक्र भी किया कि रब ने हमें किस तरह उन से बचाया है। {18:9} यित्रो उन सारे अच्छे कामों के बारे में सुन कर ख़ुश हुआ जो रब ने इस्राईलियों के लिए किए थे जब उस ने उन्हें मिस्रियों के हाथ से बचाया था। {18:10} उस ने कहा, “रब की तम्जीद हो जिस ने आप को मिस्रियों और फ़िरऔन के क़ब्ज़े से नजात दिलाई है। उसी ने क़ौम को ग़ुलामी से छुड़ाया है! {18:11} अब मैं ने जान लिया है कि रब तमाम माबूदों से अज़ीम है, क्यूँकि उस ने यह सब कुछ उन लोगों के साथ किया जिन्हों ने अपने ग़ुरूर में इस्राईलियों के साथ बुरा सुलूक किया था।” {18:12} फिर यित्रो ने अल्लाह को भस्म होने वाली क़ुर्बानी और दीगर कई क़ुर्बानियाँ पेश कीं। तब हारून और तमाम बुज़ुर्ग मूसा के सुसर यित्रो के साथ अल्लाह के हुज़ूर खाना खाने बैठे। {i18:13} 70 बुज़ुर्गों को मुक़र्रर किया जाता है {18:13} अगले दिन मूसा लोगों का इन्साफ़ करने के लिए बैठ गया। उन की तादाद इतनी ज़्यादा थी कि वह सुब्ह से ले कर शाम तक मूसा के सामने खड़े रहे। {18:14} जब यित्रो ने यह सब कुछ देखा तो उस ने पूछा, “यह क्या है जो आप लोगों के साथ कर रहे हैं? सारा दिन वह आप को घेरे रहते और आप उन की अदालत करते रहते हैं। आप यह सब कुछ अकेले ही क्यूँ कर रहे हैं?” {18:15} मूसा ने जवाब दिया, “लोग मेरे पास आ कर अल्लाह की मर्ज़ी मालूम करते हैं। {18:16} जब कभी कोई तनाज़ा या झगड़ा होता है तो दोनों पार्टियाँ मेरे पास आती हैं। मैं फ़ैसला करके उन्हें अल्लाह के अह्काम और हिदायात बताता हूँ।” {18:17} मूसा के सुसर ने उस से कहा, “आप का तरीक़ा अच्छा नहीं है। {18:18} काम इतना वसी है कि आप उसे अकेले नहीं सँभाल सकते। इस से आप और वह लोग जो आप के पास आते हैं बुरी तरह थक जाते हैं। {18:19} मेरी बात सुनें! मैं आप को एक मश्वरा देता हूँ। अल्लाह उस में आप की मदद करे। लाज़िम है कि आप अल्लाह के सामने क़ौम के नुमाइन्दा रहें और उन के मुआमलात उस के सामने पेश करें। {18:20} यह भी ज़रूरी है कि आप उन्हें अल्लाह के अह्काम और हिदायात सिखाएँ, कि वह किस तरह ज़िन्दगी गुज़ारें और क्या क्या करें। {18:21} लेकिन साथ साथ क़ौम में से क़ाबिल-ए-एतिमाद आदमी चुनें। वह ऐसे लोग हों जो अल्लाह का ख़ौफ़ मानते हों, रास्तदिल हों और रिश्वत से नफ़रत करते हों। उन्हें हज़ार हज़ार, सौ सौ, पचास पचास और दस दस आदमियों पर मुक़र्रर करें। {18:22} उन आदमियों की ज़िम्मादारी यह होगी कि वह हर वक़्त लोगों का इन्साफ़ करें। अगर कोई बहुत ही पेचीदा मुआमला हो तो वह फ़ैसले के लिए आप के पास आएँ, लेकिन दीगर मुआमलों का फ़ैसला वह ख़ुद करें। यूँ वह काम में आप का हाथ बटाएँगे और आप का बोझ हल्का हो जाएगा। {18:23} अगर मेरा यह मश्वरा अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक़ हो और आप ऐसा करें तो आप अपनी ज़िम्मादारी निभा सकेंगे और यह तमाम लोग इन्साफ़ के मिलने पर सलामती के साथ अपने अपने घर जा सकेंगे।” {18:24} मूसा ने अपने सुसर का मश्वरा मान लिया और ऐसा ही किया। {18:25} उस ने इस्राईलियों में से क़ाबिल-ए-एतिमाद आदमी चुने और उन्हें हज़ार हज़ार, सौ सौ, पचास पचास और दस दस आदमियों पर मुक़र्रर किया। {18:26} यह मर्द क़ाज़ी बन कर मुस्तक़िल तौर पर लोगों का इन्साफ़ करने लगे। आसान मसलों का फ़ैसला वह ख़ुद करते और मुश्किल मुआमलों को मूसा के पास ले आते थे। {18:27} कुछ अर्से बाद मूसा ने अपने सुसर को रुख़्सत किया तो यित्रो अपने वतन वापस चला गया। {i19:1} कोह-ए-सीना {19:1} इस्राईलियों को मिस्र से सफ़र करते हुए दो महीने हो गए थे। तीसरे महीने के पहले ही दिन वह सीना के रेगिस्तान में पहुँचे। {19:2} उस दिन वह रफ़ीदीम को छोड़ कर दश्त-ए-सीना में आ पहुँचे। वहाँ उन्हों ने रेगिस्तान में पहाड़ के क़रीब डेरे डाले। {19:3} तब मूसा पहाड़ पर चढ़ कर अल्लाह के पास गया। अल्लाह ने पहाड़ पर से मूसा को पुकार कर कहा, “याक़ूब के घराने बनी इस्राईल को बता, {19:4} ‘तुम ने देखा है कि मैं ने मिस्रियों के साथ क्या कुछ किया, और कि मैं तुम को उक़ाब के परों पर उठा कर यहाँ अपने पास लाया हूँ। {19:5} चुनाँचे अगर तुम मेरी सुनो और मेरे अह्द के मुताबिक़ चलो तो फिर तमाम क़ौमों में से मेरी ख़ास मिलकियत होगे। गो पूरी दुनिया मेरी ही है, {19:6} लेकिन तुम मेरे लिए मख़्सूस इमामों की बादशाही और मुक़द्दस क़ौम होगे।’ अब जा कर यह सारी बातें इस्राईलियों को बता।” {19:7} मूसा ने पहाड़ से उतर कर और क़ौम के बुज़ुर्गों को बुला कर उन्हें वह तमाम बातें बताईं जो कहने के लिए रब ने उसे हुक्म दिया था। {19:8} जवाब में पूरी क़ौम ने मिल कर कहा, “हम रब की हर बात पूरी करेंगे जो उस ने फ़रमाई है।” मूसा ने पहाड़ पर लौट कर रब को क़ौम का जवाब बताया। {19:9} जब वह पहुँचा तो रब ने मूसा से कहा, “मैं घने बादल में तेरे पास आऊँगा ताकि लोग मुझे तुझ से हमकलाम होते हुए सुनें। फिर वह हमेशा तुझ पर भरोसा रखेंगे।” तब मूसा ने रब को वह तमाम बातें बताईं जो लोगों ने की थीं। {19:10} रब ने मूसा से कहा, “अब लोगों के पास लौट कर आज और कल उन्हें मेरे लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस कर। वह अपने लिबास धो कर {19:11} तीसरे दिन के लिए तय्यार हो जाएँ, क्यूँकि उस दिन रब लोगों के देखते देखते कोह-ए-सीना पर उतरेगा। {19:12} लोगों की हिफ़ाज़त के लिए चारों तरफ़ पहाड़ की हद्दें मुक़र्रर कर। उन्हें ख़बरदार कर कि हुदूद को पार न करो। न पहाड़ पर चढ़ो, न उस के दामन को छुओ। जो भी उसे छुए वह ज़रूर मारा जाए। {19:13} और उसे हाथ से छू कर नहीं मारना है बल्कि पत्थरों या तीरों से। ख़्वाह इन्सान हो या हैवान, वह ज़िन्दा नहीं रह सकता। जब तक नरसिंगा देर तक फूँका न जाए उस वक़्त तक लोगों को पहाड़ पर चढ़ने की इजाज़त नहीं है।” {19:14} मूसा ने पहाड़ से उतर कर लोगों को अल्लाह के लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस किया। उन्हों ने अपने लिबास भी धोए। {19:15} उस ने उन से कहा, “तीसरे दिन के लिए तय्यार हो जाओ। मर्द औरतों से हमबिसतर न हों।” {19:16} तीसरे दिन सुब्ह पहाड़ पर घना बादल छा गया। बिजली चमकने लगी, बादल गरजने लगा और नरसिंगे की निहायत ज़ोरदार आवाज़ सुनाई दी। ख़ैमागाह में लोग लरज़ उठे। {19:17} तब मूसा लोगों को अल्लाह से मिलने के लिए ख़ैमागाह से बाहर पहाड़ की तरफ़ ले गया, और वह पहाड़ के दामन में खड़े हुए। {19:18} सीना पहाड़ धुएँ से ढका हुआ था, क्यूँकि रब आग में उस पर उतर आया। पहाड़ से धुआँ इस तरह उठ रहा था जैसे किसी भट्टे से उठता है। पूरा पहाड़ शिद्दत से लरज़ने लगा। {19:19} नरसिंगे की आवाज़ तेज़ से तेज़तर होती गई। मूसा बोलने लगा और अल्लाह उसे ऊँची आवाज़ में जवाब देता रहा। {19:20} रब सीना पहाड़ की चोटी पर उतरा और मूसा को ऊपर आने के लिए कहा। मूसा ऊपर चढ़ा। {19:21} रब ने मूसा से कहा, “फ़ौरन नीचे उतर कर लोगों को ख़बरदार कर कि वह मुझे देखने के लिए पहाड़ की हुदूद में ज़बरदस्ती दाख़िल न हों। अगर वह ऐसा करें तो बहुत से हलाक हो जाएंगे। {19:22} इमाम भी जो रब के हुज़ूर आते हैं अपने आप को मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस करें, वर्ना मेरा ग़ज़ब उन पर टूट पड़ेगा।” {19:23} लेकिन मूसा ने रब से कहा, “लोग पहाड़ पर नहीं आ सकते, क्यूँकि तू ने ख़ुद ही हमें ख़बरदार किया कि हम पहाड़ की हद्दें मुक़र्रर करके उसे मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस करें।” {19:24} रब ने जवाब दिया, “तो भी उतर जा और हारून को साथ ले कर वापस आ। लेकिन इमामों और लोगों को मत आने दे। अगर वह ज़बरदस्ती मेरे पास आएँ तो मेरा ग़ज़ब उन पर टूट पड़ेगा।” {19:25} मूसा ने लोगों के पास उतर कर उन्हें यह बातें बता दीं। {i20:1} दस अह्काम {20:1} तब अल्लाह ने यह तमाम बातें फ़रमाईं, {20:2} “मैं रब तेरा ख़ुदा हूँ जो तुझे मुल्क-ए-मिस्र की ग़ुलामी से निकाल लाया। {20:3} मेरे सिवा किसी और माबूद की परस्तिश न करना। {20:4} अपने लिए बुत न बनाना। किसी भी चीज़ की मूरत न बनाना, चाहे वह आसमान में, ज़मीन पर या समुन्दर में हो। {20:5} न बुतों की परस्तिश, न उन की ख़िदमत करना, क्यूँकि मैं तेरा रब ग़यूर ख़ुदा हूँ। जो मुझ से नफ़रत करते हैं उन्हें मैं तीसरी और चौथी पुश्त तक सज़ा दूँगा। {20:6} लेकिन जो मुझ से मुहब्बत रखते और मेरे अह्काम पूरे करते हैं उन पर मैं हज़ार पुश्तों तक मेहरबानी करूँगा। {20:7} रब अपने ख़ुदा का नाम बेमक़्सद या ग़लत मक़्सद के लिए इस्तेमाल न करना। जो भी ऐसा करता है उसे रब सज़ा दिए बग़ैर नहीं छोड़ेगा। {20:8} सबत के दिन का ख़याल रखना। उसे इस तरह मनाना कि वह मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस हो। {20:9} हफ़्ते के पहले छः दिन अपना काम-काज कर, {20:10} लेकिन सातवाँ दिन रब तेरे ख़ुदा का आराम का दिन है। उस दिन किसी तरह का काम न करना। न तू, न तेरा बेटा, न तेरी बेटी, न तेरा नौकर, न तेरी नौकरानी और न तेरे मवेशी। जो परदेसी तेरे दरमियान रहता है वह भी काम न करे। {20:11} क्यूँकि रब ने पहले छः दिन में आसमान-ओ-ज़मीन, समुन्दर और जो कुछ उन में है बनाया लेकिन सातवें दिन आराम किया। इस लिए रब ने सबत के दिन को बरकत दे कर मुक़र्रर किया कि वह मख़्सूस और मुक़द्दस हो। {20:12} अपने बाप और अपनी माँ की इज़्ज़त करना। फिर तू उस मुल्क में जो रब तेरा ख़ुदा तुझे देने वाला है देर तक जीता रहेगा। {20:13} क़त्ल न करना। {20:14} ज़िना न करना। {20:15} चोरी न करना। {20:16} अपने पड़ोसी के बारे में झूटी गवाही न देना। {20:17} अपने पड़ोसी के घर का लालच न करना। न उस की बीवी का, न उस के नौकर का, न उस की नौकरानी का, न उस के बैल और न उस के गधे का बल्कि उस की किसी भी चीज़ का लालच न करना।” {i20:18} लोग घबरा जाते हैं {20:18} जब बाक़ी तमाम लोगों ने बादल की गरज और नरसिंगे की आवाज़ सुनी और बिजली की चमक और पहाड़ से उठते हुए धुएँ को देखा तो वह ख़ौफ़ के मारे काँपने लगे और पहाड़ से दूर खड़े हो गए। {20:19} उन्हों ने मूसा से कहा, “आप ही हम से बात करें तो हम सुनेंगे। लेकिन अल्लाह को हम से बात न करने दें वर्ना हम मर जाएंगे।” {20:20} लेकिन मूसा ने उन से कहा, “मत डरो, क्यूँकि रब तुम्हें जाँचने के लिए आया है, ताकि उस का ख़ौफ़ तुम्हारी आँखों के सामने रहे और तुम गुनाह न करो।” {20:21} लोग दूर ही रहे जबकि मूसा उस गहरी तारीकी के क़रीब गया जहाँ अल्लाह था। {20:22} तब रब ने मूसा से कहा, “इस्राईलियों को बता, ‘तुम ने ख़ुद देखा कि मैं ने आसमान पर से तुम्हारे साथ बातें की हैं। {20:23} चुनाँचे मेरी परस्तिश के साथ साथ अपने लिए सोने या चाँदी के बुत न बनाओ। {20:24} मेरे लिए मिट्टी की क़ुर्बानगाह बना कर उस पर अपनी भेड़-बकरियों और गाय-बैलों की भस्म होने वाली और सलामती की क़ुर्बानियाँ चढ़ाना। मैं तुझे वह जगहें दिखाऊँगा जहाँ मेरे नाम की ताज़ीम में क़ुर्बानियाँ पेश करनी हैं। ऐसी तमाम जगहों पर मैं तेरे पास आ कर तुझे बरकत दूँगा। {20:25} अगर तू मेरे लिए क़ुर्बानगाह बनाने की ख़ातिर पत्थर इस्तेमाल करना चाहे तो तराशे हुए पत्थर इस्तेमाल न करना। क्यूँकि तू तराशने के लिए इस्तेमाल होने वाले औज़ार से उस की बेहुरमती करेगा। {20:26} क़ुर्बानगाह को सीढ़ियों के बग़ैर बनाना है ताकि उस पर चढ़ने से तेरे लिबास के नीचे से तेरा नंगापन नज़र न आए।’ {21:1} इस्राईलियों को यह अह्काम बता, {i21:2} इब्रानी ग़ुलाम के हुक़ूक़ {21:2} ‘अगर तू इब्रानी ग़ुलाम ख़रीदे तो वह छः साल तेरा ग़ुलाम रहे। इस के बाद लाज़िम है कि उसे आज़ाद कर दिया जाए। आज़ाद होने के लिए उसे पैसे देने की ज़रूरत नहीं होगी। {21:3} अगर ग़ुलाम ग़ैरशादीशुदा हालत में मालिक के घर आया हो तो वह आज़ाद हो कर अकेला ही चला जाए। अगर वह शादीशुदा हालत में आया हो तो लाज़िम है कि वह अपनी बीवी समेत आज़ाद हो कर जाए। {21:4} अगर मालिक ने ग़ुलाम की शादी कराई और बच्चे पैदा हुए हैं तो उस की बीवी और बच्चे मालिक की मिलकियत होंगे। छः साल के बाद जब ग़ुलाम आज़ाद हो कर जाए तो उस की बीवी और बच्चे मालिक ही के पास रहें। {21:5} अगर ग़ुलाम कहे, “मैं अपने मालिक और अपने बीवी बच्चों से मुहब्बत रखता हूँ, मैं आज़ाद नहीं होना चाहता” {21:6} तो ग़ुलाम का मालिक उसे अल्लाह के सामने लाए। वह उसे दरवाज़े या उस की चौखट के पास ले जाए और सुताली यानी तेज़ औज़ार से उस के कान की लौ छेद दे। तब वह ज़िन्दगी भर उस का ग़ुलाम बना रहेगा। {21:7} अगर कोई अपनी बेटी को ग़ुलामी में बेच डाले तो उस के लिए आज़ादी मिलने की शराइत मर्द से फ़र्क़ हैं। {21:8} अगर उस के मालिक ने उसे मुन्तख़ब किया कि वह उस की बीवी बन जाए, लेकिन बाद में वह उसे पसन्द न आए तो लाज़िम है कि वह मुनासिब मुआवज़ा ले कर उसे उस के रिश्तेदारों को वापस कर दे। उसे औरत को ग़ैरमुल्कियों के हाथ बेचने का इख़तियार नहीं है, क्यूँकि उस ने उस के साथ बेवफ़ा सुलूक किया है। {21:9} अगर लौंडी का मालिक उस की अपने बेटे के साथ शादी कराए तो औरत को बेटी के हुक़ूक़ हासिल होंगे। {21:10} अगर मालिक ने उस से शादी करके बाद में दूसरी औरत से भी शादी की तो लाज़िम है कि वह पहली को भी खाना और कपड़े देता रहे। इस के इलावा उस के साथ हमबिसतर होने का फ़र्ज़ भी अदा करना है। {21:11} अगर वह यह तीन फ़राइज़ अदा न करे तो उसे औरत को आज़ाद करना पड़ेगा। इस सूरत में उसे मुफ़्त आज़ाद करना होगा। {i21:12} ज़ख़्मी करने की सज़ा {21:12} जो किसी को जान-बूझ कर इतना सख़्त मारता हो कि वह मर जाए तो उसे ज़रूर सज़ा-ए-मौत देना है। {21:13} लेकिन अगर उस ने उसे जान-बूझ कर न मारा बल्कि यह इत्तिफ़ाक़ से हुआ और अल्लाह ने यह होने दिया, तो मारने वाला एक ऐसी जगह पनाह ले सकता है जो मैं मुक़र्रर करूँगा। वहाँ उसे क़त्ल किए जाने की इजाज़त नहीं होगी। {21:14} लेकिन जो दीदा-दानिस्ता और चालाकी से किसी को मार डालता है उसे मेरी क़ुर्बानगाह से भी छीन कर सज़ा-ए-मौत देना है। {21:15} जो अपने बाप या अपनी माँ को मारता पीटता है उसे सज़ा-ए-मौत दी जाए। {21:16} जिस ने किसी को अग़वा कर लिया है उसे सज़ा-ए-मौत दी जाए, चाहे वह उसे ग़ुलाम बना कर बेच चुका हो या उसे अब तक अपने पास रखा हुआ हो। {21:17} जो अपने बाप या माँ पर लानत करे उसे सज़ा-ए-मौत दी जाए। {21:18} हो सकता है कि आदमी झगड़ें और एक शख़्स दूसरे को पत्थर या मुक्के से इतना ज़ख़्मी कर दे कि गो वह बच जाए वह बिस्तर से उठ न सकता हो। {21:19} अगर बाद में मरीज़ यहाँ तक शिफ़ा पाए कि दुबारा उठ कर लाठी के सहारे चल फिर सके तो चोट पहुँचाने वाले को सज़ा नहीं मिलेगी। उसे सिर्फ़ उस वक़्त के लिए मुआवज़ा देना पड़ेगा जब तक मरीज़ पैसे न कमा सके। साथ ही उसे उस का पूरा इलाज करवाना है। {21:20} जो अपने ग़ुलाम या लौंडी को लाठी से यूँ मारे कि वह मर जाए उसे सज़ा दी जाए। {21:21} लेकिन अगर ग़ुलाम या लौंडी पिटाई के बाद एक या दो दिन ज़िन्दा रहे तो मालिक को सज़ा न दी जाए। क्यूँकि जो रक़म उस ने उस के लिए दी थी उस का नुक़्सान उसे ख़ुद उठाना पड़ेगा। {21:22} हो सकता है कि लोग आपस में लड़ रहे हों और लड़ते लड़ते किसी हामिला औरत से यूँ टकरा जाएँ कि उस का बच्चा ज़ाए हो जाए। अगर कोई और नुक़्सान न हुआ हो तो ज़र्ब पहुँचाने वाले को जुर्माना देना पड़ेगा। औरत का शौहर यह जुर्माना मुक़र्रर करे, और अदालत में इस की तस्दीक़ हो। {21:23} लेकिन अगर उस औरत को और नुक़्सान भी पहुँचा हो तो फिर ज़र्ब पहुँचाने वाले को इस उसूल के मुताबिक़ सज़ा दी जाए कि जान के बदले जान, {21:24} आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत, हाथ के बदले हाथ, पाँओ के बदले पाँओ, {21:25} जलने के ज़ख़्म के बदले जलने का ज़ख़्म, मार के बदले मार, काट के बदले काट। {21:26} अगर कोई मालिक अपने ग़ुलाम की आँख पर यूँ मारे कि वह ज़ाए हो जाए तो उसे ग़ुलाम को आँख के बदले आज़ाद करना पड़ेगा, चाहे ग़ुलाम मर्द हो या औरत। {21:27} अगर मालिक के पीटने से ग़ुलाम का दाँत टूट जाए तो उसे ग़ुलाम को दाँत के बदले आज़ाद करना पड़ेगा, चाहे ग़ुलाम मर्द हो या औरत। {i21:28} नुक़्सान का मुआवज़ा {21:28} अगर कोई बैल किसी मर्द या औरत को ऐसा मारे कि वह मर जाए तो उस बैल को संगसार किया जाए। उस का गोश्त खाने की इजाज़त नहीं है। इस सूरत में बैल के मालिक को सज़ा न दी जाए। {21:29} लेकिन हो सकता है कि मालिक को पहले आगाह किया गया था कि बैल लोगों को मारता है, तो भी उस ने बैल को खुला छोड़ा था जिस के नतीजे में उस ने किसी को मार डाला। ऐसी सूरत में न सिर्फ़ बैल को बल्कि उस के मालिक को भी संगसार करना है। {21:30} लेकिन अगर फ़ैसला किया जाए कि वह अपनी जान का फ़िद्या दे तो जितना मुआवज़ा भी मुक़र्रर किया जाए उसे देना पड़ेगा। {21:31} सज़ा में कोई फ़र्क़ नहीं है, चाहे बेटे को मारा जाए या बेटी को। {21:32} लेकिन अगर बैल किसी ग़ुलाम या लौंडी को मार दे तो उस का मालिक ग़ुलाम के मालिक को चाँदी के 30 सिक्के दे और बैल को संगसार किया जाए। {21:33} हो सकता है कि किसी ने अपने हौज़ को खुला रहने दिया या हौज़ बनाने के लिए गढ़ा खोद कर उसे खुला रहने दिया और कोई बैल या गधा उस में गिर कर मर गया। {21:34} ऐसी सूरत में हौज़ का मालिक मुर्दा जानवर के लिए पैसे दे। वह जानवर के मालिक को उस की पूरी क़ीमत अदा करे और मुर्दा जानवर ख़ुद ले ले। {21:35} अगर किसी का बैल किसी दूसरे के बैल को ऐसे मारे कि वह मर जाए तो दोनों मालिक ज़िन्दा बैल को बेच कर उस के पैसे आपस में बराबर बाँट लें। इसी तरह वह मुर्दा बैल को भी बराबर तक़्सीम करें। {21:36} लेकिन हो सकता है कि मालिक को मालूम था कि मेरा बैल दूसरे जानवरों पर हम्ला करता है, इस के बावुजूद उस ने उसे आज़ाद छोड़ दिया था। ऐसी सूरत में उसे मुर्दा बैल के इवज़ उस के मालिक को नया बैल देना पड़ेगा, और वह मुर्दा बैल ख़ुद ले ले। {i22:1} मिलकियत की हिफ़ाज़त {22:1} जिस ने कोई बैल या भेड़ चोरी करके उसे ज़बह किया या बेच डाला है उसे हर चोरी के बैल के इवज़ पाँच बैल और हर चोरी की भेड़ के इवज़ चार भेड़ें वापस करना है। {22:2} हो सकता है कि कोई चोर नक़ब लगा रहा हो और लोग उसे पकड़ कर यहाँ तक मारते पीटते रहें कि वह मर जाए। अगर रात के वक़्त ऐसा हुआ हो तो वह उस के ख़ून के ज़िम्मादार नहीं ठहर सकते। {22:3} लेकिन अगर सूरज के तुलू होने के बाद ऐसा हुआ हो तो जिस ने उसे मारा वह क़ातिल ठहरेगा। चोर को हर चुराई हुई चीज़ का इवज़ाना देना है। अगर उस के पास देने के लिए कुछ न हो तो उसे ग़ुलाम बना कर बेचना है। जो पैसे उसे बेचने के इवज़ मिलें वह चुराई हुई चीज़ों के बदले में दिए जाएँ। {22:4} अगर चोरी का जानवर चोर के पास ज़िन्दा पाया जाए तो उसे हर जानवर के इवज़ दो देने पड़ेंगे, चाहे वह बैल, भेड़, बकरी या गधा हो। {22:5} हो सकता है कि कोई अपने मवेशी को अपने खेत या अंगूर के बाग़ में छोड़ कर चरने दे और होते होते वह किसी दूसरे के खेत या अंगूर के बाग़ में जा कर चरने लगे। ऐसी सूरत में लाज़िम है कि मवेशी का मालिक नुक़्सान के इवज़ अपने अंगूर के बाग़ और खेत की बेहतरीन पैदावार में से दे। {22:6} हो सकता है कि किसी ने आग जलाई हो और वह काँटेदार झाड़ियों के ज़रीए पड़ोसी के खेत तक फैल कर उस के अनाज के पूलों को, उस की पकी हुई फ़सल को या खेत की किसी और पैदावार को बर्बाद कर दे। ऐसी सूरत में जिस ने आग जलाई हो उसे उस की पूरी क़ीमत अदा करनी है। {22:7} हो सकता है कि किसी ने कुछ पैसे या कोई और माल अपने किसी वाक़िफ़कार के सपुर्द कर दिया हो ताकि वह उसे मह्फ़ूज़ रखे। अगर यह चीज़ें उस के घर से चोरी हो जाएँ और बाद में चोर को पकड़ा जाए तो चोर को उस की दुगनी क़ीमत अदा करनी पड़ेगी। {22:8} लेकिन अगर चोर पकड़ा न जाए तो लाज़िम है कि उस घर का मालिक जिस के सपुर्द यह चीज़ें की गई थीं अल्लाह के हुज़ूर खड़ा हो ताकि मालूम किया जाए कि उस ने ख़ुद यह माल चोरी किया है या नहीं। {22:9} हो सकता है कि दो लोगों का आपस में झगड़ा हो, और दोनों किसी चीज़ के बारे में दावा करते हों कि यह मेरी है। अगर कोई क़ीमती चीज़ हो मसलन बैल, गधा, भेड़, बकरी, कपड़े या कोई खोई हुई चीज़ तो मुआमला अल्लाह के हुज़ूर लाया जाए। जिसे अल्लाह क़ुसूरवार क़रार दे उसे दूसरे को ज़ेर-ए-बह्स चीज़ की दुगनी क़ीमत अदा करनी है। {22:10} हो सकता है कि किसी ने अपना कोई गधा, बैल, भेड़, बकरी या कोई और जानवर किसी वाक़िफ़कार के सपुर्द कर दिया ताकि वह उसे मह्फ़ूज़ रखे। वहाँ जानवर मर जाए या ज़ख़्मी हो जाए, या कोई उस पर क़ब्ज़ा करके उसे उस वक़्त ले जाए जब कोई न देख रहा हो। {22:11} यह मुआमला यूँ हल किया जाए कि जिस के सपुर्द जानवर किया गया था वह रब के हुज़ूर क़सम खा कर कहे कि मैं ने अपने वाक़िफ़कार के जानवर के लालच में यह काम नहीं किया। जानवर के मालिक को यह क़बूल करना पड़ेगा, और दूसरे को इस के बदले कुछ नहीं देना होगा। {22:12} लेकिन अगर वाक़ई जानवर को चोरी किया गया है तो जिस के सपुर्द जानवर किया गया था उसे उस की क़ीमत अदा करनी पड़ेगी। {22:13} अगर किसी जंगली जानवर ने उसे फाड़ डाला हो तो वह सबूत के तौर पर फाड़ी हुई लाश को ले आए। फिर उसे उस की क़ीमत अदा नहीं करनी पड़ेगी। {22:14} हो सकता है कि कोई अपने वाक़िफ़कार से इजाज़त ले कर उस का जानवर इस्तेमाल करे। अगर जानवर को मालिक की ग़ैरमौजूदगी में चोट लगे या वह मर जाए तो उस शख़्स को जिस के पास जानवर उस वक़्त था उस का मुआवज़ा देना पड़ेगा। {22:15} लेकिन अगर जानवर का मालिक उस वक़्त साथ था तो दूसरे को मुआवज़ा देने की ज़रूरत नहीं होगी। अगर उस ने जानवर को किराए पर लिया हो तो उस का नुक़्सान किराए से पूरा हो जाएगा। {i22:16} लड़की को वरग़लाने का जुर्म {22:16} अगर किसी कुंवारी की मंगनी नहीं हुई और कोई मर्द उसे वरग़ला कर उस से हमबिसतर हो जाए तो वह महर दे कर उस से शादी करे। {22:17} लेकिन अगर लड़की का बाप उस की उस मर्द के साथ शादी करने से इन्कार करे, इस सूरत में भी मर्द को कुंवारी के लिए मुक़र्ररा रक़म देनी पड़ेगी। {i22:18} सज़ा-ए-मौत के लाइक़ जराइम {22:18} जादूगरनी को जीने न देना। {22:19} जो शख़्स किसी जानवर के साथ जिन्सी ताल्लुक़ात रखता हो उसे सज़ा-ए-मौत दी जाए। {22:20} जो न सिर्फ़ रब को क़ुर्बानियाँ पेश करे बल्कि दीगर माबूदों को भी उसे क़ौम से निकाल कर हलाक किया जाए। {i22:21} कमज़ोरों की हिफ़ाज़त के लिए अह्काम {22:21} जो परदेसी तेरे मुल्क में मेहमान है उसे न दबाना और न उस से बुरा सुलूक करना, क्यूँकि तुम भी मिस्र में परदेसी थे। {22:22} किसी बेवा या यतीम से बुरा सुलूक न करना। {22:23} अगर तू ऐसा करे और वह चिल्ला कर मुझ से फ़र्याद करें तो मैं ज़रूर उन की सुनूँगा। {22:24} मैं बड़े ग़ुस्से में आ कर तुम्हें तलवार से मार डालूँगा। फिर तुम्हारी बीवियाँ ख़ुद बेवाएँ और तुम्हारे बच्चे ख़ुद यतीम बन जाएंगे। {22:25} अगर तू ने मेरी क़ौम के किसी ग़रीब को क़र्ज़ दिया है तो उस से सूद न लेना। {22:26} अगर तुझे किसी से उस की चादर गिरवी के तौर पर मिली हो तो उसे सूरज डूबने से पहले ही वापस कर देना है, {22:27} क्यूँकि इसी को वह सोने के लिए इस्तेमाल करता है। वर्ना वह क्या चीज़ ओढ़ कर सोएगा? अगर तू चादर वापस न करे और वह शख़्स चिल्ला कर मुझ से फ़र्याद करे तो मैं उस की सुनूँगा, क्यूँकि मैं मेहरबान हूँ। {i22:28} अल्लाह से मुताल्लिक़ फ़राइज़ {22:28} अल्लाह को न कोसना, न अपनी क़ौम के किसी सरदार पर लानत करना। {22:29} मुझे वक़्त पर अपने खेत और कोल्हूओं की पैदावार में से नज़राने पेश करना। अपने पहलौठे मुझे देना। {22:30} अपने बैलों, भेड़ों और बकरियों के पहलौठों को भी मुझे देना। जानवर का पहलौठा पहले सात दिन अपनी माँ के साथ रहे। आठवें दिन वह मुझे दिया जाए। {22:31} अपने आप को मेरे लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस रखना। इस लिए ऐसे जानवर का गोश्त मत खाना जिसे किसी जंगली जानवर ने फाड़ डाला है। ऐसे गोश्त को कुत्तों को खाने देना। {i23:1} अदालत में इन्साफ़ और दूसरों से मुहब्बत {23:1} ग़लत अफ़्वाहें न फैलाना। किसी शरीर आदमी का साथ दे कर झूटी गवाही देना मना है। {23:2} अगर अक्सरियत ग़लत काम कर रही हो तो उस के पीछे न हो लेना। अदालत में गवाही देते वक़्त अक्सरियत के साथ मिल कर ऐसी बात न करना जिस से ग़लत फ़ैसला किया जाए। {23:3} लेकिन अदालत में किसी ग़रीब की तरफ़दारी भी न करना। {23:4} अगर तुझे तेरे दुश्मन का बैल या गधा आवारा फिरता हुआ नज़र आए तो उसे हर सूरत में वापस कर देना। {23:5} अगर तुझ से नफ़रत करने वाले का गधा बोझ तले गिर गया हो और तुझे पता लगे तो उसे न छोड़ना बल्कि ज़रूर उस की मदद करना। {23:6} अदालत में ग़रीब के हुक़ूक़ न मारना। {23:7} ऐसे मुआमले से दूर रहना जिस में लोग झूट बोलते हैं। जो बेगुनाह और हक़ पर है उसे सज़ा-ए-मौत न देना, क्यूँकि मैं क़ुसूरवार को हक़-ब-जानिब नहीं ठहराऊँगा। {23:8} रिश्वत न लेना, क्यूँकि रिश्वत देखने वाले को अंधा कर देती है और उस की बात बनने नहीं देती जो हक़ पर है। {23:9} जो परदेसी तेरे मुल्क में मेहमान है उस पर दबाओ न डालना। तुम ऐसे लोगों की हालत से ख़ूब वाक़िफ़ हो, क्यूँकि तुम ख़ुद मिस्र में परदेसी रहे हो। {i23:10} सबत का साल और सबत {23:10} छः साल तक अपनी ज़मीन में बीज बो कर उस की पैदावार जमा करना। {23:11} लेकिन सातवें साल ज़मीन को इस्तेमाल न करना बल्कि उसे पड़े रहने देना। जो कुछ भी उगे वह क़ौम के ग़रीब लोग खाएँ। जो उन से बच जाए उसे जंगली जानवर खाएँ। अपने अंगूर और ज़ैतून के बाग़ों के साथ भी ऐसा ही करना है। {23:12} छः दिन अपना काम-काज करना, लेकिन सातवें दिन आराम करना। फिर तेरा बैल और तेरा गधा भी आराम कर सकेंगे, तेरी लौंडी का बेटा और तेरे साथ रहने वाला परदेसी भी ताज़ादम हो जाएंगे। {23:13} जो भी हिदायत मैं ने दी है उस पर अमल कर। दीगर माबूदों की परस्तिश न करना। मैं तेरे मुँह से उन के नामों तक का ज़िक्र न सुनूँ। {i23:14} तीन ख़ास ईदें {23:14} साल में तीन दफ़ा मेरी ताज़ीम में ईद मनाना। {23:15} पहले, बेख़मीरी रोटी की ईद मनाना। अबीब के महीने में सात दिन तक तेरी रोटी में ख़मीर न हो जिस तरह मैं ने हुक्म दिया है, क्यूँकि इस महीने में तू मिस्र से निकला। इन दिनों में कोई मेरे हुज़ूर ख़ाली हाथ न आए। {23:16} दूसरे, फ़सलकटाई की ईद उस वक़्त मनाना जब तू अपने खेत में बोई हुई पहली फ़सल काटेगा। तीसरे, जमा करने की ईद फ़सल की कटाई के इख़तिताम पर मनाना है जब तू ने अंगूर और बाक़ी बाग़ों के फल जमा किए होंगे। {23:17} यूँ तेरे तमाम मर्द तीन मर्तबा रब क़ादिर-ए-मुतलक़ के हुज़ूर हाज़िर हुआ करें। {23:18} जब तू किसी जानवर को ज़बह करके क़ुर्बानी के तौर पर पेश करे तो उस के ख़ून के साथ ऐसी रोटी पेश न करना जिस में ख़मीर हो। और जो जानवर तू मेरी ईदों पर चढ़ाए उन की चर्बी अगली सुब्ह तक बाक़ी न रहे। {23:19} अपनी ज़मीन की पहली पैदावार का बेहतरीन हिस्सा रब अपने ख़ुदा के घर में लाना। भेड़ या बकरी के बच्चे को उस की माँ के दूध में न पकाना। {i23:20} रब का फ़रिश्ता राहनुमाई करेगा {23:20} मैं तेरे आगे आगे फ़रिश्ता भेजता हूँ जो रास्ते में तेरी हिफ़ाज़त करेगा और तुझे उस जगह तक ले जाएगा जो मैं ने तेरे लिए तय्यार की है। {23:21} उस की मौजूदगी में एहतियात बरतना। उस की सुनना, और उस की ख़िलाफ़वरज़ी न करना। अगर तू सरकश हो जाए तो वह तुझे मुआफ़ नहीं करेगा, क्यूँकि मेरा नाम उस में हाज़िर होगा। {23:22} लेकिन अगर तू उस की सुने और सब कुछ करे जो मैं तुझे बताता हूँ तो मैं तेरे दुश्मनों का दुश्मन और तेरे मुख़ालिफ़ों का मुख़ालिफ़ हूँगा। {23:23} क्यूँकि मेरा फ़रिश्ता तेरे आगे आगे चलेगा और तुझे मुल्क-ए-कनआन तक पहुँचा देगा जहाँ अमोरी, हित्ती, फ़रिज़्ज़ी, कनआनी, हिव्वी और यबूसी आबाद हैं। तब मैं उन्हें रू-ए-ज़मीन पर से मिटा दूँगा। {23:24} उन के माबूदों को सिज्दा न करना, न उन की ख़िदमत करना। उन के रस्म-ओ-रिवाज भी न अपनाना बल्कि उन के बुतों को तबाह कर देना। जिन सतूनों के सामने वह इबादत करते हैं उन को भी टुकड़े टुकड़े कर डालना। {23:25} रब अपने ख़ुदा की ख़िदमत करना। फिर मैं तेरी ख़ुराक और पानी को बरकत दे कर तमाम बीमारियाँ तुझ से दूर करूँगा। {23:26} फिर तेरे मुल्क में न किसी का बच्चा ज़ाए होगा, न कोई बाँझ होगी। साथ ही मैं तुझे तवील ज़िन्दगी अता करूँगा। {23:27} मैं तेरे आगे आगे दह्शत फैलाऊँगा। जहाँ भी तू जाएगा वहाँ मैं तमाम क़ौमों में अब्तरी पैदा करूँगा। मेरे सबब से तेरे सारे दुश्मन पलट कर भाग जाएंगे। {23:28} मैं तेरे आगे ज़म्बूर भेज दूँगा जो हिव्वी, कनआनी और हित्ती को मुल्क छोड़ने पर मज्बूर करेंगे। {23:29} लेकिन जब तू वहाँ पहुँचेगा तो मैं उन्हें एक ही साल में मुल्क से नहीं निकालूँगा। वर्ना पूरा मुल्क वीरान हो जाएगा और जंगली जानवर फैल कर तेरे लिए नुक़्सान का बाइस बन जाएंगे। {23:30} इस लिए मैं तेरे पहुँचने पर मुल्क के बाशिन्दों को थोड़ा थोड़ा करके निकालता जाऊँगा। इतने में तेरी तादाद बढ़ेगी और तू रफ़्ता रफ़्ता मुल्क पर क़ब्ज़ा कर सकेगा। {23:31} मैं तेरी सरहद्दें मुक़र्रर करूँगा। बहर-ए-क़ुल्ज़ुम एक हद होगी और फ़िलिस्तियों का समुन्दर दूसरी, जुनूब का रेगिस्तान एक होगी और दरया-ए-फ़ुरात दूसरी। मैं मुल्क के बाशिन्दों को तेरे क़ब्ज़े में कर दूँगा, और तू उन्हें अपने आगे आगे मुल्क से दूर करता जाएगा। {23:32} लाज़िम है कि तू उन के साथ या उन के माबूदों के साथ अह्द न बांधे। {23:33} उन का तेरे मुल्क में रहना मना है, वर्ना तू उन के सबब से मेरा गुनाह करेगा। अगर तू उन के माबूदों की इबादत करेगा तो यह तेरे लिए फंदा बन