{i1:1} अदूनियाह की साज़िश {1:1} दाऊद बादशाह बहुत बूढ़ा हो चुका था। उसे हमेशा सर्दी लगती थी, और उस पर मज़ीद बिस्तर डालने से कोई फ़ाइदा न होता था। {1:2} यह देख कर मुलाज़िमों ने बादशाह से कहा, “अगर इजाज़त हो तो हम बादशाह के लिए एक नौजवान कुंवारी ढूँड लें जो आप की ख़िदमत में हाज़िर रहे और आप की देख-भाल करे। लड़की आप के साथ लेट कर आप को गर्म रखे।” {1:3} चुनाँचे वह पूरे मुल्क में किसी ख़ूबसूरत लड़की की तलाश करने लगे। ढूँडते ढूँडते अबीशाग शूनीमी को चुन कर बादशाह के पास लाया गया। {1:4} अब से वह उस की ख़िदमत में हाज़िर होती और उस की देख-भाल करती रही। लड़की निहायत ख़ूबसूरत थी, लेकिन बादशाह ने कभी उस से सोह्बत न की। {1:5} उन दिनों में अदूनियाह बादशाह बनने की साज़िश करने लगा। वह दाऊद की बीवी हज्जीत का बेटा था। यूँ वह अबीसलूम का सौतेला भाई और उस के मरने पर दाऊद का सब से बड़ा बेटा था। शक्ल-ओ-सूरत के लिहाज़ से लोग उस की बड़ी तारीफ़ किया करते थे, और बचपन से उस के बाप ने उसे {1:6} कभी नहीं डाँटा था कि तू क्या कर रहा है। अब अदूनियाह अपने आप को लोगों के सामने पेश करके एलान करने लगा, “मैं ही बादशाह बनूँगा।” इस मक़्सद के तहत उस ने अपने लिए रथ और घोड़े ख़रीद कर 50 आदमियों को रख लिया ताकि वह जहाँ भी जाए उस के आगे आगे चलते रहें। {1:7} उस ने योआब बिन ज़रूयाह और अबियातर इमाम से बात की तो वह उस के साथी बन कर उस की हिमायत करने के लिए तय्यार हुए। {1:8} लेकिन सदोक़ इमाम, बिनायाह बिन यहोयदा और नातन नबी उस के साथ नहीं थे, न सिमई, रेई या दाऊद के मुहाफ़िज़। {1:9} एक दिन अदूनियाह ने ऐन-राजिल चश्मे के क़रीब की चटान ज़ुहलत के पास ज़ियाफ़त की। काफ़ी भेड़-बकरियाँ, गाय-बैल और मोटे-ताज़े बछड़े ज़बह किए गए। अदूनियाह ने बादशाह के तमाम बेटों और यहूदाह के तमाम शाही अफ़्सरों को दावत दी थी। {1:10} कुछ लोगों को जान-बूझ कर इस में शामिल नहीं किया गया था। उन में उस का भाई सुलेमान, नातन नबी, बिनायाह और दाऊद के मुहाफ़िज़ शामिल थे। {i1:11} दाऊद सुलेमान को बादशाह क़रार देता है {1:11} तब नातन सुलेमान की माँ बत-सबा से मिला और बोला, “क्या यह ख़बर आप तक नहीं पहुँची कि हज्जीत के बेटे अदूनियाह ने अपने आप को बादशाह बना लिया है? और हमारे आक़ा दाऊद को इस का इल्म तक नहीं! {1:12} आप की और आप के बेटे सुलेमान की ज़िन्दगी बड़े ख़तरे में है। इस लिए लाज़िम है कि आप मेरे मश्वरे पर फ़ौरन अमल करें। {1:13} दाऊद बादशाह के पास जा कर उसे बता देना, ‘ऐ मेरे आक़ा और बादशाह, क्या आप ने क़सम खा कर मुझ से वादा नहीं किया था कि तेरा बेटा सुलेमान मेरे बाद तख़्तनशीन होगा? तो फिर अदूनियाह क्यूँ बादशाह बन गया है?’ {1:14} आप की बादशाह से गुफ़्तगु अभी ख़त्म नहीं होगी कि मैं दाख़िल हो कर आप की बात की तस्दीक़ करूँगा।” {1:15} बत-सबा फ़ौरन बादशाह के पास गई जो सोने के कमरे में लेटा हुआ था। उस वक़्त तो वह बहुत उम्ररसीदा हो चुका था, और अबीशाग उस की देख-भाल कर रही थी। {1:16} बत-सबा कमरे में दाख़िल हो कर बादशाह के सामने मुँह के बल झुक गई। दाऊद ने पूछा, “क्या बात है?” {1:17} बत-सबा ने कहा, “मेरे आक़ा, आप ने तो रब अपने ख़ुदा की क़सम खा कर मुझ से वादा किया था कि तेरा बेटा सुलेमान मेरे बाद तख़्तनशीन होगा। {1:18} लेकिन अब अदूनियाह बादशाह बन बैठा है और मेरे आक़ा और बादशाह को इस का इल्म तक नहीं। {1:19} उस ने ज़ियाफ़त के लिए बहुत से गाय-बैल, मोटे-ताज़े बछड़े और भेड़-बकरियाँ ज़बह करके तमाम शहज़ादों को दावत दी है। अबियातर इमाम और फ़ौज का कमाँडर योआब भी इन में शामिल हैं, लेकिन आप के ख़ादिम सुलेमान को दावत नहीं मिली। {1:20} ऐ बादशाह मेरे आक़ा, इस वक़्त तमाम इस्राईल की आँखें आप पर लगी हैं। सब आप से यह जानने के लिए तड़पते हैं कि आप के बाद कौन तख़्तनशीन होगा। {1:21} अगर आप ने जल्द ही क़दम न उठाया तो आप के कूच कर जाने के फ़ौरन बाद मैं और मेरा बेटा अदूनियाह का निशाना बन कर मुजरिम ठहरेंगे।” {1:22} बत-सबा अभी बादशाह से बात कर ही रही थी कि दाऊद को इत्तिला दी गई कि नातन नबी {1:23} आप से मिलने आया है। नबी कमरे में दाख़िल हो कर बादशाह के सामने औंधे मुँह झुक गया। {1:24} फिर उस ने कहा, “मेरे आक़ा, लगता है कि आप इस हक़ में हैं कि अदूनियाह आप के बाद तख़्तनशीन हो। {1:25} क्यूँकि आज उस ने ऐन-राजिल जा कर बहुत से गाय-बैल, मोटे-ताज़े बछड़े और भेड़-बकरियों को ज़बह किया है। ज़ियाफ़त के लिए उस ने तमाम शहज़ादों, तमाम फ़ौजी अफ़्सरों और अबियातर इमाम को दावत दी है। इस वक़्त वह उस के साथ खाना खा खा कर और मै पी पी कर नारा लगा रहे हैं, ‘अदूनियाह बादशाह ज़िन्दाबाद!’ {1:26} कुछ लोगों को जान-बूझ कर दावत नहीं दी। उन में मैं आप का ख़ादिम, सदोक़ इमाम, बिनायाह बिन यहोयदा और आप का ख़ादिम सुलेमान भी शामिल हैं। {1:27} मेरे आक़ा, क्या आप ने वाक़ई इस का हुक्म दिया है? क्या आप ने अपने ख़ादिमों को इत्तिला दिए बग़ैर फ़ैसला किया है कि यह शख़्स बादशाह बनेगा?” {1:28} जवाब में दाऊद ने कहा, “बत-सबा को बुलाएँ!” वह वापस आई और बादशाह के सामने खड़ी हो गई। {1:29} बादशाह बोला, “रब की हयात की क़सम जिस ने फ़िद्या दे कर मुझे हर मुसीबत से बचाया है, {1:30} आप का बेटा सुलेमान मेरे बाद बादशाह होगा बल्कि आज ही मेरे तख़्त पर बैठ जाएगा। हाँ, आज ही मैं वह वादा पूरा करूँगा जो मैं ने रब इस्राईल के ख़ुदा की क़सम खा कर आप से किया था।” {1:31} यह सुन कर बत-सबा औंधे मुँह झुक गई और कहा, “मेरा मालिक दाऊद बादशाह ज़िन्दाबाद!” {1:32} फिर दाऊद ने हुक्म दिया, “सदोक़ इमाम, नातन नबी और बिनायाह बिन यहोयदा को बुला लाएँ।” तीनों आए {1:33} तो बादशाह उन से मुख़ातिब हुआ, “मेरे बेटे सुलेमान को मेरे ख़च्चर पर बिठाएँ। फिर मेरे अफ़्सरों को साथ ले कर उसे जैहून चश्मे तक पहुँचा दें। {1:34} वहाँ सदोक़ और नातन उसे मसह करके इस्राईल का बादशाह बना दें। नरसिंगे को बजा बजा कर नारा लगाना, ‘सुलेमान बादशाह ज़िन्दाबाद!’ {1:35} इस के बाद मेरे बेटे के साथ यहाँ वापस आ जाना। वह महल में दाख़िल हो कर मेरे तख़्त पर बैठ जाए और मेरी जगह हुकूमत करे, क्यूँकि मैं ने उसे इस्राईल और यहूदाह का हुक्मरान मुक़र्रर किया है।” {1:36} बिनायाह बिन यहोयदा ने जवाब दिया, “आमीन, ऐसा ही हो! रब मेरे आक़ा का ख़ुदा इस फ़ैसले पर अपनी बरकत दे। {1:37} और जिस तरह रब आप के साथ रहा उसी तरह वह सुलेमान के साथ भी हो, बल्कि वह उस के तख़्त को आप के तख़्त से कहीं ज़्यादा सरबुलन्द करे!” {1:38} फिर सदोक़ इमाम, नातन नबी, बिनायाह बिन यहोयदा और बादशाह के मुहाफ़िज़ करेतियों और फ़लेतियों ने सुलेमान को बादशाह के ख़च्चर पर बिठा कर उसे जैहून चश्मे तक पहुँचा दिया। {1:39} सदोक़ के पास तेल से भरा मेंढे का वह सींग था जो मुक़द्दस ख़ैमे में पड़ा रहता था। अब उस ने यह तेल ले कर सुलेमान को मसह किया। फिर नरसिंगा बजाया गया और लोग मिल कर नारा लगाने लगे, “सुलेमान बादशाह ज़िन्दाबाद! सुलेमान बादशाह ज़िन्दाबाद!” {1:40} तमाम लोग बाँसरी बजाते और ख़ुशी मनाते हुए सुलेमान के पीछे चलने लगे। जब वह दुबारा यरूशलम में दाख़िल हुआ तो इतना शोर था कि ज़मीन लरज़ उठी। {i1:41} अदूनियाह की शिकस्त {1:41} लोगों की यह आवाज़ें अदूनियाह और उस के मेहमानों तक भी पहुँच गईं। थोड़ी देर पहले वह खाने से फ़ारिग़ हुए थे। नरसिंगे की आवाज़ सुन कर योआब चौंक उठा और पूछा, “यह क्या है? शहर से इतना शोर क्यूँ सुनाई दे रहा है?” {1:42} वह अभी यह बात कर ही रहा था कि अबियातर का बेटा यूनतन पहुँच गया। योआब बोला, “हमारे पास आएँ। आप जैसे लाइक़ आदमी अच्छी ख़बर ले कर आ रहे होंगे।” {1:43} यूनतन ने जवाब दिया, “अफ़्सोस, ऐसा नहीं है। हमारे आक़ा दाऊद बादशाह ने सुलेमान को बादशाह बना दिया है। {1:44} उस ने उसे सदोक़ इमाम, नातन नबी, बिनायाह बिन यहोयदा और बादशाह के मुहाफ़िज़ करेतियों और फ़लेतियों के साथ जैहून चश्मे के पास भेज दिया है। सुलेमान बादशाह के ख़च्चर पर सवार था। {1:45} जैहून चश्मे के पास सदोक़ इमाम और नातन नबी ने उसे मसह करके बादशाह बना दिया। फिर वह ख़ुशी मनाते हुए शहर में वापस चले गए। पूरे शहर में हलचल मच गई। यही वह शोर है जो आप को सुनाई दे रहा है। {1:46} अब सुलेमान तख़्त पर बैठ चुका है, {1:47} और दरबारी हमारे आक़ा दाऊद बादशाह को मुबारकबाद देने के लिए उस के पास पहुँच गए हैं। वह कह रहे हैं, ‘आप का ख़ुदा करे कि सुलेमान का नाम आप के नाम से भी ज़्यादा मश्हूर हो जाए। उस का तख़्त आप के तख़्त से कहीं ज़्यादा सरबुलन्द हो।’ बादशाह ने अपने बिस्तर पर झुक कर अल्लाह की परस्तिश की {1:48} और कहा, ‘रब इस्राईल के ख़ुदा की तम्जीद हो जिस ने मेरे बेटों में से एक को मेरी जगह तख़्त पर बिठा दिया है। उस का शुक्र है कि मैं अपनी आँखों से यह देख सका’।” {1:49} यूनतन के मुँह से यह ख़बर सुन कर अदूनियाह के तमाम मेहमान घबरा गए। सब उठ कर चारों तरफ़ मुन्तशिर हो गए। {1:50} अदूनियाह सुलेमान से ख़ौफ़ खा कर मुक़द्दस ख़ैमे के पास गया और क़ुर्बानगाह के सींगों से लिपट गया। {1:51} किसी ने सुलेमान के पास जा कर उसे इत्तिला दी, “अदूनियाह को सुलेमान बादशाह से ख़ौफ़ है, इस लिए वह क़ुर्बानगाह के सींगों से लिपटे हुए कह रहा है, ‘सुलेमान बादशाह पहले क़सम खाए कि वह मुझे मौत के घाट नहीं उतारेगा’।” {1:52} सुलेमान ने वादा किया, “अगर वह लाइक़ साबित हो तो उस का एक बाल भी बीका नहीं होगा। लेकिन जब भी उस में बदी पाई जाए वह ज़रूर मरेगा।” {1:53} सुलेमान ने अपने लोगों को अदूनियाह के पास भेज दिया ताकि वह उसे बादशाह के पास पहुँचाएँ। अदूनियाह आया और सुलेमान के सामने औंधे मुँह झुक गया। सुलेमान बोला, “अपने घर चले जाओ!” {i2:1} दाऊद की आख़िरी हिदायात {2:1} जब दाऊद को मह्सूस हुआ कि कूच कर जाने का वक़्त क़रीब है तो उस ने अपने बेटे सुलेमान को हिदायत की, {2:2} “अब मैं वहाँ जा रहा हूँ जहाँ दुनिया के हर शख़्स को जाना होता है। चुनाँचे मज़बूत हों और मर्दानगी दिखाएँ। {2:3} जो कुछ रब आप का ख़ुदा आप से चाहता है वह करें और उस की राहों पर चलते रहें। अल्लाह की शरीअत में दर्ज हर हुक्म और हिदायत पर पूरे तौर पर अमल करें। फिर जो कुछ भी करेंगे और जहाँ भी जाएंगे आप को कामयाबी नसीब होगी। {2:4} फिर रब मेरे साथ अपना वादा पूरा करेगा। क्यूँकि उस ने फ़रमाया है, ‘अगर तेरी औलाद अपने चाल-चलन पर ध्यान दे कर पूरे दिल-ओ-जान से मेरी वफ़ादार रहे तो इस्राईल पर उस की हुकूमत हमेशा तक क़ाइम रहेगी।’ {2:5} दो एक और बातें भी हैं। आप को ख़ूब मालूम है कि योआब बिन ज़रूयाह ने मेरे साथ कैसा सुलूक किया है। इस्राईल के दो कमाँडरों अबिनैर बिन नैर और अमासा बिन यतर को उस ने क़त्ल किया। जब जंग नहीं थी उस ने जंग का ख़ून बहा कर अपनी पेटी और जूतों को बेक़ुसूर ख़ून से आलूदा कर लिया है। {2:6} उस के साथ वह कुछ करें जो आप को मुनासिब लगे। योआब बूढ़ा तो है, लेकिन ध्यान दें कि वह तबई मौत न मरे। {2:7} ताहम बर्ज़िल्ली जिलिआदी के बेटों पर मेहरबानी करें। वह आप की मेज़ के मुस्तक़िल मेहमान रहें, क्यूँकि उन्हों ने मेरे साथ भी ऐसा ही सुलूक किया जब मैं ने आप के भाई अबीसलूम की वजह से यरूशलम से हिज्रत की। {2:8} बहूरीम के बिनयमीनी सिमई बिन जीरा पर भी ध्यान दें। जिस दिन मैं हिज्रत करते हुए महनाइम से गुज़र रहा था तो उस ने मुझ पर लानतें भेजीं। लेकिन