{i1:1} दाऊद को साऊल और यूनतन की मौत की ख़बर मिलती है {1:1} जब दाऊद अमालीक़ियों को शिकस्त देने से वापस आया तो साऊल बादशाह मर चुका था। वह अभी दो ही दिन सिक़्लाज में ठहरा था {1:2} कि एक आदमी साऊल की लश्करगाह से पहुँचा। दुख के इज़हार के लिए उस ने अपने कपड़ों को फाड़ कर अपने सर पर ख़ाक डाल रखी थी। दाऊद के पास आ कर वह बड़े एहतिराम के साथ उस के सामने झुक गया। {1:3} दाऊद ने पूछा, “आप कहाँ से आए हैं?” आदमी ने जवाब दिया, “मैं बाल बाल बच कर इस्राईली लश्करगाह से आया हूँ।” {1:4} दाऊद ने पूछा, “बताएँ, हालात कैसे हैं?” उस ने बताया, “हमारे बहुत से आदमी मैदान-ए-जंग में काम आए। बाक़ी भाग गए हैं। साऊल और उस का बेटा यूनतन भी हलाक हो गए हैं।” {1:5} दाऊद ने सवाल किया, “आप को कैसे मालूम हुआ कि साऊल और यूनतन मर गए हैं?” {1:6} जवान ने जवाब दिया, “इत्तिफ़ाक़ से मैं जिल्बूअ के पहाड़ी सिलसिले पर से गुज़र रहा था। वहाँ मुझे साऊल नज़र आया। वह नेज़े का सहारा ले कर खड़ा था। दुश्मन के रथ और घुड़सवार तक़रीबन उसे पकड़ने ही वाले थे {1:7} कि उस ने मुड़ कर मुझे देखा और अपने पास बुलाया। मैं ने कहा, ‘जी, मैं हाज़िर हूँ।’ {1:8} उस ने पूछा, ‘तुम कौन हो?’ मैं ने जवाब दिया, ‘मैं अमालीक़ी हूँ।’ {1:9} फिर उस ने मुझे हुक्म दिया, ‘आओ और मुझे मार डालो! क्यूँकि गो मैं ज़िन्दा हूँ मेरी जान निकल रही है।’ {1:10} चुनाँचे मैं ने उसे मार दिया, क्यूँकि मैं जानता था कि बचने का कोई इम्कान नहीं रहा था। फिर मैं उस का ताज और बाज़ूबन्द ले कर अपने मालिक के पास यहाँ ले आया हूँ।” {1:11} यह सब कुछ सुन कर दाऊद और उस के तमाम लोगों ने ग़म के मारे अपने कपड़े फाड़ लिए। {1:12} शाम तक उन्हों ने रो रो कर और रोज़ा रख कर साऊल, उस के बेटे यूनतन और रब के उन बाक़ी लोगों का मातम किया जो मारे गए थे। {1:13} दाऊद ने उस जवान से जो उन की मौत की ख़बर लाया था पूछा, “आप कहाँ के हैं?” उस ने जवाब दिया, “मैं अमालीक़ी हूँ जो अजनबी के तौर पर आप के मुल्क में रहता हूँ।” {1:14} दाऊद बोला, “आप ने रब के मसह किए हुए बादशाह को क़त्ल करने की जुरअत कैसे की?” {1:15} उस ने अपने किसी जवान को बुला कर हुक्म दिया, “इसे मार डालो!” उसी वक़्त जवान ने अमालीक़ी को मार डाला। {1:16} दाऊद ने कहा, “आप ने अपने आप को ख़ुद मुजरिम ठहराया है, क्यूँकि आप ने अपने मुँह से इक़्रार किया है कि मैं ने रब के मसह किए हुए बादशाह को मार दिया है।” {i1:17} साऊल और यूनतन पर मातम का गीत {1:17} फिर दाऊद ने साऊल और यूनतन पर मातम का गीत गाया। {1:18} उस ने हिदायत दी कि यहूदाह के तमाम बाशिन्दे यह गीत याद करें। गीत का नाम ‘कमान का गीत’ है और ‘याशर की किताब’ में दर्ज है। गीत यह है, {1:19} “हाय, ऐ इस्राईल! तेरी शान-ओ-शौकत तेरी बुलन्दियों पर मारी गई है। हाय, तेरे सूरमे किस तरह गिर गए हैं! {1:20} जात में जा कर यह ख़बर मत सुनाना। अस्क़लून की गलियों में इस का एलान मत करना, वर्ना फ़िलिस्तियों की बेटियाँ ख़ुशी मनाएँगी, नामख़्तूनों की बेटियाँ फ़त्ह के नारे लगाएँगी। {1:21} ऐ जिल्बूअ के पहाड़ो! ऐ पहाड़ी ढलानो! आइन्दा तुम पर न ओस पड़े, न बारिश बरसे। क्यूँकि सूरमाओं की ढाल नापाक हो गई है। अब से साऊल की ढाल तेल मल कर इस्तेमाल नहीं की जाएगी। {1:22} यूनतन की कमान ज़बरदस्त थी, साऊल की तलवार कभी ख़ाली हाथ न लौटी। उन के हथियारों से हमेशा दुश्मन का ख़ून टपकता रहा, वह सूरमाओं की चर्बी से चमकते रहे। {1:23} साऊल और यूनतन कितने प्यारे और मेहरबान थे! जीते जी वह एक दूसरे के क़रीब रहे, और अब मौत भी उन्हें अलग न कर सकी। वह उक़ाब से तेज़ और शेरबबर से ताक़तवर थे। {1:24} ऐ इस्राईल की ख़वातीन! साऊल के लिए आँसू बहाएँ। क्यूँकि उसी ने आप को क़िर्मिज़ी रंग के शानदार कपड़ों से मुलब्बस किया, उसी ने आप को सोने के ज़ेवरात से आरास्ता किया। {1:25} हाय, हमारे सूरमे लड़ते लड़ते शहीद हो गए हैं। हाय ऐ इस्राईल, यूनतन मुर्दा हालत में तेरी बुलन्दियों पर पड़ा है। {1:26} ऐ यूनतन मेरे भाई, मैं तेरे बारे में कितना दुखी हूँ। तू मुझे कितना अज़ीज़ था। तेरी मुझ से मुहब्बत अनोखी थी, वह औरतों की मुहब्बत से भी अनोखी थी। {1:27} हाय, हाय! हमारे सूरमे किस तरह गिर कर शहीद हो गए हैं। जंग के हथियार तबाह हो गए हैं।” {i2:1} दाऊद यहूदाह का बादशाह बन जाता है {2:1} इस के बाद दाऊद ने रब से दरयाफ़्त किया, “क्या मैं यहूदाह के किसी शहर में वापस चला जाऊँ?” रब ने जवाब दिया, “हाँ, वापस जा।” दाऊद ने सवाल किया, “मैं किस शहर में जाऊँ?” रब ने जवाब दिया, “हब्रून में।” {2:2} चुनाँचे दाऊद अपनी दो बीवियों अख़ीनूअम यज़्रएली और नाबाल की बेवा अबीजेल कर्मिली के साथ हब्रून में जा बसा। {2:3} दाऊद ने अपने आदमियों को भी उन के ख़ानदानों समेत हब्रून और गिर्द-ओ-नवाह की आबादियों में मुन्तक़िल कर दिया। {2:4} एक दिन यहूदाह के आदमी हब्रून में आए और दाऊद को मसह करके अपना बादशाह बना लिया। जब दाऊद को ख़बर मिल गई कि यबीस-जिलिआद के मर्दों ने साऊल को दफ़ना दिया है {2:5} तो उस ने उन्हें पैग़ाम भेजा, “रब आप को इस के लिए बरकत दे कि आप ने अपने मालिक साऊल को दफ़न करके उस पर मेहरबानी की है। {2:6} जवाब में रब आप पर अपनी मेहरबानी और वफ़ादारी का इज़हार करे। मैं भी इस नेक अमल का अज्र दूँगा। {2:7} अब मज़बूत और दिलेर हों। आप का आक़ा साऊल तो फ़ौत हुआ है, लेकिन यहूदाह के क़बीले ने मुझे उस की जगह चुन लिया है।” {i2:8} इश्बोसत इस्राईल का बादशाह बन जाता है {2:8} इतने में साऊल की फ़ौज के कमाँडर अबिनैर बिन नैर ने साऊल के बेटे इश्बोसत को महनाइम शहर में ले जा कर {2:9} बादशाह मुक़र्रर कर दिया। जिलिआद, यज़्रएल, आशर, इफ़्राईम, बिनयमीन और तमाम इस्राईल उस के क़ब्ज़े में रहे। {2:10} सिर्फ़ यहूदाह का क़बीला दाऊद के साथ रहा। इश्बोसत 40 साल की उम्र में बादशाह बना, और उस की हुकूमत दो साल क़ाइम रही। {2:11} दाऊद हब्रून में यहूदाह पर साढ़े सात साल हुकूमत करता रहा। {i2:12} इस्राईल और यहूदाह के दरमियान जंग {2:12} एक दिन अबिनैर इश्बोसत बिन साऊल के मुलाज़िमों के साथ महनाइम से निकल कर जिबऊन आया। {2:13} यह देख कर दाऊद की फ़ौज योआब बिन ज़रूयाह की राहनुमाई में उन से लड़ने के लिए निकली। दोनों फ़ौजों की मुलाक़ात जिबऊन के तालाब पर हुई। अबिनैर की फ़ौज तालाब की उरली तरफ़ रुक गई और योआब की फ़ौज परली तरफ़। {2:14} अबिनैर ने योआब से कहा, “आओ, हमारे चन्द जवान हमारे सामने एक दूसरे का मुक़ाबला करें।” योआब बोला, “ठीक है।” {2:15} चुनाँचे हर फ़ौज ने बारह जवानों को चुन कर मुक़ाबले के लिए पेश किया। इश्बोसत और बिनयमीन के क़बीले के बारह जवान दाऊद के बारह जवानों के मुक़ाबले में खड़े हो गए। {2:16} जब मुक़ाबला शुरू हुआ तो हर एक ने एक हाथ से अपने मुख़ालिफ़ के बालों को पकड़ कर दूसरे हाथ से अपनी तलवार उस के पेट में घोंप दी। सब के सब एक साथ मर गए। बाद में जिबऊन की इस जगह का नाम ख़िल्क़त-हज़्ज़ूरीम पड़ गया। {2:17} फिर दोनों फ़ौजों के दरमियान निहायत सख़्त लड़ाई छिड़ गई। लड़ते लड़ते अबिनैर और उस के मर्द हार गए। {2:18} योआब के दो भाई अबीशै और असाहेल भी लड़ाई में हिस्सा ले रहे थे। असाहेल ग़ज़ाल की तरह तेज़ दौड़ सकता था। {2:19} जब अबिनैर शिकस्त खा कर भागने लगा तो असाहेल सीधा उस के पीछे पड़ गया और न दाईं, न बाईं तरफ़ हटा। {2:20} अबिनैर ने पीछे देख कर पूछा, “क्या आप ही हैं, असाहेल?” उस ने जवाब दिया, “जी, मैं ही हूँ।” {2:21} अबिनैर बोला, “दाईं या बाईं तरफ़ हट कर किसी और को पकड़ें! जवानों में से किसी से लड़ कर उस के हथियार और ज़िराबक्तर उतारें।” लेकिन असाहेल उस का ताक़्क़ुब करने से बाज़ न आया। {2:22} अबिनैर ने उसे आगाह किया, “ख़बरदार। मेरे पीछे से हट जाएँ, वर्ना आप को मार देने पर मज्बूर हो जाऊँगा। फिर आप के भाई योआब को किस तरह मुँह दिखाऊँगा?” {2:23} तो भी असाहेल ने पीछा न छोड़ा। यह देख कर अबिनैर ने अपने नेज़े का दस्ता इतने ज़ोर से उस के पेट में घोंप दिया कि उस का सिरा दूसरी तरफ़ निकल गया। असाहेल वहीं गिर कर जाँ-ब-हक़ हो गया। जिस ने भी वहाँ से गुज़र कर यह देखा वह वहीं रुक गया। {2:24} लेकिन योआब और अबीशै अबिनैर का ताक़्क़ुब करते रहे। जब सूरज ग़ुरूब होने लगा तो वह एक पहाड़ी के पास पहुँच गए जिस का नाम अम्मा था। यह जियाह के मुक़ाबिल उस रास्ते के पास है जो मुसाफ़िर को जिबऊन से रेगिस्तान में पहुँचाता है। {2:25} बिनयमीन के क़बीले के लोग वहाँ पहाड़ी पर अबिनैर के पीछे जमा हो कर दुबारा लड़ने के लिए तय्यार हो गए। {2:26} अबिनैर ने योआब को आवाज़ दी, “क्या यह ज़रूरी है कि हम हमेशा तक एक दूसरे को मौत के घाट उतारते जाएँ? क्या आप को समझ नहीं आई कि ऐसी हरकतें सिर्फ़ तल्ख़ी पैदा करती हैं? आप कब अपने मर्दों को हुक्म देंगे कि वह अपने इस्राईली भाइयों का ताक़्क़ुब करने से बाज़ आएँ?” {2:27} योआब ने जवाब दिया, “रब की हयात की क़सम, अगर आप लड़ने का हुक्म न देते तो मेरे लोग आज सुब्ह ही अपने भाइयों का ताक़्क़ुब करने से बाज़ आ जाते।” {2:28} उस ने नरसिंगा बजा दिया, और उस के आदमी रुक कर दूसरों का ताक़्क़ुब करने से बाज़ आए। यूँ लड़ाई ख़त्म हो गई। {2:29} उस पूरी रात के दौरान अबिनैर और उस के आदमी चलते गए। दरया-ए-यर्दन की वादी में से गुज़र कर उन्हों ने दरया को पार किया और फिर गहरी घाटी में से हो कर महनाइम पहुँच गए। {2:30} योआब भी अबिनैर और उस के लोगों को छोड़ कर वापस चला गया। जब उस ने अपने आदमियों को जमा करके गिना तो मालूम हुआ कि असाहेल के इलावा दाऊद के 19 आदमी मारे गए हैं। {2:31} इस के मुक़ाबले में अबिनैर के 360 आदमी हलाक हुए थे। सब बिनयमीन के क़बीले के थे। {2:32} योआब और उस के साथियों ने असाहेल की लाश उठा कर उसे बैत-लहम में उस के बाप की क़ब्र में दफ़न किया। फिर उसी रात अपना सफ़र जारी रख कर वह पौ फटते वक़्त हब्रून पहुँच गए। {3:1} साऊल के बेटे इश्बोसत और दाऊद के दरमियान यह जंग बड़ी देर तक जारी रही। लेकिन आहिस्ता आहिस्ता दाऊद ज़ोर पकड़ता गया जबकि इश्बोसत की ताक़त कम होती गई। {i3:2} दाऊद का ख़ानदान हब्रून में {3:2} हब्रून में दाऊद के बाज़ बेटे पैदा हुए। पहले का नाम अम्नोन था। उस की माँ अख़ीनूअम यज़्रएली थी। {3:3} फिर किलियाब पैदा हुआ जिस की माँ नाबाल की बेवा अबीजेल कर्मिली थी। तीसरा बेटा अबीसलूम था। उस की माँ माका थी जो जसूर के बादशाह तल्मी की बेटी थी। {3:4} चौथे का नाम अदूनियाह था। उस की माँ हज्जीत थी। पाँचवाँ बेटा सफ़तियाह था। उस की माँ अबीताल थी। {3:5} छटे का नाम इत्रिआम था। उस की माँ इज्ला थी। यह छः बेटे हब्रून में पैदा हुए। {i3:6} अबिनैर इश्बोसत से झगड़ता है {3:6} जितनी देर तक इश्बोसत और दाऊद के दरमियान जंग रही, उतनी देर तक अबिनैर साऊल के घराने का वफ़ादार रहा। {3:7} लेकिन एक दिन इश्बोसत अबिनैर से नाराज़ हुआ, क्यूँकि वह साऊल मरहूम की एक दाश्ता से हमबिसतर हो गया था। औरत का नाम रिस्फ़ा बिन्त अय्याह था। इश्बोसत ने शिकायत की, “आप ने मेरे बाप की दाश्ता से ऐसा सुलूक क्यूँ किया?” {3:8} अबिनैर बड़े ग़ुस्से में आ कर गरजा, “क्या मैं यहूदाह का कुत्ता हूँ कि आप मुझे ऐसा रवय्या दिखाते हैं? आज तक मैं आप के बाप के घराने और उस के रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए लड़ता रहा हूँ। मेरी ही वजह से आप अब तक दाऊद के हाथ से बचे रहे हैं। क्या यह इस का मुआवज़ा है? क्या एक ऐसी औरत के सबब से आप मुझे मुजरिम ठहरा रहे हैं? {3:9} अल्लाह मुझे सख़्त सज़ा दे अगर अब से हर मुमकिन कोशिश न करूँ कि दाऊद पूरे इस्राईल और यहूदाह पर बादशाह बन जाए, शिमाल में दान से ले {3:10} कर जुनूब में बैर-सबा तक। आख़िर रब ने ख़ुद क़सम खा कर दाऊद से वादा किया है कि मैं बादशाही साऊल के घराने से छीन कर तुझे दूँगा।” {3:11} यह सुन कर इश्बोसत अबिनैर से इतना डर गया कि मज़ीद कुछ कहने की जुरअत जाती रही। {i3:12} अबिनैर के दाऊद से मुज़ाकरात {3:12} अबिनैर ने दाऊद को पैग़ाम भेजा, “मुल्क किस का है? मेरे साथ मुआहदा कर लें तो मैं पूरे इस्राईल को आप के साथ मिला दूँगा।” {3:13} दाऊद ने जवाब दिया, “ठीक है, मैं आप के साथ मुआहदा करता हूँ। लेकिन एक ही शर्त पर, आप साऊल की बेटी मीकल को जो मेरी बीवी है मेरे घर पहुँचाएँ, वर्ना मैं आप से नहीं मिलूँगा।” {3:14} दाऊद ने इश्बोसत के पास भी क़ासिद भेज कर तक़ाज़ा किया, “मुझे मेरी बीवी मीकल जिस से शादी करने के लिए मैं ने सौ फ़िलिस्तियों को मारा वापस कर दें।” {3:15} इश्बोसत मान गया। उस ने हुक्म दिया कि मीकल को उस के मौजूदा शौहर फ़ल्तीएल बिन लैस से ले कर दाऊद को भेजा जाए। {3:16} लेकिन फ़ल्तीएल उसे छोड़ना नहीं चाहता था। वह रोते रोते बहूरीम तक अपनी बीवी के पीछे चलता रहा। तब अबिनैर ने उस से कहा, “अब जाओ! वापस चले जाओ!” तब वह वापस चला। {3:17} अबिनैर ने इस्राईल के बुज़ुर्गों से भी बात की, “आप तो काफ़ी देर से चाहते हैं कि दाऊद आप का बादशाह बन जाए। {3:18} अब क़दम उठाने का वक़्त आ गया है! क्यूँकि रब ने दाऊद से वादा किया है, ‘अपने ख़ादिम दाऊद से मैं अपनी क़ौम इस्राईल को फ़िलिस्तियों और बाक़ी तमाम दुश्मनों के हाथ से बचाऊँगा’।” {3:19} यही बात अबिनैर ने बिनयमीन के बुज़ुर्गों के पास जा कर भी की। इस के बाद वह हब्रून में दाऊद के पास आया ताकि उस के सामने इस्राईल और बिनयमीन के बुज़ुर्गों का फ़ैसला पेश करे। {3:20} बीस आदमी अबिनैर के साथ हब्रून पहुँच गए। उन का इस्तिक़्बाल करके दाऊद ने ज़ियाफ़त की। {3:21} फिर अबिनैर ने दाऊद से कहा, “अब मुझे इजाज़त दें। मैं अपने आक़ा और बादशाह के लिए तमाम इस्राईल को जमा कर लूँगा ताकि वह आप के साथ अह्द बांध कर आप को अपना बादशाह बना लें। फिर आप उस पूरे मुल्क पर हुकूमत करेंगे जिस तरह आप का दिल चाहता है।” फिर दाऊद ने अबिनैर को सलामती से रुख़्सत कर दिया। {i3:22} अबिनैर को क़त्ल किया जाता है {3:22} थोड़ी देर के बाद योआब दाऊद के आदमियों के साथ किसी लड़ाई से वापस आया। उन के पास बहुत सा लूटा हुआ माल था। लेकिन अबिनैर हब्रून में दाऊद के पास नहीं था, क्यूँकि दाऊद ने उसे सलामती से रुख़्सत कर दिया था। {3:23} जब योआब अपने आदमियों के साथ शहर में दाख़िल हुआ तो उसे इत्तिला दी गई, “अबिनैर बिन नैर बादशाह के पास था, और बादशाह ने उसे सलामती से रुख़्सत कर दिया है।” {3:24} योआब फ़ौरन बादशाह के पास गया और बोला, “आप ने यह क्या किया है? जब अबिनैर आप के पास आया तो आप ने उसे क्यूँ सलामती से रुख़्सत किया? अब उसे पकड़ने का मौक़ा जाता रहा है। {3:25} आप तो उसे जानते हैं। हक़ीक़त में वह इस लिए आया कि आप को मनवा कर आप के आने जाने और बाक़ी कामों के बारे में मालूमात हासिल करे।” {3:26} योआब ने दरबार से निकल कर क़ासिदों को अबिनैर के पीछे भेज दिया। वह अभी सफ़र करते करते सीरा के हौज़ पर से गुज़र रहा था कि क़ासिद उस के पास पहुँच गए। उन की दावत पर वह उन के साथ वापस गया। लेकिन बादशाह को इस का इल्म न था। {3:27} जब अबिनैर दुबारा हब्रून में दाख़िल होने लगा तो योआब शहर के दरवाज़े में उस का इस्तिक़्बाल करके उसे एक तरफ़ ले गया जैसे वह उस के साथ कोई ख़ुफ़िया बात करना चाहता हो। लेकिन अचानक उस ने अपनी तलवार को मियान से खैंच कर अबिनैर के पेट में घोंप दिया। इस तरह योआब ने अपने भाई असाहेल का बदला ले कर अबिनैर को मार डाला। {3:28} जब दाऊद को इस की इत्तिला मिली तो उस ने एलान किया, “मैं रब के सामने क़सम खाता हूँ कि बेक़ुसूर हूँ। मेरा अबिनैर की मौत में हाथ नहीं था। इस नाते से मुझ पर और मेरी बादशाही पर कभी भी इल्ज़ाम न लगाया जाए, {3:29} क्यूँकि योआब और उस के बाप का घराना क़ुसूरवार हैं। रब उसे और उस के बाप के घराने को मुनासिब सज़ा दे। अब से अबद तक उस की हर नस्ल में कोई न कोई हो जिसे ऐसे ज़ख़्म लग जाएँ जो भर न पाएँ, किसी को कोढ़ लग जाए, किसी को बैसाखियों की मदद से चलना पड़े, कोई ग़ैरतबई मौत मर जाए, या किसी को ख़ुराक की मुसलसल कमी रहे।” {3:30} यूँ योआब और उस के भाई अबीशै ने अपने भाई असाहेल का बदला लिया। उन्हों ने अबिनैर को इस लिए क़त्ल किया कि उस ने असाहेल को जिबऊन के क़रीब लड़ते वक़्त मौत के घाट उतार दिया था। {i3:31} दाऊद अबिनैर का मातम करता है {3:31} दाऊद ने योआब और उस के साथियों को हुक्म दिया, “अपने कपड़े फाड़ दो और टाट ओढ़ कर अबिनैर का मातम करो!” जनाज़े का बन्द-ओ-बस्त {3:32} हब्रून में किया गया। दाऊद ख़ुद जनाज़े के ऐन पीछे चला। क़ब्र पर बादशाह ऊँची आवाज़ से रो पड़ा, और बाक़ी सब लोग भी रोने लगे। {3:33} फिर दाऊद ने अबिनैर के बारे में मातमी गीत गाया, {3:34} “हाय, अबिनैर क्यूँ बेदीन की तरह मारा गया? तेरे हाथ बंधे हुए न थे, तेरे पाँओ ज़न्जीरों में जकड़े हुए न थे। जिस तरह कोई शरीरों के हाथ में आ कर मर जाता है उसी तरह तू हलाक हुआ।” तब तमाम लोग मज़ीद रोए। {3:35} दाऊद ने जनाज़े के दिन रोज़ा रखा। सब ने मिन्नत की कि वह कुछ खाए, लेकिन उस ने क़सम खा कर कहा, “अल्लाह मुझे सख़्त सज़ा दे अगर मैं सूरज के ग़ुरूब होने से पहले रोटी का एक टुकड़ा भी खा लूँ।” {3:36} बादशाह का यह रवय्या लोगों को बहुत पसन्द आया। वैसे भी दाऊद का हर अमल लोगों को पसन्द आता था। {3:37} यूँ तमाम हाज़िरीन बल्कि तमाम इस्राईलियों ने जान लिया कि बादशाह का अबिनैर को क़त्ल करने में हाथ न था। {3:38} दाऊद ने अपने दरबारियों से कहा, “क्या आप को समझ नहीं आई कि आज इस्राईल का बड़ा सूरमा फ़ौत हुआ है? {3:39} मुझे अभी अभी मसह करके बादशाह बनाया गया है, इस लिए मेरी इतनी ताक़त नहीं कि ज़रूयाह के इन दो बेटों योआब और अबीशै को कंट्रोल करूँ। रब उन्हें उन की इस शरीर हरकत की मुनासिब सज़ा दे!” {i4:1} इश्बोसत को क़त्ल किया जाता है {4:1} जब साऊल के बेटे इश्बोसत को इत्तिला मिली कि अबिनैर को हब्रून में क़त्ल किया गया है तो वह हिम्मत हार गया, और तमाम इस्राईल सख़्त घबरा गया। {4:2} इश्बोसत के दो आदमी थे जिन के नाम बाना और रैकाब थे। जब कभी इश्बोसत के फ़ौजी छापा मारने के लिए निकलते तो यह दो भाई उन पर मुक़र्रर थे। उन का बाप रिम्मोन बिनयमीन के क़बाइली इलाक़े के शहर बैरोत का रहने वाला था। बैरोत भी बिनयमीन में शुमार किया जाता है, {4:3} अगरचे उस के बाशिन्दों को हिज्रत करके जित्तैम में बसना पड़ा जहाँ वह आज तक परदेसी की हैसियत से रहते हैं। {4:4} यूनतन का एक बेटा ज़िन्दा रह गया था जिस का नाम मिफ़ीबोसत था। पाँच साल की उम्र में यज़्रएल से ख़बर आई थी कि साऊल और यूनतन मारे गए हैं। तब उस की आया उसे ले कर कहीं पनाह लेने के लिए भाग गई थी। लेकिन जल्दी की वजह से मिफ़ीबोसत गिर कर लंगड़ा हो गया था। उस वक़्त से उस की दोनों टाँगें मफ़्लूज थीं। {4:5} एक दिन रिम्मोन बैरोती के बेटे रैकाब और बाना दोपहर के वक़्त इश्बोसत के घर गए। गर्मी उरूज पर थी, इस लिए इश्बोसत आराम कर रहा था। {4:6} दोनों आदमी यह बहाना पेश करके घर के अन्दरूनी कमरे में गए कि हम कुछ अनाज ले जाने के लिए आए हैं। जब इश्बोसत के कमरे में पहुँचे तो वह चारपाई पर लेटा सो रहा था। यह {4:7} देख कर उन्हों ने उस के पेट में तलवार घोंप दी और फिर उस का सर काट कर वहाँ से सलामती से निकल आए। पूरी रात सफ़र करते करते वह दरया-ए-यर्दन की वादी में से गुज़र कर {4:8} हब्रून पहुँच गए। वहाँ उन्हों ने दाऊद को इश्बोसत का सर दिखा कर कहा, “यह देखें, साऊल के बेटे इश्बोसत का सर। आप का दुश्मन साऊल बार बार आप को मार देने की कोशिश करता रहा, लेकिन आज रब ने उस से और उस की औलाद से आप का बदला लिया है।” {i4:9} दाऊद क़ातिलों को सज़ा देता है {4:9} लेकिन दाऊद ने जवाब दिया, “रब की हयात की क़सम जिस ने फ़िद्या दे कर मुझे हर मुसीबत से बचाया है, {4:10} जिस आदमी ने मुझे उस वक़्त सिक़्लाज में साऊल की मौत की इत्तिला दी वह भी समझता था कि मैं दाऊद को अच्छी ख़बर पहुँचा रहा हूँ। लेकिन मैं ने उसे पकड़ कर सज़ा-ए-मौत दे दी। यही था वह अज्र जो उसे ऐसी ख़बर पहुँचाने के इवज़ मिला! {4:11} अब तुम शरीर लोगों ने इस से बढ़ कर किया। तुम ने बेक़ुसूर आदमी को उस के अपने घर में उस की अपनी चारपाई पर क़त्ल कर दिया है। तो क्या मेरा फ़र्ज़ नहीं कि तुम को इस क़त्ल की सज़ा दे कर तुम्हें मुल्क में से मिटा दूँ?” {4:12} दाऊद ने दोनों को मार देने का हुक्म दिया। उस के मुलाज़िमों ने उन्हें मार कर उन के हाथों और पैरों को काट डाला और उन की लाशों को हब्रून के तालाब के क़रीब कहीं लटका दिया। इश्बोसत के सर को उन्हों ने अबिनैर की क़ब्र में दफ़नाया। {i5:1} दाऊद पूरे इस्राईल का बादशाह बन जाता है {5:1} उस वक़्त इस्राईल के तमाम क़बीले हब्रून में दाऊद के पास आए और कहा, “हम आप ही की क़ौम और आप ही के रिश्तेदार हैं। {5:2} माज़ी में भी जब साऊल बादशाह था तो आप ही फ़ौजी मुहिम्मों में इस्राईल की क़ियादत करते रहे। और रब ने आप से वादा भी किया है कि तू मेरी क़ौम इस्राईल का चरवाहा बन कर उस पर हुकूमत करेगा।” {5:3} जब इस्राईल के तमाम बुज़ुर्ग हब्रून पहुँचे तो दाऊद बादशाह ने रब के हुज़ूर उन के साथ अह्द बांधा, और उन्हों ने उसे मसह करके इस्राईल का बादशाह बना दिया। {5:4} दाऊद 30 साल की उम्र में बादशाह बन गया। उस की हुकूमत 40 साल तक जारी रही। {5:5} पहले साढ़े सात साल वह सिर्फ़ यहूदाह का बादशाह था और उस का दार-उल-हकूमत हब्रून रहा। बाक़ी 33 साल वह यरूशलम में रह कर यहूदाह और इस्राईल दोनों पर हुकूमत करता रहा। {i5:6} दाऊद यरूशलम पर क़ब्ज़ा करता है {5:6} बादशाह बनने के बाद दाऊद अपने फ़ौजियों के साथ यरूशलम गया ताकि उस पर हम्ला करे। वहाँ अब तक यबूसी आबाद थे। दाऊद को देख कर यबूसियों ने उस का मज़ाक़ उड़ाया, “आप हमारे शहर में कभी दाख़िल नहीं हो पाएँगे! आप को रोकने के लिए हमारे लंगड़े और अंधे काफ़ी हैं।” उन्हें पूरा यक़ीन था कि दाऊद शहर में किसी भी तरीक़े से नहीं आ सकेगा। {5:7} तो भी दाऊद ने सिय्यून के क़िले पर क़ब्ज़ा कर लिया जो आजकल ‘दाऊद का शहर’ कहलाता है। {5:8} जिस दिन उन्हों ने शहर पर हम्ला किया उस ने एलान किया, “जो भी यबूसियों पर फ़त्ह पाना चाहे उसे पानी की सुरंग में से गुज़र कर शहर में घुसना पड़ेगा ताकि उन लंगड़ों और अंधों को मारे जिन से मेरी जान नफ़रत करती है।” इस लिए आज तक कहा जाता है, “लंगड़ों और अंधों को घर में जाने की इजाज़त नहीं।” {5:9} यरूशलम पर फ़त्ह पाने के बाद दाऊद क़िले में रहने लगा। उस ने उसे ‘दाऊद का शहर’ क़रार दिया और उस के इर्दगिर्द शहर को बढ़ाने लगा। यह तामीरी काम इर्दगिर्द के चबूतरों से शुरू हुआ और होते होते क़िले तक पहुँच गया। {5:10} यूँ दाऊद ज़ोर पकड़ता गया, क्यूँकि रब्ब-उल-अफ़्वाज उस के साथ था। {i5:11} दाऊद की तरक़्क़ी {5:11} एक दिन सूर के बादशाह हीराम ने दाऊद के पास वफ़द भेजा। बढ़ई और राज भी साथ थे। उन के पास देवदार की लकड़ी थी, और उन्हों ने दाऊद के लिए महल बना दिया। {5:12} यूँ दाऊद ने जान लिया कि रब ने मुझे इस्राईल का बादशाह बना कर मेरी बादशाही अपनी क़ौम इस्राईल की ख़ातिर सरफ़राज़ कर दी है। {5:13} हब्रून से यरूशलम में मुन्तक़िल होने के बाद दाऊद ने मज़ीद बीवियों और दाश्ताओं से शादी की। नतीजे में यरूशलम में उस के कई बेटे-बेटियाँ पैदा हुए। {5:14} जो बेटे वहाँ पैदा हुए वह यह थे: सम्मूअ, सोबाब, नातन, सुलेमान, {5:15} इब्हार, इलीसूअ, नफ़ज, यफ़ीअ, {5:16} इलीसमा, इल्यदा और इलीफ़लत। {i5:17} फ़िलिस्तियों पर फ़त्ह {5:17} जब फ़िलिस्तियों को इत्तिला मिली कि दाऊद को मसह करके इस्राईल का बादशाह बनाया गया है तो उन्हों ने अपने फ़ौजियों को इस्राईल में भेज दिया ताकि उसे पकड़ लें। लेकिन दाऊद को पता चल गया, और उस ने एक पहाड़ी क़िले में पनाह ले ली। {5:18} जब फ़िलिस्ती इस्राईल में पहुँच कर वादी-ए-रफ़ाईम में फैल गए {5:19} तो दाऊद ने रब से दरयाफ़्त किया, “क्या मैं फ़िलिस्तियों पर हम्ला करूँ? क्या तू मुझे उन पर फ़त्ह बख़्शेगा?” रब ने जवाब दिया, “हाँ, उन पर हम्ला कर! मैं उन्हें ज़रूर तेरे क़ब्ज़े में कर दूँगा।” {5:20} चुनाँचे दाऊद अपने फ़ौजियों को ले कर बाल-पराज़ीम गया। वहाँ उस ने फ़िलिस्तियों को शिकस्त दी। बाद में उस ने गवाही दी, “जितने ज़ोर से बन्द के टूट जाने पर पानी उस से फूट निकलता है उतने ज़ोर से आज रब मेरे देखते देखते दुश्मन की सफ़ों में से फूट निकला है।” चुनाँचे उस जगह का नाम बाल-पराज़ीम यानी ‘फूट निकलने का मालिक’ पड़ गया। {5:21} फ़िलिस्ती अपने बुत छोड़ कर भाग गए, और वह दाऊद और उस के आदमियों के क़ब्ज़े में आ गए। {5:22} एक बार फिर फ़िलिस्ती आ कर वादी-ए-रफ़ाईम में फैल गए। {5:23} जब दाऊद ने रब से दरयाफ़्त किया तो उस ने जवाब दिया, “इस मर्तबा उन का सामना मत करना बल्कि उन के पीछे जा कर बका के दरख़्तों के सामने उन पर हम्ला कर। {5:24} जब उन दरख़्तों की चोटियों से क़दमों की चाप सुनाई दे तो ख़बरदार! यह इस का इशारा होगा कि रब ख़ुद तेरे आगे आगे चल कर फ़िलिस्तियों को मारने के लिए निकल आया है।” {5:25} दाऊद ने ऐसा ही किया और नतीजे में फ़िलिस्तियों को शिकस्त दे कर जिबऊन से ले कर जज़र तक उन का ताक़्क़ुब किया। {i6:1} दाऊद अह्द का सन्दूक़ यरूशलम में ले आता है {6:1} एक बार फिर दाऊद ने इस्राईल के चुनीदा आदमियों को जमा किया। 30,000 अफ़राद थे। {6:2} उन के साथ मिल कर वह यहूदाह के बाला पहुँच गया ताकि अल्लाह का सन्दूक़ उठा कर यरूशलम ले जाएँ, वही सन्दूक़ जिस पर रब्ब-उल-अफ़्वाज के नाम का ठप्पा लगा है और जहाँ वह सन्दूक़ के ऊपर करूबी फ़रिश्तों के दरमियान तख़्तनशीन है। {6:3} लोगों ने अल्लाह के सन्दूक़ को पहाड़ी पर वाक़े अबीनदाब के घर से निकाल कर एक नई बैलगाड़ी पर रख {6:4} दिया, और अबीनदाब के दो बेटे उज़्ज़ा और अख़ियो उसे यरूशलम की तरफ़ ले जाने लगे। अख़ियो गाड़ी के आगे आगे {6:5} और दाऊद बाक़ी तमाम लोगों के साथ पीछे चल रहा था। सब रब के हुज़ूर पूरे ज़ोर से ख़ुशी मनाने और गीत गाने लगे। मुख़्तलिफ़ साज़ भी बजाए जा रहे थे। फ़िज़ा सितारों, सरोदों, दफ़ों, ख़न्जरियों और झाँझों की आवाज़ों से गूँज उठी। {6:6} वह गन्दुम गाहने की एक जगह पर पहुँच गए जिस के मालिक का नाम नकोन था। वहाँ बैल अचानक बेकाबू हो गए। उज़्ज़ा ने जल्दी से अल्लाह का सन्दूक़ पकड़ लिया ताकि वह गिर न जाए। {6:7} उसी लम्हे रब का ग़ज़ब उस पर नाज़िल हुआ, क्यूँकि उस ने अल्लाह के सन्दूक़ को छूने की जुरअत की थी। वहीं अल्लाह के सन्दूक़ के पास ही उज़्ज़ा गिर कर हलाक हो गया। {6:8} दाऊद को बड़ा रंज हुआ कि रब का ग़ज़ब उज़्ज़ा पर यूँ टूट पड़ा है। उस वक़्त से उस जगह का नाम परज़-उज़्ज़ा यानी ‘उज़्ज़ा पर टूट पड़ना’ है। {6:9} उस दिन दाऊद को रब से ख़ौफ़ आया। उस ने सोचा, “रब का सन्दूक़ किस तरह मेरे पास पहुँच सकेगा?” {6:10} चुनाँचे उस ने फ़ैसला किया कि हम रब का सन्दूक़ यरूशलम नहीं ले जाएंगे बल्कि उसे ओबेद-अदोम जाती के घर में मह्फ़ूज़ रखेंगे। {6:11} वहाँ वह तीन माह तक पड़ा रहा। इन तीन महीनों के दौरान रब ने ओबेद-अदोम और उस के पूरे घराने को बरकत दी। {6:12} एक दिन दाऊद को इत्तिला दी गई, “जब से अल्लाह का सन्दूक़ ओबेद-अदोम के घर में है उस वक़्त से रब ने उस के घराने और उस की पूरी मिलकियत को बरकत दी है।” यह सुन कर दाऊद ओबेद-अदोम के घर गया और ख़ुशी मनाते हुए अल्लाह के सन्दूक़ को दाऊद के शहर ले आया। {6:13} छः क़दमों के बाद दाऊद ने रब का सन्दूक़ उठाने वालों को रोक कर एक साँड और एक मोटा-ताज़ा बछड़ा क़ुर्बान किया। {6:14} जब जुलूस आगे निकला तो दाऊद पूरे ज़ोर के साथ रब के हुज़ूर नाचने लगा। वह कतान का बालापोश पहने हुए था। {6:15} ख़ुशी के नारे लगा लगा कर और नरसिंगे फूँक फूँक कर दाऊद और तमाम इस्राईली रब का सन्दूक़ यरूशलम ले आए। {6:16} रब का सन्दूक़ दाऊद के शहर में दाख़िल हुआ तो दाऊद की बीवी मीकल बिन्त साऊल खिड़की में से जुलूस को देख रही थी। जब बादशाह रब के हुज़ूर कूदता और नाचता हुआ नज़र आया तो मीकल ने दिल में उसे हक़ीर जाना। {6:17} रब का सन्दूक़ उस तम्बू के दरमियान में रखा गया जो दाऊद ने उस के लिए लगवाया था। फिर दाऊद ने रब के हुज़ूर भस्म होने वाली और सलामती की क़ुर्बानियाँ पेश कीं। {6:18} इस के बाद उस ने क़ौम को रब्ब-उल-अफ़्वाज के नाम से बरकत दे कर {6:19} हर इस्राईली मर्द और औरत को एक रोटी, खजूर की एक टिक्की और किशमिश की एक टिक्की दे दी। फिर तमाम लोग अपने अपने घरों को वापस चले गए। {6:20} दाऊद भी अपने घर लौटा ताकि अपने ख़ानदान को बरकत दे कर सलाम करे। वह अभी महल के अन्दर नहीं पहुँचा था कि मीकल निकल कर उस से मिलने आई। उस ने तन्ज़न कहा, “वाह जी वाह। आज इस्राईल का बादशाह कितनी शान के साथ लोगों को नज़र आया है! अपने लोगों की लौंडियों के सामने ही उस ने अपने कपड़े उतार दिए, बिलकुल उसी तरह जिस तरह गंवार करते हैं।” {6:21} दाऊद ने जवाब दिया, “मैं रब ही के हुज़ूर नाच रहा था, जिस ने आप के बाप और उस के ख़ानदान को तर्क करके मुझे चुन लिया और इस्राईल का बादशाह बना दिया है। उसी की ताज़ीम में मैं आइन्दा भी नाचूँगा। {6:22} हाँ, मैं इस से भी ज़्यादा ज़लील होने के लिए तय्यार हूँ। जहाँ तक लौंडियों का ताल्लुक़ है, वह ज़रूर मेरी इज़्ज़त करेंगी।” {6:23} जीते जी मीकल बेऔलाद रही। {i7:1} रब दाऊद से अबदी बादशाही का वादा करता है {7:1} दाऊद बादशाह सुकून से अपने महल में रहने लगा, क्यूँकि रब ने इर्दगिर्द के दुश्मनों को उस पर हम्ला करने से रोक दिया था। {7:2} एक दिन दाऊद ने नातन नबी से बात की, “देखें, मैं यहाँ देवदार के महल में रहता हूँ जबकि अल्लाह का सन्दूक़ अब तक तम्बू में पड़ा है। यह मुनासिब नहीं है!” {7:3} नातन ने बादशाह की हौसलाअफ़्ज़ाई की, “जो कुछ भी आप करना चाहते हैं वह करें। रब आप के साथ है।” {7:4} लेकिन उसी रात रब नातन से हमकलाम हुआ, {7:5} “मेरे ख़ादिम दाऊद के पास जा कर उसे बता दे कि रब फ़रमाता है, ‘क्या तू मेरी रिहाइश के लिए मकान तामीर करेगा? हरगिज़ नहीं! {7:6} आज तक मैं किसी मकान में नहीं रहा। जब से मैं इस्राईलियों को मिस्र से निकाल लाया उस वक़्त से मैं ख़ैमे में रह कर जगह-ब-जगह फिरता रहा हूँ। {7:7} जिस दौरान मैं तमाम इस्राईलियों के साथ इधर उधर फिरता रहा क्या मैं ने इस्राईल के उन राहनुमाओं से कभी इस नाते से शिकायत की जिन्हें मैं ने अपनी क़ौम की गल्लाबानी करने का हुक्म दिया था? क्या मैं ने उन में से किसी से कहा कि तुम ने मेरे लिए देवदार का घर क्यूँ नहीं बनाया?’ {7:8} चुनाँचे मेरे ख़ादिम दाऊद को बता दे, ‘रब्ब-उल-अफ़्वाज फ़रमाता है कि मैं ही ने तुझे चरागाह में भेड़ों की गल्लाबानी करने से फ़ारिग़ करके अपनी क़ौम इस्राईल का बादशाह बना दिया है। {7:9} जहाँ भी तू ने क़दम रखा वहाँ मैं तेरे साथ रहा हूँ। तेरे देखते देखते मैं ने तेरे तमाम दुश्मनों को हलाक कर दिया है। अब मैं तेरा नाम सरफ़राज़ कर दूँगा, वह दुनिया के सब से अज़ीम आदमियों के नामों के बराबर ही होगा। {7:10} और मैं अपनी क़ौम इस्राईल के लिए एक वतन मुहय्या करूँगा, पौदे की तरह उन्हें यूँ लगा दूँगा कि वह जड़ पकड़ कर मह्फ़ूज़ रहेंगे और कभी बेचैन नहीं होंगे। बेदीन क़ौमें उन्हें उस तरह नहीं दबाएँगी जिस तरह माज़ी में किया करती थीं, {7:11} उस वक़्त से जब मैं क़ौम पर क़ाज़ी मुक़र्रर करता था। मैं तेरे दुश्मनों को तुझ से दूर रख कर तुझे अम्न-ओ-अमान अता करूँगा। आज रब फ़रमाता है कि मैं ही तेरे लिए घर बनाऊँगा। {7:12} जब तू बूढ़ा हो कर कूच कर जाएगा और अपने बापदादा के साथ आराम करेगा तो मैं तेरी जगह तेरे बेटों में से एक को तख़्त पर बिठा दूँगा। उस की बादशाही को मैं मज़बूत बना दूँगा। {7:13} वही मेरे नाम के लिए घर तामीर करेगा, और मैं उस की बादशाही का तख़्त अबद तक क़ाइम रखूँगा। {7:14} मैं उस का बाप हूँगा, और वह मेरा बेटा होगा। जब कभी उस से ग़लती होगी तो मैं उसे यूँ छड़ी से सज़ा दूँगा जिस तरह इन्सानी बाप अपने बेटे की तर्बियत करता है। {7:15} लेकिन मेरी नज़र-ए-करम कभी उस से नहीं हटेगी। उस के साथ मैं वह सुलूक नहीं करूँगा जो मैं ने साऊल के साथ किया जब उसे तेरे सामने से हटा दिया। {7:16} तेरा घराना और तेरी बादशाही हमेशा मेरे हुज़ूर क़ाइम रहेगी, तेरा तख़्त हमेशा मज़बूत रहेगा’।” {i7:17} दाऊद की शुक्रगुज़ारी {7:17} नातन ने दाऊद के पास जा कर उसे सब कुछ सुनाया जो रब ने उसे रोया में बताया था। {7:18} तब दाऊद अह्द के सन्दूक़ के पास गया और रब के हुज़ूर बैठ कर दुआ करने लगा, “ऐ रब क़ादिर-ए-मुतलक़, मैं कौन हूँ और मेरा ख़ानदान क्या हैसियत रखता है कि तू ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया है? {7:19} और अब ऐ रब क़ादिर-ए-मुतलक़, तू मुझे और भी ज़्यादा अता करने को है, क्यूँकि तू ने अपने ख़ादिम के घराने के मुस्तक़बिल के बारे में भी वादा किया है। क्या तू आम तौर पर इन्सान के साथ ऐसा सुलूक करता है? हरगिज़ नहीं! {7:20} लेकिन मैं मज़ीद क्या कहूँ? ऐ रब क़ादिर-ए-मुतलक़, तू तो अपने ख़ादिम को जानता है। {7:21} तू ने अपने फ़रमान की ख़ातिर और अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ यह अज़ीम काम करके अपने ख़ादिम को इत्तिला दी है। {7:22} ऐ रब क़ादिर-ए-मुतलक़, तू कितना अज़ीम है! तुझ जैसा कोई नहीं है। हम ने अपने कानों से सुन लिया है कि तेरे सिवा कोई और ख़ुदा नहीं है। {7:23} दुनिया में कौन सी क़ौम तेरी उम्मत इस्राईल की मानिन्द है? तू ने इसी एक क़ौम का फ़िद्या दे कर उसे ग़ुलामी से छुड़ाया और अपनी क़ौम बना लिया। तू ने इस्राईल के वास्ते बड़े और हैबतनाक काम करके अपने नाम की शोहरत फैला दी। हमें मिस्र से रिहा करके तू ने क़ौमों और उन के देवताओं को हमारे आगे से निकाल दिया। {7:24} ऐ रब, तू इस्राईल को हमेशा के लिए अपनी क़ौम बना कर उन का ख़ुदा बन गया है। {7:25} चुनाँचे ऐ रब क़ादिर-ए-मुतलक़, जो बात तू ने अपने ख़ादिम और उस के घराने के बारे में की है उसे अबद तक क़ाइम रख और अपना वादा पूरा कर। {7:26} तब तेरा नाम अबद तक मश्हूर रहेगा और लोग तस्लीम करेंगे कि रब्ब-उल-अफ़्वाज इस्राईल का ख़ुदा है। फिर तेरे ख़ादिम दाऊद का घराना भी तेरे हुज़ूर क़ाइम रहेगा। {7:27} ऐ रब्ब-उल-अफ़्वाज, इस्राईल के ख़ुदा, तू ने अपने ख़ादिम के कान को इस बात के लिए खोल दिया है। तू ही ने फ़रमाया, ‘मैं तेरे लिए घर तामीर करूँगा।’ सिर्फ़ इसी लिए तेरे ख़ादिम ने यूँ तुझ से दुआ करने की जुरअत की है। {7:28} ऐ रब क़ादिर-ए-मुतलक़, तू ही ख़ुदा है, और तेरी ही बातों पर एतिमाद किया जा सकता है। तू ने अपने ख़ादिम से इन अच्छी चीज़ों का वादा किया है। {7:29} अब अपने ख़ादिम के घराने को बरकत देने पर राज़ी हो ताकि वह हमेशा तक तेरे हुज़ूर क़ाइम रहे। क्यूँकि तू ही ने यह फ़रमाया है, और चूँकि तू ऐ रब क़ादिर-ए-मुतलक़ ने बरकत दी है इस लिए तेरे ख़ादिम का घराना अबद तक मुबारक रहेगा।” {i8:1} दाऊद की जंगें {8:1} फिर ऐसा वक़्त आया कि दाऊद ने फ़िलिस्तियों को शिकस्त दे कर उन्हें अपने ताबे कर लिया और हुकूमत की बागडोर उन के हाथों से छीन ली। {8:2} उस ने मोआबियों पर भी फ़त्ह पाई। मोआबी क़ैदियों की क़तार बना कर उस ने उन्हें ज़मीन पर लिटा दिया। फिर रस्सी का टुकड़ा ले कर उस ने क़तार का नाप लिया। जितने लोग रस्सी की लम्बाई में आ गए वह एक गुरोह बन गए। यूँ दाऊद ने लोगों को गुरोहों में तक़्सीम किया। फिर उस ने गुरोहों के तीन हिस्से बना कर दो हिस्सों के सर क़लम किए और एक हिस्से को ज़िन्दा छोड़ दिया। लेकिन जितने क़ैदी छूट गए वह दाऊद के ताबे रह कर उसे ख़राज देते रहे। {8:3} दाऊद ने शिमाली शाम के शहर ज़ोबाह के बादशाह हददअज़र बिन रहोब को भी हरा दिया जब हददअज़र दरया-ए-फ़ुरात पर दुबारा क़ाबू पाने के लिए निकल आया था। {8:4} दाऊद ने 1,700 घुड़सवारों और 20,000 पियादा सिपाहियों को गिरिफ़्तार कर लिया। रथों के 100 घोड़ों को उस ने अपने लिए मह्फ़ूज़ रखा, जबकि बाक़ियों की उस ने कोंचें काट दीं ताकि वह आइन्दा जंग के लिए इस्तेमाल न हो सकें। {8:5} जब दमिश्क़ के अरामी बाशिन्दे ज़ोबाह के बादशाह हददअज़र की मदद करने आए तो दाऊद ने उन के 22,000 अफ़राद हलाक कर दिए। {8:6} फिर उस ने दमिश्क़ के इलाक़े में अपनी फ़ौजी चौकियाँ क़ाइम कीं। अरामी उस के ताबे हो गए और उसे ख़राज देते रहे। जहाँ भी दाऊद गया वहाँ रब ने उसे कामयाबी बख़्शी। {8:7} सोने की जो ढालें हददअज़र के अफ़्सरों के पास थीं उन्हें दाऊद यरूशलम ले गया। {8:8} हददअज़र के दो शहरों बताह और बेरोती से उस ने कस्रत का पीतल छीन लिया। {8:9} जब हमात के बादशाह तूई को इत्तिला मिली कि दाऊद ने हददअज़र की पूरी फ़ौज पर फ़त्ह पाई है {8:10} तो उस ने अपने बेटे यूराम को दाऊद के पास भेजा ताकि उसे सलाम कहे। यूराम ने दाऊद को हददअज़र पर फ़त्ह के लिए मुबारकबाद दी, क्यूँकि हददअज़र तूई का दुश्मन था, और उन के दरमियान जंग रही थी। यूराम ने दाऊद को सोने, चाँदी और पीतल के तोह्फ़े भी पेश किए। {8:11} दाऊद ने यह चीज़ें रब के लिए मख़्सूस कर दीं। जहाँ भी वह दूसरी क़ौमों पर ग़ालिब आया वहाँ की सोना-चाँदी उस ने रब के लिए मख़्सूस कर दी। {8:12} यूँ अदोम, मोआब, अम्मोन, फिलिस्तिया, अमालीक़ और ज़ोबाह के बादशाह हददअज़र बिन रहोब की सोना-चाँदी रब को पेश की गई। {8:13} जब दाऊद ने नमक की वादी में अदोमियों पर फ़त्ह पाई तो उस की शोहरत मज़ीद फैल गई। उस जंग में दुश्मन के 18,000 अफ़राद हलाक हुए। {8:14} दाऊद ने अदोम के पूरे मुल्क में अपनी फ़ौजी चौकियाँ क़ाइम कीं, और तमाम अदोमी दाऊद के ताबे हो गए। दाऊद जहाँ भी जाता रब उस की मदद करके उसे फ़त्ह बख़्शता। {i8:15} दाऊद के आला अफ़्सर {8:15} जितनी देर दाऊद पूरे इस्राईल पर हुकूमत करता रहा उतनी देर तक उस ने ध्यान दिया कि क़ौम के हर एक शख़्स को इन्साफ़ मिल जाए। {8:16} योआब बिन ज़रूयाह फ़ौज पर मुक़र्रर था। यहूसफ़त बिन अख़ीलूद बादशाह का मुशीर-ए-ख़ास था। {8:17} सदोक़ बिन अख़ीतूब और अख़ीमलिक बिन अबियातर इमाम थे। सिरायाह मीरमुन्शी था। {8:18} बिनायाह बिन यहोयदा दाऊद के ख़ास दस्ते बनाम करेती-ओ-फ़लेती का कप्तान था। दाऊद के बेटे इमाम थे। {i9:1} दाऊद यूनतन के बेटे पर मेहरबानी करता है {9:1} एक दिन दाऊद पूछने लगा, “क्या साऊल के ख़ानदान का कोई फ़र्द बच गया है? मैं यूनतन की ख़ातिर उस पर अपनी मेहरबानी का इज़हार करना चाहता हूँ।” {9:2} एक आदमी को बुलाया गया जो साऊल के घराने का मुलाज़िम था। उस का नाम ज़ीबा था। दाऊद ने सवाल किया, “क्या आप ज़ीबा हैं?” ज़ीबा ने जवाब दिया, “जी, आप का ख़ादिम हाज़िर है।” {9:3} बादशाह ने दरयाफ़्त किया, “क्या साऊल के ख़ानदान का कोई फ़र्द ज़िन्दा रह गया है? मैं उस पर अल्लाह की मेहरबानी का इज़हार करना चाहता हूँ।” ज़ीबा ने कहा, “यूनतन का एक बेटा अब तक ज़िन्दा है। वह दोनों टाँगों से मफ़्लूज है।” {9:4} दाऊद ने पूछा, “वह कहाँ है?” ज़ीबा ने जवाब दिया, “वह लो-दिबार में मकीर बिन अम्मीएल के हाँ रहता है।” {9:5} दाऊद ने उसे फ़ौरन दरबार में बुला लिया। {9:6} यूनतन के जिस बेटे का ज़िक्र ज़ीबा ने किया वह मिफ़ीबोसत था। जब उसे दाऊद के सामने लाया गया तो उस ने मुँह के बल झुक कर उस की इज़्ज़त की। दाऊद ने कहा, “मिफ़ीबोसत!” उस ने जवाब दिया, “जी, आप का ख़ादिम हाज़िर है।” {9:7} दाऊद बोला, “डरें मत। आज मैं आप के बाप यूनतन के साथ किया हुआ वादा पूरा करके आप पर अपनी मेहरबानी का इज़हार करना चाहता हूँ। अब सुनें! मैं आप को आप के दादा साऊल की तमाम ज़मीनें वापस कर देता हूँ। इस के इलावा मैं चाहता हूँ कि आप रोज़ाना मेरे साथ खाना खाया करें।” {9:8} मिफ़ीबोसत ने दुबारा झुक कर बादशाह की ताज़ीम की, “मैं कौन हूँ कि आप मुझ जैसे मुर्दा कुत्ते पर ध्यान दे कर ऐसी मेहरबानी फ़रमाएँ!” {9:9} दाऊद ने साऊल के पुराने मुलाज़िम ज़ीबा को बुला कर उसे हिदायत दी, “मैं ने आप के मालिक के पोते को साऊल और उस के ख़ानदान की तमाम मिलकियत दे दी है। {9:10} अब आप की ज़िम्मादारी यह है कि आप अपने बेटों और नौकरों के साथ उस के खेतों को सँभालें ताकि उस का ख़ानदान ज़मीनों की पैदावार से गुज़ारा कर सके। लेकिन मिफ़ीबोसत ख़ुद यहाँ रह कर मेरे बेटों की तरह मेरे साथ खाना खाया करेगा।” (ज़ीबा के 15 बेटे और 20 नौकर थे)। {9:11} ज़ीबा ने जवाब दिया, “मैं आप की ख़िदमत में हाज़िर हूँ। जो भी हुक्म आप देंगे मैं करने के लिए तय्यार हूँ।” {9:12} उस दिन से ज़ीबा के घराने के तमाम अफ़राद मिफ़ीबोसत के मुलाज़िम हो गए। मिफ़ीबोसत ख़ुद जो दोनों टाँगों से मफ़्लूज था यरूशलम {9:13} में रिहाइशपज़ीर हुआ और रोज़ाना दाऊद बादशाह के साथ खाना खाता रहा। उस का एक छोटा बेटा था जिस का नाम मीका था। {i10:1} अम्मोनी दाऊद की बेइज़्ज़ती करते हैं {10:1} कुछ देर के बाद अम्मोनियों का बादशाह फ़ौत हुआ, और उस का बेटा हनून तख़्तनशीन हुआ। {10:2} दाऊद ने सोचा, “नाहस ने हमेशा मुझ पर मेहरबानी की थी, इस लिए अब मैं भी उस के बेटे हनून पर मेहरबानी करूँगा।” उस ने बाप की वफ़ात का अफ़्सोस करने के लिए हनून के पास वफ़द भेजा। लेकिन जब दाऊद के सफ़ीर अम्मोनियों के दरबार में पहुँच गए {10:3} तो उस मुल्क के बुज़ुर्ग हनून बादशाह के कान में मन्फ़ी बातें भरने लगे, “क्या दाऊद ने इन आदमियों को वाक़ई सिर्फ़ इस लिए भेजा है कि वह अफ़्सोस करके आप के बाप का एहतिराम करें? हरगिज़ नहीं! यह सिर्फ़ बहाना है। असल में यह जासूस हैं जो हमारे दार-उल-हकूमत के बारे में मालूमात हासिल करना चाहते हैं ताकि उस पर क़ब्ज़ा कर सकें।” {10:4} चुनाँचे हनून ने दाऊद के आदमियों को पकड़वा कर उन की दाढ़ियों का आधा हिस्सा मुंडवा दिया और उन के लिबास को कमर से ले कर पाँओ तक काट कर उतरवाया। इसी हालत में बादशाह ने उन्हें फ़ारिग़ कर दिया। {10:5} जब दाऊद को इस की ख़बर मिली तो उस ने अपने क़ासिदों को उन से मिलने के लिए भेजा ताकि उन्हें बताएँ, “यरीहू में उस वक़्त तक ठहरे रहें जब तक आप की दाढ़ियाँ दुबारा बहाल न हो जाएँ।” क्यूँकि वह अपनी दाढ़ियों की वजह से बड़ी शर्मिन्दगी मह्सूस कर रहे थे। {i10:6} अम्मोनियों से जंग {10:6} अम्मोनियों को ख़ूब मालूम था कि इस हरकत से हम दाऊद के दुश्मन बन गए हैं। इस लिए उन्हों ने किराए पर कई जगहों से फ़ौजी तलब किए। बैत-रहोब और ज़ोबाह के 20,000 अरामी पियादा सिपाही, माका का बादशाह 1,000 फ़ौजियों समेत और मुल्क-ए-तोब के 12,000 सिपाही उन की मदद करने आए। {10:7} जब दाऊद को इस का इल्म हुआ तो उस ने योआब को पूरी फ़ौज के साथ उन का मुक़ाबला करने के लिए भेज दिया। {10:8} अम्मोनी अपने दार-उल-हकूमत रब्बा से निकल कर शहर के दरवाज़े के सामने ही सफ़आरा हुए जबकि उन के अरामी इत्तिहादी ज़ोबाह और रहोब मुल्क-ए-तोब और माका के मर्दों समेत कुछ फ़ासिले पर खुले मैदान में खड़े हो गए। {10:9} जब योआब ने जान लिया कि सामने और पीछे दोनों तरफ़ से हमले का ख़तरा है तो उस ने अपनी फ़ौज को दो हिस्सों में तक़्सीम कर दिया। सब से अच्छे फ़ौजियों के साथ वह ख़ुद शाम के सिपाहियों से लड़ने के लिए तय्यार हुआ। {10:10} बाक़ी आदमियों को उस ने अपने भाई अबीशै के हवाले कर दिया ताकि वह अम्मोनियों से लड़ें। {10:11} एक दूसरे से अलग होने से पहले योआब ने अबीशै से कहा, “अगर शाम के फ़ौजी मुझ पर ग़ालिब आने लगें तो मेरे पास आ कर मेरी मदद करना। लेकिन अगर आप अम्मोनियों पर क़ाबू न पा सकें तो मैं आ कर आप की मदद करूँगा। {10:12} हौसला रखें! हम दिलेरी से अपनी क़ौम और अपने ख़ुदा के शहरों के लिए लड़ें। और रब वह कुछ होने दे जो उस की नज़र में ठीक है।” {10:13} योआब ने अपनी फ़ौज के साथ शाम के फ़ौजियों पर हम्ला किया तो वह उस के सामने से भागने लगे। {10:14} यह देख कर अम्मोनी अबीशै से फ़रार हो कर शहर में दाख़िल हुए। फिर योआब अम्मोनियों से लड़ने से बाज़ आया और यरूशलम वापस चला गया। {i10:15} शाम के ख़िलाफ़ जंग {10:15} जब शाम के फ़ौजियों को शिकस्त की बेइज़्ज़ती का एहसास हुआ तो वह दुबारा जमा हो गए। {10:16} हददअज़र ने दरया-ए-फ़ुरात के पार मसोपुतामिया में आबाद अरामियों को बुलाया ताकि वह उस की मदद करें। फिर सब हिलाम पहुँच गए। हददअज़र की फ़ौज पर मुक़र्रर अफ़्सर सोबक उन की राहनुमाई कर रहा था। {10:17} जब दाऊद को ख़बर मिली तो उस ने इस्राईल के तमाम लड़ने के क़ाबिल आदमियों को जमा किया और दरया-ए-यर्दन को पार करके हिलाम पहुँच गया। शाम के फ़ौजी सफ़आरा हो कर इस्राईलियों का मुक़ाबला करने लगे। {10:18} लेकिन उन्हें दुबारा शिकस्त मान कर फ़रार होना पड़ा। इस दफ़ा उन के 700 रथबानों के इलावा 40,000 पियादा सिपाही हलाक हुए। दाऊद ने फ़ौज के कमाँडर सोबक को इतना ज़ख़्मी कर दिया कि वह मैदान-ए-जंग में हलाक हो गया। {10:19} जो अरामी बादशाह पहले हददअज़र के ताबे थे उन्हों ने अब हार मान कर इस्राईलियों से सुलह कर ली और उन के ताबे हो गए। उस वक़्त से अरामियों ने अम्मोनियों की मदद करने की फिर जुरअत न की। {i11:1} दाऊद और बत-सबा {11:1} बहार का मौसम आ गया, वह वक़्त जब बादशाह जंग के लिए निकलते हैं। दाऊद बादशाह ने भी अपने फ़ौजियों को लड़ने के लिए भेज दिया। योआब की राहनुमाई में उस के अफ़्सर और पूरी फ़ौज अम्मोनियों से लड़ने के लिए रवाना हुए। वह दुश्मन को तबाह करके दार-उल-हकूमत रब्बा का मुहासरा करने लगे। दाऊद ख़ुद यरूशलम में रहा। {11:2} एक दिन वह दोपहर के वक़्त सो गया। जब शाम के वक़्त जाग उठा तो महल की छत पर टहलने लगा। अचानक उस की नज़र एक औरत पर पड़ी जो अपने सहन में नहा रही थी। औरत निहायत ख़ूबसूरत थी। {11:3} दाऊद ने किसी को उस के बारे में मालूमात हासिल करने के लिए भेज दिया। वापस आ कर उस ने इत्तिला दी, “औरत का नाम बत-सबा है। वह इलीआम की बेटी और ऊरियाह हित्ती की बीवी है।” {11:4} तब दाऊद ने क़ासिदों को बत-सबा के पास भेजा ताकि उसे महल में ले आएँ। औरत आई तो दाऊद उस से हमबिसतर हुआ। फिर बत-सबा अपने घर वापस चली गई। (थोड़ी देर पहले उस ने वह रस्म अदा की थी जिस का तक़ाज़ा शरीअत माहवारी के बाद करती है ताकि औरत दुबारा पाक-साफ़ हो जाए)। {11:5} कुछ देर के बाद उसे मालूम हुआ कि मेरा पाँओ भारी हो गया है। उस ने दाऊद को इत्तिला दी, “मेरा पाँओ भारी हो गया है।” {11:6} यह सुनते ही दाऊद ने योआब को पैग़ाम भेजा, “ऊरियाह हित्ती को मेरे पास भेज दें!” योआब ने उसे भेज दिया। {11:7} जब ऊरियाह दरबार में पहुँचा तो दाऊद ने उस से योआब और फ़ौज का हाल मालूम किया और पूछा कि जंग किस तरह चल रही है? {11:8} फिर उस ने ऊरियाह को बताया, “अब अपने घर जाएँ और पाँओ धो कर आराम करें।” ऊरियाह अभी महल से दूर नहीं गया था कि एक मुलाज़िम ने उस के पीछे भाग कर उसे बादशाह की तरफ़ से तोह्फ़ा दिया। {11:9} लेकिन ऊरियाह अपने घर न गया बल्कि रात के लिए बादशाह के मुहाफ़िज़ों के साथ ठहरा रहा जो महल के दरवाज़े के पास सोते थे। {11:10} दाऊद को इस बात का पता चला तो उस ने अगले दिन उसे दुबारा बुलाया। उस ने पूछा, “क्या बात है? आप तो बड़ी दूर से आए हैं। आप अपने घर क्यूँ न गए?” {11:11} ऊरियाह ने जवाब दिया, “अह्द का सन्दूक़ और इस्राईल और यहूदाह के फ़ौजी झोंपड़ियों में रह रहे हैं। योआब और बादशाह के अफ़्सर भी खुले मैदान में ठहरे हुए हैं तो क्या मुनासिब है कि मैं अपने घर जा कर आराम से खाऊँ पियूँ और अपनी बीवी से हमबिसतर हो जाऊँ? हरगिज़ नहीं! आप की हयात की क़सम, मैं कभी ऐसा नहीं करूँगा।” {11:12} दाऊद ने उसे कहा, “एक और दिन यहाँ ठहरें। कल मैं आप को वापस जाने दूँगा।” चुनाँचे ऊरियाह एक और दिन यरूशलम में ठहरा रहा। {11:13} शाम के वक़्त दाऊद ने उसे खाने की दावत दी। उस ने उसे इतनी मै पिलाई कि ऊरियाह नशे में धुत हो गया, लेकिन इस मर्तबा भी वह अपने घर न गया बल्कि दुबारा महल में मुहाफ़िज़ों के साथ सो गया। {i11:14} दाऊद ऊरियाह को क़त्ल करवाता है {11:14} अगले दिन सुब्ह दाऊद ने योआब को ख़त लिख कर ऊरियाह के हाथ भेज दिया। {11:15} उस में लिखा था, “ऊरियाह को सब से अगली सफ़ में खड़ा करें, जहाँ लड़ाई सब से सख़्त होती है। फिर अचानक पीछे की तरफ़ हट कर उसे छोड़ दें ताकि दुश्मन उसे मार दे।” {11:16} यह पढ़ कर योआब ने ऊरियाह को एक ऐसी जगह पर खड़ा किया जिस के बारे में उसे इल्म था कि दुश्मन के सब से ज़बरदस्त फ़ौजी वहाँ लड़ते हैं। {11:17} जब अम्मोनियों ने शहर से निकल कर उन पर हम्ला किया तो कुछ इस्राईली शहीद हुए। ऊरियाह हित्ती भी उन में शामिल था। {11:18} योआब ने लड़ाई की पूरी रिपोर्ट भेज दी। {11:19} दाऊद को यह पैग़ाम पहुँचाने वाले को उस ने बताया, “जब आप बादशाह को तफ़्सील से लड़ाई का सारा सिलसिला सुनाएँगे {11:20} तो हो सकता है वह ग़ुस्से हो कर कहे, ‘आप शहर के इतने क़रीब क्यूँ गए? क्या आप को मालूम न था कि दुश्मन फ़सील से तीर चलाएँगे? {11:21} क्या आप को याद नहीं कि क़दीम ज़माने में जिदाऊन के बेटे अबीमलिक के साथ क्या हुआ? तैबिज़ शहर में एक औरत ही ने उसे मार डाला। और वजह यह थी कि वह क़िले के इतने क़रीब आ गया था कि औरत दीवार पर से चक्की का ऊपर का पाट उस पर फैंक सकी। शहर की फ़सील के इस क़दर क़रीब लड़ने की क्या ज़रूरत थी?’ अगर बादशाह आप पर ऐसे इल्ज़ामात लगाएँ तो जवाब में बस इतना ही कह देना, ‘ऊरियाह हित्ती भी मारा गया है’।” {11:22} क़ासिद रवाना हुआ। जब यरूशलम पहुँचा तो उस ने दाऊद को योआब का पूरा पैग़ाम सुना दिया, {11:23} “दुश्मन हम से ज़्यादा ताक़तवर थे। वह शहर से निकल कर खुले मैदान में हम पर टूट पड़े। लेकिन हम ने उन का सामना यूँ किया कि वह पीछे हट गए, बल्कि हम ने उन का ताक़्क़ुब शहर के दरवाज़े तक किया। {11:24} लेकिन अफ़्सोस कि फिर कुछ तीरअन्दाज़ हम पर फ़सील पर से तीर बरसाने लगे। आप के कुछ ख़ादिम खेत आए और ऊरियाह हित्ती भी उन में शामिल है।” {11:25} दाऊद ने जवाब दिया, “योआब को बता देना कि यह मुआमला आप को हिम्मत हारने न दे। जंग तो ऐसी ही होती है। कभी कोई यहाँ तलवार का लुक़्मा हो जाता है, कभी वहाँ। पूरे अज़म के साथ शहर से जंग जारी रख कर उसे तबाह कर दें। यह कह कर योआब की हौसलाअफ़्ज़ाई करें।” {11:26} जब बत-सबा को इत्तिला मिली कि ऊरियाह नहीं रहा तो उस ने उस का मातम किया। {11:27} मातम का वक़्त पूरा हुआ तो दाऊद ने उसे अपने घर बुला कर उस से शादी कर ली। फिर उस के बेटा पैदा हुआ। लेकिन दाऊद की यह हरकत रब को निहायत बुरी लगी। {i12:1} नातन दाऊद को मुजरिम ठहराता है {12:1} रब ने नातन नबी को दाऊद के पास भेज दिया। बादशाह के पास पहुँच कर वह कहने लगा, “किसी शहर में दो आदमी रहते थे। एक अमीर था, दूसरा ग़रीब। {12:2} अमीर की बहुत भेड़-बकरियाँ और गाय-बैल थे, {12:3} लेकिन ग़रीब के पास कुछ नहीं था, सिर्फ़ भेड़ की नन्ही सी बच्ची जो उस ने ख़रीद रखी थी। ग़रीब उस की परवरिश करता रहा, और वह घर में उस के बच्चों के साथ साथ बड़ी होती गई। वह उस की प्लेट से खाती, उस के प्याले से पीती और रात को उस के बाज़ूओं में सो जाती। ग़रज़ भेड़ ग़रीब के लिए बेटी की सी हैसियत रखती थी। {12:4} एक दिन अमीर के हाँ मेहमान आया। जब उस के लिए खाना पकाना था तो अमीर का दिल नहीं करता था कि अपने रेवड़ में से किसी जानवर को ज़बह करे, इस लिए उस ने ग़रीब आदमी से उस की नन्ही सी भेड़ ले कर उसे मेहमान के लिए तय्यार किया।” {12:5} यह सुन कर दाऊद को बड़ा ग़ुस्सा आया। वह पुकारा, “रब की हयात की क़सम, जिस आदमी ने यह किया वह सज़ा-ए-मौत के लाइक़ है। {12:6} लाज़िम है कि वह भेड़ की बच्ची के इवज़ ग़रीब को भेड़ के चार बच्चे दे। यही उस की मुनासिब सज़ा है, क्यूँकि उस ने ऐसी हरकत करके ग़रीब पर तरस न खाया।” {12:7} नातन ने दाऊद से कहा, “आप ही वह आदमी हैं! रब इस्राईल का ख़ुदा फ़रमाता है, ‘मैं ने तुझे मसह करके इस्राईल का बादशाह बना दिया, और मैं ही ने तुझे साऊल से मह्फ़ूज़ रखा। {12:8} साऊल का घराना उस की बीवियों समेत मैं ने तुझे दे दिया। हाँ, पूरा इस्राईल और यहूदाह भी तेरे तहत आ गए हैं। और अगर यह तेरे लिए कम होता तो मैं तुझे मज़ीद देने के लिए भी तय्यार होता। {12:9} अब मुझे बता कि तू ने मेरी मर्ज़ी को हक़ीर जान कर ऐसी हरकत क्यूँ की है जिस से मुझे नफ़रत है? तू ने ऊरियाह हित्ती को क़त्ल करवाके उस की बीवी को छीन लिया है। हाँ, तू क़ातिल है, क्यूँकि तू ने हुक्म दिया कि ऊरियाह को अम्मोनियों से लड़ते लड़ते मरवाना है। {12:10} चूँकि तू ने मुझे हक़ीर जान कर ऊरियाह हित्ती की बीवी को उस से छीन लिया इस लिए आइन्दा तलवार तेरे घराने से नहीं हटेगी।’ {12:11} रब फ़रमाता है, ‘मैं होने दूँगा कि तेरे अपने ख़ानदान में से मुसीबत तुझ पर आएगी। तेरे देखते देखते मैं तेरी बीवियों को तुझ से छीन कर तेरे क़रीब के आदमी के हवाले कर दूँगा, और वह अलानिया उन से हमबिसतर होगा। {12:12} तू ने चुपके से गुनाह किया, लेकिन जो कुछ मैं जवाब में होने दूँगा वह अलानिया और पूरे इस्राईल के देखते देखते होगा’।” {12:13} तब दाऊद ने इक़्रार किया, “मैं ने रब का गुनाह किया है।” नातन ने जवाब दिया, “रब ने आप को मुआफ़ कर दिया है और आप नहीं मरेंगे। {12:14} लेकिन इस हरकत से आप ने रब के दुश्मनों को कुफ़्र बकने का मौक़ा फ़राहम किया है, इस लिए बत-सबा से होने वाला बेटा मर जाएगा।” {12:15} तब नातन अपने घर चला गया। फिर रब ने बत-सबा के बेटे को छू दिया, और वह सख़्त बीमार हो गया। {i12:16} दाऊद का बेटा मर जाता है {12:16} दाऊद ने अल्लाह से इल्तिमास की कि बच्चे को बचने दे। रोज़ा रख कर वह रात के वक़्त नंगे फ़र्श पर सोने लगा। {12:17} घर के बुज़ुर्ग उस के इर्दगिर्द खड़े कोशिश करते रहे कि वह फ़र्श से उठ जाए, लेकिन बेफ़ाइदा। वह उन के साथ खाने के लिए भी तय्यार नहीं था। {12:18} सातवें दिन बेटा फ़ौत हो गया। दाऊद के मुलाज़िमों ने उसे ख़बर पहुँचाने की जुरअत न की, क्यूँकि उन्हों ने सोचा, “जब बच्चा अभी ज़िन्दा था तो हम ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन उस ने हमारी एक भी न सुनी। अब अगर बच्चे की मौत की ख़बर दें तो ख़तरा है कि वह कोई नुक़्सानदेह क़दम उठाए।” {12:19} लेकिन दाऊद ने देखा कि मुलाज़िम धीमी आवाज़ में एक दूसरे से बात कर रहे हैं। उस ने पूछा, “क्या बेटा मर गया है?” उन्हों ने जवाब दिया, “जी, वह मर गया है।” {12:20} यह सुन कर दाऊद फ़र्श पर से उठ गया। वह नहाया और जिस्म को ख़ुश्बूदार तेल से मल कर साफ़ कपड़े पहन लिए। फिर उस ने रब के घर में जा कर उस की परस्तिश की। इस के बाद वह महल में वापस गया और खाना मंगवा कर खाया। {12:21} उस के मुलाज़िम हैरान हुए और बोले, “जब बच्चा ज़िन्दा था तो आप रोज़ा रख कर रोते रहे। अब बच्चा जाँ-ब-हक़ हो गया है तो आप उठ कर दुबारा खाना खा रहे हैं। क्या वजह है?” {12:22} दाऊद ने जवाब दिया, “जब तक बच्चा ज़िन्दा था तो मैं रोज़ा रख कर रोता रहा। ख़याल यह था कि शायद रब मुझ पर रहम करके उसे ज़िन्दा छोड़ दे। {12:23} लेकिन जब वह कूच कर गया है तो अब रोज़ा रखने का क्या फ़ाइदा? क्या मैं इस से उसे वापस ला सकता हूँ? हरगिज़ नहीं! एक दिन मैं ख़ुद ही उस के पास पहुँचूँगा। लेकिन उस का यहाँ मेरे पास वापस आना नामुमकिन है।” {12:24} फिर दाऊद ने अपनी बीवी बत-सबा के पास जा कर उसे तसल्ली दी और उस से हमबिसतर हुआ। तब उस के एक और बेटा पैदा हुआ। दाऊद ने उस का नाम सुलेमान यानी अम्नपसन्द रखा। यह बच्चा रब को प्यारा था, {12:25} इस लिए उस ने नातन नबी की मारिफ़त इत्तिला दी कि उस का नाम यदीदियाह यानी ‘रब को प्यारा’ रखा जाए। {i12:26} रब्बा शहर पर फ़त्ह {12:26} अब तक योआब अम्मोनी दार-उल-हकूमत रब्बा का मुहासरा किए हुए था। फिर वह शहर के एक हिस्से बनाम ‘शाही शहर’ पर क़ब्ज़ा करने में कामयाब हो गया। {12:27} उस ने दाऊद को इत्तिला दी, “मैं ने रब्बा पर हम्ला करके उस जगह पर क़ब्ज़ा कर लिया है जहाँ पानी दस्तयाब है। {12:28} चुनाँचे अब फ़ौज के बाक़ी अफ़राद को ला कर ख़ुद शहर पर क़ब्ज़ा कर लें। वर्ना लोग समझेंगे कि मैं ही शहर का फ़ातेह हूँ।” {12:29} चुनाँचे दाऊद फ़ौज के बाक़ी अफ़राद को ले कर रब्बा पहुँचा। जब शहर पर हम्ला किया तो वह उस के क़ब्ज़े में आ गया। {12:30} दाऊद ने हनून बादशाह का ताज उस के सर से उतार कर अपने सर पर रख लिया। सोने के इस ताज का वज़न 34 किलोग्राम था, और उस में एक बेशक़ीमत जौहर जड़ा हुआ था। दाऊद ने शहर से बहुत सा लूटा हुआ माल ले कर {12:31} उस के बाशिन्दों को ग़ुलाम बना लिया। उन्हें पत्थर काटने की आरियाँ, लोहे की कुदालें और कुल्हाड़ियाँ दी गईं ताकि वह मज़दूरी करें और भट्टों पर काम करें। यही सुलूक बाक़ी अम्मोनी शहरों के बाशिन्दों के साथ भी किया गया। जंग के इख़तिताम पर दाऊद पूरी फ़ौज के साथ यरूशलम लौट आया। {i13:1} तमर की इस्मतदरी {13:1} दाऊद के बेटे अबीसलूम की ख़ूबसूरत बहन थी जिस का नाम तमर था। उस का सौतेला भाई अम्नोन तमर से शदीद मुहब्बत करने लगा। {13:2} वह तमर को इतनी शिद्दत से चाहने लगा कि रंजिश के बाइस बीमार हो गया, क्यूँकि तमर कुंवारी थी, और अम्नोन को उस के क़रीब आने का कोई रास्ता नज़र न आया। {13:3} अम्नोन का एक दोस्त था जिस का नाम यूनदब था। वह दाऊद के भाई सिमआ का बेटा था और बड़ा ज़हीन था। {13:4} उस ने अम्नोन से पूछा, “बादशाह के बेटे, क्या मसला है? रोज़-ब-रोज़ आप ज़्यादा बुझे हुए नज़र आ रहे हैं। क्या आप मुझे नहीं बताएँगे कि बात क्या है?” अम्नोन बोला, “मैं अबीसलूम की बहन तमर से शदीद मुहब्बत करता हूँ।” {13:5} यूनदब ने अपने दोस्त को मश्वरा दिया, “बिस्तर पर लेट जाएँ और ऐसा ज़ाहिर करें गोया बीमार हैं। जब आप के वालिद आप का हाल पूछने आएँगे तो उन से दरख़्वास्त करना, ‘मेरी बहन तमर आ कर मुझे मरीज़ों का खाना खिलाए। वह मेरे सामने खाना तय्यार करे ताकि मैं उसे देख कर उस के हाथ से खाना खाऊँ’।” {13:6} चुनाँचे अम्नोन ने बिस्तर पर लेट कर बीमार होने का बहाना किया। जब बादशाह उस का हाल पूछने आया तो अम्नोन ने गुज़ारिश की, “मेरी बहन तमर मेरे पास आए और मेरे सामने मरीज़ों का खाना बना कर मुझे अपने हाथ से खिलाए।” {13:7} दाऊद ने तमर को इत्तिला दी, “आप का भाई अम्नोन बीमार है। उस के पास जा कर उस के लिए मरीज़ों का खाना तय्यार करें।” {13:8} तमर ने अम्नोन के पास आ कर उस की मौजूदगी में मैदा गूँधा और खाना तय्यार करके पकाया। अम्नोन बिस्तर पर लेटा उसे देखता रहा। {13:9} जब खाना पक गया तो तमर ने उसे अम्नोन के पास ला कर पेश किया। लेकिन उस ने खाने से इन्कार कर दिया। उस ने हुक्म दिया, “तमाम नौकर कमरे से बाहर निकल जाएँ!” जब सब चले गए {13:10} तो उस ने तमर से कहा, “खाने को मेरे सोने के कमरे में ले आएँ ताकि मैं आप के हाथ से खा सकूँ।” तमर खाने को ले कर सोने के कमरे में अपने भाई के पास आई। {13:11} जब वह उसे खाना खिलाने लगी तो अम्नोन ने उसे पकड़ कर कहा, “आ मेरी बहन, मेरे साथ हमबिसतर हो!” {13:12} वह पुकारी, “नहीं, मेरे भाई! मेरी इस्मतदरी न करें। ऐसा अमल इस्राईल में मना है। ऐसी बेदीन हरकत मत करना! {13:13} और ऐसी बेहुरमती के बाद मैं कहाँ जाऊँ? जहाँ तक आप का ताल्लुक़ है इस्राईल में आप की बुरी तरह बदनामी हो जाएगी, और सब समझेंगे कि आप निहायत शरीर आदमी हैं। आप बादशाह से बात क्यूँ नहीं करते? यक़ीनन वह आप को मुझ से शादी करने से नहीं रोकेंगे।” {13:14} लेकिन अम्नोन ने उस की न सुनी बल्कि उसे पकड़ कर उस की इस्मतदरी की। {13:15} लेकिन फिर अचानक उस की मुहब्बत सख़्त नफ़रत में बदल गई। पहले तो वह तमर से शदीद मुहब्बत करता था, लेकिन अब वह इस से बढ़ कर उस से नफ़रत करने लगा। उस ने हुक्म दिया, “उठ, दफ़ा हो जा!” {13:16} तमर ने इल्तिमास की, “हाय, ऐसा मत करना। अगर आप मुझे निकालेंगे तो यह पहले गुनाह से ज़्यादा संगीन जुर्म होगा।” लेकिन अम्नोन उस की सुनने के लिए तय्यार न था। {13:17} उस ने अपने नौकर को बुला कर हुक्म दिया, “इस औरत को यहाँ से निकाल दो और इस के पीछे दरवाज़ा बन्द करके कुंडी लगाओ!” {13:18} नौकर तमर को बाहर ले गया और फिर उस के पीछे दरवाज़ा बन्द करके कुंडी लगा दी। तमर एक लम्बे बाज़ूओं वाला फ़्राक पहने हुए थी। बादशाह की तमाम कुंवारी बेटियाँ यही लिबास पहना करती थीं। {13:19} बड़ी रंजिश के आलम में उस ने अपना यह लिबास फाड़ कर अपने सर पर राख डाल ली। फिर अपना हाथ सर पर रख कर वह चीख़ती चिल्लाती वहाँ से चली गई। {13:20} जब घर पहुँच गई तो अबीसलूम ने उस से पूछा, “मेरी बहन, क्या अम्नोन ने आप से ज़ियादती की है? अब ख़ामोश हो जाएँ। वह तो आप का भाई है। इस मुआमले को हद से ज़्यादा अहमियत मत देना।” उस वक़्त से तमर अकेली ही अपने भाई अबीसलूम के घर में रही। {13:21} जब दाऊद को इस वाकिए की ख़बर मिली तो उसे सख़्त ग़ुस्सा आया। {13:22} अबीसलूम ने अम्नोन से एक भी बात न की। न उस ने उस पर कोई इल्ज़ाम लगाया, न कोई अच्छी बात की, क्यूँकि तमर की इस्मतदरी की वजह से वह अपने भाई से सख़्त नफ़रत करने लगा था। {i13:23} अबीसलूम का इन्तिक़ाम {13:23} दो साल गुज़र गए। अबीसलूम की भेड़ें इफ़्राईम के क़रीब के बाल-हसूर में लाई गईं ताकि उन के बाल क़तरे जाएँ। इस मौक़े पर अबीसलूम ने बादशाह के तमाम बेटों को दावत दी कि वह वहाँ ज़ियाफ़त में शरीक हों। {13:24} वह दाऊद बादशाह के पास भी गया और कहा, “इन दिनों में मैं अपनी भेड़ों के बाल कतरा रहा हूँ। बादशाह और उन के अफ़्सरों को भी मेरे साथ ख़ुशी मनाने की दावत है।” {13:25} लेकिन दाऊद ने इन्कार किया, “नहीं, मेरे बेटे, हम सब तो नहीं आ सकते। इतने लोग आप के लिए बोझ का बाइस बन जाएंगे।” अबीसलूम बहुत इसरार करता रहा, लेकिन दाऊद ने दावत को क़बूल न किया बल्कि उसे बरकत दे कर रुख़्सत करना चाहता था। {13:26} आख़िरकार अबीसलूम ने दरख़्वास्त की, “अगर आप हमारे साथ जा न सकें तो फिर कम अज़ कम मेरे भाई अम्नोन को आने दें।” बादशाह ने पूछा, “ख़ासकर अम्नोन को क्यूँ?” {13:27} लेकिन अबीसलूम इतना ज़ोर देता रहा कि दाऊद ने अम्नोन को बाक़ी बेटों समेत बाल-हसूर जाने की इजाज़त दे दी। {13:28} ज़ियाफ़त से पहले अबीसलूम ने अपने मुलाज़िमों को हुक्म दिया, “सुनें! जब अम्नोन मै पी पी कर ख़ुश हो जाएगा तो मैं आप को अम्नोन को मारने का हुक्म दूँगा। फिर आप को उसे मार डालना है। डरें मत, क्यूँकि मैं ही ने आप को यह हुक्म दिया है। मज़बूत और दिलेर हों!” {13:29} मुलाज़िमों ने ऐसा ही किया। उन्हों ने अम्नोन को मार डाला। यह देख कर बादशाह के दूसरे बेटे उठ कर अपने ख़च्चरों पर सवार हुए और भाग गए। {13:30} वह अभी रास्ते में ही थे कि अफ़्वाह दाऊद तक पहुँची, “अबीसलूम ने आप के तमाम बेटों को क़त्ल कर दिया है। एक भी नहीं बचा।” {13:31} बादशाह उठा और अपने कपड़े फाड़ कर फ़र्श पर लेट गया। उस के दरबारी भी दुख में अपने कपड़े फाड़ फाड़ कर उस के पास खड़े रहे। {13:32} फिर दाऊद का भतीजा यूनदब बोल उठा, “मेरे आक़ा, आप न सोचें कि उन्हों ने तमाम शहज़ादों को मार डाला है। सिर्फ़ अम्नोन मर गया होगा, क्यूँकि जब से उस ने तमर की इस्मतदरी की उस वक़्त से अबीसलूम का यही इरादा था। {13:33} लिहाज़ा इस ख़बर को इतनी अहमियत न दें कि तमाम बेटे हलाक हुए हैं। सिर्फ़ अम्नोन मर गया होगा।” {13:34} इतने में अबीसलूम फ़रार हो गया था। फिर यरूशलम की फ़सील पर खड़े पहरेदार ने अचानक देखा कि मग़रिब से लोगों का बड़ा गुरोह शहर की तरफ़ बढ़ रहा है। वह पहाड़ी के दामन में चले आ रहे थे। {13:35} तब यूनदब ने बादशाह से कहा, “लो, बादशाह के बेटे आ रहे हैं, जिस तरह आप के ख़ादिम ने कहा था।” {13:36} वह अभी अपनी बात ख़त्म कर ही रहा था कि शहज़ादे अन्दर आए और ख़ूब रो पड़े। बादशाह और उस के अफ़्सर भी रोने लगे। {13:37} दाऊद बड़ी देर तक अम्नोन का मातम करता रहा। लेकिन अबीसलूम ने फ़रार हो कर जसूर के बादशाह तल्मी बिन अम्मीहूद के पास पनाह ली जो उस का नाना था। {13:38} वहाँ वह तीन साल तक रहा। {13:39} फिर एक वक़्त आ गया कि दाऊद का अम्नोन के लिए दुख दूर हो गया, और उस का अबीसलूम पर ग़ुस्सा थम गया। {i14:1} योआब अबीसलूम की सिफ़ारिश करता है {14:1} योआब बिन ज़रूयाह को मालूम हुआ कि बादशाह अपने बेटे अबीसलूम को चाहता है, {14:2} इस लिए उस ने तक़ूअ से एक दानिशमन्द औरत को बुलाया। योआब ने उसे हिदायत दी, “मातम का रूप भरें जैसे आप देर से किसी का मातम कर रही हों। मातम के कपड़े पहन कर ख़ुश्बूदार तेल मत लगाना। {14:3} बादशाह के पास जा कर उस से बात करें।” फिर योआब ने औरत को लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ वह कुछ सिखाया जो उसे बादशाह को बताना था। {14:4} दाऊद के दरबार में आ कर औरत ने औंधे मुँह झुक कर इल्तिमास की, “ऐ बादशाह, मेरी मदद करें!” {14:5} दाऊद ने दरयाफ़्त किया, “क्या मसला है?” औरत ने जवाब दिया, “मैं बेवा हूँ, मेरा शौहर फ़ौत हो गया है। {14:6} और मेरे दो बेटे थे। एक दिन वह बाहर खेत में एक दूसरे से उलझ पड़े। और चूँकि कोई मौजूद नहीं था जो दोनों को अलग करता इस लिए एक ने दूसरे को मार डाला। {14:7} उस वक़्त से पूरा कुम्बा मेरे ख़िलाफ़ उठ खड़ा हुआ है। वह तक़ाज़ा करते हैं कि मैं अपने बेटे को उन के हवाले करूँ। वह कहते हैं, ‘उस ने अपने भाई को मार दिया है, इस लिए हम बदले में उसे सज़ा-ए-मौत देंगे। इस तरह वारिस भी नहीं रहेगा।’ यूँ वह मेरी उम्मीद की आख़िरी किरन को ख़त्म करना चाहते हैं। क्यूँकि अगर मेरा यह बेटा भी मर जाए तो मेरे शौहर का नाम क़ाइम नहीं रहेगा, और उस का ख़ानदान रू-ए-ज़मीन पर से मिट जाएगा।” {14:8} बादशाह ने औरत से कहा, “अपने घर चली जाएँ और फ़िक्र न करें। मैं मुआमला हल कर दूँगा।” {14:9} लेकिन औरत ने गुज़ारिश की, “ऐ बादशाह, डर है कि लोग फिर भी मुझे मुजरिम ठहराएँगे अगर मेरे बेटे को सज़ा-ए-मौत न दी जाए। आप पर तो वह इल्ज़ाम नहीं लगाएँगे।” {14:10} दाऊद ने इसरार किया, “अगर कोई आप को तंग करे तो उसे मेरे पास ले आएँ। फिर वह आइन्दा आप को नहीं सताएगा!” {14:11} औरत को तसल्ली न हुई। उस ने गुज़ारिश की, “ऐ बादशाह, बराह-ए-करम रब अपने ख़ुदा की क़सम खाएँ कि आप किसी को भी मौत का बदला नहीं लेने देंगे। वर्ना नुक़्सान में इज़ाफ़ा होगा और मेरा दूसरा बेटा भी हलाक हो जाएगा।” दाऊद ने जवाब दिया, “रब की हयात की क़सम, आप के बेटे का एक बाल भी बीका नहीं होगा।” {14:12} फिर औरत असल बात पर आ गई, “मेरे आक़ा, बराह-ए-करम अपनी ख़ादिमा को एक और बात करने की इजाज़त दें।” बादशाह बोला, “करें बात।” {14:13} तब औरत ने कहा, “आप ख़ुद क्यूँ अल्लाह की क़ौम के ख़िलाफ़ ऐसा इरादा रखते हैं जिसे आप ने अभी अभी ग़लत क़रार दिया है? आप ने ख़ुद फ़रमाया है कि यह ठीक नहीं, और यूँ आप ने अपने आप को ही मुजरिम ठहराया है। क्यूँकि आप ने अपने बेटे को रद्द करके उसे वापस आने नहीं दिया। {14:14} बेशक हम सब को किसी वक़्त मरना है। हम सब ज़मीन पर उंडेले गए पानी की मानिन्द हैं जिसे ज़मीन जज़ब कर लेती है और जो दुबारा जमा नहीं किया जा सकता। लेकिन अल्लाह हमारी ज़िन्दगी को बिलावजह मिटा नहीं देता बल्कि ऐसे मन्सूबे तय्यार रखता है जिन के ज़रीए मर्दूद शख़्स भी उस के पास वापस आ सके और उस से दूर न रहे। {14:15} ऐ बादशाह मेरे आक़ा, मैं इस वक़्त इस लिए आप के हुज़ूर आई हूँ कि मेरे लोग मुझे डराने की कोशिश कर रहे हैं। मैं ने सोचा, मैं बादशाह से बात करने की जुरअत करूँगी, शायद वह मेरी सुनें {14:16} और मुझे उस आदमी से बचाएँ जो मुझे और मेरे बेटे को उस मौरूसी ज़मीन से महरूम रखना चाहता है जो अल्लाह ने हमें दे दी है। {14:17} ख़याल यह था कि अगर बादशाह मुआमला हल कर दें तो फिर मुझे दुबारा सुकून मिलेगा, क्यूँकि आप अच्छी और बुरी बातों का इम्तियाज़ करने में अल्लाह के फ़रिश्ते जैसे हैं। रब आप का ख़ुदा आप के साथ हो।” {14:18} यह सब कुछ सुन कर दाऊद बोल उठा, “अब मुझे एक बात बताएँ। इस का सहीह जवाब दें।” औरत ने जवाब दिया, “जी मेरे आक़ा, बात फ़रमाइए।” दाऊद ने पूछा, “क्या योआब ने आप से यह काम करवाया?” {14:19} औरत पुकारी, “बादशाह की हयात की क़सम, जो कुछ भी मेरे आक़ा फ़रमाते हैं वह निशाने पर लग जाता है, ख़्वाह बन्दा बाईं या दाईं तरफ़ हटने की कोशिश क्यूँ न करे। जी हाँ, आप के ख़ादिम योआब ने मुझे आप के हुज़ूर भेज दिया। उस ने मुझे लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ सब कुछ बताया जो मुझे आप को अर्ज़ करना था, {14:20} क्यूँकि वह आप को यह बात बराह-ए-रास्त नहीं पेश करना चाहता था। लेकिन मेरे आक़ा को अल्लाह के फ़रिश्ते की सी हिक्मत हासिल है। जो कुछ भी मुल्क में वुक़ू में आता है उस का आप को पता चल जाता है।” {i14:21} अबीसलूम की वापसी {14:21} दाऊद ने योआब को बुला कर उस से कहा, “ठीक है, मैं आप की दरख़्वास्त पूरी करूँगा। जाएँ, मेरे बेटे अबीसलूम को वापस ले आएँ।” {14:22} योआब औंधे मुँह झुक गया और बोला, “रब बादशाह को बरकत दे! मेरे आक़ा, आज मुझे मालूम हुआ है कि मैं आप को मन्ज़ूर हूँ, क्यूँकि आप ने अपने ख़ादिम की दरख़्वास्त को पूरा किया है।” {14:23} योआब रवाना हो कर जसूर चला गया और वहाँ से अबीसलूम को वापस लाया। {14:24} लेकिन जब वह यरूशलम पहुँचे तो बादशाह ने हुक्म दिया, “उसे अपने घर में रहने की इजाज़त है, लेकिन वह कभी मुझे नज़र न आए।” चुनाँचे अबीसलूम अपने घर में दुबारा रहने लगा, लेकिन बादशाह से कभी मुलाक़ात न हो सकी। {14:25} पूरे इस्राईल में अबीसलूम जैसा ख़ूबसूरत आदमी नहीं था। सब उस की ख़ास तारीफ़ करते थे, क्यूँकि सर से ले कर पाँओ तक उस में कोई नुक़्स नज़र नहीं आता था। {14:26} साल में वह एक ही मर्तबा अपने बाल कटवाता था, क्यूँकि इतने में उस के बाल हद से ज़्यादा वज़नी हो जाते थे। जब उन्हें तोला जाता तो उन का वज़न तक़रीबन सवा दो किलोग्राम होता था। {14:27} अबीसलूम के तीन बेटे और एक बेटी थी। बेटी का नाम तमर था और वह निहायत ख़ूबसूरत थी। {14:28} दो साल गुज़र गए, फिर भी अबीसलूम को बादशाह से मिलने की इजाज़त न मिली। {14:29} फिर उस ने योआब को इत्तिला भेजी कि वह उस की सिफ़ारिश करे। लेकिन योआब ने आने से इन्कार किया। अबीसलूम ने उसे दुबारा बुलाने की कोशिश की, लेकिन इस बार भी योआब उस के पास न आया। {14:30} तब अबीसलूम ने अपने नौकरों को हुक्म दिया, “देखो, योआब का खेत मेरे खेत से मुल्हिक़ है, और उस में जौ की फ़सल पक रही है। जाओ, उसे आग लगा दो!” नौकर गए और ऐसा ही किया। {14:31} जब खेत में आग लग गई तो योआब भाग कर अबीसलूम के पास आया और शिकायत की, “आप के नौकरों ने मेरे खेत को आग क्यूँ लगाई है?” {14:32} अबीसलूम ने जवाब दिया, “देखें, आप नहीं आए जब मैं ने आप को बुलाया। क्यूँकि मैं चाहता हूँ कि आप बादशाह के पास जा कर उन से पूछें कि मुझे जसूर से क्यूँ लाया गया। बेहतर होता कि मैं वहीं रहता। अब बादशाह मुझ से मिलें या अगर वह अब तक मुझे क़ुसूरवार ठहराते हैं तो मुझे सज़ा-ए-मौत दें।” {14:33} योआब ने बादशाह के पास जा कर उसे यह पैग़ाम पहुँचाया। फिर दाऊद ने अपने बेटे को बुलाया। अबीसलूम अन्दर आया और बादशाह के सामने औंधे मुँह झुक गया। फिर बादशाह ने अबीसलूम को बोसा दिया। {i15:1} अबीसलूम की साज़िश {15:1} कुछ देर के बाद अबीसलूम ने रथ और घोड़े ख़रीदे और साथ साथ 50 मुहाफ़िज़ भी रखे जो उस के आगे आगे दौड़ें। {15:2} रोज़ाना वह सुब्ह-सवेरे उठ कर शहर के दरवाज़े पर जाता। जब कभी कोई शख़्स इस मक़्सद से शहर में दाख़िल होता कि बादशाह उस के किसी मुक़द्दमे का फ़ैसला करे तो अबीसलूम उस से मुख़ातिब हो कर पूछता, “आप किस शहर से हैं?” अगर वह जवाब देता, “मैं इस्राईल के फ़ुलाँ क़बीले से हूँ,” {15:3} तो अबीसलूम कहता, “बेशक आप इस मुक़द्दमे को जीत सकते हैं, लेकिन अफ़्सोस! बादशाह का कोई भी बन्दा इस पर सहीह ध्यान नहीं देगा।” {15:4} फिर वह बात जारी रखता, “काश मैं ही मुल्क पर आला क़ाज़ी मुक़र्रर किया गया होता! फिर सब लोग अपने मुक़द्दमे मुझे पेश कर सकते और मैं उन का सहीह इन्साफ़ कर देता।” {15:5} और अगर कोई क़रीब आ कर अबीसलूम के सामने झुकने लगता तो वह उसे रोक कर उस को गले लगाता और बोसा देता। {15:6} यह उस का उन तमाम इस्राईलियों के साथ सुलूक था जो अपने मुक़द्दमे बादशाह को पेश करने के लिए आते थे। यूँ उस ने इस्राईलियों के दिलों को अपनी तरफ़ माइल कर लिया। {15:7} यह सिलसिला चार साल जारी रहा। एक दिन अबीसलूम ने दाऊद से बात की, “मुझे हब्रून जाने की इजाज़त दीजिए, क्यूँकि मैं ने रब से ऐसी मन्नत मानी है जिस के लिए ज़रूरी है कि हब्रून जाऊँ। {15:8} क्यूँकि जब मैं जसूर में था तो मैं ने क़सम खा कर वादा किया था, ‘ऐ रब, अगर तू मुझे यरूशलम वापस लाए तो मैं हब्रून में तेरी परस्तिश करूँगा’।” {15:9} बादशाह ने जवाब दिया, “ठीक है। सलामती से जाएँ।” {15:10} लेकिन हब्रून पहुँच कर अबीसलूम ने ख़ुफ़िया तौर पर अपने क़ासिदों को इस्राईल के तमाम क़बाइली इलाक़ों में भेज दिया। जहाँ भी वह गए उन्हों ने एलान किया, “जूँ ही नरसिंगे की आवाज़ सुनाई दे आप सब को कहना है, ‘अबीसलूम हब्रून में बादशाह बन गया है’!” {15:11} अबीसलूम के साथ 200 मेहमान यरूशलम से हब्रून आए थे। वह बेलौस थे, और उन्हें इस के बारे में इल्म ही न था। {15:12} जब हब्रून में क़ुर्बानियाँ चढ़ाई जा रही थीं तो अबीसलूम ने दाऊद के एक मुशीर को बुलाया जो जिलोह का रहने वाला था। उस का नाम अख़ीतुफ़ल जिलोनी था। वह आया और अबीसलूम के साथ मिल गया। यूँ अबीसलूम के पैरोकारों में इज़ाफ़ा होता गया और उस की साज़िशें ज़ोर पकड़ने लगीं। {i15:13} दाऊद यरूशलम से हिज्रत करता है {15:13} एक क़ासिद ने दाऊद के पास पहुँच कर उसे इत्तिला दी, “अबीसलूम आप के ख़िलाफ़ उठ खड़ा हुआ है, और तमाम इस्राईल उस के पीछे लग गया है।” {15:14} दाऊद ने अपने मुलाज़िमों से कहा, “आओ, हम फ़ौरन हिज्रत करें, वर्ना अबीसलूम के क़ब्ज़े में आ जाएंगे। जल्दी करें ताकि हम फ़ौरन रवाना हो सकें, क्यूँकि वह कोशिश करेगा कि जितनी जल्दी हो सके यहाँ पहुँचे। अगर हम उस वक़्त शहर से निकले न हों तो वह हम पर आफ़त ला कर शहर के बाशिन्दों को मार डालेगा।” {15:15} बादशाह के मुलाज़िमों ने जवाब दिया, “जो भी फ़ैसला हमारे आक़ा और बादशाह करें हम हाज़िर हैं।” {15:16} बादशाह अपने पूरे ख़ानदान के साथ रवाना हुआ। सिर्फ़ दस दाश्ताएँ महल को सँभालने के लिए पीछे रह गईं। {15:17} जब दाऊद अपने तमाम लोगों के साथ शहर के आख़िरी घर तक पहुँचा तो वह रुक गया। {15:18} उस ने अपने तमाम पैरोकारों को आगे निकलने दिया, पहले शाही दस्ते करेती-ओ-फ़लेती को, फिर उन 600 जाती आदमियों को जो उस के साथ जात से यहाँ आए थे और आख़िर में बाक़ी तमाम लोगों को। {15:19} जब फ़िलिस्ती शहर जात का आदमी इत्ती दाऊद के सामने से गुज़रने लगा तो बादशाह उस से मुख़ातिब हुआ, “आप हमारे साथ क्यूँ जाएँ? नहीं, वापस चले जाएँ और नए बादशाह के साथ रहें। आप तो ग़ैरमुल्की हैं और इस लिए इस्राईल में रहते हैं कि आप को जिलावतन कर दिया गया है। {15:20} आप को यहाँ आए थोड़ी देर हुई है, तो क्या मुनासिब है कि आप को दुबारा मेरी वजह से कभी इधर कभी इधर घूमना पड़े? क्या पता है कि मुझे कहाँ कहाँ जाना पड़े। इस लिए वापस चले जाएँ, और अपने हमवतनों को भी अपने साथ ले जाएँ। रब आप पर अपनी मेहरबानी और वफ़ादारी का इज़हार करे।” {15:21} लेकिन इत्ती ने एतिराज़ किया, “मेरे आक़ा, रब और बादशाह की हयात की क़सम, मैं आप को कभी नहीं छोड़ सकता, ख़्वाह मुझे अपनी जान भी क़ुर्बान करनी पड़े।” {15:22} तब दाऊद मान गया। “चलो, फिर आगे निकलें!” चुनाँचे इत्ती अपने लोगों और उन के ख़ानदानों के साथ आगे निकला। {15:23} आख़िर में दाऊद ने वादी-ए-क़िद्रोन को पार करके रेगिस्तान की तरफ़ रुख़ किया। गिर्द-ओ-नवाह के तमाम लोग बादशाह को उस के पैरोकारों समेत रवाना होते हुए देख कर फूट फूट कर रोने लगे। {15:24} सदोक़ इमाम और तमाम लावी भी दाऊद के साथ शहर से निकल आए थे। लावी अह्द का सन्दूक़ उठाए चल रहे थे। अब उन्हों ने उसे शहर से बाहर ज़मीन पर रख दिया, और अबियातर वहाँ क़ुर्बानियाँ चढ़ाने लगा। लोगों के शहर से निकलने के पूरे अर्से के दौरान वह क़ुर्बानियाँ चढ़ाता रहा। {15:25} फिर दाऊद सदोक़ से मुख़ातिब हुआ, “अल्लाह का सन्दूक़ शहर में वापस ले जाएँ। अगर रब की नज़र-ए-करम मुझ पर हुई तो वह किसी दिन मुझे शहर में वापस ला कर अह्द के सन्दूक़ और उस की सुकूनतगाह को दुबारा देखने की इजाज़त देगा। {15:26} लेकिन अगर वह फ़रमाए कि तू मुझे पसन्द नहीं है, तो मैं यह भी बर्दाश्त करने के लिए तय्यार हूँ। वह मेरे साथ वह कुछ करे जो उसे मुनासिब लगे। {15:27} जहाँ तक आप का ताल्लुक़ है, अपने बेटे अख़ीमाज़ को साथ ले कर सहीह-सलामत शहर में वापस चले जाएँ। अबियातर और उस का बेटा यूनतन भी साथ जाएँ। {15:28} मैं ख़ुद रेगिस्तान में दरया-ए-यर्दन की उस जगह रुक जाऊँगा जहाँ हम आसानी से दरया को पार कर सकेंगे। वहाँ आप मुझे यरूशलम के हालात के बारे में पैग़ाम भेज सकते हैं। मैं आप के इन्तिज़ार में रहूँगा।” {15:29} चुनाँचे सदोक़ और अबियातर अह्द का सन्दूक़ शहर में वापस ले जा कर वहीं रहे। {15:30} दाऊद रोते रोते ज़ैतून के पहाड़ पर चढ़ने लगा। उस का सर ढाँपा हुआ था, और वह नंगे पाँओ चल रहा था। बाक़ी सब के सर भी ढाँपे हुए थे, सब रोते रोते चढ़ने लगे। {15:31} रास्ते में दाऊद को इत्तिला दी गई, “अख़ीतुफ़ल भी अबीसलूम के साथ मिल गया है।” यह सुन कर दाऊद ने दुआ की, “ऐ रब, बख़्श दे कि अख़ीतुफ़ल के मश्वरे नाकाम हो जाएँ।” {15:32} चलते चलते दाऊद पहाड़ की चोटी पर पहुँच गया जहाँ अल्लाह की परस्तिश की जाती थी। वहाँ हूसी अर्की उस से मिलने आया। उस के कपड़े फटे हुए थे, और सर पर ख़ाक थी। {15:33} दाऊद ने उस से कहा, “अगर आप मेरे साथ जाएँ तो आप सिर्फ़ बोझ का बाइस बनेंगे। {15:34} बेहतर है कि आप लौट कर शहर में जाएँ और अबीसलूम से कहें, ‘ऐ बादशाह, मैं आप की ख़िदमत में हाज़िर हूँ। पहले मैं आप के बाप की ख़िदमत करता था, और अब आप ही की ख़िदमत करूँगा।’ अगर आप ऐसा करें तो आप अख़ीतुफ़ल के मश्वरे नाकाम बनाने में मेरी बड़ी मदद करेंगे। {15:35} आप अकेले नहीं होंगे। दोनों इमाम सदोक़ और अबियातर भी यरूशलम में पीछे रह गए हैं। दरबार में जो भी मन्सूबे बांधे जाएंगे {15:36} वह उन्हें बताएँ। सदोक़ का बेटा अख़ीमाज़ और अबियातर का बेटा यूनतन मुझे हर ख़बर पहुँचाएँगे, क्यूँकि वह भी शहर में ठहरे हुए हैं।” {15:37} तब दाऊद का दोस्त हूसी वापस चला गया। वह उस वक़्त पहुँच गया जब अबीसलूम यरूशलम में दाख़िल हो रहा था। {i16:1} ज़ीबा मिफ़ीबोसत के बारे में झूट बोलता है {16:1} दाऊद अभी पहाड़ की चोटी से कुछ आगे निकल गया था कि मिफ़ीबोसत का मुलाज़िम ज़ीबा उस से मिलने आया। उस के पास दो गधे थे जिन पर ज़ीनें कसी हुई थीं। उन पर 200 रोटियाँ, किशमिश की 100 टिक्कियाँ, 100 ताज़ा फल और मै की एक मश्क लदी हुई थी। {16:2} बादशाह ने पूछा, “आप इन चीज़ों के साथ क्या करना चाहते हैं?” ज़ीबा ने जवाब दिया, “गधे बादशाह के ख़ानदान के लिए हैं, वह इन पर बैठ कर सफ़र करें। रोटी और फल जवानों के लिए हैं, और मै उन के लिए जो रेगिस्तान में चलते चलते थक जाएँ।” {16:3} बादशाह ने सवाल किया, “आप के पुराने मालिक का पोता मिफ़ीबोसत कहाँ है?” ज़ीबा ने कहा, “वह यरूशलम में ठहरा हुआ है। वह सोचता है कि आज इस्राईली मुझे बादशाह बना देंगे, क्यूँकि मैं साऊल का पोता हूँ।” {16:4} यह सुन कर दाऊद बोला, “आज ही मिफ़ीबोसत की तमाम मिलकियत आप के नाम मुन्तक़िल की जाती है!” ज़ीबा ने कहा, “मैं आप के सामने अपने घुटने टेकता हूँ। रब करे कि मैं अपने आक़ा और बादशाह का मन्ज़ूर-ए-नज़र रहूँ।” {16:5} जब दाऊद बादशाह बहूरीम के क़रीब पहुँचा तो एक आदमी वहाँ से निकल कर उस पर लानतें भेजने लगा। आदमी का नाम सिमई बिन जीरा था, और वह साऊल का रिश्तेदार था। {i16:6} सिमई दाऊद को लान-तान करता है {16:6} वह दाऊद और उस के अफ़्सरों पर पत्थर भी फैंकने लगा, अगरचे दाऊद के बाएँ और दाएँ हाथ उस के मुहाफ़िज़ और बेहतरीन फ़ौजी चल रहे थे। {16:7} लानत करते करते सिमई चीख़ रहा था, “चल, दफ़ा हो जा! क़ातिल! बदमआश! {16:8} यह तेरा ही क़ुसूर था कि साऊल और उस का ख़ानदान तबाह हुए। अब रब तुझे जो साऊल की जगह तख़्तनशीन हो गया है इस की मुनासिब सज़ा दे रहा है। उस ने तेरे बेटे अबीसलूम को तेरी जगह तख़्तनशीन करके तुझे तबाह कर दिया है। क़ातिल को सहीह मुआवज़ा मिल गया है!” {16:9} अबीशै बिन ज़रूयाह बादशाह से कहने लगा, “यह कैसा मुर्दा कुत्ता है जो मेरे आक़ा बादशाह पर लानत करे? मुझे इजाज़त दें, तो मैं जा कर उस का सर क़लम कर दूँ।” {16:10} लेकिन बादशाह ने उसे रोक दिया, “मेरा आप और आप के भाई योआब से क्या वास्ता? नहीं, उसे लानत करने दें। हो सकता है रब ने उसे यह करने का हुक्म दिया है। तो फिर हम कौन हैं कि उसे रोकें।” {16:11} फिर दाऊद तमाम अफ़्सरों से भी मुख़ातिब हुआ, “जबकि मेरा अपना बेटा मुझे क़त्ल करने की कोशिश कर रहा है तो साऊल का यह रिश्तेदार ऐसा क्यूँ न करे? इसे छोड़ दो, क्यूँकि रब ने इसे यह करने का हुक्म दिया है। {16:12} शायद रब मेरी मुसीबत का लिहाज़ करके सिमई की लानतें बरकत में बदल दे।” {16:13} दाऊद और उस के लोगों ने सफ़र जारी रखा। सिमई क़रीब की पहाड़ी ढलान पर उस के बराबर चलते चलते उस पर लानतें भेजता और पत्थर और मिट्टी के ढेले फैंकता रहा। {16:14} सब थकेमान्दे दरया-ए-यर्दन को पहुँच गए। वहाँ दाऊद ताज़ादम हो गया। {i16:15} अबीसलूम यरूशलम में {16:15} इतने में अबीसलूम अपने पैरोकारों के साथ यरूशलम में दाख़िल हुआ था। अख़ीतुफ़ल भी उन के साथ मिल गया था। {16:16} थोड़ी देर के बाद दाऊद का दोस्त हूसी अर्की अबीसलूम के दरबार में हाज़िर हो कर पुकारा, “बादशाह ज़िन्दाबाद! बादशाह ज़िन्दाबाद!” {16:17} यह सुन कर अबीसलूम ने उस से तन्ज़न कहा, “यह कैसी वफ़ादारी है जो आप अपने दोस्त दाऊद को दिखा रहे हैं? आप अपने दोस्त के साथ रवाना क्यूँ न हुए?” {16:18} हूसी ने जवाब दिया, “नहीं, जिस आदमी को रब और तमाम इस्राईलियों ने मुक़र्रर किया है, वही मेरा मालिक है, और उसी की ख़िदमत में मैं हाज़िर रहूँगा। {16:19} दूसरे, अगर किसी की ख़िदमत करनी है तो क्या दाऊद के बेटे की ख़िदमत करना मुनासिब नहीं है? जिस तरह मैं आप के बाप की ख़िदमत करता रहा हूँ उसी तरह अब आप की ख़िदमत करूँगा।” {16:20} फिर अबीसलूम अख़ीतुफ़ल से मुख़ातिब हुआ, “आगे क्या करना चाहिए? मुझे अपना मश्वरा पेश करें।” {16:21} अख़ीतुफ़ल ने जवाब दिया, “आप के बाप ने अपनी कुछ दाश्ताओं को महल सँभालने के लिए यहाँ छोड़ दिया है। उन के साथ हमबिसतर हो जाएँ। फिर तमाम इस्राईल को मालूम हो जाएगा कि आप ने अपने बाप की ऐसी बेइज़्ज़ती की है कि सुलह का रास्ता बन्द हो गया है। यह देख कर सब जो आप के साथ हैं मज़बूत हो जाएंगे।” {16:22} अबीसलूम मान गया, और महल की छत पर उस के लिए ख़ैमा लगाया गया। उस में वह पूरे इस्राईल के देखते देखते अपने बाप की दाश्ताओं से हमबिसतर हुआ। {16:23} उस वक़्त अख़ीतुफ़ल का हर मश्वरा अल्लाह के फ़रमान जैसा माना जाता था। दाऊद और अबीसलूम दोनों यूँ ही उस के मश्वरों की क़दर करते थे। {i17:1} हूसी और अख़ीतुफ़ल {17:1} अख़ीतुफ़ल ने अबीसलूम को एक और मश्वरा भी दिया। “मुझे इजाज़त दें तो मैं 12,000 फ़ौजियों के साथ इसी रात दाऊद का ताक़्क़ुब करूँ। {17:2} मैं उस पर हम्ला करूँगा जब वह थकामाँदा और बेदिल है। तब वह घबरा जाएगा, और उस के तमाम फ़ौजी भाग जाएंगे। नतीजतन मैं सिर्फ़ बादशाह ही को मार दूँगा {17:3} और बाक़ी तमाम लोगों को आप के पास वापस लाऊँगा। जो आदमी आप पकड़ना चाहते हैं उस की मौत पर सब वापस आ जाएंगे। और क़ौम में अम्न-ओ-अमान क़ाइम