जाएगा’।” {i24:1} रब इस्राईल से अह्द बांधता है {24:1} रब ने मूसा से कहा, “तू, हारून, नदब, अबीहू और इस्राईल के 70 बुज़ुर्ग मेरे पास ऊपर आएँ। कुछ फ़ासिले पर खड़े हो कर मुझे सिज्दा करो। {24:2} सिर्फ़ तू अकेला ही मेरे क़रीब आ, दूसरे दूर रहें। और क़ौम के बाक़ी लोग तेरे साथ पहाड़ पर न चढ़ें।” {24:3} तब मूसा ने क़ौम के पास जा कर रब की तमाम बातें और अह्काम पेश किए। जवाब में सब ने मिल कर कहा, “हम रब की इन तमाम बातों पर अमल करेंगे।” {24:4} तब मूसा ने रब की तमाम बातें लिख लीं। अगले दिन वह सुब्ह-सवेरे उठा और पहाड़ के पास गया। उस के दामन में उस ने क़ुर्बानगाह बनाई। साथ ही उस ने इस्राईल के हर एक क़बीले के लिए एक एक पत्थर का सतून खड़ा किया। {24:5} फिर उस ने कुछ इस्राईली नौजवानों को क़ुर्बानी पेश करने के लिए बुलाया ताकि वह रब की ताज़ीम में भस्म होने वाली क़ुर्बानियाँ चढ़ाएँ और जवान बैलों को सलामती की क़ुर्बानी के तौर पर पेश करें। {24:6} मूसा ने क़ुर्बानियों का ख़ून जमा किया। उस का आधा हिस्सा उस ने बासनों में डाल दिया और आधा हिस्सा क़ुर्बानगाह पर छिड़क दिया। {24:7} फिर उस ने वह किताब ली जिस में रब के साथ अह्द की तमाम शराइत दर्ज थीं और उसे क़ौम को पढ़ कर सुनाया। जवाब में उन्हों ने कहा, “हम रब की इन तमाम बातों पर अमल करेंगे। हम उस की सुनेंगे।” {24:8} इस पर मूसा ने बासनों में से ख़ून ले कर उसे लोगों पर छिड़का और कहा, “यह ख़ून उस अह्द की तस्दीक़ करता है जो रब ने तुम्हारे साथ किया है और जो उस की तमाम बातों पर मब्नी है।” {24:9} इस के बाद मूसा, हारून, नदब, अबीहू और इस्राईल के 70 बुज़ुर्ग सीना पहाड़ पर चढ़े। {24:10} वहाँ उन्हों ने इस्राईल के ख़ुदा को देखा। लगता था कि उस के पाँओ के नीचे संग-ए-लाजवर्द का सा तख़्ता था। वह आसमान की मानिन्द साफ़-ओ-शफ़्फ़ाफ़ था। {24:11} अगरचे इस्राईल के राहनुमाओं ने यह सब कुछ देखा तो भी रब ने उन्हें हलाक न किया, बल्कि वह अल्लाह को देखते रहे और उस के हुज़ूर अह्द का खाना खाते और पीते रहे। {i24:12} पत्थर की तख़्तियाँ {24:12} पहाड़ से उतरने के बाद रब ने मूसा से कहा, “मेरे पास पहाड़ पर आ कर कुछ देर के लिए ठहरे रहना। मैं तुझे पत्थर की तख़्तियाँ दूँगा जिन पर मैं ने अपनी शरीअत और अह्काम लिखे हैं और जो इस्राईल की तालीम-ओ-तर्बियत के लिए ज़रूरी हैं।” {24:13} मूसा अपने मददगार यशूअ के साथ चल पड़ा और अल्लाह के पहाड़ पर चढ़ गया। {24:14} पहले उस ने बुज़ुर्गों से कहा, “हमारी वापसी के इन्तिज़ार में यहाँ ठहरे रहो। हारून और हूर तुम्हारे पास रहेंगे। कोई भी मुआमला हो तो लोग उन ही के पास जाएँ।” {i24:15} मूसा रब से मिलता है {24:15} जब मूसा चढ़ने लगा तो पहाड़ पर बादल छा गया। {24:16} रब का जलाल कोह-ए-सीना पर उतर आया। छः दिन तक बादल उस पर छाया रहा। सातवें दिन रब ने बादल में से मूसा को बुलाया। {24:17} रब का जलाल इस्राईलियों को भी नज़र आता था। उन्हें यूँ लगा जैसा कि पहाड़ की चोटी पर तेज़ आग भड़क रही हो। {24:18} चढ़ते चढ़ते मूसा बादल में दाख़िल हुआ। वहाँ वह चालीस दिन और चालीस रात रहा। {i25:1} मुलाक़ात का ख़ैमा बनाने के लिए हदिए {25:1} रब ने मूसा से कहा, {25:2} “इस्राईलियों को बता कि वह हदिए ला कर मुझे उठाने वाली क़ुर्बानी के तौर पर पेश करें। लेकिन सिर्फ़ उन से हदिए क़बूल करो जो दिली ख़ुशी से दें। {25:3} उन से यह चीज़ें हदिए के तौर पर क़बूल करो: सोना, चाँदी, पीतल; {25:4} नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग का धागा, बारीक कतान, बकरी के बाल, {25:5} मेंढों की सुर्ख़ रंगी हुई खालें, तख़स की खालें, कीकर की लकड़ी, {25:6} शमादान के लिए ज़ैतून का तेल, मसह करने के लिए तेल और ख़ुश्बूदार बख़ूर के लिए मसाले, {25:7} अक़ीक़-ए-अह्मर और दीगर जवाहिर जो इमाम-ए-आज़म के बालापोश और सीने के कीसे में जड़े जाएंगे। {25:8} इन चीज़ों से लोग मेरे लिए मक़्दिस बनाएँ ताकि मैं उन के दरमियान रहूँ। {25:9} मैं तुझे मक़्दिस और उस के तमाम सामान का नमूना दिखाऊँगा, क्यूँकि तुम्हें सब कुछ ऐन उसी के मुताबिक़ बनाना है। {i25:10} अह्द का सन्दूक़ {25:10} लोग कीकर की लकड़ी का सन्दूक़ बनाएँ। उस की लम्बाई पौने चार फ़ुट हो जबकि उस की चौड़ाई और ऊँचाई सवा दो {25:11} दो फ़ुट हो। पूरे सन्दूक़ पर अन्दर और बाहर से ख़ालिस सोना चढ़ाना। ऊपर की सतह के इर्दगिर्द सोने की झालर लगाना। {25:12} सन्दूक़ को उठाने के लिए सोने के चार कड़े ढाल कर उन्हें सन्दूक़ के चारपाइयों पर लगाना। दोनों तरफ़ दो दो कड़े हों। {25:13} फिर कीकर की दो लकड़ियाँ सन्दूक़ को उठाने के लिए तय्यार करना। उन पर सोना चढ़ा कर {25:14} उन को दोनों तरफ़ के कड़ों में डालना ताकि उन से सन्दूक़ को उठाया जाए। {25:15} यह लकड़ियाँ सन्दूक़ के इन कड़ों में पड़ी रहें। उन्हें कभी भी दूर न किया जाए। {25:16} सन्दूक़ में शरीअत की वह दो तख़्तियाँ रखना जो मैं तुझे दूँगा। {25:17} सन्दूक़ का ढकना ख़ालिस सोने का बनाना। उस की लम्बाई पौने चार फ़ुट और चौड़ाई सवा दो फ़ुट हो। उस का नाम कफ़्फ़ारे का ढकना है। {25:18} सोने से घड़ कर दो करूबी फ़रिश्ते बनाए जाएँ जो ढकने के दोनों सिरों {25:19} पर खड़े हों। यह दो फ़रिश्ते और ढकना एक ही टुकड़े से बनाने हैं। {25:20} फ़रिश्तों के पर यूँ ऊपर की तरफ़ फैले हुए हों कि वह ढकने को पनाह दें। उन के मुँह एक दूसरे की तरफ़ किए हुए हों, और वह ढकने की तरफ़ देखें। {25:21} ढकने को सन्दूक़ पर लगा, और सन्दूक़ में शरीअत की वह दो तख़्तियाँ रख जो मैं तुझे दूँगा। {25:22} वहाँ ढकने के ऊपर दोनों फ़रिश्तों के दरमियान से मैं अपने आप को तुझ पर ज़ाहिर करके तुझ से हमकलाम हूँगा और तुझे इस्राईलियों के लिए तमाम अह्काम दूँगा। {i25:23} मख़्सूस रोटियों की मेज़ {25:23} कीकर की लकड़ी की मेज़ बनाना। उस की लम्बाई तीन फ़ुट, चौड़ाई डेढ़ फ़ुट और ऊँचाई सवा दो फ़ुट हो। {25:24} उस पर ख़ालिस सोना चढ़ाना, और उस के इर्दगिर्द सोने की झालर लगाना। {25:25} मेज़ की ऊपर की सतह पर चौखटा लगाना जिस की ऊँचाई तीन इंच हो और जिस पर सोने की झालर लगी हो। {25:26} सोने के चार कड़े ढाल कर उन्हें चारों कोनों पर लगाना जहाँ मेज़ के पाए लगे हैं। {25:27} यह कड़े मेज़ की सतह पर लगे चौखटे के नीचे लगाए जाएँ। उन में वह लकड़ियाँ डालनी हैं जिन से मेज़ को उठाया जाएगा। {25:28} यह लकड़ियाँ भी कीकर की हों और उन पर सोना चढ़ाया जाए। उन से मेज़ को उठाना है। {25:29} उस के थाल, प्याले, मर्तबान और मै की नज़रें पेश करने के बर्तन ख़ालिस सोने से बनाना है। {25:30} मेज़ पर वह रोटियाँ हर वक़्त मेरे हुज़ूर पड़ी रहें जो मेरे लिए मख़्सूस हैं। {i25:31} शमादान {25:31} ख़ालिस सोने का शमादान भी बनाना। उस का पाया और डंडी घड़ कर बनाना है। उस की प्यालियाँ जो फूलों और कलियों की शक्ल की होंगी पाए और डंडी के साथ एक ही टुकड़ा हों। {25:32} डंडी से दाईं और बाईं तरफ़ तीन तीन शाख़ें निकलें। {25:33} हर शाख़ पर तीन प्यालियाँ लगी हों जो बादाम की कलियों और फूलों की शक्ल की हों। {25:34} शमादान की डंडी पर भी इस क़िस्म की प्यालियाँ लगी हों, लेकिन तादाद में चार। {25:35} इन में से तीन प्यालियाँ दाएँ बाएँ की छः शाख़ों के नीचे लगी हों। वह यूँ लगी हों कि हर प्याली से दो शाख़ें निकलें। {25:36} शाख़ें और प्यालियाँ बल्कि पूरा शमादान ख़ालिस सोने के एक ही टुकड़े से घड़ कर बनाना है। {25:37} शमादान के लिए सात चराग़ बना कर उन्हें यूँ शाख़ों पर रखना कि वह सामने की जगह रौशन करें। {25:38} बत्ती कतरने की क़ैंचियाँ और जलते कोएले के लिए छोटे बर्तन भी ख़ालिस सोने से बनाए जाएँ। {25:39} शमादान और उस सारे सामान के लिए पूरे 34 किलोग्राम ख़ालिस सोना इस्तेमाल किया जाए। {25:40} ग़ौर कर कि सब कुछ ऐन उस नमूने के मुताबिक़ बनाया जाए जो मैं तुझे यहाँ पहाड़ पर दिखाता हूँ। {i26:1} मुलाक़ात का ख़ैमा {26:1} मुक़द्दस ख़ैमे के लिए दस पर्दे बनाना। उन के लिए बारीक कतान और नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग का धागा इस्तेमाल करना। पर्दों में किसी माहिर कारीगर के कढ़ाई के काम से करूबी फ़रिश्तों का डिज़ाइन बनवाना। {26:2} हर पर्दे की लम्बाई 42 फ़ुट और चौड़ाई 6 फ़ुट हो। {26:3} पाँच पर्दों के लम्बे हाशिए एक दूसरे के साथ जोड़े जाएँ और इसी तरह बाक़ी पाँच भी। यूँ दो बड़े टुकड़े बन जाएंगे। {26:4} दोनों टुकड़ों को एक दूसरे के साथ मिलाने के लिए नीले धागे के हल्क़े बनाना। यह हल्क़े हर टुकड़े के 42 फ़ुट वाले एक किनारे पर लगाए जाएँ, {26:5} एक टुकड़े के हाशिए पर 50 हल्क़े और दूसरे पर भी उतने ही हल्क़े। इन दो हाशियों के हल्क़े एक दूसरे के आमने-सामने हों। {26:6} फिर सोने की 50 हुकें बना कर उन से आमने-सामने के हल्क़े एक दूसरे के साथ मिलाना। यूँ दोनों टुकड़े जुड़ कर ख़ैमे का काम देंगे। {26:7} बकरी के बालों से भी 11 पर्दे बनाना जिन्हें कपड़े वाले ख़ैमे के ऊपर रखा जाए। {26:8} हर पर्दे की लम्बाई 45 फ़ुट और चौड़ाई 6 फ़ुट हो। {26:9} पाँच पर्दों के लम्बे हाशिए एक दूसरे के साथ जोड़े जाएँ और इसी तरह बाक़ी छः भी। इन छः पर्दों के छटे पर्दे को एक दफ़ा तह करना। यह सामने वाले हिस्से से लटके। {26:10} बकरी के बाल के इन दोनों टुकड़ों को भी मिलाना है। इस के लिए हर टुकड़े के 45 फ़ुट वाले एक किनारे पर पचास पचास हल्क़े लगाना। {26:11} फिर पीतल की 50 हुकें बना कर उन से दोनों हिस्से मिलाना। {26:12} जब बकरियों के बालों का यह ख़ैमा कपड़े के ख़ैमे के ऊपर लगाया जाएगा तो आधा पर्दा बाक़ी रहेगा। वह ख़ैमे की पिछली तरफ़ लटका रहे। {26:13} ख़ैमे के दाईं और बाईं तरफ़ बकरी के बालों का ख़ैमा कपड़े के ख़ैमे की निस्बत डेढ़ डेढ़ फ़ुट लम्बा होगा। यूँ वह दोनों तरफ़ लटके हुए कपड़े के ख़ैमे को मह्फ़ूज़ रखेगा। {26:14} एक दूसरे के ऊपर के इन दोनों ख़ैमों की हिफ़ाज़त के लिए दो ग़िलाफ़ बनाने हैं। बकरी के बालों के ख़ैमे पर मेंढों की सुर्ख़ रंगी हुई खालें जोड़ कर रखी जाएँ और उन पर तख़स की खालें मिला कर रखी जाएँ। {26:15} कीकर की लकड़ी के तख़्ते बनाना जो खड़े किए जाएँ ताकि ख़ैमे की दीवारों का काम दें। {26:16} हर तख़्ते की ऊँचाई 15 फ़ुट हो और चौड़ाई सवा दो फ़ुट। {26:17} हर तख़्ते के नीचे दो दो चूलें हों। यह चूलें हर तख़्ते को उस के पाइयों के साथ जोड़ेंगी ताकि तख़्ता खड़ा रहे। {26:18} ख़ैमे की जुनूबी दीवार के लिए 20 तख़्तों की ज़रूरत है {26:19} और साथ ही चाँदी के 40 पाइयों की। उन पर तख़्ते खड़े किए जाएंगे। हर तख़्ते के नीचे दो पाए होंगे, और हर पाए में एक चूल लगेगी। {26:20} इसी तरह ख़ैमे की शिमाली दीवार के लिए भी 20 तख़्तों की ज़रूरत है {26:21} और साथ ही चाँदी के 40 पाइयों की। वह भी तख़्तों को खड़ा करने के लिए हैं। हर तख़्ते के नीचे दो पाए होंगे। {26:22} ख़ैमे की पिछली यानी मग़रिबी दीवार के लिए छः तख़्ते बनाना। {26:23} इस दीवार को शिमाली और जुनूबी दीवारों के साथ जोड़ने के लिए कोने वाले दो तख़्ते बनाना। {26:24} इन दो तख़्तों में नीचे से ले कर ऊपर तक कोना हो ताकि एक से शिमाली दीवार मग़रिबी दीवार के साथ जुड़ जाए और दूसरे से जुनूबी दीवार मग़रिबी दीवार के साथ। इन के ऊपर के सिरे कड़ों से मज़बूत किए जाएँ। {26:25} यूँ पिछले यानी मग़रिबी तख़्तों की पूरी तादाद 8 होगी और इन के लिए चाँदी के पाइयों की तादाद 16, हर तख़्ते के नीचे दो दो पाए होंगे। {26:26} इस के इलावा कीकर की लकड़ी के शहतीर बनाना, तीनों दीवारों के लिए पाँच पाँच शहतीर। {26:27} वह हर दीवार के तख़्तों पर यूँ लगाए जाएँ कि वह उन्हें एक दूसरे के साथ मिलाएँ। {26:28} दरमियानी शहतीर दीवार की आधी ऊँचाई पर दीवार के एक सिरे से दूसरे सिरे तक लगाया जाए। {26:29} शहतीरों को तख़्तों के साथ लगाने के लिए सोने के कड़े बना कर तख़्तों में लगाना। तमाम तख़्तों और शहतीरों पर सोना चढ़ाना। {26:30} पूरे मुक़द्दस ख़ैमे को उसी नमूने के मुताबिक़ बनाना जो मैं तुझे पहाड़ पर दिखाता हूँ। {i26:31} मुक़द्दस ख़ैमे के पर्दे {26:31} अब एक और पर्दा बनाना। इस के लिए भी बारीक कतान और नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग का धागा इस्तेमाल करना। उस पर भी किसी माहिर कारीगर के कढ़ाई के काम से करूबी फ़रिश्तों का डिज़ाइन बनवाना। {26:32} इसे सोने की हुकों से कीकर की लकड़ी के चार सतूनों से लटकाना। इन सतूनों पर सोना चढ़ाया जाए और वह चाँदी के पाइयों पर खड़े हों। {26:33} यह पर्दा मुक़द्दस कमरे को मुक़द्दसतरीन कमरे से अलग करेगा जिस में अह्द का सन्दूक़ पड़ा रहेगा। पर्दे को लटकाने के बाद उस के पीछे मुक़द्दसतरीन कमरे में अह्द का सन्दूक़ रखना। {26:34} फिर अह्द के सन्दूक़ पर कफ़्फ़ारे का ढकना रखना। {26:35} जिस मेज़ पर मेरे लिए मख़्सूस की गई रोटियाँ पड़ी रहती हैं वह पर्दे के बाहर मुक़द्दस कमरे में शिमाल की तरफ़ रखी जाए। उस के मुक़ाबिल जुनूब की तरफ़ शमादान रखा जाए। {26:36} फिर ख़ैमे के दरवाज़े के लिए भी पर्दा बनाया जाए। इस के लिए भी बारीक कतान और नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग का धागा इस्तेमाल किया जाए। इस पर कढ़ाई का काम किया जाए। {26:37} इस पर्दे को सोने की हुकों से कीकर की लकड़ी के पाँच सतूनों से लटकाना। इन सतूनों पर भी सोना चढ़ाया जाए, और वह पीतल के पाइयों पर खड़े हों। {i27:1} जानवरों को चढ़ाने की क़ुर्बानगाह {27:1} कीकर की लकड़ी की क़ुर्बानगाह बनाना। उस की ऊँचाई साढ़े चार फ़ुट हो जबकि उस की लम्बाई और चौड़ाई साढ़े सात सात फ़ुट हो। {27:2} उस के ऊपर चारों कोनों में से एक एक सींग निकले। सींग और क़ुर्बानगाह एक ही टुकड़े के हों। सब पर पीतल चढ़ाना। {27:3} उस का तमाम साज़-ओ-सामान और बर्तन भी पीतल के हों यानी राख को उठा कर ले जाने की बालटियाँ, बेलचे, काँटे, जलते हुए कोएले के लिए बर्तन और छिड़काओ के कटोरे। {27:4} क़ुर्बानगाह को उठाने के लिए पीतल का जंगला बनाना जो ऊपर से खुला हो। जंगले के चारों कोनों पर कड़े लगाए जाएँ। {27:5} क़ुर्बानगाह की आधी ऊँचाई पर किनारा लगाना, और क़ुर्बानगाह को जंगले में इस किनारे तक रखा जाए। {27:6} उसे उठाने के लिए कीकर की दो लकड़ियाँ बनाना जिन पर पीतल चढ़ाना है। {27:7} उन को क़ुर्बानगाह के दोनों तरफ़ के कड़ों में डाल देना। {27:8} पूरी क़ुर्बानगाह लकड़ी की हो, लेकिन अन्दर से खोखली हो। उसे ऐन उस नमूने के मुताबिक़ बनाना जो मैं तुझे पहाड़ पर दिखाता हूँ। {i27:9} ख़ैमे का सहन {27:9} मुक़द्दस ख़ैमे के लिए सहन बनाना। उस की चारदीवारी बारीक कतान के कपड़े से बनाई जाए। चारदीवारी की लम्बाई जुनूब की तरफ़ 150 फ़ुट हो। {27:10} कपड़े को चाँदी की हुकों और पट्टियों से लकड़ी के 20 खम्बों के साथ लगाया जाए। हर खम्बा पीतल के पाए पर