मेरी वापसी पर वह दरया-ए-यर्दन पर मुझ से मिलने आया और मैं ने रब की क़सम खा कर उस से वादा किया कि उसे मौत के घाट नहीं उतारूँगा। {2:9} लेकिन आप उस का जुर्म नज़रअन्दाज़ न करें बल्कि उस की मुनासिब सज़ा दें। आप दानिशमन्द हैं, इस लिए आप ज़रूर सज़ा देने का कोई न कोई तरीक़ा ढूँड निकालेंगे। वह बूढ़ा तो है, लेकिन ध्यान दें कि वह तबई मौत न मरे।” {2:10} फिर दाऊद मर कर अपने बापदादा से जा मिला। उसे यरूशलम के उस हिस्से में दफ़न किया गया जो ‘दाऊद का शहर’ कहलाता है। {2:11} वह कुल 40 साल तक इस्राईल का बादशाह रहा, सात साल हब्रून में और 33 साल यरूशलम में। {2:12} सुलेमान अपने बाप दाऊद के बाद तख़्तनशीन हुआ। उस की हुकूमत मज़बूती से क़ाइम हुई। {i2:13} अदूनियाह की मौत {2:13} एक दिन दाऊद की बीवी हज्जीत का बेटा अदूनियाह सुलेमान की माँ बत-सबा के पास आया। बत-सबा ने पूछा, “क्या आप अम्नपसन्द इरादा रख कर आए हैं?” अदूनियाह बोला, “जी, {2:14} बल्कि मेरी आप से गुज़ारिश है।” बत-सबा ने जवाब दिया, “तो फिर बताएँ!” {2:15} अदूनियाह ने कहा, “आप तो जानती हैं कि असल में बादशाह बनने का हक़ मेरा था। और यह तमाम इस्राईल की तवक़्क़ो भी थी। लेकिन अब तो हालात बदल गए हैं। मेरा भाई बादशाह बन गया है, क्यूँकि यही रब की मर्ज़ी थी। {2:16} अब मेरी आप से दरख़्वास्त है। इस से इन्कार न करें।” बत-सबा बोली, “बताएँ।” {2:17} अदूनियाह ने कहा, “मैं अबीशाग शूनीमी से शादी करना चाहता हूँ। बराह-ए-करम सुलेमान बादशाह के सामने मेरी सिफ़ारिश करें ताकि बात बन जाए। अगर आप बात करें तो वह इन्कार नहीं करेगा।” {2:18} बत-सबा राज़ी हुई, “चलें, ठीक है। मैं आप का यह मुआमला बादशाह को पेश करूँगी।” {2:19} चुनाँचे बत-सबा सुलेमान बादशाह के पास गई ताकि उसे अदूनियाह का मुआमला पेश करे। जब दरबार में पहुँची तो बादशाह उठ कर उस से मिलने आया और उस के सामने झुक गया। फिर वह दुबारा तख़्त पर बैठ गया और हुक्म दिया कि माँ के लिए भी तख़्त रखा जाए। बादशाह के दहने हाथ बैठ कर {2:20} उस ने अपना मुआमला पेश किया, “मेरी आप से एक छोटी सी गुज़ारिश है। इस से इन्कार न करें।” बादशाह ने जवाब दिया, “अम्मी, बताएँ अपनी बात, मैं इन्कार नहीं करूँगा।” {2:21} बत-सबा बोली, “अपने भाई अदूनियाह को अबीशाग शूनीमी से शादी करने दें।” {2:22} यह सुन कर सुलेमान भड़क उठा, “अदूनियाह की अबीशाग से शादी!! यह कैसी बात है जो आप पेश कर रही हैं? अगर आप यह चाहती हैं तो क्यूँ न बराह-ए-रास्त तक़ाज़ा करें कि अदूनियाह मेरी जगह तख़्त पर बैठ जाए। आख़िर वह मेरा बड़ा भाई है, और अबियातर इमाम और योआब बिन ज़रूयाह भी उस का साथ दे रहे हैं।” {2:23} फिर सुलेमान बादशाह ने रब की क़सम खा कर कहा, “इस दरख़्वास्त से अदूनियाह ने अपनी मौत पर मुहर लगाई है। अल्लाह मुझे सख़्त सज़ा दे अगर मैं उसे