हो जाएगा।” {17:4} यह मश्वरा अबीसलूम और इस्राईल के तमाम बुज़ुर्गों को पसन्द आया। {17:5} ताहम अबीसलूम ने कहा, “पहले हम हूसी अर्की से भी मश्वरा लें। कोई उसे बुला लाए।” {17:6} हूसी आया तो अबीसलूम ने उस के सामने अख़ीतुफ़ल का मन्सूबा बयान करके पूछा, “आप का क्या ख़याल है? क्या हमें ऐसा करना चाहिए, या आप की कोई और राय है?” {17:7} हूसी ने जवाब दिया, “जो मश्वरा अख़ीतुफ़ल ने दिया है वह इस दफ़ा ठीक नहीं। {17:8} आप तो अपने वालिद और उन के आदमियों से वाक़िफ़ हैं। वह सब माहिर फ़ौजी हैं। वह उस रीछनी की सी शिद्दत से लड़ेंगे जिस से उस के बच्चे छीन लिए गए हैं। यह भी ज़हन में रखना चाहिए कि आप का बाप तजरिबाकार फ़ौजी है। इम्कान नहीं कि वह रात को अपने फ़ौजियों के दरमियान गुज़ारेगा। {17:9} ग़ालिबन वह इस वक़्त भी गहरी खाई या कहीं और छुप गया है। हो सकता है वह वहाँ से निकल कर आप के दस्तों पर हम्ला करे और इब्तिदा ही में आप के थोड़े बहुत अफ़राद मर जाएँ। फिर अफ़्वाह फैल जाएगी कि अबीसलूम के दस्तों में क़त्ल-ए-आम शुरू हो गया है। {17:10} यह सुन कर आप के तमाम अफ़राद डर के मारे बेदिल हो जाएंगे, ख़्वाह वह शेरबबर जैसे बहादुर क्यूँ न हों। क्यूँकि तमाम इस्राईल जानता है कि आप का बाप बेहतरीन फ़ौजी है और कि उस के साथी भी दिलेर हैं। {17:11} यह पेश-ए-नज़र रख कर मैं आप को एक और मश्वरा देता हूँ। शिमाल में दान से ले कर जुनूब में बैर-सबा तक लड़ने के क़ाबिल तमाम इस्राईलियों को बुलाएँ। इतने जमा करें कि वह साहिल की रेत की मानिन्द होंगे, और आप ख़ुद उन के आगे चल कर लड़ने के लिए निकलें। {17:12} फिर हम दाऊद का खोज लगा कर उस पर हम्ला करेंगे। हम उस तरह उस पर टूट पड़ेंगे जिस तरह ओस ज़मीन पर गिरती है। सब के सब हलाक हो जाएंगे, और न वह और न उस के आदमी बच पाएँगे। {17:13} अगर दाऊद किसी शहर में पनाह ले तो तमाम इस्राईली फ़सील के साथ रस्से लगा कर पूरे शहर को वादी में घसीट ले जाएंगे। पत्थर पर पत्थर बाक़ी नहीं रहेगा!” {17:14} अबीसलूम और तमाम इस्राईलियों ने कहा, “हूसी का मश्वरा अख़ीतुफ़ल के मश्वरे से बेहतर है।” हक़ीक़त में अख़ीतुफ़ल का मश्वरा कहीं बेहतर था, लेकिन रब ने उसे नाकाम होने दिया ताकि अबीसलूम को मुसीबत में डाले। {i17:15} दाऊद को अबीसलूम का मन्सूबा बताया जाता है {17:15} हूसी ने दोनों इमामों सदोक़ और अबियातर को वह मन्सूबा बताया जो अख़ीतुफ़ल ने अबीसलूम और इस्राईल के बुज़ुर्गों को पेश किया था। साथ साथ उस ने उन्हें अपने मश्वरे के बारे में भी आगाह किया। {17:16} उस ने कहा, “अब फ़ौरन दाऊद को इत्तिला दें कि किसी सूरत में भी इस रात को दरया-ए-यर्दन की उस जगह पर न गुज़ारें जहाँ लोग दरया को पार करते हैं। लाज़िम है कि आप आज ही दरया को उबूर कर लें, वर्ना आप तमाम साथियों समेत बर्बाद हो जाएंगे।” {17:17} यूनतन और अख़ीमाज़ यरूशलम से बाहर के चश्मे ऐन-राजिल के पास इन्तिज़ार कर रहे थे, क्यूँकि वह शहर में दाख़िल हो कर किसी को नज़र आने का ख़तरा मोल नहीं ले सकते थे। एक नौकरानी शहर से निकल आई और उन्हें हूसी का पैग़ाम दे दिया ताकि वह आगे निकल कर उसे दाऊद तक पहुँचाएँ। {17:18} लेकिन एक जवान ने उन्हें देखा और भाग कर अबीसलूम को इत्तिला दी। दोनों जल्दी जल्दी वहाँ से चले गए और एक आदमी के घर में छुप गए जो बहूरीम में रहता था। उस के सहन में कुआँ था। उस में वह उतर गए। {17:19} आदमी की बीवी ने कुएँ के मुँह पर कपड़ा बिछा कर उस पर अनाज के दाने बिखेर दिए ताकि किसी को मालूम न हो कि वहाँ कुआँ है। {17:20} अबीसलूम के सिपाही उस घर में पहुँचे और औरत से पूछने लगे, “अख़ीमाज़ और यूनतन कहाँ हैं?” औरत ने जवाब दिया, “वह आगे निकल चुके हैं, क्यूँकि वह नदी को पार करना चाहते थे।” सिपाही दोनों आदमियों का खोज लगाते लगाते थक गए। आख़िरकार वह ख़ाली हाथ यरूशलम लौट गए। {17:21} जब चले गए तो अख़ीमाज़ और यूनतन कुएँ से निकल कर सीधे दाऊद बादशाह के पास चले गए ताकि उसे पैग़ाम सुनाएँ। उन्हों ने कहा, “लाज़िम है कि आप दरया को फ़ौरन पार करें!” फिर उन्हों ने दाऊद को अख़ीतुफ़ल का पूरा मन्सूबा बताया। {17:22} दाऊद और उस के तमाम साथी जल्द ही रवाना हुए और उसी रात दरया-ए-यर्दन को उबूर किया। पौ फटते वक़्त एक भी पीछे नहीं रह गया था। {17:23} जब अख़ीतुफ़ल ने देखा कि मेरा मश्वरा रद्द किया गया है तो वह अपने गधे पर ज़ीन कस कर अपने वतनी शहर वापस चला गया। वहाँ उस ने घर के तमाम मुआमलात का बन्द-ओ-बस्त किया, फिर जा कर फाँसी ले ली। उसे उस के बाप की क़ब्र में दफ़नाया गया। {17:24} जब दाऊद महनाइम पहुँच गया तो अबीसलूम इस्राईली फ़ौज के साथ दरया-ए-यर्दन को पार करने लगा। {17:25} उस ने अमासा को फ़ौज पर मुक़र्रर किया था, क्यूँकि योआब तो दाऊद के साथ था। अमासा एक इस्माईली बनाम इत्रा का बेटा था। उस की माँ अबीजेल बिन्त नाहस थी, और वह योआब की माँ ज़रूयाह की बहन थी। {17:26} अबीसलूम और उस के साथियों ने मुल्क-ए-जिलिआद में पड़ाओ डाला। {17:27} जब दाऊद महनाइम पहुँचा तो तीन आदमियों ने उस का इस्तिक़्बाल किया। सोबी बिन नाहस अम्मोनियों के दार-उल-हकूमत रब्बा से, मकीर बिन अम्मीएल लो-दिबार से और बर्ज़िल्ली जिलिआदी राजिलीम से आए। {17:28} तीनों ने दाऊद और उस के लोगों को बिस्तर, बासन, मिट्टी के बर्तन, गन्दुम, जौ, मैदा, अनाज के भुने हुए दाने, लोबिया, मसूर, {17:29} शहद, दही, भेड़-बकरियाँ और गाय के दूध का पनीर मुहय्या किया। क्यूँकि उन्हों ने सोचा, “यह लोग रेगिस्तान में चलते चलते ज़रूर भूके, प्यासे और थकेमान्दे हो गए होंगे।” {i18:1} जंग के लिए तय्यारियाँ {18:1} दाऊद ने अपने फ़ौजियों का मुआइना करके हज़ार हज़ार और सौ सौ अफ़राद पर आदमी मुक़र्रर किए। {18:2} फिर उस ने उन्हें तीन हिस्सों में तक़्सीम करके एक हिस्से पर योआब को, दूसरे पर उस के भाई अबीशै बिन ज़रूयाह को और तीसरे पर इत्ती जाती को मुक़र्रर किया। उस ने फ़ौजियों को बताया, “मैं ख़ुद भी आप के साथ लड़ने के लिए निकलूँगा।” {18:3} लेकिन उन्हों ने एतिराज़ किया, “ऐसा न करें! अगर हमें भागना भी पड़े या हमारा आधा हिस्सा मारा भी जाए तो अबीसलूम के फ़ौजियों के लिए इतना कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। वह आप ही को पकड़ना चाहते हैं, क्यूँकि आप उन के नज़्दीक हम में से 10,000 अफ़राद से ज़्यादा अहम हैं। चुनाँचे बेहतर है कि आप शहर ही में रहें और वहाँ से हमारी हिमायत करें।” {18:4} बादशाह ने जवाब दिया, “ठीक है, जो कुछ आप को माक़ूल लगता है वही करूँगा।” वह शहर के दरवाज़े पर खड़ा हुआ, और तमाम मर्द सौ सौ और हज़ार हज़ार के गुरोहों में उस के सामने से गुज़र कर बाहर निकले। {18:5} योआब, अबीशै और इत्ती को उस ने हुक्म दिया, “मेरी ख़ातिर जवान अबीसलूम से नर्मी से पेश आना!” तमाम फ़ौजियों ने तीनों कमाँडरों से यह बात सुनी। {i18:6} अबीसलूम की शिकस्त {18:6} दाऊद के लोग खुले मैदान में इस्राईलियों से लड़ने गए। इफ़्राईम के जंगल में उन की टक्कर हुई, {18:7} और दाऊद के फ़ौजियों ने मुख़ालिफ़ों को शिकस्त-ए-फ़ाश दी। उन के 20,000 अफ़राद हलाक हुए। {18:8} लड़ाई पूरे जंगल में फैलती गई। यह जंगल इतना ख़तरनाक था कि उस दिन तलवार की निस्बत ज़्यादा लोग उस की ज़द में आ कर हलाक हो गए। {18:9} अचानक दाऊद के कुछ फ़ौजियों को अबीसलूम नज़र आया। वह ख़च्चर पर सवार बलूत के एक बड़े दरख़्त के साय में से गुज़रने लगा तो उस के बाल दरख़्त की शाख़ों में उलझ गए। उस का ख़च्चर आगे निकल गया जबकि अबीसलूम वहीं आसमान-ओ-ज़मीन के दरमियान लटका रहा। {18:10} जिन आदमियों ने यह देखा उन में से एक योआब के पास गया और इत्तिला दी, “मैं ने अबीसलूम को देखा है। वह बलूत के एक दरख़्त में लटका हुआ है।” {18:11} योआब पुकारा, “क्या आप ने उसे देखा? तो उसे वहीं क्यूँ न मार दिया? फिर मैं आप को इनआम के तौर पर चाँदी के दस सिक्के और एक कमरबन्द दे देता।” {18:12} लेकिन आदमी ने एतिराज़ किया, “अगर आप मुझे चाँदी के हज़ार सिक्के भी देते तो भी मैं बादशाह के बेटे को हाथ न लगाता। हमारे सुनते सुनते बादशाह ने आप, अबीशै और इत्ती को हुक्म दिया, ‘मेरी ख़ातिर अबीसलूम को नुक़्सान न पहुँचाएँ।’ {18:13} और अगर मैं चुपके से भी उसे क़त्ल करता तो भी इस की ख़बर किसी न किसी वक़्त बादशाह के कानों तक पहुँचती। क्यूँकि कोई भी बात बादशाह से पोशीदा नहीं रहती। अगर मुझे इस सूरत में पकड़ा जाता तो आप मेरी हिमायत न करते।” {18:14} योआब बोला, “मेरा वक़्त मज़ीद ज़ाए मत करो।” उस ने तीन नेज़े ले कर अबीसलूम के दिल में घोंप दिए जब वह अभी ज़िन्दा हालत में दरख़्त से लटका हुआ था। {18:15} फिर योआब के दस सिलाहबर्दारों ने अबीसलूम को घेर कर उसे हलाक कर दिया। {18:16} तब योआब ने नरसिंगा बजा दिया, और उस के फ़ौजी दूसरों का ताक़्क़ुब करने से बाज़ आ कर वापस आ गए। {18:17} बाक़ी इस्राईली अपने अपने घर भाग गए। योआब के आदमियों ने अबीसलूम की लाश को एक गहरे गढ़े में फैंक कर उस पर पत्थरों का बड़ा ढेर लगा दिया। {18:18} कुछ देर पहले अबीसलूम इस ख़याल से बादशाह की वादी में अपनी याद में एक सतून खड़ा कर चुका था कि मेरा कोई बेटा नहीं है जो मेरा नाम क़ाइम रखे। आज तक यह ‘अबीसलूम की यादगार’ कहलाता है। {i18:19} दाऊद को अबीसलूम की मौत की ख़बर मिलती है {18:19} अख़ीमाज़ बिन सदोक़ ने योआब से दरख़्वास्त की, “मुझे दौड़ कर बादशाह को ख़ुशख़बरी सुनाने दें कि रब ने उसे दुश्मनों से बचा लिया है।” {18:20} लेकिन योआब ने इन्कार किया, “जो पैग़ाम आप को बादशाह तक पहुँचाना है वह उस के लिए ख़ुशख़बरी नहीं है, क्यूँकि उस का बेटा मर गया है। किसी और वक़्त मैं ज़रूर आप को उस के पास भेज दूँगा, लेकिन आज नहीं।” {18:21} उस ने एथोपिया के एक आदमी को हुक्म दिया, “जाएँ और बादशाह को बताएँ।” आदमी योआब के सामने औंधे मुँह झुक गया और फिर दौड़ कर चला गया। {18:22} लेकिन अख़ीमाज़ ख़ुश नहीं था। वह इसरार करता रहा, “कुछ भी हो जाए, मेहरबानी करके मुझे उस के पीछे दौड़ने दें!” एक और बार योआब ने उसे रोकने की कोशिश की, “बेटे, आप जाने के लिए क्यूँ तड़पते हैं? जो ख़बर पहुँचानी है उस के लिए आप को इनआम नहीं मिलेगा।” {18:23} अख़ीमाज़ ने जवाब दिया, “कोई बात नहीं। कुछ भी हो जाए, मैं हर सूरत में दौड़ कर बादशाह के पास जाना चाहता हूँ।” तब योआब ने उसे जाने दिया। अख़ीमाज़ ने दरया-ए-यर्दन के खुले मैदान का रास्ता लिया, इस लिए वह एथोपिया के आदमी से पहले बादशाह के पास पहुँच गया। {18:24} उस वक़्त दाऊद शहर के बाहर और अन्दर वाले दरवाज़ों के दरमियान बैठा इन्तिज़ार कर रहा था। जब पहरेदार दरवाज़े के ऊपर की फ़सील पर चढ़ा तो उसे एक तन्हा आदमी नज़र आया जो दौड़ता हुआ उन की तरफ़ आ रहा था। {18:25} पहरेदार ने आवाज़ दे कर बादशाह को इत्तिला दी। दाऊद बोला, “अगर अकेला हो तो ज़रूर ख़ुशख़बरी ले कर आ रहा होगा।” यह आदमी भागता भागता क़रीब आ गया, {18:26} लेकिन इतने में पहरेदार को एक और आदमी नज़र आया जो शहर की तरफ़ दौड़ता हुआ आ रहा था। उस ने शहर के दरवाज़े के दरबान को आवाज़ दी, “एक और आदमी दौड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। वह भी अकेला ही आ रहा है।” दाऊद ने कहा, “वह भी अच्छी ख़बर ले कर आ रहा है।” {18:27} फिर पहरेदार पुकारा, “लगता है कि पहला आदमी अख़ीमाज़ बिन सदोक़ है, क्यूँकि वही यूँ चलता है।” दाऊद को तसल्ली हुई, “अख़ीमाज़ अच्छा बन्दा है। वह ज़रूर अच्छी ख़बर ले कर आ रहा होगा।” {18:28} दूर से अख़ीमाज़ ने बादशाह को आवाज़ दी, “बादशाह की सलामती हो!” वह औंधे मुँह बादशाह के सामने झुक कर बोला, “रब आप के ख़ुदा की तम्जीद हो! उस ने आप को उन लोगों से बचा लिया है जो मेरे आक़ा और बादशाह के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए थे।” {18:29} दाऊद ने पूछा, “और मेरा बेटा अबीसलूम? क्या वह मह्फ़ूज़ है?” अख़ीमाज़ ने जवाब दिया, “जब योआब ने मुझे और बादशाह के दूसरे ख़ादिम को आप के पास रुख़्सत किया तो उस वक़्त बड़ी अफ़्रा-तफ़्री थी। मुझे तफ़्सील से मालूम न हुआ कि क्या हो रहा है।” {18:30} बादशाह ने हुक्म दिया, “एक तरफ़ हो कर मेरे पास खड़े हो जाएँ!” अख़ीमाज़ ने ऐसा ही किया। {18:31} फिर एथोपिया का आदमी पहुँच गया। उस ने कहा, “मेरे बादशाह, मेरी ख़ुशख़बरी सुनें! आज रब ने आप को उन सब लोगों से नजात दिलाई है जो आप के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए थे।” {18:32} बादशाह ने सवाल किया, “और मेरा बेटा अबीसलूम? क्या वह मह्फ़ूज़ है?” एथोपिया के आदमी ने जवाब दिया, “मेरे आक़ा, जिस तरह उस के साथ हुआ है, उस तरह आप के तमाम दुश्मनों के साथ हो जाए, उन सब के साथ जो आप को नुक़्सान पहुँचाना चाहते हैं!” {18:33} यह सुन कर बादशाह लरज़ उठा। शहर के दरवाज़े के ऊपर की फ़सील पर एक कमरा था। अब बादशाह रोते रोते सीढ़ियों पर चढ़ने लगा और चीख़ते चिल्लाते उस कमरे में चला गया, “हाय मेरे बेटे अबीसलूम! मेरे बेटे, मेरे बेटे अबीसलूम! काश मैं ही तेरी जगह मर जाता। हाय अबीसलूम, मेरे बेटे, मेरे बेटे!” {i19:1} योआब दाऊद को समझाता है {19:1} योआब को इत्तिला दी गई, “बादशाह रोते रोते अबीसलूम का मातम कर रहा है।” {19:2} जब फ़ौजियों को ख़बर मिली कि बादशाह अपने बेटे का मातम कर रहा है तो फ़त्ह पाने पर उन की सारी ख़ुशी काफ़ूर हो गई। हर तरफ़ मातम और ग़म का समाँ था। {19:3} उस दिन दाऊद के आदमी चोरी चोरी शहर में घुस आए, ऐसे लोगों की तरह जो मैदान-ए-जंग से फ़रार होने पर शरमाते हुए चुपके से शहर में आ जाते हैं। {19:4} बादशाह अभी कमरे में बैठा था। अपने मुँह को ढाँप कर वह चीख़ता चिल्लाता रहा, “हाय मेरे बेटे अबीसलूम! हाय अबीसलूम, मेरे बेटे, मेरे बेटे!” {19:5} तब योआब उस के पास जा कर उसे समझाने लगा, “आज आप के ख़ादिमों ने न सिर्फ़ आप की जान बचाई है बल्कि आप के बेटों, बेटियों, बीवियों और दाश्ताओं की जान भी। तो भी आप ने उन का मुँह काला कर दिया है। {19:6} जो आप से नफ़रत करते हैं उन से आप मुहब्बत रखते हैं जबकि जो आप से प्यार करते हैं उन से आप नफ़रत करते हैं। आज आप ने साफ़ ज़ाहिर कर दिया है कि आप के कमाँडर और दस्ते आप की नज़र में कोई हैसियत नहीं रखते। हाँ, आज मैं ने जान लिया है कि अगर अबीसलूम ज़िन्दा होता तो आप ख़ुश होते, ख़्वाह हम बाक़ी तमाम लोग हलाक क्यूँ न हो जाते। {19:7} अब उठ कर बाहर जाएँ और अपने ख़ादिमों की हौसलाअफ़्ज़ाई करें। रब की क़सम, अगर आप बाहर न निकलेंगे तो रात तक एक भी आप के साथ नहीं रहेगा। फिर आप पर ऐसी मुसीबत आएगी जो आप की जवानी से ले कर आज तक आप पर नहीं आई है।” {19:8} तब दाऊद उठा और शहर के दरवाज़े के पास उतर आया। जब फ़ौजियों को बताया गया कि बादशाह शहर के दरवाज़े में बैठा है तो वह सब उस के सामने जमा हुए। इतने में इस्राईली अपने घर भाग गए थे। {i19:9} दाऊद यरूशलम वापस आता है {19:9} इस्राईल के तमाम क़बीलों में लोग आपस में बह्स-मुबाहसा करने लगे, “दाऊद बादशाह ने हमें हमारे दुश्मनों से बचाया, और उसी ने हमें फ़िलिस्तियों के हाथ से आज़ाद कर दिया। लेकिन अबीसलूम की वजह से वह मुल्क से हिज्रत कर गया है। {19:10} अब जब अबीसलूम जिसे हम ने मसह करके बादशाह बनाया था मर गया है तो आप बादशाह को वापस लाने से क्यूँ झिजकते हैं?” {19:11} दाऊद ने सदोक़ और अबियातर इमामों की मारिफ़त यहूदाह के बुज़ुर्गों को इत्तिला दी, “यह बात मुझ तक पहुँच गई है कि तमाम इस्राईल अपने बादशाह का इस्तिक़्बाल करके उसे महल में वापस लाना चाहता है। तो फिर आप क्यूँ देर कर रहे हैं? क्या आप मुझे वापस लाने में सब से आख़िर में आना चाहते हैं? {19:12} आप मेरे भाई, मेरे क़रीबी रिश्तेदार हैं। तो फिर आप बादशाह को वापस लाने में आख़िर में क्यूँ आ रहे हैं?” {19:13} और अबीसलूम के कमाँडर अमासा को दोनों इमामों ने दाऊद का यह पैग़ाम पहुँचाया, “सुनें, आप मेरे भतीजे हैं, इस लिए अब से आप ही योआब की जगह मेरी फ़ौज के कमाँडर होंगे। अल्लाह मुझे सख़्त सज़ा दे अगर मैं अपना यह वादा पूरा न करूँ।” {19:14} इस तरह दाऊद यहूदाह के तमाम दिलों को जीत सका, और सब के सब उस के पीछे लग गए। उन्हों ने उसे पैग़ाम भेजा, “वापस आएँ, आप भी और आप के तमाम लोग भी।” {19:15} तब दाऊद यरूशलम वापस चलने लगा। जब वह दरया-ए-यर्दन तक पहुँचा तो यहूदाह के लोग जिल्जाल में आए ताकि उस से मिलें और उसे दरया के दूसरे किनारे तक पहुँचाएँ। {i19:16} दाऊद सिमई को मुआफ़ कर देता है {19:16} बिनयमीनी शहर बहूरीम का सिमई बिन जीरा भी भाग कर यहूदाह के आदमियों के साथ दाऊद से मिलने आया। {19:17} बिनयमीन के क़बीले के हज़ार आदमी उस के साथ थे। साऊल का पुराना नौकर ज़ीबा भी अपने 15 बेटों और 20 नौकरों समेत उन में शामिल था। बादशाह के यर्दन के किनारे तक पहुँचने से पहले पहले {19:18} वह जल्दी से दरया को उबूर करके उस के पास आए ताकि बादशाह के घराने को दरया के दूसरे किनारे तक पहुँचाएँ और हर तरह से बादशाह को ख़ुश रखें। दाऊद दरया को पार करने को था कि सिमई औंधे मुँह उस के सामने गिर गया। {19:19} उस ने इल्तिमास की, “मेरे आक़ा, मुझे मुआफ़ करें। जो ज़ियादती मैं ने उस दिन आप से की जब आप को यरूशलम को छोड़ना पड़ा वह याद न करें। बराह-ए-करम यह बात अपने ज़हन से निकाल दें। {19:20} मैं ने जान लिया है कि मुझ से बड़ा जुर्म सरज़द हुआ है, इस लिए आज मैं यूसुफ़ के घराने के तमाम अफ़राद से पहले ही अपने आक़ा और बादशाह के हुज़ूर आ गया हूँ।” {19:21} अबीशै बिन ज़रूयाह बोला, “सिमई सज़ा-ए-मौत के लाइक़ है! उस ने रब के मसह किए हुए बादशाह पर लानत की है।” {19:22} लेकिन दाऊद ने उसे डाँटा, “मेरा आप और आप के भाई योआब के साथ क्या वास्ता? ऐसी बातों से आप इस दिन मेरे मुख़ालिफ़ बन गए हैं! आज तो इस्राईल में किसी को सज़ा-ए-मौत देने का नहीं बल्कि ख़ुशी का दिन है। देखें, इस दिन मैं दुबारा इस्राईल का बादशाह बन गया हूँ!” {19:23} फिर बादशाह सिमई से मुख़ातिब हुआ, “रब की क़सम, आप नहीं मरेंगे।” {i19:24} मिफ़ीबोसत दाऊद से मिलने आता है {19:24} साऊल का पोता मिफ़ीबोसत भी बादशाह से मिलने आया। उस दिन से जब दाऊद को यरूशलम को छोड़ना पड़ा आज तक जब वह सलामती से वापस पहुँचा मिफ़ीबोसत मातम की हालत में रहा था। न उस ने अपने पाँओ न अपने कपड़े धोए थे, न अपनी मूँछों की काँट-छाँट की थी। {19:25} जब वह बादशाह से मिलने के लिए यरूशलम से निकला तो बादशाह ने उस से सवाल किया, “मिफ़ीबोसत, आप मेरे साथ क्यूँ नहीं गए थे?” {19:26} उस ने जवाब दिया, “मेरे आक़ा और बादशाह, मैं जाने के लिए तय्यार था, लेकिन मेरा नौकर ज़ीबा मुझे धोका दे कर अकेला ही चला गया। मैं ने तो उसे बताया था, ‘मेरे गधे पर ज़ीन कसो ताकि मैं बादशाह के साथ रवाना हो सकूँ।’ और मेरा जाने का कोई और वसीला था नहीं, क्यूँकि मैं दोनों टाँगों से माज़ूर हूँ। {19:27} ज़ीबा ने मुझ पर तोहमत लगाई है। लेकिन मेरे आक़ा और बादशाह अल्लाह के फ़रिश्ते जैसे हैं। मेरे साथ वही कुछ करें जो आप को मुनासिब लगे। {19:28} मेरे दादा के पूरे घराने को आप हलाक कर सकते थे, लेकिन फिर भी आप ने मेरी इज़्ज़त करके उन मेहमानों में शामिल कर लिया जो रोज़ाना आप की मेज़ पर खाना खाते हैं। चुनाँचे मेरा क्या हक़ है कि मैं बादशाह से मज़ीद अपील करूँ।” {19:29} बादशाह बोला, “अब बस करें। मैं ने फ़ैसला कर लिया है कि आप की ज़मीनें आप और ज़ीबा में बराबर तक़्सीम की जाएँ।” {19:30} मिफ़ीबोसत ने जवाब दिया, “वह सब कुछ ले ले। मेरे लिए यही काफ़ी है कि आज मेरे आक़ा और बादशाह सलामती से अपने महल में वापस आ पहुँचे हैं।” {i19:31} दाऊद और बर्ज़िल्ली {19:31} बर्ज़िल्ली जिलिआदी राजिलीम से आया था ताकि बादशाह के साथ दरया-ए-यर्दन को पार करके उसे रुख़्सत करे। {19:32} बर्ज़िल्ली 80 साल का था। महनाइम में रहते वक़्त उसी ने दाऊद की मेहमान-नवाज़ी की थी, क्यूँकि वह बहुत अमीर था। {19:33} अब दाऊद ने बर्ज़िल्ली को दावत दी, “मेरे साथ यरूशलम जा कर वहाँ रहें! मैं आप का हर तरह से ख़याल रखूँगा।” {19:34} लेकिन बर्ज़िल्ली ने इन्कार किया, “मेरी ज़िन्दगी के थोड़े दिन बाक़ी हैं, मैं क्यूँ यरूशलम में जा बसूँ? {19:35} मेरी उम्र 80 साल है। न मैं अच्छी और बुरी चीज़ों में इम्तियाज़ कर सकता, न मुझे खाने-पीने की चीज़ों का मज़ा आता है। गीत गाने वालों की आवाज़ें भी मुझ से सुनी नहीं जातीं। नहीं मेरे आक़ा और बादशाह, अगर मैं आप के साथ जाऊँ तो आप के लिए सिर्फ़ बोझ का बाइस हूँगा। {19:36} इस की ज़रूरत नहीं कि आप मुझे इस क़िस्म का मुआवज़ा दें। मैं बस आप के साथ दरया-ए-यर्दन को पार करूँगा {19:37} और फिर अगर इजाज़त हो तो वापस चला जाऊँगा। मैं अपने ही शहर में मरना चाहता हूँ, जहाँ मेरे माँ-बाप की क़ब्र है। लेकिन मेरा बेटा किम्हाम आप की ख़िदमत में हाज़िर है। वह आप के साथ चला जाए तो आप उस के लिए वह कुछ करें जो आप को मुनासिब लगे।” {19:38} दाऊद ने जवाब दिया, “ठीक है, किम्हाम मेरे साथ जाए। और जो कुछ भी आप चाहेंगे मैं उस के लिए करूँगा। अगर कोई काम है जो मैं आप के लिए कर सकता हूँ तो मैं हाज़िर हूँ।” {19:39} फिर दाऊद ने अपने साथियों समेत दरया को उबूर किया। बर्ज़िल्ली को बोसा दे कर उस ने उसे बरकत दी। बर्ज़िल्ली अपने शहर वापस चल पड़ा {19:40} जबकि दाऊद जिल्जाल की तरफ़ बढ़ गया। किम्हाम भी साथ गया। इस के इलावा यहूदाह के सब और इस्राईल के आधे लोग उस के साथ चले। {i19:41} इस्राईल और यहूदाह आपस में झगड़ते हैं {19:41} रास्ते में इस्राईल के मर्द बादशाह के पास आ कर शिकायत करने लगे, “हमारे भाइयों यहूदाह के लोगों ने आप को आप के घराने और फ़ौजियों समेत चोरी चोरी क्यूँ दरया-ए-यर्दन के मग़रिबी किनारे तक पहुँचाया? यह ठीक नहीं है।” {19:42} यहूदाह के मर्दों ने जवाब दिया, “बात यह है कि हम बादशाह के क़रीबी रिश्तेदार हैं। आप को यह देख कर ग़ुस्सा क्यूँ आ गया है? न हम ने बादशाह का खाना खाया, न उस से कोई तोह्फ़ा पाया है।” {19:43} तो भी इस्राईल के मर्दों ने एतिराज़ किया, “हमारे दस क़बीले हैं, इस लिए हमारा बादशाह की ख़िदमत करने का दस गुना ज़्यादा हक़ है। तो फिर आप हमें हक़ीर क्यूँ जानते हैं? हम ने तो पहले अपने बादशाह को वापस लाने की बात की थी।” यूँ बह्स-मुबाहसा जारी रहा, लेकिन यहूदाह के मर्दों की बातें ज़्यादा सख़्त थीं। {i20:1} सबा दाऊद के ख़िलाफ़ उठ खड़ा होता है {20:1} झगड़ने वालों में से एक बदमआश था जिस का नाम सबा बिन बिक्री था। वह बिनयमीनी था। अब उस ने नरसिंगा बजा कर एलान किया, “न हमें दाऊद से मीरास में कुछ मिलेगा, न यस्सी के बेटे से कुछ मिलने की उम्मीद है। ऐ इस्राईल, हर एक अपने घर वापस चला जाए!” {20:2} तब तमाम इस्राईली दाऊद को छोड़ कर सबा बिन बिक्री के पीछे लग गए। सिर्फ़ यहूदाह के मर्द अपने बादशाह के साथ लिपटे रहे और उसे यर्दन से ले कर यरूशलम तक पहुँचाया। {20:3} जब दाऊद अपने महल में दाख़िल हुआ तो उस ने उन दस दाश्ताओं का बन्द-ओ-बस्त कराया जिन को उस ने महल को सँभालने के लिए पीछे छोड़ दिया था। वह उन्हें एक ख़ास घर में अलग रख कर उन की तमाम ज़रूरियात पूरी करता रहा लेकिन उन से कभी हमबिसतर न हुआ। वह कहीं जा न सकीं, और उन्हें ज़िन्दगी के आख़िरी लम्हे तक बेवा की सी ज़िन्दगी गुज़ारनी पड़ी। {20:4} फिर दाऊद ने अमासा को हुक्म दिया, “यहूदाह के तमाम फ़ौजियों को मेरे पास बुला लाएँ। तीन दिन के अन्दर अन्दर उन के साथ हाज़िर हो जाएँ।” {20:5} अमासा रवाना हुआ। लेकिन जब तीन दिन के बाद लौट न आया {20:6} तो दाऊद अबीशै से मुख़ातिब हुआ, “आख़िर में सबा बिन बिक्री हमें अबीसलूम की निस्बत ज़्यादा नुक़्सान पहुँचाएगा। जल्दी करें, मेरे दस्तों को ले कर उस का ताक़्क़ुब करें। ऐसा न हो कि वह क़िलाबन्द शहरों को क़ब्ज़े में ले ले और यूँ हमारा बड़ा नुक़्सान हो जाए।” {20:7} तब योआब के सिपाही, बादशाह का दस्ता करेती-ओ-फ़लेती और तमाम माहिर फ़ौजी यरूशलम से निकल कर सबा बिन बिक्री का ताक़्क़ुब करने लगे। {20:8} जब वह जिबऊन की बड़ी चटान के पास पहुँचे तो उन की मुलाक़ात अमासा से हुई जो थोड़ी देर पहले वहाँ पहुँच गया था। योआब अपना फ़ौजी लिबास पहने हुए था, और उस पर उस ने कमर में अपनी तलवार की पेटी बांधी हुई थी। अब जब वह अमासा से मिलने गया तो उस ने अपने बाएँ हाथ से तलवार को चोरी चोरी मियान से निकाल लिया। {20:9} उस ने सलाम करके कहा, “भाई, क्या सब ठीक है?” और फिर अपने दहने हाथ से अमासा की दाढ़ी को यूँ पकड़ लिया जैसे उसे बोसा देना चाहता हो। {20:10} अमासा ने योआब के दूसरे हाथ में तलवार पर ध्यान न दिया, और अचानक योआब ने उसे इतने ज़ोर से पेट में घोंप दिया कि उस की अंतड़ियाँ फूट कर ज़मीन पर गिर गईं। तलवार को दुबारा इस्तेमाल करने की ज़रूरत ही नहीं थी, क्यूँकि अमासा फ़ौरन मर गया। फिर योआब और अबीशै सबा का ताक़्क़ुब करने के लिए आगे बढ़े। {20:11} योआब का एक फ़ौजी अमासा की लाश के पास खड़ा रहा और गुज़रने वाले फ़ौजियों को आवाज़ देता रहा, “जो योआब और दाऊद के साथ है वह योआब के पीछे हो ले!” {20:12} लेकिन जितने वहाँ से गुज़रे वह अमासा का ख़ूनआलूदा और तड़पता हुआ जिस्म देख कर रुक गए। जब आदमी ने देखा कि लाश रुकावट का बाइस बन गई है तो उस ने उसे रास्ते से हटा कर खेत में घसीट लिया और उस पर कपड़ा डाल दिया। {20:13} लाश के ग़ाइब हो जाने पर सब लोग योआब के पीछे चले गए और सबा का ताक़्क़ुब करने लगे। {20:14} इतने में सबा पूरे इस्राईल से गुज़रते गुज़रते शिमाल के शहर अबील-बैत-माका तक पहुँच गया था। बिक्री के ख़ानदान के तमाम मर्द भी उस के पीछे लग कर वहाँ पहुँच गए थे। {20:15} तब योआब और उस के फ़ौजी वहाँ पहुँच कर शहर का मुहासरा करने लगे। उन्हों ने शहर की बाहर वाली दीवार के साथ साथ मिट्टी का बड़ा तोदा लगाया और उस पर से गुज़र कर अन्दर वाली बड़ी दीवार तक पहुँच गए। वहाँ वह दीवार की तोड़ फोड़ करने लगे ताकि वह गिर जाए। {20:16} तब शहर की एक दानिशमन्द औरत ने फ़सील से योआब के लोगों को आवाज़ दी, “सुनें! योआब को यहाँ बुला लें ताकि मैं उस से बात कर सकूँ।” {20:17} जब योआब दीवार के पास आया तो औरत ने सवाल किया, “क्या आप योआब हैं?” योआब ने जवाब दिया, “मैं ही हूँ।” औरत ने दरख़्वास्त की, “ज़रा मेरी बातों पर ध्यान दें।” योआब बोला, “ठीक है, मैं सुन रहा हूँ।” {20:18} फिर औरत ने अपनी बात पेश की, “पुराने ज़माने में कहा जाता था कि अबील शहर से मश्वरा लो तो बात बनेगी। {20:19} देखें, हमारा शहर इस्राईल का सब से ज़्यादा अम्नपसन्द और वफ़ादार शहर है। आप एक ऐसा शहर तबाह करने की कोशिश कर रहे हैं जो ‘इस्राईल की माँ’ कहलाता है। आप रब की मीरास को क्यूँ हड़प कर लेना चाहते हैं?” {20:20} योआब ने जवाब दिया, “अल्लाह न करे कि मैं आप के शहर को हड़प या तबाह करूँ। {20:21} मेरे आने का एक और मक़्सद है। इफ़्राईम के पहाड़ी इलाक़े का एक आदमी दाऊद बादशाह के ख़िलाफ़ उठ खड़ा हुआ है जिस का नाम सबा बिन बिक्री है। उसे ढूँड रहे हैं। उसे हमारे हवाले करें तो हम शहर को छोड़ कर चले जाएंगे।” औरत ने कहा, “ठीक है, हम दीवार पर से उस का सर आप के पास फैंक देंगे।” {20:22} उस ने अबील-बैत-माका के बाशिन्दों से बात की और अपनी हिक्मत से उन्हें क़ाइल किया कि ऐसा ही करना चाहिए। उन्हों ने सबा का सर क़लम करके योआब के पास फैंक दिया। तब योआब ने नरसिंगा बजा कर शहर को छोड़ने का हुक्म दिया, और तमाम फ़ौजी अपने अपने घर वापस चले गए। योआब ख़ुद यरूशलम में दाऊद बादशाह के पास लौट गया। {i20:23} दाऊद के आला अफ़्सर {20:23} योआब पूरी इस्राईली फ़ौज पर, बिनायाह बिन यहोयदा शाही दस्ते करेती-ओ-फ़लेती पर {20:24} और अदोराम बेगारियों पर मुक़र्रर था। यहूसफ़त बिन अख़ीलूद बादशाह का मुशीर-ए-ख़ास था। {20:25} सिवा मीरमुन्शी था और सदोक़ और अबियातर इमाम थे। {20:26} ईरा याईरी दाऊद का ज़ाती इमाम था। {i21:1} साऊल के जुर्म का कफ़्फ़ारा {21:1} दाऊद की हुकूमत के दौरान काल पड़ गया जो तीन साल तक जारी रहा। जब दाऊद ने इस की वजह दरयाफ़्त की तो रब ने जवाब दिया, “काल इस लिए ख़त्म नहीं हो रहा कि साऊल ने जिबऊनियों को क़त्ल किया था।” {21:2} तब बादशाह ने जिबऊनियों को बुला लिया ताकि उन से बात करे। असल में वह इस्राईली नहीं बल्कि अमोरियों का बचा-खुचा हिस्सा थे। मुल्क-ए-कनआन पर क़ब्ज़ा करते वक़्त इस्राईलियों ने क़सम खा कर वादा किया था कि हम आप को हलाक नहीं करेंगे। लेकिन साऊल ने इस्राईल और यहूदाह के लिए जोश में आ कर उन्हें हलाक करने की कोशिश की थी। {21:3} दाऊद ने जिबऊनियों से पूछा, “मैं उस ज़ियादती का कफ़्फ़ारा किस तरह दे सकता हूँ जो आप से हुई है? मैं आप के लिए क्या करूँ ताकि आप दुबारा उस ज़मीन को बरकत दें जो रब ने हमें मीरास में दी है?” {21:4} उन्हों ने जवाब दिया, “जो साऊल ने हमारे और हमारे ख़ानदानों के साथ किया है उस का इज़ाला सोने-चाँदी से नहीं किया जा सकता। यह भी मुनासिब नहीं कि हम इस के इवज़ किसी इस्राईली को मार दें।” दाऊद ने सवाल किया, “तो फिर मैं आप के लिए क्या करूँ?” {21:5} जिबऊनियों ने कहा, “साऊल ही ने हमें हलाक करने का मन्सूबा बनाया था, वही हमें तबाह करना चाहता था ताकि हम इस्राईल की किसी भी जगह क़ाइम न रह सकें। {21:6} इस लिए साऊल की औलाद में से सात मर्दों को हमारे हवाले कर दें। हम उन्हें रब के चुने हुए बादशाह साऊल के वतनी शहर जिबिआ में रब के पहाड़ पर मौत के घाट उतार कर उस के हुज़ूर लटका दें।” बादशाह ने जवाब दिया, “मैं उन्हें आप के हवाले कर दूँगा।” {21:7} यूनतन का बेटा मिफ़ीबोसत साऊल का पोता तो था, लेकिन बादशाह ने उसे न छेड़ा, क्यूँकि उस ने रब की क़सम खा कर यूनतन से वादा किया था कि मैं आप की औलाद को कभी नुक़्सान नहीं पहुँचाऊँगा। {21:8} चुनाँचे उस ने साऊल की दाश्ता रिस्फ़ा बिन्त अय्याह के दो बेटों अर्मोनी और मिफ़ीबोसत को और इस के इलावा साऊल की बेटी मीरब के पाँच बेटों को चुन लिया। मीरब बर्ज़िल्ली महूलाती के बेटे अद्रीएल की बीवी थी। {21:9} इन सात आदमियों को दाऊद ने जिबऊनियों के हवाले कर दिया। सातों आदमियों को मज़कूरा पहाड़ पर लाया गया। वहाँ जिबऊनियों ने उन्हें क़त्ल करके रब के हुज़ूर लटका दिया। वह सब एक ही दिन मर गए। उस वक़्त जौ की फ़सल की कटाई शुरू हुई थी। {21:10} तब रिस्फ़ा बिन्त अय्याह सातों लाशों के पास गई और पत्थर पर अपने लिए टाट का कपड़ा बिछा कर लाशों की हिफ़ाज़त करने लगी। दिन के वक़्त वह परिन्दों को भगाती और रात के वक़्त जंगली जानवरों को लाशों से दूर रखती रही। वह बहार के मौसम में फ़सल की कटाई के पहले दिनों से ले कर उस वक़्त तक वहाँ ठहरी रही जब तक बारिश न हुई। {21:11} जब दाऊद को मालूम हुआ कि साऊल की दाश्ता रिस्फ़ा ने क्या किया है {21:12} तो वह यबीस-जिलिआद के बाशिन्दों के पास गया और उन से साऊल और उस के बेटे यूनतन की हड्डियों को ले कर साऊल के बाप क़ीस की क़ब्र में दफ़नाया। (जब फ़िलिस्तियों ने जिल्बूअ के पहाड़ी इलाक़े में इस्राईलियों को {21:13} शिकस्त दी थी तो उन्हों ने साऊल और यूनतन की लाशों को बैत-शान के चौक में लटका दिया था। तब यबीस-जिलिआद के आदमी चोरी चोरी वहाँ आ कर लाशों को अपने पास ले गए थे।) दाऊद ने जिबिआ में अब {21:14} तक लटकी सात लाशों को भी उतार कर ज़िला में क़ीस की क़ब्र में दफ़नाया। ज़िला बिनयमीन के क़बीले की आबादी है। जब सब कुछ दाऊद के हुक्म के मुताबिक़ किया गया था तो रब ने मुल्क के लिए दुआएँ सुन लीं। {i21:15} फ़िलिस्तियों से जंगें {21:15} एक और बार फ़िलिस्तियों और इस्राईलियों के दरमियान जंग छिड़ गई। दाऊद अपनी फ़ौज समेत फ़िलिस्तियों से लड़ने के लिए निकला। जब वह लड़ता लड़ता निढाल हो गया था {21:16} तो एक फ़िलिस्ती ने उस पर हम्ला किया जिस का नाम इश्बी-बनोब था। यह आदमी देओक़ामत मर्द रफ़ा की नस्ल से था। उस के पास नई तलवार और इतना लम्बा नेज़ा था कि सिर्फ़ उस की पीतल की नोक का वज़न तक़रीबन साढ़े 3 किलोग्राम था। {21:17} लेकिन अबीशै बिन ज़रूयाह दौड़ कर दाऊद की मदद करने आया और फ़िलिस्ती को मार डाला। इस के बाद दाऊद के फ़ौजियों ने क़सम खाई, “आइन्दा आप लड़ने के लिए हमारे साथ नहीं निकलेंगे। ऐसा न हो कि इस्राईल का चराग़ बुझ जाए।” {21:18} इस के बाद इस्राईलियों को जूब के क़रीब भी फ़िलिस्तियों से लड़ना पड़ा। वहाँ सिब्बकी हूसाती ने देओक़ामत म्रद रफ़ा की औलाद में से एक आदमी को मार डाला जिस का नाम सफ़ था। {21:19} जूब के क़रीब एक और लड़ाई छिड़ गई। इस के दौरान बैत-लहम के इल्हनान बिन यारे-उरजीम ने जाती जालूत को मौत के घाट उतार दिया। जालूत का नेज़ा खड्डी के शहतीर जैसा बड़ा था। {21:20} एक और दफ़ा जात के पास लड़ाई हुई। फ़िलिस्तियों का एक फ़ौजी जो रफ़ा की नस्ल का था बहुत लम्बा था। उस के हाथों और पैरों की छः छः उंगलियाँ यानी मिल कर 24 उंगलियाँ थीं। {21:21} जब वह इस्राईलियों का मज़ाक़ उड़ाने लगा तो दाऊद के भाई सिमआ के बेटे यूनतन ने उसे मार डाला। {21:22} जात के यह देओक़ामत मर्द रफ़ा की औलाद थे, और वह दाऊद और उस के फ़ौजियों के हाथों हलाक हुए। {i22:1} दाऊद का गीत {22:1} जिस दिन रब ने दाऊद को तमाम दुश्मनों और साऊल के हाथ से बचाया उस दिन बादशाह ने गीत गाया, {22:2} “रब मेरी चटान, मेरा क़िला और मेरा नजातदहिन्दा है। {22:3} मेरा ख़ुदा मेरी चटान है जिस में मैं पनाह लेता हूँ। वह मेरी ढाल, मेरी नजात का पहाड़, मेरा बुलन्द हिसार और मेरी पनाहगाह