खड़ा हो। {27:11} चारदीवारी शिमाल की तरफ़ भी इसी की मानिन्द हो। {27:12} ख़ैमे के पीछे मग़रिब की तरफ़ चारदीवारी की चौड़ाई 75 फ़ुट हो और कपड़ा लकड़ी के 10 खम्बों के साथ लगाया जाए। यह खम्बे भी पीतल के पाइयों पर खड़े हों। {27:13} सामने, मशरिक़ की तरफ़ जहाँ से सूरज तुलू होता है चारदीवारी की चौड़ाई भी 75 फ़ुट हो। {27:14} यहाँ चारदीवारी का दरवाज़ा हो। कपड़ा दरवाज़े के दाईं तरफ़ साढ़े 22 फ़ुट चौड़ा हो और उस के बाईं तरफ़ भी {27:15} उतना ही चौड़ा। उसे दोनों तरफ़ तीन तीन लकड़ी के खम्बों के साथ लगाया जाए जो पीतल के पाइयों पर खड़े हों। {27:16} दरवाज़े का पर्दा 30 फ़ुट चौड़ा बनाना। वह नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग के धागे और बारीक कतान से बनाया जाए, और उस पर कढ़ाई का काम हो। यह कपड़ा लकड़ी के चार खम्बों के साथ लगाया जाए। वह भी पीतल के पाइयों पर खड़े हों। {27:17} तमाम खम्बे पीतल के पाइयों पर खड़े हों और कपड़ा चाँदी की हुकों और पट्टियों से हर खम्बे के साथ लगाया जाए। {27:18} चारदीवारी की लम्बाई 150 फ़ुट, चौड़ाई 75 फ़ुट और ऊँचाई साढ़े 7 फ़ुट हो। खम्बों के तमाम पाए पीतल के हों। {27:19} जो भी साज़-ओ-सामान मुक़द्दस ख़ैमे में इस्तेमाल किया जाता है वह सब पीतल का हो। ख़ैमे और चारदीवारी की मेख़ें भी पीतल की हों। {i27:20} शमादान का तेल {27:20} इस्राईलियों को हुक्म देना कि वह तेरे पास कूटे हुए ज़ैतूनों का ख़ालिस तेल लाएँ ताकि मुक़द्दस कमरे के शमादान के चराग़ मुतवातिर जलते रहें। {27:21} हारून और उस के बेटे शमादान को मुलाक़ात के ख़ैमे के मुक़द्दस कमरे में रखें, उस पर्दे के सामने जिस के पीछे अह्द का सन्दूक़ है। उस में वह तेल डालते रहें ताकि वह रब के सामने शाम से ले कर सुब्ह तक जलता रहे। इस्राईलियों का यह उसूल अबद तक क़ाइम रहे। {i28:1} इमामों के लिबास {28:1} अपने भाई हारून और उस के बेटों नदब, अबीहू, इलीअज़र और इतमर को बुला। मैं ने उन्हें इस्राईलियों में से चुन लिया है ताकि वह इमामों की हैसियत से मेरी ख़िदमत करें। {28:2} अपने भाई हारून के लिए मुक़द्दस लिबास बनवाना जो पुरवक़ार और शानदार हों। {28:3} लिबास बनाने की ज़िम्मादारी उन तमाम लोगों को देना जो ऐसे कामों में माहिर हैं और जिन को मैं ने हिक्मत की रूह से भर दिया है। क्यूँकि जब हारून को मख़्सूस किया जाएगा और वह मुक़द्दस ख़ैमे की ख़िदमत सरअन्जाम देगा तो उसे इन कपड़ों की ज़रूरत होगी। {28:4} उस के लिए यह लिबास बनाने हैं: सीने का कीसा, बालापोश, चोग़ा, बुना हुआ ज़ेरजामा, पगड़ी और कमरबन्द। यह कपड़े अपने भाई हारून और उस के बेटों के लिए बनवाने हैं ताकि वह इमाम के तौर पर ख़िदमत कर सकें। {28:5} इन कपड़ों के लिए सोना और नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग का धागा और बारीक कतान इस्तेमाल किया जाए। {i28:6} हारून का बालापोश {28:6} बालापोश को भी सोने और नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग के धागे और बारीक कतान से बनाना है। उस पर किसी माहिर कारीगर से कढ़ाई का काम करवाया जाए। {28:7} उस की दो पट्टियाँ हों जो कंधों पर रख कर सामने और पीछे से बालापोश के साथ लगी हों। {28:8} इस के इलावा एक पटका बुनना है जिस से बालापोश को बांधा जाए और जो बालापोश के साथ एक टुकड़ा हो। उस के लिए भी सोना, नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग का धागा और बारीक कतान इस्तेमाल किया जाए। {28:9} फिर अक़ीक़-ए-अह्मर के दो पत्थर चुन कर उन पर इस्राईल के बारह बेटों के नाम कन्दा करना। {28:10} हर जौहर पर छः छः नाम उन की पैदाइश की तरतीब के मुताबिक़ कन्दा किए जाएँ। {28:11} यह नाम उस तरह जौहरों पर कन्दा किए जाएँ जिस तरह मुहर कन्दा की जाती है। फिर दोनों जौहर सोने के ख़ानों में जड़ कर {28:12} बालापोश की दो पट्टियों पर ऐसे लगाना कि कंधों पर आ जाएँ। जब हारून मेरे हुज़ूर आएगा तो जौहरों पर के यह नाम उस के कंधों पर होंगे और मुझे इस्राईलियों की याद दिलाएँगे। {28:13} सोने के ख़ाने बनाना {28:14} और ख़ालिस सोने की दो ज़न्जीरें जो डोरी की तरह गुंधी हुई हों। फिर इन दो ज़न्जीरों को सोने के ख़ानों के साथ लगाना। {i28:15} सीने का कीसा {28:15} सीने के लिए कीसा बनाना। उस में वह क़ुरए पड़े रहें जिन की मारिफ़त मेरी मर्ज़ी मालूम की जाएगी। माहिर कारीगर उसे उन ही चीज़ों से बनाए जिन से हारून का बालापोश बनाया गया है यानी सोने और नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग के धागे और बारीक कतान से। {28:16} जब कपड़े को एक दफ़ा तह किया गया हो तो कीसे की लम्बाई और चौड़ाई नौ नौ इंच हो। {28:17} उस पर चार क़तारों में जवाहिर जड़ना। हर क़तार में तीन तीन जौहर हों। पहली क़तार में लाल, ज़बर्जद और ज़ुमुर्रद। {28:18} दूसरी में फ़ीरोज़ा, संग-ए-लाजवर्द और हज्र-उल-क़मर। {28:19} तीसरी में ज़रक़ोन, अक़ीक़ और याक़ूत-ए-अर्ग़वानी। {28:20} चौथी में पुखराज, अक़ीक़-ए-अह्मर और यशब। हर जौहर सोने के ख़ाने में जड़ा हुआ हो। {28:21} यह बारह जवाहिर इस्राईल के बारह क़बीलों की नुमाइन्दगी करते हैं। एक एक जौहर पर एक क़बीले का नाम कन्दा किया जाए। यह नाम उस तरह कन्दा किए जाएँ जिस तरह मुहर कन्दा की जाती है। {28:22} सीने के कीसे पर ख़ालिस सोने की दो ज़न्जीरें लगाना जो डोरी की तरह गुंधी हुई हों। {28:23} उन्हें लगाने के लिए दो कड़े बना कर कीसे के ऊपर के दो कोनों पर लगाना। {28:24} अब दोनों ज़न्जीरें उन दो कड़ों से लगाना। {28:25} उन के दूसरे सिरे बालापोश की कंधों वाली पट्टियों के दो ख़ानों के साथ जोड़ देना, फिर सामने की तरफ़ लगाना। {28:26} कीसे के निचले दो कोनों पर भी सोने के दो कड़े लगाना। वह अन्दर, बालापोश की तरफ़ लगे हों। {28:27} अब दो और कड़े बना कर बालापोश की कंधों वाली पट्टियों पर लगाना। यह भी सामने की तरफ़ लगे हों लेकिन नीचे, बालापोश के पटके के ऊपर ही। {28:28} सीने के कीसे के निचले कड़े नीली डोरी से बालापोश के इन निचले कड़ों के साथ बांधे जाएँ। यूँ कीसा पटके के ऊपर अच्छी तरह सीने के साथ लगा रहेगा। {28:29} जब भी हारून मक़्दिस में दाख़िल हो कर रब के हुज़ूर आएगा वह इस्राईली क़बीलों के नाम अपने दिल पर सीने के कीसे की सूरत में साथ ले जाएगा। यूँ वह क़ौम की याद दिलाता रहेगा। {28:30} सीने के कीसे में दोनों क़ुरए बनाम ऊरीम और तुम्मीम रखे जाएँ। वह भी मक़्दिस में रब के सामने आते वक़्त हारून के दिल पर हों। यूँ जब हारून रब के हुज़ूर होगा तो रब की मर्ज़ी पूछने का वसीला हमेशा उस के दिल पर होगा। {i28:31} हारून का चोग़ा {28:31} चोग़ा भी बुनना। वह पूरी तरह नीले धागे से बनाया जाए। चोग़े को बालापोश से पहले पहना जाए। {28:32} उस के गरेबान को बुने हुए कालर से मज़बूत किया जाए ताकि वह न फटे। {28:33} नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग के धागे से अनार बना कर उन्हें चोग़े के दामन में लगा देना। उन के दरमियान सोने की घंटियाँ लगाना। {28:34} दामन में अनार और घंटियाँ बारी बारी लगाना। {28:35} हारून ख़िदमत करते वक़्त हमेशा चोग़ा पहने। जब वह मक़्दिस में रब के हुज़ूर आएगा और वहाँ से निकलेगा तो घंटियाँ सुनाई देंगी। फिर वह नहीं मरेगा। {i28:36} माथे पर छोटी तख़्ती, ज़ेरजामा और पगड़ी {28:36} ख़ालिस सोने की तख़्ती बना कर उस पर यह अल्फ़ाज़ कन्दा करना, ‘रब के लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस।’ यह अल्फ़ाज़ यूँ कन्दा किए जाएँ जिस तरह मुहर कन्दा की जाती है। {28:37} उसे नीली डोरी से पगड़ी के सामने वाले हिस्से से लगाया जाए {28:38} ताकि वह हारून के माथे पर पड़ी रहे। जब भी वह मक़्दिस में जाए तो यह तख़्ती साथ हो। जब इस्राईली अपने नज़राने ला कर रब के लिए मख़्सूस करें लेकिन किसी ग़लती के बाइस क़ुसूरवार हों तो उन का यह क़ुसूर हारून पर मुन्तक़िल होगा। इस लिए यह तख़्ती हर वक़्त उस के माथे पर हो ताकि रब इस्राईलियों को क़बूल कर ले। {28:39} ज़ेरजामे को बारीक कतान से बुनना और इस तरह पगड़ी भी। फिर कमरबन्द बनाना। उस पर कढ़ाई का काम किया जाए। {i28:40} बाक़ी लिबास {28:40} हारून के बेटों के लिए भी ज़ेरजामे, कमरबन्द और पगड़ियाँ बनाना ताकि वह पुरवक़ार और शानदार नज़र आएँ। {28:41} यह सब अपने भाई हारून और उस के बेटों को पहनाना। उन के सरों पर तेल उंडेल कर उन्हें मसह करना। यूँ उन्हें उन के उह्दे पर मुक़र्रर करके मेरी ख़िदमत के लिए मख़्सूस करना। {28:42} उन के लिए कतान के पाजामे भी बनाना ताकि वह ज़ेरजामे के नीचे नंगे न हों। उन की लम्बाई कमर से रान तक हो। {28:43} जब भी हारून और उस के बेटे मुलाक़ात के ख़ैमे में दाख़िल हों तो उन्हें यह पाजामे पहनने हैं। इसी तरह जब उन्हें मुक़द्दस कमरे में ख़िदमत करने के लिए क़ुर्बानगाह के पास आना होता है तो वह यह पहनें, वर्ना वह क़ुसूरवार ठहर कर मर जाएंगे। यह हारून और उस की औलाद के लिए एक अबदी उसूल है। {i29:1} इमामों की मख़्सूसियत {29:1} इमामों को मक़्दिस में मेरी ख़िदमत के लिए मख़्सूस करने का यह तरीक़ा है: एक जवान बैल और दो बेऐब मेंढे चुन लेना। {29:2} बेहतरीन मैदे से तीन क़िस्म की चीज़ें पकाना जिन में ख़मीर न हो। पहले, सादा रोटी। दूसरे, रोटी जिस में तेल डाला गया हो। तीसरे, रोटी जिस पर तेल लगाया गया हो। {29:3} यह चीज़ें टोकरी में रख कर जवान बैल और दो मेंढों के साथ रब को पेश करना। {29:4} फिर हारून और उस के बेटों को मुलाक़ात के ख़ैमे के दरवाज़े पर ला कर ग़ुसल कराना। {29:5} इस के बाद ज़ेरजामा, चोग़ा, बालापोश और सीने का कीसा ले कर हारून को पहनाना। बालापोश को उस के महारत से बुने हुए पटके के ज़रीए बांधना। {29:6} उस के सर पर पगड़ी बांध कर उस पर सोने की मुक़द्दस तख़्ती लगाना। {29:7} हारून के सर पर मसह का तेल उंडेल कर उसे मसह करना। {29:8} फिर उस के बेटों को आगे ला कर ज़ेरजामा पहनाना। {29:9} उन के पगड़ियाँ और कमरबन्द बांधना। यूँ तू हारून और उस के बेटों को उन के मन्सब पर मुक़र्रर करना। सिर्फ़ वह और उन की औलाद हमेशा तक मक़्दिस में मेरी ख़िदमत करते रहें। {29:10} बैल को मुलाक़ात के ख़ैमे के सामने लाना। हारून और उस के बेटे उस के सर पर अपने हाथ रखें। {29:11} उसे ख़ैमे के दरवाज़े के सामने रब के हुज़ूर ज़बह करना। {29:12} बैल के ख़ून में से कुछ ले कर अपनी उंगली से क़ुर्बानगाह के सींगों पर लगाना और बाक़ी ख़ून क़ुर्बानगाह के पाए पर उंडेल देना। {29:13} अंतड़ियों पर की तमाम चर्बी, जोड़कलेजी और दोनों गुर्दे उन की चर्बी समेत ले कर क़ुर्बानगाह पर जला देना। {29:14} लेकिन बैल के गोश्त, खाल और अंतड़ियों के गोबर को ख़ैमागाह के बाहर जला देना। यह गुनाह की क़ुर्बानी है। {29:15} इस के बाद पहले मेंढे को ले आना। हारून और उस के बेटे अपने हाथ मेंढे के सर पर रखें। {29:16} उसे ज़बह करके उस का ख़ून क़ुर्बानगाह के चार पहलूओं पर छिड़कना। {29:17} मेंढे को टुकड़े टुकड़े करके उस की अंतड़ियों और पिंडलियों को धोना। फिर उन्हें सर और बाक़ी टुकड़ों के साथ मिला कर {29:18} पूरे मेंढे को क़ुर्बानगाह पर जला देना। जलने वाली यह क़ुर्बानी रब के लिए भस्म होने वाली क़ुर्बानी है, और उस की ख़ुश्बू रब को पसन्द है। {29:19} अब दूसरे मेंढे को ले आना। हारून और उस के बेटे अपने हाथ मेंढे के सर पर रखें। {29:20} उस को ज़बह करना। उस के ख़ून में से कुछ ले कर हारून और उस के बेटों के दहने कान की लौ पर लगाना। इसी तरह ख़ून को उन के दहने हाथ और दहने पाँओ के अंगूठों पर भी लगाना। बाक़ी ख़ून क़ुर्बानगाह के चार पहलूओं पर छिड़कना। {29:21} जो ख़ून क़ुर्बानगाह पर पड़ा है उस में से कुछ ले कर और मसह के तेल के साथ मिला कर हारून और उस के कपड़ों पर छिड़कना। इसी तरह उस के बेटों और उन के कपड़ों पर भी छिड़कना। यूँ वह और उस के बेटे ख़िदमत के लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस हो जाएंगे। {29:22} इस मेंढे का ख़ास मक़्सद यह है कि हारून और उस के बेटों को मक़्दिस में ख़िदमत करने का इख़तियार और उह्दा दिया जाए। मेंढे की चर्बी, दुम, अंतड़ियों पर की सारी चर्बी, जोड़कलेजी, दोनों गुर्दे उन की चर्बी समेत और दहनी रान अलग करनी है। {29:23} उस टोकरी में से जो रब के हुज़ूर यानी ख़ैमे के दरवाज़े पर पड़ी है एक सादा रोटी, एक रोटी जिस में तेल डाला गया हो और एक रोटी जिस पर तेल लगाया गया हो निकालना। {29:24} मेंढे से अलग की गई चीज़ें और बेख़मीरी रोटी की टोकरी की यह चीज़ें ले कर हारून और उस के बेटों के हाथों में देना, और वह उन्हें हिलाने वाली क़ुर्बानी के तौर पर रब के सामने हिलाएँ। {29:25} फिर यह चीज़ें उन से वापस ले कर भस्म होने वाली क़ुर्बानी के साथ क़ुर्बानगाह पर जला देना। यह रब के लिए जलने वाली क़ुर्बानी है, और उस की ख़ुश्बू रब को पसन्द है। {29:26} अब उस मेंढे का सीना लेना जिस की मारिफ़त हारून को इमाम-ए-आज़म का इख़तियार दिया जाता है। सीने को भी हिलाने वाली क़ुर्बानी के तौर पर रब के सामने हिलाना। यह सीना क़ुर्बानी का तेरा हिस्सा होगा। {29:27} यूँ तुझे हारून और उस के बेटों की मख़्सूसियत के लिए मुस्तामल मेंढे के टुकड़े मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस करने हैं। उस के सीने को रब के सामने हिलाने वाली क़ुर्बानी के तौर पर हिलाया जाए और उस की रान को उठाने वाली क़ुर्बानी के तौर पर उठाया जाए। {29:28} हारून और उस की औलाद को इस्राईलियों की तरफ़ से हमेशा तक यह मिलने का हक़ है। जब भी इस्राईली रब को अपनी सलामती की क़ुर्बानियाँ पेश करें तो इमामों को यह दो टुकड़े मिलेंगे। {29:29} जब हारून फ़ौत हो जाएगा तो उस के मुक़द्दस लिबास उस की औलाद में से उस मर्द को देने हैं जिसे मसह करके हारून की जगह मुक़र्रर किया जाएगा। {29:30} जो बेटा उस की जगह मुक़र्रर किया जाएगा और मक़्दिस में ख़िदमत करने के लिए मुलाक़ात के ख़ैमे में आएगा वह यह लिबास सात दिन तक पहने रहे। {29:31} जो मेंढा हारून और उस के बेटों की मख़्सूसियत के लिए ज़बह किया गया है उसे मुक़द्दस जगह पर उबालना है। {29:32} फिर हारून और उस के बेटे मुलाक़ात के ख़ैमे के दरवाज़े पर मेंढे का गोश्त और टोकरी की बेख़मीरी रोटियाँ खाएँ। {29:33} वह यह चीज़ें खाएँ जिन से उन्हें गुनाहों का कफ़्फ़ारा और इमाम का उह्दा मिला है। लेकिन कोई और यह न खाए, क्यूँकि यह मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस हैं। {29:34} और अगर अगली सुब्ह तक इस गोश्त या रोटी में से कुछ बच जाए तो उसे जलाया जाए। उसे खाना मना है, क्यूँकि वह मुक़द्दस है। {29:35} जब तू हारून और उस के बेटों को इमाम मुक़र्रर करेगा तो ऐन मेरी हिदायत पर अमल करना। यह तक़्रीब सात दिन तक मनाई जाए। {29:36} इस के दौरान गुनाह की क़ुर्बानी के तौर पर रोज़ाना एक जवान