मौत के घाट न उतारूँ। {2:24} रब की क़सम जिस ने मेरी तस्दीक़ करके मुझे मेरे बाप दाऊद के तख़्त पर बिठा दिया और अपने वादे के मुताबिक़ मेरे लिए घर तामीर किया है, अदूनियाह को आज ही मरना है!” {2:25} फिर सुलेमान बादशाह ने बिनायाह बिन यहोयदा को हुक्म दिया कि वह अदूनियाह को मौत के घाट उतार दे। चुनाँचे वह निकला और उसे मार डाला। {i2:26} योआब और अबियातर की सज़ा {2:26} अबियातर इमाम से बादशाह ने कहा, “अब यहाँ से चले जाएँ। अनतोत में अपने घर में रहें और वहाँ अपनी ज़मीनें सँभालें। गो आप सज़ा-ए-मौत के लाइक़ हैं तो भी मैं इस वक़्त आप को नहीं मार दूँगा, क्यूँकि आप मेरे बाप दाऊद के सामने रब क़ादिर-ए-मुतलक़ के अह्द का सन्दूक़ उठाए हर जगह उन के साथ गए। आप मेरे बाप के तमाम तक्लीफ़दिह और मुश्किलतरीन लमहात में शरीक रहे हैं।” {2:27} यह कह कर सुलेमान ने अबियातर का रब के हुज़ूर इमाम की ख़िदमत सरअन्जाम देने का हक़ मन्सूख़ कर दिया। यूँ रब की वह पेशगोई पूरी हुई जो उस ने सैला में एली के घराने के बारे में की थी। {2:28} योआब को जल्द ही पता चला कि अदूनियाह और अबियातर से क्या कुछ हुआ है। वह अबीसलूम की साज़िशों में तो शरीक नहीं हुआ था लेकिन बाद में अदूनियाह का साथी बन गया था। इस लिए अब वह भाग कर रब के मुक़द्दस ख़ैमे में दाख़िल हुआ और क़ुर्बानगाह के सींगों को पकड़ लिया। {2:29} सुलेमान बादशाह को इत्तिला दी गई, “योआब भाग कर रब के मुक़द्दस ख़ैमे में गया है। अब वह वहाँ क़ुर्बानगाह के पास खड़ा है।” यह सुन कर सुलेमान ने बिनायाह बिन यहोयदा को हुक्म दिया, “जाओ, योआब को मार दो!” {2:30} बिनायाह रब के ख़ैमे में जा कर योआब से मुख़ातिब हुआ, “बादशाह फ़रमाता है कि ख़ैमे से निकल आओ!” लेकिन योआब ने जवाब दिया, “नहीं, अगर मरना है तो यहीं मरूँगा।” बिनायाह बादशाह के पास वापस आया और उसे योआब का जवाब सुनाया। {2:31} तब बादशाह ने हुक्म दिया, “चलो, उस की मर्ज़ी! उसे वहीं मार कर दफ़न कर दो ताकि मैं और मेरे बाप का घराना उन क़त्लों के जवाबदिह न ठहरें जो उस ने बिलावजह किए हैं। {2:32} रब उसे उन दो आदमियों के क़त्ल की सज़ा दे जो उस से कहीं ज़्यादा शरीफ़ और अच्छे थे यानी इस्राईली फ़ौज का कमाँडर अबिनैर बिन नैर और यहूदाह की फ़ौज का कमाँडर अमासा बिन यतर। योआब ने दोनों को तलवार से मार डाला, हालाँकि मेरे बाप को इस का इल्म नहीं था। {2:33} योआब और उस की औलाद हमेशा तक इन क़त्लों के क़ुसूरवार ठहरें। लेकिन रब दाऊद, उस की औलाद, घराने और तख़्त को हमेशा तक सलामती अता करे।” {2:34} तब बिनायाह ने मुक़द्दस ख़ैमे में जा कर योआब को मार दिया। उसे यहूदाह के बयाबान में उस की अपनी ज़मीन में दफ़ना दिया गया। {2:35} योआब की जगह बादशाह ने बिनायाह बिन यहोयदा को फ़ौज का कमाँडर बना दिया। अबियातर का उह्दा उस ने सदोक़ इमाम