है। तू मेरा नजातदहिन्दा है जो मुझे ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद से बचाता है। {22:4} मैं रब को पुकारता हूँ, उस की तम्जीद हो! तब वह मुझे दुश्मनों से छुटकारा देता है। {22:5} मौत की मौजों ने मुझे घेर लिया, हलाकत के सैलाब ने मेरे दिल पर दह्शत तारी की। {22:6} पाताल के रस्सों ने मुझे जकड़ लिया, मौत ने मेरे रास्ते में अपने फंदे डाल दिए। {22:7} जब मैं मुसीबत में फंस गया तो मैं ने रब को पुकारा। मैं ने मदद के लिए अपने ख़ुदा से फ़र्याद की तो उस ने अपनी सुकूनतगाह से मेरी आवाज़ सुनी, मेरी चीख़ें उस के कान तक पहुँच गईं। {22:8} तब ज़मीन लरज़ उठी और थरथराने लगी, आसमान की बुन्यादें रब के ग़ज़ब के सामने काँपने और झूलने लगीं। {22:9} उस की नाक से धुआँ निकल आया, उस के मुँह से भस्म करने वाले शोले और दहकते कोएले भड़क उठे। {22:10} आसमान को झुका कर वह नाज़िल हुआ। जब उतर आया तो उस के पाँओ के नीचे अंधेरा ही अंधेरा था। {22:11} वह करूबी फ़रिश्ते पर सवार हुआ और उड़ कर हवा के परों पर मंडलाने लगा। {22:12} उस ने अंधेरे को अपनी छुपने की जगह बनाया, बारिश के काले और घने बादल ख़ैमे की तरह अपने इर्दगिर्द लगाए। {22:13} उस के हुज़ूर की तेज़ रौशनी से शोलाज़न कोएले फूट निकले। {22:14} रब आसमान से कड़कने लगा, अल्लाह तआला की आवाज़ गूँज उठी। {22:15} उस ने अपने तीर चला दिए तो दुश्मन तित्तर-बित्तर हो गए। उस की बिजली इधर उधर गिरती गई तो उन में हलचल मच गई। {22:16} रब ने डाँटा तो समुन्दर की वादियाँ ज़ाहिर हुईं, जब वह ग़ुस्से में गरजा तो उस के दम के झोंकों से ज़मीन की बुन्यादें नज़र आईं। {22:17} बुलन्दियों पर से अपना हाथ बढ़ा कर उस ने मुझे पकड़ लिया, गहरे पानी में से खैंच कर मुझे निकाल लाया। {22:18} उस ने मुझे मेरे ज़बरदस्त दुश्मन से बचाया, उन से जो मुझ से नफ़रत करते हैं, जिन पर मैं ग़ालिब न आ सका। {22:19} जिस दिन मैं मुसीबत में फंस गया उस दिन उन्हों ने मुझ पर हम्ला किया, लेकिन रब मेरा सहारा बना रहा। {22:20} उस ने मुझे तंग जगह से निकाल कर छुटकारा दिया, क्यूँकि वह मुझ से ख़ुश था। {22:21} रब मुझे मेरी रास्तबाज़ी का अज्र देता है। मेरे हाथ साफ़ हैं, इस लिए वह मुझे बरकत देता है। {22:22} क्यूँकि मैं रब की राहों पर चलता रहा हूँ, मैं बदी करने से अपने ख़ुदा से दूर नहीं हुआ। {22:23} उस के तमाम अह्काम मेरे सामने रहे हैं, मैं उस के फ़रमानों से नहीं हटा। {22:24} उस के सामने ही मैं बेइल्ज़ाम रहा, गुनाह करने से बाज़ रहा हूँ। {22:25} इस लिए रब ने मुझे मेरी रास्तबाज़ी का अज्र दिया, क्यूँकि उस की आँखों के सामने ही मैं पाक-साफ़ साबित हुआ। {22:26} ऐ अल्लाह, जो वफ़ादार है उस के साथ तेरा सुलूक वफ़ादारी का है, जो बेइल्ज़ाम है उस के साथ तेरा सुलूक बेइल्ज़ाम है। {22:27} जो पाक है उस के साथ तेरा सुलूक पाक है। लेकिन जो कजरौ है उस के साथ तेरा सुलूक भी कजरवी का है। {22:28} तू पस्तहालों को नजात देता है, और तेरी आँखें मग़रूरों पर लगी रहती हैं ताकि उन्हें पस्त करें। {22:29} ऐ रब, तू ही मेरा चराग़ है, रब ही मेरे अंधेरे को रौशन करता है। {22:30} क्यूँकि तेरे साथ मैं फ़ौजी दस्ते पर हम्ला कर सकता, अपने ख़ुदा के साथ दीवार को फलाँग सकता हूँ। {22:31} अल्लाह की राह कामिल है, रब का फ़रमान ख़ालिस है। जो भी उस में पनाह ले उस की वह ढाल है। {22:32} क्यूँकि रब के सिवा कौन ख़ुदा है? हमारे ख़ुदा के सिवा कौन चटान है? {22:33} अल्लाह मुझे क़ुव्वत से कमरबस्ता करता, वह मेरी राह को कामिल कर देता है। {22:34} वह मेरे पाँओ को हिरन की सी फुरती अता करता, मुझे मज़बूती से मेरी बुलन्दियों पर खड़ा करता है। {22:35} वह मेरे हाथों को जंग करने की तर्बियत देता है। अब मेरे बाज़ू पीतल की कमान को भी तान लेते हैं। {22:36} ऐ रब, तू ने मुझे अपनी नजात की ढाल बख़्श दी है, तेरी नर्मी ने मुझे बड़ा बना दिया है। {22:37} तू मेरे क़दमों के लिए रास्ता बना देता है, इस लिए मेरे टख़ने नहीं डगमगाते। {22:38} मैं ने अपने दुश्मनों का ताक़्क़ुब करके उन्हें कुचल दिया, मैं बाज़ न आया जब तक वह ख़त्म न हो गए। {22:39} मैं ने उन्हें तबाह करके यूँ पाश पाश कर दिया कि दुबारा उठ न सके बल्कि गिर कर मेरे पाँओ तले पड़े रहे। {22:40} क्यूँकि तू ने मुझे जंग करने के लिए क़ुव्वत से कमरबस्ता कर दिया, तू ने मेरे मुख़ालिफ़ों को मेरे सामने झुका दिया। {22:41} तू ने मेरे दुश्मनों को मेरे सामने से भगा दिया, और मैं ने नफ़रत करने वालों को तबाह कर दिया। {22:42} वह मदद के लिए चीख़ते चिल्लाते रहे, लेकिन बचाने वाला कोई नहीं था। वह रब को पुकारते रहे, लेकिन उस ने जवाब न दिया। {22:43} मैं ने उन्हें चूर चूर करके गर्द की तरह हवा में उड़ा दिया। मैं ने उन्हें गली में मिट्टी की तरह पाँओ तले रौंद कर रेज़ा रेज़ा कर दिया। {22:44} तू ने मुझे मेरी क़ौम के झगड़ों से बचा कर अक़्वाम पर मेरी हुकूमत क़ाइम रखी है। जिस क़ौम से मैं नावाक़िफ़ था वह मेरी ख़िदमत करती है। {22:45} परदेसी दबक कर मेरी ख़ुशामद करते हैं। जूँ ही मैं बात करता हूँ तो वह मेरी सुनते हैं। {22:46} वह हिम्मत हार कर काँपते हुए अपने क़िलों से निकल आते हैं। {22:47} रब ज़िन्दा है! मेरी चटान की तम्जीद हो! मेरे ख़ुदा की ताज़ीम हो जो मेरी नजात की चटान है। {22:48} वही ख़ुदा है जो मेरा इन्तिक़ाम लेता, अक़्वाम को मेरे ताबे कर देता {22:49} और मुझे मेरे दुश्मनों से छुटकारा देता है। यक़ीनन तू मुझे मेरे मुख़ालिफ़ों पर सरफ़राज़ करता, मुझे ज़ालिमों से बचाए रखता है। {22:50} ऐ रब, इस लिए मैं अक़्वाम में तेरी हम्द-ओ-सना करूँगा, तेरे नाम की तारीफ़ में गीत गाऊँगा। {22:51} क्यूँकि रब अपने बादशाह को बड़ी नजात देता है, वह अपने मसह किए हुए बादशाह दाऊद और उस की औलाद पर हमेशा तक मेहरबान रहेगा।” {i23:1} दाऊद के आख़िरी अल्फ़ाज़ {23:1} दर्ज-ए-ज़ैल दाऊद के आख़िरी अल्फ़ाज़ हैं: “दाऊद बिन यस्सी का फ़रमान जिसे अल्लाह ने सरफ़राज़ किया, जिसे याक़ूब के ख़ुदा ने मसह करके बादशाह बना दिया था, और जिस की तारीफ़ इस्राईल के गीत करते हैं, {23:2} रब के रूह ने मेरी मारिफ़त बात की, उस का फ़रमान मेरी ज़बान पर था। {23:3} इस्राईल के ख़ुदा ने फ़रमाया, इस्राईल की चटान मुझ से हमकलाम हुई, ‘जो इन्साफ़ से हुकूमत करता है, जो अल्लाह का ख़ौफ़ मान कर हुक्मरानी करता है, {23:4} वह सुब्ह की रौशनी की मानिन्द है, उस तुलू-ए-आफ़्ताब की मानिन्द जब बादल छाए नहीं होते। जब उस की किरनें बारिश के बाद ज़मीन पर पड़ती हैं तो पौदे फूट निकलते हैं।’ {23:5} यक़ीनन मेरा घराना मज़बूती से अल्लाह के साथ है, क्यूँकि उस ने मेरे साथ अबदी अह्द बांधा है, ऐसा अह्द जिस का हर पहलू मुनज़्ज़म और मह्फ़ूज़ है। वह मेरी नजात तक्मील तक पहुँचाएगा और मेरी हर आर्ज़ू पूरी करेगा। {23:6} लेकिन बेदीन ख़ारदार झाड़ियों की मानिन्द हैं जो हवा के झोंकों से इधर उधर बिखर गई हैं। काँटों की वजह से कोई भी हाथ नहीं लगाता। {23:7} लोग उन्हें लोहे के औज़ार या नेज़े के दस्ते से जमा करके वहीं के वहीं जला देते हैं।” {i23:8} दाऊद के सूरमा {23:8} दर्ज-ए-ज़ैल दाऊद के सूरमाओं की फ़हरिस्त है। जो तीन अफ़्सर योआब के भाई अबीशै के ऐन बाद आते थे उन में योशेब-बशेबत तह्कमूनी पहले नम्बर पर आता था। एक बार उस ने अपने नेज़े से 800 आदमियों को मार दिया। {23:9} इन तीन अफ़्सरों में से दूसरी जगह पर इलीअज़र बिन दोदो बिन अख़ूही आता था। एक जंग में जब उन्हों ने फ़िलिस्तियों को चैलेंज दिया था और इस्राईली बाद में पीछे हट गए तो इलीअज़र दाऊद के साथ {23:10} फ़िलिस्तियों का मुक़ाबला करता रहा। उस दिन वह फ़िलिस्तियों को मारते मारते इतना थक गया कि आख़िरकार तलवार उठा न सका बल्कि हाथ तलवार के साथ जम गया। रब ने उस की मारिफ़त बड़ी फ़त्ह बख़्शी। बाक़ी दस्ते सिर्फ़ लाशों को लूटने के लिए लौट आए। {23:11} उस के बाद तीसरी जगह पर सम्मा बिन अजी-हरारी आता था। एक मर्तबा फ़िलिस्ती लही के क़रीब मसूर के खेत में इस्राईल के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे। इस्राईली फ़ौजी उन के सामने भागने लगे, {23:12} लेकिन सम्मा खेत के दरमियान तक बढ़ गया और वहाँ लड़ते लड़ते फ़िलिस्तियों को शिकस्त दी। रब ने उस की मारिफ़त बड़ी फ़त्ह बख़्शी। {23:13} एक और जंग के दौरान दाऊद अदुल्लाम के ग़ार के पहाड़ी क़िले में था जबकि फ़िलिस्ती फ़ौज ने वादी-ए-रफ़ाईम में अपनी लश्करगाह लगाई थी। उन {23:14} के दस्तों ने बैत-लहम पर भी क़ब्ज़ा कर लिया था। फ़सल का मौसम था। दाऊद के तीस आला अफ़्सरों में से तीन उस से मिलने आए। {23:15} दाऊद को शदीद प्यास लगी, और वह कहने लगा, “कौन मेरे लिए बैत-लहम के दरवाज़े पर के हौज़ से कुछ पानी लाएगा?” {23:16} यह सुन कर तीनों अफ़्सर फ़िलिस्तियों की लश्करगाह पर हम्ला करके उस में घुस गए और लड़ते लड़ते बैत-लहम के हौज़ तक पहुँच गए। उस से कुछ पानी भर कर वह उसे दाऊद के पास ले आए। लेकिन उस ने पीने से इन्कार कर दिया बल्कि उसे क़ुर्बानी के तौर पर उंडेल कर रब को पेश किया {23:17} और बोला, “रब न करे कि मैं यह पानी पियूँ। अगर ऐसा करता तो उन आदमियों का ख़ून पीता जो अपनी जान पर खेल कर पानी लाए हैं।” इस लिए वह उसे पीना नहीं चाहता था। यह इन तीन सूरमाओं के ज़बरदस्त कामों की एक मिसाल है। {23:18} योआब बिन ज़रूयाह का भाई अबीशै मज़कूरा तीन सूरमाओं पर मुक़र्रर था। एक दफ़ा उस ने अपने नेज़े से 300 आदमियों {23:19} को मार डाला। तीनों की निस्बत उस की दुगनी इज़्ज़त की जाती थी, लेकिन वह ख़ुद उन में गिना नहीं जाता था। {23:20} बिनायाह बिन यहोयदा भी ज़बरदस्त फ़ौजी था। वह क़ब्ज़िएल का रहने वाला था, और उस ने बहुत दफ़ा अपनी मर्दानगी दिखाई। मोआब के दो बड़े सूरमा उस के हाथों हलाक हुए। एक बार जब बहुत बर्फ़ पड़ गई तो उस ने एक हौज़ में उतर कर एक शेरबबर को मार डाला जो उस में गिर गया था। {23:21} एक और मौक़े पर उस का वास्ता एक देओक़ामत मिस्री से पड़ा। मिस्री के हाथ में नेज़ा था जबकि उस के पास सिर्फ़ लाठी थी। लेकिन बिनायाह ने उस पर हम्ला करके उस के हाथ से नेज़ा छीन लिया और उसे उस के अपने हथियार से मार डाला। {23:22} ऐसी बहादुरी दिखाने की बिना पर बिनायाह बिन यहोयदा मज़कूरा तीन आदमियों के बराबर मश्हूर हुआ। {23:23} तीस अफ़्सरों के दीगर मर्दों की निस्बत उस की ज़्यादा इज़्ज़त की जाती थी, लेकिन वह मज़कूरा तीन आदमियों में गिना नहीं जाता था। दाऊद ने उसे अपने मुहाफ़िज़ों पर मुक़र्रर किया। {23:24} ज़ैल के आदमी बादशाह के 30 सूरमाओं में शामिल थे। योआब का भाई असाहेल, बैत-लहम का इल्हनान बिन दोदो, {23:25} सम्मा हरोदी, इलीक़ा हरोदी, {23:26} ख़लिस फ़ल्ती, तक़ूअ का ईरा बिन अक़्क़ीस, {23:27} अनतोत का अबीअज़र, मबून्नी हूसाती, {23:28} ज़ल्मोन अख़ूही, महरी नतूफ़ाती, {23:29} हलिब बिन बाना नतूफ़ाती, बिनयमीनी शहर जिबिआ का इत्ती बिन रीबी, {23:30} बिनायाह फ़िरआतोनी, नहले-जास का हिद्दी, {23:31} अबी-अल्बोन अर्बाती, अज़्मावत बर्हूमी, {23:32} इलियह्बा सालबूनी, बनी यसीन, यूनतन {23:33} बिन सम्मा हरारी, अख़ीआम बिन सरार-हरारी, {23:34} इलीफ़लत बिन अहस्बी माकाती, इलीआम बिन अख़ीतुफ़ल जिलोनी, {23:35} हस्रो कर्मिली, फ़ारी अर्बी, {23:36} ज़ोबाह का इजाल बिन नातन, बानी जादी, {23:37} सिलक़ अम्मोनी, योआब बिन ज़रूयाह का सिलाहबर्दार नहरी बैरोती, {23:38} ईरा इत्री, जरीब इत्री {23:39} और ऊरियाह हित्ती। आदमियों की कुल तादाद 37 थी। {i24:1} दाऊद की मर्दुमशुमारी {24:1} एक बार फिर रब को इस्राईल पर ग़ुस्सा आया, और उस ने दाऊद को उन्हें मुसीबत में डालने पर उकसा कर उस के ज़हन में मर्दुमशुमारी करने का ख़याल डाल दिया। {24:2} चुनाँचे दाऊद ने फ़ौज के कमाँडर योआब को हुक्म दिया, “दान से ले कर बैर-सबा तक इस्राईल के तमाम क़बीलों में से गुज़रते हुए जंग करने के क़ाबिल मर्दों को गिन लें ताकि मालूम हो जाए कि उन की कुल तादाद क्या है।” {24:3} लेकिन योआब ने एतिराज़ किया, “ऐ बादशाह मेरे आक़ा, काश रब आप का ख़ुदा आप के देखते देखते फ़ौजियों की तादाद सौ गुना बढ़ाए। लेकिन मेरे आक़ा और बादशाह उन की मर्दुमशुमारी क्यूँ करना चाहते हैं?” {24:4} लेकिन बादशाह योआब और फ़ौज के बड़े अफ़्सरों के एतिराज़ात के बावुजूद अपनी बात पर डटा रहा। चुनाँचे वह दरबार से रवाना हो कर इस्राईल के मर्दों की फ़हरिस्त तय्यार करने लगे। {24:5} दरया-ए-यर्दन को उबूर करके उन्हों ने अरोईर और वादी-ए-अर्नोन के बीच के शहर में शुरू किया। वहाँ से वह जद और याज़ेर से हो कर {24:6} जिलिआद और हित्तियों के मुल्क के शहर क़ादिस तक पहुँचे। फिर आगे बढ़ते बढ़ते वह दान और सैदा के गिर्द-ओ-नवाह के इलाक़े {24:7} और क़िलाबन्द शहर सूर और हिव्वियों और कनआनियों के तमाम शहरों तक पहुँच गए। आख़िरकार उन्हों ने यहूदाह के जुनूब की मर्दुमशुमारी बैर-सबा तक की। {24:8} यूँ पूरे मुल्क में सफ़र करते करते वह 9 महीनों और 20 दिनों के बाद यरूशलम वापस आए। {24:9} योआब ने बादशाह को मर्दुमशुमारी की पूरी रिपोर्ट पेश की। इस्राईल में तलवार चलाने के क़ाबिल 8 लाख अफ़राद थे जबकि यहूदाह के 5 लाख मर्द थे। {24:10} लेकिन अब दाऊद का ज़मीर उस को मलामत करने लगा। उस ने रब से दुआ की, “मुझ से संगीन गुनाह सरज़द हुआ है। ऐ रब, अब अपने ख़ादिम का क़ुसूर मुआफ़ कर। मुझ से बड़ी हमाक़त हुई है।” {24:11} अगले दिन जब दाऊद सुब्ह के वक़्त उठा तो उस के ग़ैबबीन जाद नबी को रब की तरफ़ से पैग़ाम मिल गया, {24:12} “दाऊद के पास जा कर उसे बता देना, ‘रब तुझे तीन सज़ाएँ पेश करता है। इन में से एक चुन ले’।” {24:13} जाद दाऊद के पास गया और उसे रब का पैग़ाम सुना दिया। उस ने सवाल किया, “आप किस सज़ा को तर्जीह देते हैं? अपने मुल्क में सात साल के दौरान काल? या यह कि आप के दुश्मन आप को भगा कर तीन माह तक आप का ताक़्क़ुब करते रहें? या यह कि आप के मुल्क में तीन दिन तक वबा फैल जाए? ध्यान से इस के बारे में सोचें ताकि मैं उसे आप का जवाब पहुँचा सकूँ जिस ने मुझे भेजा है।” {24:14} दाऊद ने जवाब दिया, “हाय, मैं क्या कहूँ? मैं बहुत परेशान हूँ। लेकिन आदमियों के हाथ में पड़ने की निस्बत बेहतर है कि मैं रब ही के हाथ में पड़ जाऊँ, क्यूँकि उस का रहम अज़ीम है।” {24:15} तब रब ने इस्राईल में वबा फैलने दी। वह उसी सुब्ह शुरू हुई और तीन दिन तक लोगों को मौत के घाट उतारती गई। शिमाल में दान से ले कर जुनूब में बैर-सबा तक कुल 70,000 अफ़राद हलाक हुए। {24:16} लेकिन जब वबा का फ़रिश्ता चलते चलते यरूशलम तक पहुँच गया और उस पर हाथ उठाने लगा तो रब ने लोगों की मुसीबत को देख कर तरस खाया और तबाह करने वाले फ़रिश्ते को हुक्म दिया, “बस कर! अब बाज़ आ।” उस वक़्त रब का फ़रिश्ता वहाँ खड़ा था जहाँ अरौनाह यबूसी अपना अनाज गाहता था। {24:17} जब दाऊद ने फ़रिश्ते को लोगों को मारते हुए देखा तो उस ने रब से इल्तिमास की, “मैं ही ने गुनाह किया है, यह मेरा ही क़ुसूर है। इन भेड़ों से क्या ग़लती हुई है? बराह-ए-करम इन को छोड़ कर मुझे और मेरे ख़ानदान को सज़ा दे।” {24:18} उसी दिन जाद दाऊद के पास आया और उस से कहा, “अरौनाह यबूसी की गाहने की जगह के पास जा कर उस पर रब की क़ुर्बानगाह बना ले।” {24:19} चुनाँचे दाऊद चढ़ कर गाहने की जगह के पास आया जिस तरह रब ने जाद की मारिफ़त फ़रमाया था। {24:20} जब अरौनाह ने बादशाह और उस के दरबारियों को अपनी तरफ़ चढ़ता हुआ देखा तो वह निकल कर बादशाह के सामने औंधे मुँह झुक गया। {24:21} उस ने पूछा, “मेरे आक़ा और बादशाह मेरे पास क्यूँ आ गए?” दाऊद ने जवाब दिया, “मैं आप की गाहने की जगह ख़रीदना चाहता हूँ ताकि रब के लिए क़ुर्बानगाह तामीर करूँ। क्यूँकि यह करने से वबा रुक जाएगी।” {24:22} अरौनाह ने कहा, “मेरे आक़ा और बादशाह, जो कुछ आप को अच्छा लगे उसे ले कर चढ़ाएँ। यह बैल भस्म होने वाली क़ुर्बानी के लिए हाज़िर हैं। और अनाज को गाहने और बैलों को जोतने का सामान क़ुर्बानगाह पर रख कर जला दें। {24:23} बादशाह सलामत, मैं ख़ुशी से आप को यह सब कुछ दे देता हूँ। दुआ है कि आप रब अपने ख़ुदा को पसन्द आएँ।” {24:24} लेकिन बादशाह ने इन्कार किया, “नहीं, मैं ज़रूर हर चीज़ की पूरी क़ीमत अदा करूँगा। मैं रब अपने ख़ुदा को ऐसी कोई भस्म होने वाली क़ुर्बानी पेश नहीं करूँगा जो मुझे मुफ़्त में मिल जाए।” चुनाँचे दाऊद ने बैलों समेत गाहने की जगह चाँदी के 50 सिक्कों के इवज़ ख़रीद ली। {24:25} उस ने वहाँ रब की ताज़ीम में क़ुर्बानगाह तामीर करके उस पर भस्म होने वाली और सलामती की क़ुर्बानियाँ चढ़ाईं। तब रब ने मुल्क के लिए दुआ सुन कर वबा को रोक दिया।