बैल ज़बह करना। इस से तू क़ुर्बानगाह का कफ़्फ़ारा दे कर उसे हर तरह की नापाकी से पाक करेगा। इस के इलावा उस पर मसह का तेल उंडेलना। इस से वह मेरे लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस हो जाएगा। {29:37} सात दिन तक क़ुर्बानगाह का कफ़्फ़ारा दे कर उसे पाक-साफ़ करना और उसे तेल से मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस करना। फिर क़ुर्बानगाह निहायत मुक़द्दस होगी। जो भी उसे छुएगा वह भी मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस हो जाएगा। {i29:38} रोज़मर्रा की क़ुर्बानियाँ {29:38} रोज़ाना एक एक साल के दो भेड़ के नर बच्चे क़ुर्बानगाह पर जला देना, {29:39} एक को सुब्ह के वक़्त, दूसरे को सूरज के ग़ुरूब होने के ऐन बाद। {29:40} पहले जानवर के साथ डेढ़ किलोग्राम बेहतरीन मैदा पेश किया जाए जो कूटे हुए ज़ैतूनों के एक लिटर तेल के साथ मिलाया गया हो। मै की नज़र के तौर पर एक लिटर मै भी क़ुर्बानगाह पर उंडेलना। {29:41} दूसरे जानवर के साथ भी ग़ल्ला और मै की यह दो नज़रें पेश की जाएँ। ऐसी क़ुर्बानी की ख़ुश्बू रब को पसन्द है। {29:42} लाज़िम है कि आने वाली तमाम नस्लें भस्म होने वाली यह क़ुर्बानी बाक़ाइदगी से मुक़द्दस ख़ैमे के दरवाज़े पर रब के हुज़ूर चढ़ाएँ। वहाँ मैं तुम से मिला करूँगा और तुम से हमकलाम हूँगा। {29:43} वहाँ मैं इस्राईलियों से भी मिला करूँगा, और वह जगह मेरे जलाल से मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस हो जाएगी। {29:44} यूँ मैं मुलाक़ात के ख़ैमे और क़ुर्बानगाह को मख़्सूस करूँगा और हारून और उस के बेटों को मख़्सूस करूँगा ताकि वह इमामों की हैसियत से मेरी ख़िदमत करें। {29:45} तब मैं इस्राईलियों के दरमियान रहूँगा और उन का ख़ुदा हूँगा। {29:46} वह जान लेंगे कि मैं रब उन का ख़ुदा हूँ, कि मैं उन्हें मिस्र से निकाल लाया ताकि उन के दरमियान सुकूनत करूँ। मैं रब उन का ख़ुदा हूँ। {i30:1} बख़ूर जलाने की क़ुर्बानगाह {30:1} कीकर की लकड़ी की क़ुर्बानगाह बनाना जिस पर बख़ूर जलाया जाए। {30:2} वह डेढ़ फ़ुट लम्बी, इतनी ही चौड़ी और तीन फ़ुट ऊँची हो। उस के चारों कोनों में से सींग निकलें जो क़ुर्बानगाह के साथ एक ही टुकड़े से बनाए गए हों। {30:3} उस की ऊपर की सतह, उस के चार पहलूओं और उस के सींगों पर ख़ालिस सोना चढ़ाना। ऊपर की सतह के इर्दगिर्द सोने की झालर हो। {30:4} सोने के दो कड़े बना कर इन्हें उस झालर के नीचे एक दूसरे के मुक़ाबिल पहलूओं पर लगाना। इन कड़ों में क़ुर्बानगाह को उठाने की लकड़ियाँ डाली जाएँगी। {30:5} यह लकड़ियाँ कीकर की हों, और उन पर भी सोना चढ़ाना। {30:6} इस क़ुर्बानगाह को ख़ैमे के मुक़द्दस कमरे में उस पर्दे के सामने रखना जिस के पीछे अह्द का सन्दूक़ और उस का ढकना होंगे, वह ढकना जहाँ मैं तुझ से मिला करूँगा। {30:7} जब हारून हर सुब्ह शमादान के चराग़ तय्यार करे उस वक़्त वह उस पर ख़ुश्बूदार बख़ूर जलाए। {30:8} सूरज के ग़ुरूब होने के बाद भी जब वह दुबारा चराग़ों की देख-भाल करेगा तो वह साथ साथ बख़ूर जलाए। यूँ रब के सामने बख़ूर मुतवातिर जलता रहे। लाज़िम है कि बाद की नस्लें भी इस उसूल पर क़ाइम रहें। {30:9} इस क़ुर्बानगाह पर सिर्फ़ जाइज़ बख़ूर इस्तेमाल किया जाए। इस पर न तो जानवरों की क़ुर्बानियाँ चढ़ाई जाएँ, न ग़ल्ला या मै की नज़रें पेश की जाएँ। {30:10} हारून साल में एक दफ़ा उस का कफ़्फ़ारा दे कर उसे पाक करे। इस के लिए वह कफ़्फ़ारे के दिन उस क़ुर्बानी का कुछ ख़ून सींगों पर लगाए। यह उसूल भी अबद तक क़ाइम रहे। यह क़ुर्बानगाह रब के लिए निहायत मुक़द्दस है।” {i30:11} मर्दुमशुमारी के पैसे {30:11} रब ने मूसा से कहा, {30:12} “जब भी तू इस्राईलियों की मर्दुमशुमारी करे तो लाज़िम है कि जिन का शुमार किया गया हो वह रब को अपनी जान का फ़िद्या दें ताकि उन में वबा न फैले। {30:13} जिस जिस का शुमार किया गया हो वह चाँदी के आधे सिक्के के बराबर रक़म उठाने वाली क़ुर्बानी के तौर पर दे। सिक्के का वज़न मक़्दिस के सिक्कों के बराबर हो। यानी चाँदी के सिक्के का वज़न 11 ग्राम हो, इस लिए छः ग्राम चाँदी देनी है। {30:14} जिस की भी उम्र 20 साल या इस से ज़ाइद हो वह रब को यह रक़म उठाने वाली क़ुर्बानी के तौर पर दे। {30:15} अमीर और ग़रीब दोनों इतना ही दें, क्यूँकि यही नज़राना रब को पेश करने से तुम्हारी जान का कफ़्फ़ारा दिया जाता है। {30:16} कफ़्फ़ारे की यह रक़म मुलाक़ात के ख़ैमे की ख़िदमत के लिए इस्तेमाल करना। फिर यह नज़राना रब को याद दिलाता रहेगा कि तुम्हारी जानों का कफ़्फ़ारा दिया गया है।” {i30:17} धोने का हौज़ {30:17} रब ने मूसा से कहा, {30:18} “पीतल का ढाँचा बनाना जिस पर पीतल का हौज़ बना कर रखना है। यह हौज़ धोने के लिए है। उसे सहन में मुलाक़ात के ख़ैमे और जानवरों को चढ़ाने की क़ुर्बानगाह के दरमियान रख कर पानी से भर देना। {30:19} हारून और उस के बेटे अपने हाथ-पाँओ धोने के लिए उस का पानी इस्तेमाल करें। {30:20} मुलाक़ात के ख़ैमे में दाख़िल होने से पहले ही वह अपने आप को धोएँ वर्ना वह मर जाएंगे। इसी तरह जब भी वह ख़ैमे के बाहर की क़ुर्बानगाह पर जानवरों की क़ुर्बानियाँ चढ़ाएँ {30:21} तो लाज़िम है कि पहले हाथ-पाँओ धो लें, वर्ना वह मर जाएंगे। यह उसूल हारून और उस की औलाद के लिए हमेशा तक क़ाइम रहे।” {i30:22} मसह का तेल {30:22} रब ने मूसा से कहा, {30:23} “मसह के तेल के लिए उम्दा क़िस्म के मसाले इस्तेमाल करना। 6 किलोग्राम आब-ए-मुर, 3 किलोग्राम ख़ुश्बूदार दारचीनी, 3 किलोग्राम ख़ुश्बूदार बेद {30:24} और 6 किलोग्राम तेजपात। यह चीज़ें मक़्दिस के बाटों के हिसाब से तोल कर चार लिटर ज़ैतून के तेल में डालना। {30:25} सब कुछ मिला कर ख़ुश्बूदार तेल तय्यार करना। वह मुक़द्दस है और सिर्फ़ उस वक़्त इस्तेमाल किया जाए जब कोई चीज़ या शख़्स मेरे लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस किया जाए। {30:26} यही तेल ले कर मुलाक़ात का ख़ैमा और उस का सारा सामान मसह करना यानी ख़ैमा, अह्द का सन्दूक़, {30:27} मेज़ और उस का सामान, शमादान और उस का सामान, बख़ूर जलाने की क़ुर्बानगाह, {30:28} जानवरों को चढ़ाने की क़ुर्बानगाह और उस का सामान, धोने का हौज़ और उस का ढाँचा। {30:29} यूँ तू यह तमाम चीज़ें मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस करेगा। इस से वह निहायत मुक़द्दस हो जाएँगी। जो भी उन्हें छुएगा वह मुक़द्दस हो जाएगा। {30:30} हारून और उस के बेटों को भी इस तेल से मसह करना ताकि वह मुक़द्दस हो कर मेरे लिए इमाम का काम सरअन्जाम दे सकें। {30:31} इस्राईलियों को कह दे कि यह तेल हमेशा तक मेरे लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस है। {30:32} इस लिए इसे अपने लिए इस्तेमाल न करना और न इस तरकीब से अपने लिए तेल बनाना। यह तेल मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस है और तुम्हें भी इसे यूँ ठहराना है। {30:33} जो इस तरकीब से आम इस्तेमाल के लिए तेल बनाता है या किसी आम शख़्स पर लगाता है उसे उस की क़ौम में से मिटा डालना है।” {i30:34} बख़ूर की क़ुर्बानी {30:34} रब ने मूसा से कहा, “बख़ूर इस तरकीब से बनाना है: मस्तकी, ओनिका, बिरीजा और ख़ालिस लुबान बराबर के हिस्सों में {30:35} मिला कर ख़ुश्बूदार बख़ूर बनाना। इत्रसाज़ का यह काम नमकीन, ख़ालिस और मुक़द्दस हो। {30:36} इस में से कुछ पीस कर पाउडर बनाना और मुलाक़ात के ख़ैमे में अह्द के सन्दूक़ के सामने डालना जहाँ मैं तुझ से मिला करूँगा। इस बख़ूर को मुक़द्दसतरीन ठहराना। {30:37} इसी तरकीब के मुताबिक़ अपने लिए बख़ूर न बनाना। इसे रब के लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस ठहराना है। {30:38} जो भी अपने ज़ाती इस्तेमाल के लिए इस क़िस्म का बख़ूर बनाए उसे उस की क़ौम में से मिटा डालना है।” {i31:1} बज़लीएल और उहलियाब {31:1} फिर रब ने मूसा से कहा, {31:2} “मैं ने यहूदाह के क़बीले के बज़लीएल बिन ऊरी बिन हूर को चुन लिया है ताकि वह मुक़द्दस ख़ैमे की तामीर में राहनुमाई करे। {31:3} मैं ने उसे इलाही रूह से मामूर करके हिक्मत, समझ और तामीर के हर काम के लिए दरकार इल्म दे दिया है। {31:4} वह नक़्शे बना कर उन के मुताबिक़ सोने, चाँदी और पीतल की चीज़ें बना सकता है। {31:5} वह जवाहिर को काट कर जड़ने की क़ाबिलियत रखता है। वह लकड़ी को तराश कर उस से मुख़्तलिफ़ चीज़ें बना सकता है। वह बहुत सारे और कामों में भी महारत रखता है। {31:6} साथ ही मैं ने दान के क़बीले के उहलियाब बिन अख़ीसमक को मुक़र्रर किया है ताकि वह हर काम में उस की मदद करे। इस के इलावा मैं ने तमाम समझदार कारीगरों को महारत दी है ताकि वह सब कुछ उन हिदायात के मुताबिक़ बना सकें जो मैं ने तुझे दी हैं। {31:7} यानी मुलाक़ात का ख़ैमा, कफ़्फ़ारे के ढकने समेत अह्द का सन्दूक़ और ख़ैमे का सारा दूसरा सामान, {31:8} मेज़ और उस का सामान, ख़ालिस सोने का शमादान और उस का सामान, बख़ूर जलाने की क़ुर्बानगाह, {31:9} जानवरों को चढ़ाने की क़ुर्बानगाह और उस का सामान, धोने का हौज़ उस ढाँचे समेत जिस पर वह रखा जाता है, {31:10} वह लिबास जो हारून और उस के बेटे मक़्दिस में ख़िदमत करने के लिए पहनते हैं, {31:11} मसह का तेल और मक़्दिस के लिए ख़ुश्बूदार बख़ूर। यह सब कुछ वह वैसे ही बनाएँ जैसे मैं ने तुझे हुक्म दिया है।” {i31:12} सबत यानी हफ़्ते का दिन {31:12} रब ने मूसा से कहा, {31:13} “इस्राईलियों को बता कि हर सबत का दिन ज़रूर मनाओ। क्यूँकि सबत का दिन एक नुमायाँ निशान है जिस से जान लिया जाएगा कि मैं रब हूँ जो तुम्हें मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस करता हूँ। और यह निशान मेरे और तुम्हारे दरमियान नस्ल-दर-नस्ल क़ाइम रहेगा। {31:14} सबत का दिन ज़रूर मनाना, क्यूँकि वह तुम्हारे लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस है। जो भी उस की बेहुरमती करे वह ज़रूर जान से मारा जाए। जो भी इस दिन काम करे उसे उस की क़ौम में से मिटाया जाए। {31:15} छः दिन काम करना, लेकिन सातवाँ दिन आराम का दिन है। वह रब के लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस है। {31:16} इस्राईलियों को हाल में और मुस्तक़बिल में सबत का दिन अबदी अह्द समझ कर मनाना है। {31:17} वह मेरे और इस्राईलियों के दरमियान अबदी निशान होगा। क्यूँकि रब ने छः दिन के दौरान आसमान-ओ-ज़मीन को बनाया जबकि सातवें दिन उस ने आराम किया और ताज़ादम हो गया।” {i31:18} रब शरीअत की तख़्तियाँ देता है {31:18} यह सब कुछ मूसा को बताने के बाद रब ने उसे सीना पहाड़ पर शरीअत की दो तख़्तियाँ दीं। अल्लाह ने ख़ुद पत्थर की इन तख़्तियों पर तमाम बातें लिखी थीं। {i32:1} सोने का बछड़ा {32:1} पहाड़ के दामन में लोग मूसा के इन्तिज़ार में रहे, लेकिन बहुत देर हो गई। एक दिन वह हारून के गिर्द जमा हो कर कहने लगे, “आएँ, हमारे लिए देवता बना दें जो हमारे आगे आगे चलते हुए हमारी राहनुमाई करें। क्यूँकि क्या मालूम कि उस बन्दे मूसा को क्या हुआ है जो हमें मिस्र से निकाल लाया।” {32:2} जवाब में हारून ने कहा, “आप की बीवियाँ, बेटे और बेटियाँ अपनी सोने की बालियाँ उतार कर मेरे पास ले आएँ।” {32:3} सब लोग अपनी बालियाँ उतार उतार कर हारून के पास ले आए {32:4} तो उस ने यह ज़ेवरात ले कर बछड़ा ढाल दिया। बछड़े को देख कर लोग बोल उठे, “ऐ इस्राईल, यह तेरे देवता हैं जो तुझे मिस्र से निकाल लाए।” {32:5} जब हारून ने यह देखा तो उस ने बछड़े के सामने क़ुर्बानगाह बना कर एलान किया, “कल हम रब की ताज़ीम में ईद मनाएँगे।” {32:6} अगले दिन लोग सुब्ह-सवेरे उठे और भस्म होने वाली क़ुर्बानियाँ और सलामती की क़ुर्बानियाँ चढ़ाईं। वह खाने-पीने के लिए बैठ गए और फिर उठ कर रंगरलियों में अपने दिल बहलाने लगे। {i32:7} मूसा अपनी क़ौम की शफ़ाअत करता है {32:7} उस वक़्त रब ने मूसा से कहा, “पहाड़ से उतर जा। तेरे लोग जिन्हें तू मिस्र से निकाल लाया बड़ी शरारतें कर रहे हैं। {32:8} वह कितनी जल्दी से उस रास्ते से हट गए हैं जिस पर चलने के लिए मैं ने उन्हें हुक्म दिया था। उन्हों ने अपने लिए ढाला हुआ बछड़ा बना कर उसे सिज्दा किया है। उन्हों ने उसे क़ुर्बानियाँ पेश करके कहा है, ‘ऐ इस्राईल, यह तेरे देवता हैं। यही तुझे मिस्र से निकाल लाए हैं’।” {32:9} अल्लाह ने मूसा से कहा, “मैं ने देखा है कि यह क़ौम बड़ी हटधर्म है। {32:10} अब मुझे रोकने की कोशिश न कर। मैं उन पर अपना ग़ज़ब उंडेल कर उन को रू-ए-ज़मीन पर से मिटा दूँगा। उन की जगह मैं तुझ से एक बड़ी क़ौम बना दूँगा।” {32:11} लेकिन मूसा ने कहा, “ऐ रब, तू अपनी क़ौम पर अपना ग़ुस्सा क्यूँ उतारना चाहता है? तू ख़ुद अपनी अज़ीम क़ुदरत से उसे मिस्र से निकाल लाया है। {32:12} मिस्री क्यूँ कहें, ‘रब इस्राईलियों को सिर्फ़ इस बुरे मक़्सद से हमारे मुल्क से निकाल ले गया है कि उन्हें पहाड़ी इलाक़े में मार डाले और यूँ उन्हें रू-ए-ज़मीन पर से मिटाए’? अपना ग़ुस्सा ठंडा होने दे और अपनी क़ौम के साथ बुरा सुलूक करने से बाज़ रह। {32:13} याद रख कि तू ने अपने ख़ादिमों इब्राहीम, इस्हाक़ और याक़ूब से अपनी ही क़सम खा कर कहा था, ‘मैं तुम्हारी औलाद की तादाद यूँ बढ़ाऊँगा कि वह आसमान के सितारों के बराबर हो जाएगी। मैं उन्हें वह मुल्क दूँगा जिस का वादा मैं ने किया है, और वह उसे हमेशा के लिए मीरास में पाएँगे’।” {32:14} मूसा के कहने पर रब ने वह नहीं किया जिस का एलान उस ने कर दिया था बल्कि वह अपनी क़ौम से बुरा सुलूक करने से बाज़ रहा। {i32:15} बुतपरस्ती के नताइज {32:15} मूसा मुड़ कर पहाड़ से उतरा। उस के हाथों में शरीअत की दोनों तख़्तियाँ थीं। उन पर आगे पीछे लिखा गया था। {32:16} अल्लाह ने ख़ुद तख़्तियों को बना कर उन पर अपने अह्काम कन्दा किए थे। {32:17} उतरते उतरते यशूअ ने लोगों का शोर सुना और मूसा से कहा, “ख़ैमागाह में जंग का शोर मच रहा है!” {32:18} मूसा ने जवाब दिया, “न तो यह फ़त्हमन्दों के नारे हैं, न शिकस्त खाए हुओं की चीख़-पुकार। मुझे गाने वालों की आवाज़ सुनाई दे रही है।” {32:19} जब वह ख़ैमागाह के नज़्दीक पहुँचा तो उस ने लोगों को सोने के बछड़े के सामने नाचते हुए देखा। बड़े ग़ुस्से में आ कर उस ने तख़्तियों को ज़मीन पर पटख़ दिया, और वह टुकड़े टुकड़े हो कर पहाड़ के दामन में गिर गईं। {32:20} मूसा ने इस्राईलियों के बनाए हुए बछड़े को जला दिया। जो कुछ बच गया उसे उस ने पीस पीस कर पाउडर बना डाला और पाउडर पानी पर छिड़क कर इस्राईलियों को पिला दिया। {32:21} उस ने हारून से पूछा, “इन लोगों ने तुम्हारे साथ क्या किया कि तुम ने उन्हें ऐसे बड़े गुनाह में फंसा दिया?” {32:22} हारून ने कहा, “मेरे आक़ा। ग़ुस्से न हों। आप ख़ुद जानते हैं कि यह लोग बदी पर तुले रहते हैं। {32:23} उन्हों ने मुझ से कहा, ‘हमारे लिए देवता बना दें जो हमारे आगे आगे चलते हुए हमारी राहनुमाई करें। क्यूँकि क्या मालूम कि उस बन्दे मूसा को क्या हुआ है जो हमें मिस्र से निकाल लाया।’ {32:24} इस लिए मैं ने उन को बताया, ‘जिस के पास सोने के ज़ेवरात हैं वह उन्हें उतार लाए।’ जो कुछ उन्हों ने मुझे दिया उसे मैं ने आग में फैंक दिया तो होते होते सोने का यह बछड़ा निकल आया।” {32:25} मूसा ने देखा कि लोग बेकाबू हो गए हैं। क्यूँकि हारून ने उन्हें बेलगाम छोड़ दिया था, और यूँ वह इस्राईल के दुश्मनों के लिए मज़ाक़ का निशाना बन गए थे। {32:26} मूसा ख़ैमागाह के दरवाज़े पर खड़े हो कर बोला, “जो भी रब का बन्दा है वह मेरे पास आए।” जवाब में लावी के क़बीले के तमाम लोग उस के पास जमा हो गए। {32:27} फिर मूसा ने उन से कहा, “रब इस्राईल का ख़ुदा फ़रमाता है, ‘हर एक अपनी तलवार ले कर ख़ैमागाह में से गुज़रे। एक सिरे के दरवाज़े से शुरू करके दूसरे सिरे के दरवाज़े तक चलते चलते हर मिलने वाले को जान से मार दो, चाहे वह तुम्हारा भाई, दोस्त या रिश्तेदार ही क्यूँ न हो। फिर मुड़ कर मारते मारते पहले दरवाज़े पर वापस आ जाओ’।” {32:28} लावियों ने मूसा की हिदायत पर अमल किया तो उस दिन तक़रीबन 3,000 मर्द हलाक हुए। {32:29} यह देख कर मूसा ने लावियों से कहा, “आज अपने आप को मक़्दिस में रब की ख़िदमत करने के लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस करो, क्यूँकि तुम अपने बेटों और भाइयों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए तय्यार थे। इस लिए रब तुम को आज बरकत देगा।” {32:30} अगले दिन मूसा ने इस्राईलियों से बात की, “तुम ने निहायत संगीन गुनाह किया है। तो भी मैं अब रब के पास पहाड़ पर जा रहा हूँ। शायद मैं तुम्हारे गुनाह का कफ़्फ़ारा दे सकूँ।” {32:31} चुनाँचे मूसा ने रब के पास वापस जा कर कहा, “हाय, इस क़ौम ने निहायत संगीन गुनाह किया है। उन्हों ने अपने लिए सोने का देवता बना लिया। {32:32} मेहरबानी करके उन्हें मुआफ़ कर। लेकिन अगर तू उन्हें मुआफ़ न करे तो फिर मुझे भी अपनी उस किताब में से मिटा दे जिस में तू ने अपने लोगों के नाम दर्ज किए हैं।” {32:33} रब ने जवाब दिया, “मैं सिर्फ़ उस को अपनी किताब में से मिटाता हूँ जो मेरा गुनाह करता है। {32:34} अब जा, लोगों को उस जगह ले चल जिस का ज़िक्र मैं ने किया है। मेरा फ़रिश्ता तेरे आगे आगे चलेगा। लेकिन जब सज़ा का मुक़र्ररा दिन आएगा तब मैं उन्हें सज़ा दूँगा।” {32:35} फिर रब ने इस्राईलियों के दरमियान वबा फैलने दी, इस लिए कि उन्हों ने उस बछड़े की पूजा की थी जो हारून ने बनाया था। {33:1} रब ने मूसा से कहा, “इस जगह से रवाना हो जा। उन लोगों को ले कर जिन को तू मिस्र से निकाल लाया है उस मुल्क को जा जिस का वादा मैं ने इब्राहीम, इस्हाक़ और याक़ूब से किया है। उन ही से मैं ने क़सम खा कर कहा था, ‘मैं यह मुल्क तुम्हारी औलाद को दूँगा।’ {33:2} मैं तेरे आगे आगे फ़रिश्ता भेज कर कनआनी, अमोरी, हित्ती, फ़रिज़्ज़ी, हिव्वी और यबूसी अक़्वाम को उस मुल्क से निकाल दूँगा। {33:3} उठ, उस मुल्क को जा जहाँ दूध और शहद की कस्रत है। लेकिन मैं साथ नहीं जाऊँगा। तुम इतने हटधर्म हो कि अगर मैं साथ जाऊँ तो ख़तरा है कि तुम्हें वहाँ पहुँचने से पहले ही बर्बाद कर दूँ।” {33:4} जब इस्राईलियों ने यह सख़्त अल्फ़ाज़ सुने तो वह मातम करने लगे। किसी ने भी अपने ज़ेवर न पहने, {33:5} क्यूँकि रब ने मूसा से कहा था, “इस्राईलियों को बता कि तुम हटधर्म हो। अगर मैं एक लम्हा भी तुम्हारे साथ चलूँ तो ख़तरा है कि मैं तुम्हें तबाह कर दूँ। अब अपने ज़ेवरात उतार डालो। फिर मैं फ़ैसला करूँगा कि तुम्हारे साथ क्या किया जाए।” {33:6} इन अल्फ़ाज़ पर इस्राईलियों ने होरिब यानी सीना पहाड़ पर अपने ज़ेवर उतार दिए। {i33:7} मुलाक़ात का ख़ैमा {33:7} उस वक़्त मूसा ने ख़ैमा ले कर उसे कुछ फ़ासिले पर ख़ैमागाह के बाहर लगा दिया। उस ने उस का नाम ‘मुलाक़ात का ख़ैमा’ रखा। जो भी रब की मर्ज़ी दरयाफ़्त करना चाहता वह ख़ैमागाह से निकल कर वहाँ जाता। {33:8} जब भी मूसा ख़ैमागाह से निकल कर वहाँ जाता तो तमाम लोग अपने ख़ैमों के दरवाज़ों पर खड़े हो कर मूसा के पीछे देखने लगते। उस के मुलाक़ात के ख़ैमे में ओझल होने तक वह उसे देखते रहते। {33:9} मूसा के ख़ैमे में दाख़िल होने पर बादल का सतून उतर कर ख़ैमे के दरवाज़े पर ठहर जाता। जितनी देर तक रब मूसा से बातें करता उतनी देर तक वह वहाँ ठहरा रहता। {33:10} जब इस्राईली मुलाक़ात के ख़ैमे के दरवाज़े पर बादल का सतून देखते तो वह अपने अपने ख़ैमे के दरवाज़े पर खड़े हो कर सिज्दा करते। {33:11} रब मूसा से रू-ब-रू बातें करता था, ऐसे शख़्स की तरह जो अपने दोस्त से बातें करता है। इस के बाद मूसा निकल कर ख़ैमागाह को वापस चला जाता। लेकिन उस का जवान मददगार यशूअ बिन नून ख़ैमे को नहीं छोड़ता था। {i33:12} मूसा रब का जलाल देखता है {33:12} मूसा ने रब से कहा, “देख, तू मुझ से कहता आया है कि इस क़ौम को कनआन ले चल। लेकिन तू मेरे साथ किस को भेजेगा? तू ने अब तक यह बात मुझे नहीं बताई हालाँकि तू ने कहा है, ‘मैं तुझे बनाम जानता हूँ, तुझे मेरा करम हासिल हुआ है।’ {33:13} अगर मुझे वाक़ई तेरा करम हासिल है तो मुझे अपने रास्ते दिखा ताकि मैं तुझे जान लूँ और तेरा करम मुझे हासिल होता रहे। इस बात का ख़याल रख कि यह क़ौम तेरी ही उम्मत है।” {33:14} रब ने जवाब दिया, “मैं ख़ुद तेरे साथ चलूँगा और तुझे आराम दूँगा।” {33:15} मूसा ने कहा, “अगर तू ख़ुद साथ नहीं चलेगा तो फिर हमें यहाँ से रवाना न करना। {33:16} अगर तू हमारे साथ न जाए तो किस तरह पता चलेगा कि मुझे और तेरी क़ौम को तेरा करम हासिल हुआ है? हम सिर्फ़ इसी वजह से दुनिया की दीगर क़ौमों से अलग और मुम्ताज़ हैं।” {33:17} रब ने मूसा से कहा, “मैं तेरी यह दरख़्वास्त भी पूरी करूँगा, क्यूँकि तुझे मेरा करम हासिल हुआ है और मैं तुझे बनाम जानता हूँ।” {33:18} फिर मूसा बोला, “बराह-ए-करम मुझे अपना जलाल दिखा।” {33:19} रब ने जवाब दिया, “मैं अपनी पूरी भलाई तेरे सामने से गुज़रने दूँगा और तेरे सामने ही अपने नाम रब का एलान करूँगा। मैं जिस पर मेहरबान होना चाहूँ उस पर मेहरबान होता हूँ, और जिस पर रहम करना चाहूँ उस पर रहम करता हूँ। {33:20} लेकिन तू मेरा चिहरा नहीं देख सकता, क्यूँकि जो भी मेरा चिहरा देखे वह ज़िन्दा नहीं रह सकता।” {33:21} फिर रब ने फ़रमाया, “देख, मेरे पास एक जगह है। वहाँ की चटान पर खड़ा हो जा। {33:22} जब मेरा जलाल वहाँ से गुज़रेगा तो मैं तुझे चटान के एक शिगाफ़ में रखूँगा और अपना हाथ तेरे ऊपर फैलाऊँगा ताकि तू मेरे गुज़रने के दौरान मह्फ़ूज़ रहे। {33:23} इस के बाद मैं अपना हाथ हटाऊँगा और तू मेरे पीछे देख सकेगा। लेकिन मेरा चिहरा देखा नहीं जा सकता।” {i34:1} पत्थर की नई तख़्तियाँ {34:1} रब ने मूसा से कहा, “अपने लिए पत्थर की दो तख़्तियाँ तराश ले जो पहली दो की मानिन्द हों। फिर मैं उन पर वह अल्फ़ाज़ लिखूँगा जो पहली तख़्तियों पर लिखे थे जिन्हें तू ने पटख़ दिया था। {34:2} सुब्ह तक तय्यार हो कर सीना पहाड़ पर चढ़ना। चोटी पर मेरे सामने खड़ा हो जा। {34:3} तेरे साथ कोई भी न आए बल्कि पूरे पहाड़ पर कोई और शख़्स नज़र न आए, यहाँ तक कि भेड़-बकरियाँ और गाय-बैल भी पहाड़ के दामन में न चरें।” {34:4} चुनाँचे मूसा ने दो तख़्तियाँ तराश लीं जो पहली की मानिन्द थीं। फिर वह सुब्ह-सवेरे उठ कर सीना पहाड़ पर चढ़ गया जिस तरह रब ने उसे हुक्म दिया था। उस के हाथों में पत्थर की दोनों तख़्तियाँ थीं। {34:5} जब वह चोटी पर पहुँचा तो रब बादल में उतर आया और उस के पास खड़े हो कर अपने नाम रब का एलान किया। {34:6} मूसा के सामने से गुज़रते हुए उस ने पुकारा, “रब, रब, रहीम और मेहरबान ख़ुदा। तहम्मुल, शफ़्क़त और वफ़ा से भरपूर। {34:7} वह हज़ारों पर अपनी शफ़्क़त क़ाइम रखता और लोगों का क़ुसूर, नाफ़रमानी और गुनाह मुआफ़ करता है। लेकिन वह हर एक को उस की मुनासिब सज़ा भी देता है। जब वालिदैन गुनाह करें तो उन की औलाद को भी तीसरी और चौथी पुश्त तक सज़ा के नताइज भुगतने पड़ेंगे।” {34:8} मूसा ने जल्दी से झुक कर सिज्दा किया। {34:9} उस ने कहा, “ऐ रब, अगर मुझ पर तेरा करम हो तो हमारे साथ चल। बेशक यह क़ौम हटधर्म है, तो भी हमारा क़ुसूर और गुनाह मुआफ़ कर और बख़्श दे कि हम दुबारा तेरे ही बन जाएँ।” {34:10} तब रब ने कहा, “मैं तुम्हारे साथ अह्द बांधूँगा। तेरी क़ौम के सामने ही मैं ऐसे मोजिज़े करूँगा जो अब तक दुनिया भर की किसी भी क़ौम में नहीं किए गए। पूरी क़ौम जिस के दरमियान तू रहता है रब का काम देखेगी और उस से डर जाएगी जो मैं तेरे साथ करूँगा। {34:11} जो अह्काम मैं आज देता हूँ उन पर अमल करता रह। मैं अमोरी, कनआनी, हित्ती, फ़रिज़्ज़ी, हिव्वी और यबूसी अक़्वाम को तेरे आगे आगे मुल्क से निकाल दूँगा। {34:12} ख़बरदार, जो उस मुल्क में रहते हैं जहाँ तू जा रहा है उन से अह्द न बांधना। वर्ना वह तेरे दरमियान रहते हुए तुझे गुनाहों में फंसाते रहेंगे। {34:13} उन की क़ुर्बानगाहें ढा देना, उन के बुतों के सतून टुकड़े टुकड़े कर देना और उन की देवी यसीरत के खम्बे काट डालना। {34:14} किसी और माबूद की परस्तिश न करना, क्यूँकि रब का नाम ग़यूर है, अल्लाह ग़ैरतमन्द है। {34:15} ख़बरदार, उस मुल्क के बाशिन्दों से अह्द न करना, क्यूँकि तेरे दरमियान रहते हुए भी वह अपने माबूदों की पैरवी करके ज़िना करेंगे और उन्हें क़ुर्बानियाँ चढ़ाएँगे। आख़िरकार वह तुझे भी अपनी क़ुर्बानियों में शिर्कत की दावत देंगे। {34:16} ख़तरा है कि तू उन की बेटियों का अपने बेटों के साथ रिश्ता बांधे। फिर जब यह अपने माबूदों की पैरवी करके ज़िना करेंगी तो उन के सबब से तेरे बेटे भी उन की पैरवी करने लगेंगे। {34:17} अपने लिए देवता न ढालना। {i34:18} सालाना ईदें {34:18} बेख़मीरी रोटी की ईद मनाना। अबीब के महीने में सात दिन तक तेरी रोटी में ख़मीर न हो जिस तरह मैं ने हुक्म दिया है। क्यूँकि इस महीने में तू मिस्र से निकला। {34:19} हर पहलौठा मेरा है। तेरे माल मवेशियों का हर पहलौठा मेरा है, चाहे बछड़ा हो या लेला। {34:20} लेकिन पहलौठे गधे के इवज़ भेड़ देना। अगर यह मुमकिन न हो तो उस की गर्दन तोड़ डालना। अपने पहलौठे बेटों के लिए भी इवज़ी देना। कोई मेरे पास ख़ाली हाथ न आए। {34:21} छः दिन काम-काज करना, लेकिन सातवें दिन आराम करना। ख़्वाह हल चलाना हो या फ़सल काटनी हो तो भी सातवें दिन आराम करना। {34:22} गन्दुम की फ़सल की कटाई की ईद उस वक़्त मनाना जब तू गेहूँ की पहली फ़सल काटेगा। अंगूर और फल जमा करने की ईद इस्राईली साल के इख़तिताम पर मनानी है। {34:23} लाज़िम है कि तेरे तमाम मर्द साल में तीन मर्तबा रब क़ादिर-ए-मुतलक़ के सामने जो इस्राईल का ख़ुदा है हाज़िर हों। {34:24} मैं तेरे आगे आगे क़ौमों को मुल्क से निकाल दूँगा और तेरी सरहद्दें बढ़ाता जाऊँगा। फिर जब तू साल में तीन मर्तबा रब अपने ख़ुदा के हुज़ूर आएगा तो कोई भी तेरे मुल्क का लालच नहीं करेगा। {34:25} जब तू किसी जानवर को ज़बह करके क़ुर्बानी के तौर पर पेश करता है तो उस के ख़ून के साथ ऐसी रोटी पेश न करना जिस में ख़मीर हो। ईद-ए-फ़सह की क़ुर्बानी से अगली सुब्ह तक कुछ बाक़ी न रहे। {34:26} अपनी ज़मीन की पहली पैदावार में से बेहतरीन हिस्सा रब अपने ख़ुदा के घर में ले आना। बकरी या भेड़ के बच्चे को उस की माँ के दूध में न पकाना।” {i34:27} मूसा के चिहरे पर चमक {34:27} रब ने मूसा से कहा, “यह तमाम बातें लिख ले, क्यूँकि यह उस अह्द की बुन्याद हैं जो मैं ने तेरे और इस्राईल के साथ बांधा है।” {34:28} मूसा चालीस दिन और चालीस रात वहीं रब के हुज़ूर रहा। इस दौरान न उस ने कुछ खाया न पिया। उस ने पत्थर की तख़्तियों पर अह्द के दस अह्काम लिखे। {34:29} इस के बाद मूसा शरीअत की दोनों तख़्तियों को हाथ में लिए हुए सीना पहाड़ से उतरा। उस के चिहरे की जिल्द चमक रही थी, क्यूँकि उस ने रब से बात की थी। लेकिन उसे ख़ुद इस का इल्म नहीं था। {34:30} जब हारून और तमाम इस्राईलियों ने देखा कि मूसा का चिहरा चमक रहा है तो वह उस के पास आने से डर गए। {34:31} लेकिन उस ने उन्हें बुलाया तो हारून और जमाअत के तमाम सरदार उस के पास आए, और उस ने उन से बात की। {34:32} बाद में बाक़ी इस्राईली भी आए, और मूसा ने उन्हें तमाम अह्काम सुनाए जो रब ने उसे कोह-ए-सीना पर दिए थे। {34:33} यह सब कुछ कहने के बाद मूसा ने अपने चिहरे पर निक़ाब डाल लिया। {34:34} जब भी वह रब से बात करने के लिए मुलाक़ात के ख़ैमे में जाता तो निक़ाब को ख़ैमे से निकलते वक़्त तक उतार लेता। और जब वह निकल कर इस्राईलियों को रब से मिले हुए अह्काम सुनाता {34:35} तो वह देखते कि उस के चिहरे की जिल्द चमक रही है। इस के बाद मूसा दुबारा निक़ाब को अपने चिहरे पर डाल लेता, और वह उस वक़्त तक चिहरे पर रहता जब तक मूसा रब से बात करने के लिए मुलाक़ात के ख़ैमे में न जाता था। {i35:1} सबत का दिन {35:1} मूसा ने इस्राईल की पूरी जमाअत को इकट्ठा करके कहा, “रब ने तुम को यह हुक्म दिए हैं: {35:2} छः दिन काम-काज किया जाए, लेकिन सातवाँ दिन मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस हो। वह रब के लिए आराम का सबत है। जो भी इस दिन काम करे उसे सज़ा-ए-मौत दी जाए। {35:3} हफ़्ते के दिन अपने तमाम घरों में आग तक न जलाना।” {i35:4} मुलाक़ात के ख़ैमे के लिए सामान {35:4} मूसा ने इस्राईल की पूरी जमाअत से कहा, “रब ने हिदायत दी है {35:5} कि जो कुछ तुम्हारे पास है उस में से हदिए ला कर रब को उठाने वाली क़ुर्बानी के तौर पर पेश करो। जो भी दिली ख़ुशी से देना चाहे वह इन चीज़ों में से कुछ दे: सोना, चाँदी, पीतल; {35:6} नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग का धागा, बारीक कतान, बकरी के बाल, {35:7} मेंढों की सुर्ख़ रंगी हुई खालें, तख़स की खालें, कीकर की लकड़ी, {35:8} शमादान के लिए ज़ैतून का तेल, मसह करने के लिए तेल और ख़ुश्बूदार बख़ूर के लिए मसाले, {35:9} अक़ीक़-ए-अह्मर और दीगर जवाहिर जो इमाम-ए-आज़म के बालापोश और सीने के कीसे में जड़े जाएंगे। {35:10} तुम में से जितने माहिर कारीगर हैं वह आ कर वह कुछ बनाएँ जो रब ने फ़रमाया {35:11} यानी ख़ैमा और वह ग़िलाफ़ जो उस के ऊपर लगाए जाएंगे, हुकें, दीवारों के तख़्ते, शहतीर, सतून और पाए, {35:12} अह्द का सन्दूक़, उसे उठाने की लकड़ियाँ, उस के कफ़्फ़ारे का ढकना, मुक़द्दसतरीन कमरे के दरवाज़े का पर्दा, {35:13} मख़्सूस रोटियों की मेज़, उसे उठाने की लकड़ियाँ, उस का सारा सामान और रोटियाँ, {35:14} शमादान और उस पर रखने के चराग़ उस के सामान समेत, शमादान के लिए तेल, {35:15} बख़ूर जलाने की क़ुर्बानगाह, उसे उठाने की लकड़ियाँ, मसह का तेल, ख़ुश्बूदार बख़ूर, मुक़द्दस ख़ैमे के दरवाज़े का पर्दा, {35:16} जानवरों को चढ़ाने की क़ुर्बानगाह, उस का पीतल का जंगला, उसे उठाने की लकड़ियाँ और बाक़ी सारा सामान, धोने का हौज़ और वह ढाँचा जिस पर हौज़ रखा जाता है, {35:17} चारदीवारी के पर्दे उन के खम्बों और पाइयों समेत, सहन के दरवाज़े का पर्दा, {35:18} ख़ैमे और चारदीवारी की मेख़ें और रस्से, {35:19} और वह मुक़द्दस लिबास जो हारून और उस के बेटे मक़्दिस में ख़िदमत करने के लिए पहनते हैं।” {35:20} यह सुन कर इस्राईल की पूरी जमाअत मूसा के पास से चली गई। {35:21} और जो जो दिली ख़ुशी से देना चाहता था वह मुलाक़ात के ख़ैमे, उस के सामान या इमामों के कपड़ों के लिए कोई हदिया ले कर वापस आया। {35:22} रब के हदिए के लिए मर्द और ख़वातीन दिली ख़ुशी से अपने सोने के ज़ेवरात मसलन जड़ाओ पिनें, बालियाँ और छल्ले ले आए। {35:23} जिस जिस के पास दरकार चीज़ों में से कुछ था वह उसे मूसा के पास ले आया यानी नीले, क़िर्मिज़ी और अर्ग़वानी रंग का धागा, बारीक कतान, बकरी के बाल, मेंढों की सुर्ख़ रंगी हुई खालें और तख़स की खालें। {35:24} चाँदी, पीतल और कीकर की लकड़ी भी हदिए के तौर पर लाई गई। {35:25} और जितनी औरतें कातने में माहिर थीं वह अपनी काती हुई चीज़ें ले आईं यानी नीले, क़िर्मिज़ी और अर्ग़वानी रंग का धागा और बारीक कतान। {35:26} इसी तरह जो जो औरत बकरी के बाल कातने में माहिर थी और दिली ख़ुशी से मक़्दिस के लिए काम करना चाहती थी वह यह कात कर ले आई। {35:27} सरदार अक़ीक़-ए-अह्मर और दीगर जवाहिर ले आए जो इमाम-ए-आज़म के बालापोश और सीने के कीसे के लिए दरकार थे। {35:28} वह शमादान, मसह के तेल और ख़ुश्बूदार बख़ूर के लिए मसाले और ज़ैतून का तेल भी ले आए। {35:29} यूँ इस्राईल के तमाम मर्द और ख़वातीन जो दिली ख़ुशी से रब को कुछ देना चाहते थे उस सारे काम के लिए हदिए ले आए जो रब ने मूसा की मारिफ़त करने को कहा था। {i35:30} बज़लीएल और उहलियाब {35:30} फिर मूसा ने इस्राईलियों से कहा, “रब ने यहूदाह के क़बीले के बज़लीएल बिन ऊरी बिन हूर को चुन लिया है। {35:31} उस ने उसे इलाही रूह से मामूर करके हिक्मत, समझ और तामीर के हर काम के लिए दरकार इल्म दे दिया है। {35:32} वह नक़्शे बना कर उन के मुताबिक़ सोने, चाँदी और पीतल की चीज़ें बना सकता है। {35:33} वह जवाहिर को काट कर जड़ने की क़ाबिलियत रखता है। वह लकड़ी को तराश कर उस से मुख़्तलिफ़ चीज़ें बना सकता है। वह बहुत सारे और कामों में भी महारत रखता है। {35:34} साथ ही रब ने उसे और दान के क़बीले के उहलियाब बिन अख़ीसमक को दूसरों को सिखाने की क़ाबिलियत भी दी है। {35:35} उस ने उन्हें वह महारत और हिक्मत दी है जो हर काम के लिए दरकार है यानी कारीगरी के हर काम के लिए, कढ़ाई के काम के लिए, नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग के धागे और बारीक कतान से कपड़ा बनाने के लिए और बुनाई के काम के लिए। वह माहिर कारीगर हैं और नक़्शे भी बना सकते हैं। {36:1} लाज़िम है कि बज़लीएल, उहलियाब और बाक़ी कारीगर जिन को रब ने मक़्दिस की तामीर के लिए हिक्मत और समझ दी है सब कुछ ऐन उन हिदायात के मुताबिक़ बनाएँ जो रब ने दी हैं।” {i36:2} इस्राईली दिली ख़ुशी से देते हैं {36:2} मूसा ने बज़लीएल और उहलियाब को बुलाया। साथ ही उस ने हर उस कारीगर को भी बुलाया जिसे रब ने मक़्दिस की तामीर के लिए हिक्मत और महारत दी थी और जो ख़ुशी से आना और यह काम करना चाहता था। {36:3} उन्हें मूसा से तमाम हदिए मिले जो इस्राईली मक़्दिस की तामीर के लिए लाए थे। इस के बाद भी लोग रोज़-ब-रोज़ सुब्ह के वक़्त हदिए लाते रहे। {36:4} आख़िरकार तमाम कारीगर जो मक़्दिस बनाने के काम में लगे थे अपना काम छोड़ कर मूसा के पास आए। {36:5} उन्हों ने कहा, “लोग हद से ज़्यादा ला रहे हैं। जिस काम का हुक्म रब ने दिया है उस के लिए इतने सामान की ज़रूरत नहीं है।” {36:6} तब मूसा ने पूरी ख़ैमागाह में एलान करवा दिया कि कोई मर्द या औरत मक़्दिस की तामीर के लिए अब कुछ न लाए। यूँ उन्हें मज़ीद चीज़ें लाने से रोका गया, {36:7} क्यूँकि काम के लिए सामान ज़रूरत से ज़्यादा हो गया था। {i36:8} मुलाक़ात का ख़ैमा {36:8} जो कारीगर महारत रखते थे उन्हों ने ख़ैमे को बनाया। उन्हों ने बारीक कतान और नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी धागे से दस पर्दे बनाए। पर्दों पर किसी माहिर कारीगर के कढ़ाई के काम से करूबी फ़रिश्तों का डिज़ाइन बनाया गया। {36:9} हर पर्दे की लम्बाई 42 फ़ुट और चौड़ाई 6 फ़ुट थी। {36:10} पाँच पर्दों के लम्बे हाशिए एक दूसरे के साथ जोड़े गए और इसी तरह बाक़ी पाँच भी। यूँ दो बड़े टुकड़े बन गए। {36:11} दोनों टुकड़ों को एक दूसरे के साथ मिलाने के लिए उन्हों ने नीले धागे के हल्क़े बनाए। यह हल्क़े हर टुकड़े के 42 फ़ुट वाले एक किनारे पर लगाए गए, {36:12} एक टुकड़े के हाशिए पर 50 हल्क़े और दूसरे पर भी उतने ही हल्क़े। इन दो हाशियों के हल्क़े एक दूसरे के आमने-सामने थे। {36:13} फिर बज़लीएल ने सोने की 50 हुकें बना कर उन से आमने-सामने के हल्क़ों को एक दूसरे के साथ मिलाया। यूँ दोनों टुकड़ों के जोड़ने से ख़ैमा बन गया। {36:14} उस ने बकरी के बालों से भी 11 पर्दे बनाए जिन्हें कपड़े वाले ख़ैमे के ऊपर रखना था। {36:15} हर पर्दे की लम्बाई 45 फ़ुट और चौड़ाई 6 फ़ुट थी। {36:16} पाँच पर्दों के लम्बे हाशिए एक दूसरे के साथ जोड़े गए और इस तरह बाक़ी छः भी। {36:17} इन दोनों टुकड़ों को मिलाने के लिए उस ने हर टुकड़े के 45 फ़ुट वाले एक किनारे पर पचास पचास हल्क़े लगाए। {36:18} फिर पीतल की 50 हुकें बना कर उस ने दोनों हिस्से मिलाए। {36:19} एक दूसरे के ऊपर के दोनों ख़ैमों की हिफ़ाज़त के लिए बज़लीएल ने दो और ग़िलाफ़ बनाए। बकरी के बालों के ख़ैमे पर रखने के लिए उस ने मेंढों की सुर्ख़ रंगी हुई खालें जोड़ दीं और उस के ऊपर रखने के लिए तख़स की खालें मिलाईं। {36:20} इस के बाद उस ने कीकर की लकड़ी के तख़्ते बनाए जो ख़ैमे की दीवारों का काम देते थे। {36:21} हर तख़्ते की ऊँचाई 15 फ़ुट थी और चौड़ाई सवा दो फ़ुट। {36:22} हर तख़्ते के नीचे दो दो चूलें थीं। इन चूलों से हर तख़्ते को उस के पाइयों के साथ जोड़ा जाता था ताकि तख़्ता खड़ा रहे। {36:23} ख़ैमे की जुनूबी दीवार के लिए 20 तख़्ते बनाए गए {36:24} और साथ ही चाँदी के 40 पाए भी जिन पर तख़्ते खड़े किए जाते थे। हर तख़्ते के नीचे दो पाए थे, और हर पाए में एक चूल लगती थी। {36:25} इसी तरह ख़ैमे की शिमाली दीवार के लिए भी 20 तख़्ते बनाए गए {36:26} और साथ ही चाँदी के 40 पाए जो तख़्तों को खड़ा करने के लिए थे। हर तख़्ते के नीचे दो पाए थे। {36:27} ख़ैमे की पिछली यानी मग़रिबी दीवार के लिए छः तख़्ते बनाए गए। {36:28} इस दीवार को शिमाली और जुनूबी दीवारों के साथ जोड़ने के लिए कोने वाले दो तख़्ते बनाए गए। {36:29} इन दो तख़्तों में नीचे से ले कर ऊपर तक कोना था ताकि एक से शिमाली दीवार मग़रिबी दीवार के साथ जुड़ जाए और दूसरे से जुनूबी दीवार मग़रिबी दीवार के साथ। इन के ऊपर के सिरे कड़ों से मज़बूत किए गए। {36:30} यूँ पिछले यानी मग़रिबी तख़्तों की पूरी तादाद 8 थी और इन के लिए चाँदी के पाइयों की तादाद 16, हर तख़्ते के नीचे दो पाए। {36:31} फिर बज़लीएल ने कीकर की लकड़ी के शहतीर बनाए, तीनों दीवारों के लिए पाँच पाँच शहतीर। वह हर {36:32} दीवार के तख़्तों पर यूँ लगाने के लिए थे कि उन से तख़्ते एक दूसरे के साथ मिलाए जाएँ। {36:33} दरमियानी शहतीर यूँ बनाया गया कि वह दीवार की आधी ऊँचाई पर दीवार के एक सिरे से दूसरे सिरे तक लग सकता था। {36:34} उस ने तमाम तख़्तों और शहतीरों पर सोना चढ़ाया। शहतीरों को तख़्तों के साथ लगाने के लिए उस ने सोने के कड़े बनाए जो तख़्तों में लगाने थे। {i36:35} मुक़द्दस ख़ैमे के पर्दे {36:35} अब बज़लीएल ने एक और पर्दा बनाया। उस के लिए भी बारीक कतान और नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग का धागा इस्तेमाल हुआ। उस पर भी किसी माहिर कारीगर के कढ़ाई के काम से करूबी फ़रिश्तों का डिज़ाइन बनाया गया। {36:36} फिर उस ने पर्दे को लटकाने के लिए कीकर की लकड़ी के चार सतून, सोने की हुकें और चाँदी के चार पाए बनाए। सतूनों पर सोना चढ़ाया गया। {36:37} बज़लीएल ने ख़ैमे के दरवाज़े के लिए भी पर्दा बनाया। वह भी बारीक कतान और नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग के धागे से बनाया गया, और उस पर कढ़ाई का काम किया गया। {36:38} इस पर्दे को लटकाने के लिए उस ने सोने की हुकें और कीकर की लकड़ी के पाँच सतून बनाए। सतूनों के ऊपर के सिरों और पट्टियों पर सोना चढ़ाया गया जबकि उन के पाए पीतल के थे। {i37:1} अह्द का सन्दूक़ {37:1} बज़लीएल ने कीकर की लकड़ी का सन्दूक़ बनाया। उस की लम्बाई पौने चार फ़ुट थी जबकि उस की चौड़ाई और ऊँचाई सवा दो दो फ़ुट थी। {37:2} उस ने पूरे सन्दूक़ पर अन्दर और बाहर से ख़ालिस सोना चढ़ाया। ऊपर की सतह के इर्दगिर्द उस ने सोने की झालर लगाई। {37:3} सन्दूक़ को उठाने के लिए उस ने सोने के चार कड़े ढाल कर उन्हें सन्दूक़ के चारपाइयों पर लगाया। दोनों तरफ़ दो दो कड़े थे। {37:4} फिर उस ने कीकर की दो लकड़ियाँ सन्दूक़ को उठाने के लिए तय्यार कीं और उन पर सोना चढ़ाया। {37:5} उस ने इन लकड़ियों को दोनों तरफ़ के कड़ों में डाल दिया ताकि उन से सन्दूक़ को उठाया जा सके। {37:6} बज़लीएल ने सन्दूक़ का ढकना ख़ालिस सोने का बनाया। उस की लम्बाई पौने चार फ़ुट और चौड़ाई सवा दो फ़ुट थी। {37:7} फिर उस ने दो करूबी फ़रिश्ते सोने से घड़ कर बनाए जो ढकने के दोनों {37:8} सिरों पर खड़े थे। यह दो फ़रिश्ते और ढकना एक ही टुकड़े से बनाए गए। {37:9} फ़रिश्तों के पर यूँ ऊपर की तरफ़ फैले हुए थे कि वह ढकने को पनाह देते थे। उन के मुँह एक दूसरे की तरफ़ किए हुए थे, और वह ढकने की तरफ़ देखते थे। {i37:10} मख़्सूस रोटियों की मेज़ {37:10} इस के बाद बज़लीएल ने कीकर की लकड़ी की मेज़ बनाई। उस की लम्बाई तीन फ़ुट, चौड़ाई डेढ़ फ़ुट और ऊँचाई सवा दो फ़ुट थी। {37:11} उस ने उस पर ख़ालिस सोना चढ़ा कर उस के इर्दगिर्द सोने की झालर लगाई। {37:12} मेज़ की ऊपर की सतह पर उस ने चौखटा भी लगाया जिस की ऊँचाई तीन इंच थी और जिस पर सोने की झालर लगी थी। {37:13} अब उस ने सोने के चार कड़े ढाल कर उन्हें चारों कोनों पर लगाया जहाँ मेज़ के पाए लगे थे। {37:14} यह कड़े मेज़ की सतह पर लगे चौखटे के नीचे लगाए गए। उन में वह लकड़ियाँ डालनी थीं जिन से मेज़ को उठाना था। {37:15} बज़लीएल ने यह लकड़ियाँ भी कीकर से बनाईं और उन पर सोना चढ़ाया। {37:16} आख़िरकार उस ने ख़ालिस सोने के वह थाल, प्याले, मै की नज़रें पेश करने के बर्तन और मर्तबान बनाए जो उस पर रखे जाते थे। {i37:17} शमादान {37:17} फिर बज़लीएल ने ख़ालिस सोने का शमादान बनाया। उस का पाया और डंडी घड़ कर बनाए गए। उस की प्यालियाँ जो फूलों और कलियों की शक्ल की थीं पाए और डंडी के साथ एक ही टुकड़ा थीं। {37:18} डंडी से दाईं और बाईं तरफ़ तीन तीन शाख़ें निकलती थीं। {37:19} हर शाख़ पर तीन प्यालियाँ लगी थीं जो बादाम की कलियों और फूलों की शक्ल की थीं। {37:20} शमादान की डंडी पर भी इस क़िस्म की प्यालियाँ लगी थीं, लेकिन तादाद में चार। {37:21} इन में से तीन प्यालियाँ दाएँ बाएँ की छः शाख़ों के नीचे लगी थीं। वह यूँ लगी थीं कि हर प्याली से दो शाख़ें निकलती थीं। {37:22} शाख़ें और प्यालियाँ बल्कि पूरा शमादान ख़ालिस सोने के एक ही टुकड़े से घड़ कर बनाया गया। {37:23} बज़लीएल ने शमादान के लिए ख़ालिस सोने के सात चराग़ बनाए। उस ने बत्ती कतरने की क़ैंचियाँ और जलते कोएले के लिए छोटे बर्तन भी ख़ालिस सोने से बनाए। {37:24} शमादान और उस के तमाम सामान के लिए पूरे 34 किलोग्राम ख़ालिस सोना इस्तेमाल हुआ। {i37:25} बख़ूर जलाने की क़ुर्बानगाह {37:25} बज़लीएल ने कीकर की लकड़ी की क़ुर्बानगाह बनाई जो बख़ूर जलाने के लिए थी। वह डेढ़ फ़ुट लम्बी, इतनी ही चौड़ी और तीन फ़ुट ऊँची थी। उस के चार कोनों में से सींग निकलते थे जो क़ुर्बानगाह के साथ एक ही टुकड़े से बनाए गए थे। {37:26} उस की ऊपर की सतह, उस के चार पहलूओं और उस के सींगों पर ख़ालिस सोना चढ़ाया गया। ऊपर की सतह के इर्दगिर्द बज़लीएल ने सोने की झालर बनाई। {37:27} सोने के दो कड़े बना कर उस ने उन्हें इस झालर के नीचे एक दूसरे के मुक़ाबिल पहलूओं पर लगाया। इन कड़ों में क़ुर्बानगाह को उठाने की लकड़ियाँ डाली गईं। {37:28} यह लकड़ियाँ कीकर की थीं, और उन पर भी सोना चढ़ाया गया। {37:29} बज़लीएल ने मसह करने का मुक़द्दस तेल और ख़ुश्बूदार ख़ालिस बख़ूर भी बनाया। यह इत्रसाज़ का काम था। {i38:1} जानवरों को पेश करने की क़ुर्बानगाह {38:1} बज़लीएल ने कीकर की लकड़ी की एक और क़ुर्बानगाह बनाई जो भस्म होने वाली क़ुर्बानियों के लिए थी। उस की ऊँचाई साढ़े चार फ़ुट, उस की लम्बाई और चौड़ाई साढ़े सात सात फ़ुट थी। {38:2} उस के ऊपर चारों कोनों में से सींग निकलते थे। सींग और क़ुर्बानगाह एक ही टुकड़े के थे, और उस पर पीतल चढ़ाया गया। {38:3} उस का तमाम साज़-ओ-सामान और बर्तन भी पीतल के थे यानी राख को उठा कर ले जाने की बालटियाँ, बेलचे, काँटे, जलते हुए कोएले के लिए बर्तन और छिड़काओ के कटोरे। {38:4} क़ुर्बानगाह को उठाने के लिए उस ने पीतल का जंगला बनाया। वह ऊपर से खुला था और यूँ बनाया गया कि जब क़ुर्बानगाह उस में रखी जाए तो वह उस किनारे तक पहुँचे जो क़ुर्बानगाह की आधी ऊँचाई पर लगी थी। {38:5} उस ने क़ुर्बानगाह को उठाने के लिए चार कड़े बना कर उन्हें जंगले के चार कोनों पर लगाया। {38:6} फिर उस ने कीकर की दो लकड़ियाँ बना कर उन पर पीतल चढ़ाया {38:7} और क़ुर्बानगाह के दोनों तरफ़ लगे इन कड़ों में डाल दीं। यूँ उसे उठाया जा सकता था। क़ुर्बानगाह लकड़ी की थी लेकिन खोखली थी। {38:8} बज़लीएल ने धोने का हौज़ और उस का ढाँचा भी पीतल से बनाया। उस का पीतल उन औरतों के आईनों से मिला था जो मुलाक़ात के ख़ैमे के दरवाज़े पर ख़िदमत करती थीं। {i38:9} ख़ैमे का सहन {38:9} फिर बज़लीएल ने सहन बनाया। उस की चारदीवारी बारीक कतान के कपड़े से बनाई गई। चारदीवारी की लम्बाई जुनूब की तरफ़ 150 फ़ुट थी। {38:10} कपड़े को लगाने के लिए चाँदी की हुकें, पट्टियाँ, लकड़ी के खम्बे और उन के पाए बनाए गए। {38:11} चारदीवारी शिमाल की तरफ़ भी इसी तरह बनाई गई। {38:12} ख़ैमे के पीछे मग़रिब की तरफ़ चारदीवारी की चौड़ाई 75 फ़ुट थी। कपड़े के इलावा उस के लिए 10 खम्बे, 10 पाए और कपड़ा लगाने के लिए चाँदी की हुकें और पट्टियाँ बनाई गईं। {38:13} सामने, मशरिक़ की तरफ़ जहाँ से सूरज तुलू होता है चारदीवारी की चौड़ाई भी 75 फ़ुट थी। {38:14} कपड़ा दरवाज़े के दाईं तरफ़ साढ़े 22 फ़ुट चौड़ा था और उस के बाईं तरफ़ भी उतना ही {38:15} चौड़ा। उसे दोनों तरफ़ तीन तीन खम्बों के साथ लगाया गया जो पीतल के पाइयों पर खड़े थे। {38:16} चारदीवारी के तमाम पर्दों के लिए बारीक कतान इस्तेमाल हुआ। {38:17} खम्बे पीतल के पाइयों पर खड़े थे, और पर्दे चाँदी की हुकों और पट्टियों से खम्बों के साथ लगे थे। खम्बों के ऊपर के सिरों पर चाँदी चढ़ाई गई थी। सहन के तमाम खम्बों पर चाँदी की पट्टियाँ लगी थीं। {38:18} चारदीवारी के दरवाज़े का पर्दा नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग के धागे और बारीक कतान से बनाया गया, और उस पर कढ़ाई का काम किया गया। वह 30 फ़ुट चौड़ा और चारदीवारी के दूसरे पर्दों की तरह साढ़े सात फ़ुट ऊँचा था। {38:19} उस के चार खम्बे और पीतल के चार पाए थे। उस की हुकें और पट्टियाँ चाँदी की थीं, और खम्बों के ऊपर के सिरों पर चाँदी चढ़ाई गई थी। {38:20} ख़ैमे और चारदीवारी की तमाम मेख़ें पीतल की थीं। {i38:21} ख़ैमे का तामीरी सामान {38:21} ज़ैल में उस सामान की फ़हरिस्त है जो मक़्दिस की तामीर के लिए इस्तेमाल हुआ। मूसा के हुक्म पर इमाम-ए-आज़म हारून के बेटे इतमर ने लावियों की मारिफ़त यह फ़हरिस्त तय्यार की। {38:22} (यहूदाह के क़बीले के बज़लीएल बिन ऊरी बिन हूर ने वह सब कुछ बनाया जो रब ने मूसा को बताया था। {38:23} उस के साथ दान के क़बीले का उहलियाब बिन अख़ीसमक था जो कारीगरी के हर काम और कढ़ाई के काम में माहिर था। वह नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग के धागे और बारीक कतान से कपड़ा बनाने में भी माहिर था।) {38:24} उस सोने का वज़न जो लोगों के हदियों से जमा हुआ और मक़्दिस की तामीर के लिए इस्तेमाल हुआ तक़रीबन 1,000 किलोग्राम था (उसे मक़्दिस के बाटों के हिसाब से तोला गया)। {38:25} तामीर के लिए चाँदी जो मर्दुमशुमारी के हिसाब से वसूल हुई, उस का वज़न तक़रीबन 3,430 किलोग्राम था (उसे भी मक़्दिस के बाटों के हिसाब से तोला गया)। {38:26} जिन मर्दों की उम्र 20 साल या इस से ज़ाइद थी उन्हें चाँदी का आधा आधा सिक्का देना पड़ा। मर्दों की कुल तादाद 6,03,550 थी। {38:27} चूँकि दीवारों के तख़्तों के पाए और मुक़द्दसतरीन कमरे के दरवाज़े के सतूनों के पाए चाँदी के थे इस लिए तक़रीबन पूरी चाँदी इन 100 पाइयों के लिए सर्फ़ हुई। {38:28} तक़रीबन 30 किलोग्राम चाँदी बच गई। इस से चारदीवारी के खम्बों की हुकें और पट्टियाँ बनाई गईं, और यह खम्बों के ऊपर के सिरों पर भी चढ़ाई गई। {38:29} जो पीतल हदियों से जमा हुआ उस का वज़न तक़रीबन 2,425 किलोग्राम था। {38:30} ख़ैमे के दरवाज़े के पाए, जानवरों को चढ़ाने की क़ुर्बानगाह, उस का जंगला, बर्तन और साज़-ओ-सामान, {38:31} चारदीवारी के पाए, सहन के दरवाज़े के पाए और ख़ैमे और चारदीवारी की तमाम मेख़ें इसी से बनाई गईं। {i39:1} हारून का बालापोश {39:1} बज़लीएल की हिदायत पर कारीगरों ने नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग का धागा ले कर मक़्दिस में ख़िदमत के लिए लिबास बनाए। उन्हों ने हारून के मुक़द्दस कपड़े उन हिदायात के ऐन मुताबिक़ बनाए जो रब ने मूसा को दी थीं। {39:2} उन्हों ने इमाम-ए-आज़म का बालापोश बनाने के लिए सोना, नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग का धागा और बारीक कतान इस्तेमाल किया। {39:3} उन्हों ने सोने को कूट कूट कर वर्क़ बनाया और फिर उसे काट कर धागे बनाए। जब नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग के धागे और बारीक कतान से कपड़ा बनाया गया तो सोने का यह धागा महारत से कढ़ाई के काम में इस्तेमाल हुआ। {39:4} उन्हों ने बालापोश के लिए दो पट्टियाँ बनाईं और उन्हें बालापोश के कंधों पर रख कर सामने और पीछे से बालापोश के साथ लगाइं। {39:5} पटका भी बनाया गया जिस से बालापोश को बांधा जाता था। इस के लिए भी सोना, नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग का धागा और बारीक कतान इस्तेमाल हुआ। यह उन हिदायात के ऐन मुताबिक़ हुआ जो रब ने मूसा को दी थीं। {39:6} फिर उन्हों ने अक़ीक़-ए-अह्मर के दो पत्थर चुन लिए और उन्हें सोने के ख़ानों में जड़ कर उन पर इस्राईल के बारह बेटों के नाम कन्दा किए। यह नाम जौहरों पर उस तरह कन्दा किए गए जिस तरह मुहर कन्दा की जाती है। {39:7} उन्हों ने पत्थरों को बालापोश की दो पट्टियों पर यूँ लगाया कि वह हारून के कंधों पर रब को इस्राईलियों की याद दिलाते रहें। यह सब कुछ रब की दी गई हिदायात के ऐन मुताबिक़ हुआ। {i39:8} सीने का कीसा {39:8} इस के बाद उन्हों ने सीने का कीसा बनाया। यह माहिर कारीगर का काम था और उन ही चीज़ों से बना जिन से हारून का बालापोश भी बना था यानी सोने और नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग के धागे और बारीक कतान से। {39:9} जब कपड़े को एक दफ़ा तह किया गया तो कीसे की लम्बाई और चौड़ाई नौ नौ इंच थी। {39:10} उन्हों ने उस पर चार क़तारों में जवाहिर जड़े। हर क़तार में तीन तीन जौहर थे। पहली क़तार में लाल, ज़बर्जद और ज़ुमुर्रद। {39:11} दूसरी में फ़ीरोज़ा, संग-ए-लाजवर्द और हज्र-उल-क़मर। {39:12} तीसरी में ज़रक़ोन, अक़ीक़ और याक़ूत-ए-अर्ग़वानी। {39:13} चौथी में पुखराज, अक़ीक़-ए-अह्मर और यशब। हर जौहर सोने के ख़ाने में जड़ा हुआ था। {39:14} यह बारह जवाहिर इस्राईल के बारह क़बीलों की नुमाइन्दगी करते थे। एक एक जौहर पर एक क़बीले का नाम कन्दा किया गया, और यह नाम उस तरह कन्दा किए गए जिस तरह मुहर कन्दा की जाती है। {39:15} अब उन्हों ने सीने के कीसे के लिए ख़ालिस सोने की दो ज़न्जीरें बनाईं जो डोरी की तरह गुंधी हुई थीं। {39:16} साथ साथ उन्हों ने सोने के दो ख़ाने और दो कड़े भी बनाए। उन्हों ने यह कड़े कीसे के ऊपर के दो कोनों पर लगाए। {39:17} फिर दोनों ज़न्जीरें उन दो कड़ों के साथ लगाई गईं। {39:18} उन के दूसरे सिरे बालापोश की कंधों वाली पट्टियों के दो ख़ानों के साथ जोड़ दिए गए, फिर सामने की तरफ़ लगाए गए। {39:19} उन्हों ने कीसे के निचले दो कोनों पर भी सोने के दो कड़े लगाए। वह अन्दर, बालापोश की तरफ़ लगे थे। {39:20} अब उन्हों ने दो और कड़े बना कर बालापोश की कंधों वाली पट्टियों पर लगाए। यह भी सामने की तरफ़ लगे थे लेकिन नीचे, बालापोश के पटके के ऊपर ही। {39:21} उन्हों ने सीने के कीसे के निचले कड़े नीली डोरी से बालापोश के इन निचले कड़ों के साथ बांधे। यूँ कीसा पटके के ऊपर अच्छी तरह सीने के साथ लगा रहा। यह उन हिदायात के ऐन मुताबिक़ हुआ जो रब ने मूसा को दी थीं। {i39:22} हारून का चोग़ा {39:22} फिर कारीगरों ने चोग़ा बुना। वह पूरी तरह नीले धागे से बनाया गया। चोग़े को बालापोश से पहले पहनना था। {39:23} उस के गरेबान को बुने हुए कालर से मज़बूत किया गया ताकि वह न फटे। {39:24} उन्हों ने नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग के धागे से अनार बना कर उन्हें चोग़े के दामन में लगा दिया। {39:25} उन के दरमियान ख़ालिस सोने की घंटियाँ लगाई गईं। {39:26} दामन में अनार और घंटियाँ बारी बारी लगाई गईं। लाज़िम था कि हारून ख़िदमत करने के लिए हमेशा यह चोग़ा पहने। रब ने मूसा को यही हुक्म दिया था। {i39:27} ख़िदमत के लिए दीगर लिबास {39:27} कारीगरों ने हारून और उस के बेटों के लिए बारीक कतान के ज़ेरजामे बनाए। यह बुनने वाले का काम था। {39:28} साथ साथ उन्हों ने बारीक कतान की पगड़ियाँ और बारीक कतान के पाजामे बनाए। {39:29} कमरबन्द को बारीक कतान और नीले, अर्ग़वानी और क़िर्मिज़ी रंग के धागे से बनाया गया। कढ़ाई करने वालों ने इस पर काम किया। सब कुछ उन हिदायात के मुताबिक़ बनाया गया जो रब ने मूसा को दी थीं। {39:30} उन्हों ने मुक़द्दस ताज यानी ख़ालिस सोने की तख़्ती बनाई और उस पर यह अल्फ़ाज़ कन्दा किए, ‘रब के लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस।’ {39:31} फिर उन्हों ने इसे नीली डोरी से पगड़ी के सामने वाले हिस्से से लगा दिया। यह भी उन हिदायात के मुताबिक़ बनाया गया जो रब ने मूसा को दी थीं। {i39:32} सारा सामान मूसा को दिखाया जाता है {39:32} आख़िरकार मक़्दिस का काम मुकम्मल हुआ। इस्राईलियों ने सब कुछ उन हिदायात के मुताबिक़ बनाया था जो रब ने मूसा को दी थीं। {39:33} वह मक़्दिस की तमाम चीज़ें मूसा के पास ले आए यानी मुक़द्दस ख़ैमा और उस का सारा सामान, उस की हुकें, दीवारों के तख़्ते, शहतीर, सतून और पाए, {39:34} ख़ैमे पर मेंढों की सुर्ख़ रंगी हुई खालों का ग़िलाफ़ और तख़स की खालों का ग़िलाफ़, मुक़द्दसतरीन कमरे के दरवाज़े का पर्दा, {39:35} अह्द का सन्दूक़ जिस में शरीअत की तख़्तियाँ रखनी थीं, उसे उठाने की लकड़ियाँ और उस का ढकना, {39:36} मख़्सूस रोटियों की मेज़, उस का सारा सामान और रोटियाँ, {39:37} ख़ालिस सोने का शमादान और उस पर रखने के चराग़ उस के सारे सामान समेत, शमादान के लिए तेल, {39:38} बख़ूर जलाने की सोने की क़ुर्बानगाह, मसह का तेल, ख़ुश्बूदार बख़ूर, मुक़द्दस ख़ैमे के दरवाज़े का पर्दा, {39:39} जानवरों को चढ़ाने की पीतल की क़ुर्बानगाह, उस का पीतल का जंगला, उसे उठाने की लकड़ियाँ और बाक़ी सारा सामान, धोने का हौज़ और वह ढाँचा जिस पर हौज़ रखना था, {39:40} चारदीवारी के पर्दे उन के खम्बों और पाइयों समेत, सहन के दरवाज़े का पर्दा, चारदीवारी के रस्से और मेख़ें, मुलाक़ात के ख़ैमे में ख़िदमत करने का बाक़ी सारा सामान {39:41} और मक़्दिस में ख़िदमत करने के वह मुक़द्दस लिबास जो हारून और उस के बेटों को पहनने थे। {39:42} सब कुछ उन हिदायात के मुताबिक़ बनाया गया था जो रब ने मूसा को दी थीं। {39:43} मूसा ने तमाम चीज़ों का मुआइना किया और मालूम किया कि उन्हों ने सब कुछ रब की हिदायात के मुताबिक़ बनाया था। तब उस ने उन्हें बरकत दी। {i40:1} मक़्दिस को खड़ा करने की हिदायात {40:1} फिर रब ने मूसा से कहा, {40:2} “पहले महीने की पहली तारीख़ को मुलाक़ात का ख़ैमा खड़ा करना। {40:3} अह्द का सन्दूक़ जिस में शरीअत की तख़्तियाँ हैं मुक़द्दसतरीन कमरे में रख कर उस के दरवाज़े का पर्दा लगाना। {40:4} इस के बाद मख़्सूस रोटियों की मेज़ मुक़द्दस कमरे में ला कर उस पर तमाम ज़रूरी सामान रखना। उस कमरे में शमादान भी ले आना और उस पर उस के चराग़ रखना। {40:5} बख़ूर की सोने की क़ुर्बानगाह उस पर्दे के सामने रखना जिस के पीछे अह्द का सन्दूक़ है। फिर ख़ैमे में दाख़िल होने के दरवाज़े पर पर्दा लगाना। {40:6} जानवरों को चढ़ाने की क़ुर्बानगाह सहन में ख़ैमे के दरवाज़े के सामने रखी जाए। {40:7} ख़ैमे और इस क़ुर्बानगाह के दरमियान धोने का हौज़ रख कर उस में पानी डालना। {40:8} सहन की चारदीवारी खड़ी करके उस के दरवाज़े का पर्दा लगाना। {40:9} फिर मसह का तेल ले कर उसे ख़ैमे और उस के सारे सामान पर छिड़क देना। यूँ तू उसे मेरे लिए मख़्सूस करेगा और वह मुक़द्दस होगा। {40:10} फिर जानवरों को चढ़ाने की क़ुर्बानगाह और उस के सामान पर मसह का तेल छिड़कना। यूँ तू उसे मेरे लिए मख़्सूस करेगा और वह निहायत मुक़द्दस होगा। {40:11} इसी तरह हौज़ और उस ढाँचे को भी मख़्सूस करना जिस पर हौज़ रखा गया है। {40:12} हारून और उस के बेटों को मुलाक़ात के ख़ैमे के दरवाज़े पर ला कर ग़ुसल कराना। {40:13} फिर हारून को मुक़द्दस लिबास पहनाना और उसे मसह करके मेरे लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस करना ताकि इमाम के तौर पर मेरी ख़िदमत करे। {40:14} उस के बेटों को ला कर उन्हें ज़ेरजामे पहना देना। {40:15} उन्हें उन के वालिद की तरह मसह करना ताकि वह भी इमामों के तौर पर मेरी ख़िदमत करें। जब उन्हें मसह किया जाएगा तो वह और बाद में उन की औलाद हमेशा तक मक़्दिस में इस ख़िदमत के लिए मख़्सूस होंगे।” {i40:16} मक़्दिस को खड़ा किया जाता है {40:16} मूसा ने सब कुछ रब की हिदायात के मुताबिक़ किया। {40:17} पहले महीने की पहली तारीख़ को मुक़द्दस ख़ैमा खड़ा किया गया। उन्हें मिस्र से निकले पूरा एक साल हो गया था। {40:18} मूसा ने दीवार के तख़्तों को उन के पाइयों पर खड़ा करके उन के साथ शहतीर लगाए। इसी तरह उस ने सतूनों को भी खड़ा किया। {40:19} उस ने रब की हिदायात के ऐन मुताबिक़ दीवारों पर कपड़े का ख़ैमा लगाया और उस पर दूसरे ग़िलाफ़ रखे। {40:20} उस ने शरीअत की दोनों तख़्तियाँ ले कर अह्द के सन्दूक़ में रख दीं, उठाने के लिए लकड़ियाँ सन्दूक़ के कड़ों में डाल दीं और कफ़्फ़ारे का ढकना उस पर लगा दिया। {40:21} फिर उस ने रब की हिदायात के ऐन मुताबिक़ सन्दूक़ को मुक़द्दसतरीन कमरे में रख कर उस के दरवाज़े का पर्दा लगा दिया। यूँ अह्द के सन्दूक़ पर पर्दा पड़ा रहा। {40:22} मूसा ने मख़्सूस रोटियों की मेज़ मुक़द्दस कमरे के शिमाली हिस्से में उस पर्दे के सामने रख दी जिस के पीछे अह्द का सन्दूक़ था। {40:23} उस ने रब की हिदायत के ऐन मुताबिक़ रब के लिए मख़्सूस की हुई रोटियाँ मेज़ पर रखीं। {40:24} उसी कमरे के जुनूबी हिस्से में उस ने शमादान को मेज़ के मुक़ाबिल रख दिया। {40:25} उस पर उस ने रब की हिदायत के ऐन मुताबिक़ रब के सामने चराग़ रख दिए। {40:26} उस ने बख़ूर की सोने की क़ुर्बानगाह भी उसी कमरे में रखी, उस पर्दे के बिलकुल सामने जिस के पीछे अह्द का सन्दूक़ था। {40:27} उस ने उस पर रब की हिदायत के ऐन मुताबिक़ ख़ुश्बूदार बख़ूर जलाया। {40:28} फिर उस ने ख़ैमे का दरवाज़ा लगा दिया। {40:29} बाहर जा कर उस ने जानवरों को चढ़ाने की क़ुर्बानगाह ख़ैमे के दरवाज़े के सामने रख दी। उस पर उस ने रब की हिदायत के ऐन मुताबिक़ भस्म होने वाली क़ुर्बानियाँ और ग़ल्ला की नज़रें चढ़ाईं। {40:30} उस ने धोने के हौज़ को ख़ैमे और उस क़ुर्बानगाह के दरमियान रख कर उस में पानी डाल दिया। {40:31} मूसा, हारून और उस के बेटे उसे अपने हाथ-पाँओ धोने के लिए इस्तेमाल करते थे। {40:32} जब भी वह मुलाक़ात के ख़ैमे में दाख़िल होते या जानवरों को चढ़ाने की क़ुर्बानगाह के पास आते तो रब की हिदायत के ऐन मुताबिक़ पहले ग़ुसल करते। {40:33} आख़िर में मूसा ने ख़ैमा, क़ुर्बानगाह और चारदीवारी खड़ी करके सहन के दरवाज़े का पर्दा लगा दिया। यूँ मूसा ने मक़्दिस की तामीर मुकम्मल की। {i40:34} ख़ैमे में रब का जलाल {40:34} फिर मुलाक़ात के ख़ैमे पर बादल छा गया और मक़्दिस रब के जलाल से भर गया। {40:35} मूसा ख़ैमे में दाख़िल न हो सका, क्यूँकि बादल उस पर ठहरा हुआ था और मक़्दिस रब के जलाल से भर गया था। {40:36} तमाम सफ़र के दौरान जब भी मक़्दिस के ऊपर से बादल उठता तो इस्राईली सफ़र के लिए तय्यार हो जाते। {40:37} अगर वह न उठता तो वह उस वक़्त तक ठहरे रहते जब तक बादल उठ न जाता। {40:38} दिन के वक़्त बादल मक़्दिस के ऊपर ठहरा रहता और रात के वक़्त वह तमाम इस्राईलियों को आग की सूरत में नज़र आता था। यह सिलसिला पूरे सफ़र के दौरान जारी रहा।