को दे दिया। {i2:36} सिमई की मौत {2:36} इस के बाद बादशाह ने सिमई को बुला कर उसे हुक्म दिया, “यहाँ यरूशलम में अपना घर बना कर रहना। आइन्दा आप को शहर से निकलने की इजाज़त नहीं है, ख़्वाह आप कहीं भी जाना चाहें। {2:37} यक़ीन जानें कि जूँ ही आप शहर के दरवाज़े से निकल कर वादी-ए-क़िद्रोन को पार करेंगे तो आप को मार दिया जाएगा। तब आप ख़ुद अपनी मौत के ज़िम्मादार ठहरेंगे।” {2:38} सिमई ने जवाब दिया, “ठीक है, जो कुछ मेरे आक़ा ने फ़रमाया है मैं करूँगा।” सिमई देर तक बादशाह के हुक्म के मुताबिक़ यरूशलम में रहा। {2:39} तीन साल यूँ ही गुज़र गए। लेकिन एक दिन उस के दो ग़ुलाम भाग गए। चलते चलते वह जात के बादशाह अकीस बिन माका के पास पहुँच गए। किसी ने सिमई को इत्तिला दी, “आप के ग़ुलाम जात में ठहरे हुए हैं।” {2:40} वह फ़ौरन अपने गधे पर ज़ीन कस कर ग़ुलामों को ढूँडने के लिए जात में अकीस के पास चला गया। दोनों ग़ुलाम अब तक वहीं थे तो सिमई उन्हें पकड़ कर यरूशलम वापस ले आया। {2:41} सुलेमान को ख़बर मिली कि सिमई जात जा कर लौट आया है। {2:42} तब उस ने उसे बुला कर पूछा, “क्या मैं ने आप को आगाह करके नहीं कहा था कि यक़ीन जानें कि जूँ ही आप यरूशलम से निकलेंगे आप को मार दिया जाएगा, ख़्वाह आप कहीं भी जाना चाहें। और क्या आप ने जवाब में रब की क़सम खा कर नहीं कहा था, ‘ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगा?’ {2:43} लेकिन अब आप ने अपनी क़सम तोड़ कर मेरे हुक्म की ख़िलाफ़वरज़ी की है। यह आप ने क्यूँ किया है?” {2:44} फिर बादशाह ने कहा, “आप ख़ूब जानते हैं कि आप ने मेरे बाप दाऊद के साथ कितना बुरा सुलूक किया। अब रब आप को इस की सज़ा देगा। {2:45} लेकिन सुलेमान बादशाह को वह बरकत देता रहेगा, और दाऊद का तख़्त रब के हुज़ूर अबद तक क़ाइम रहेगा।” {2:46} फिर बादशाह ने बिनायाह बिन यहोयदा को हुक्म दिया कि वह सिमई को मार दे। बिनायाह ने उसे बाहर ले जा कर तलवार से मार दिया। यूँ सुलेमान की इस्राईल पर हुकूमत मज़बूत हो गई। {i3:1} सुलेमान रब से हिक्मत माँगता है {3:1} सुलेमान फ़िरऔन की बेटी से शादी करके मिस्री बादशाह का दामाद बन गया। शुरू में उस की बीवी शहर के उस हिस्से में रहती थी जो ‘दाऊद का शहर’ कहलाता था। क्यूँकि उस वक़्त नया महल, रब का घर और शहर की फ़सील ज़ेर-ए-तामीर थे। {3:2} उन दिनों में रब के नाम का घर तामीर नहीं हुआ था, इस लिए इस्राईली अपनी क़ुर्बानियाँ मुख़्तलिफ़ ऊँची जगहों पर चढ़ाते थे। {3:3} सुलेमान रब से प्यार करता था और इस लिए अपने बाप दाऊद की तमाम हिदायात के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारता था। लेकिन वह भी जानवरों की अपनी क़ुर्बानियाँ और बख़ूर ऐसे ही मक़ामों पर रब को पेश करता था। {3:4} एक दिन बादशाह जिबऊन गया और वहाँ भस्म होने वाली 1,000 क़ुर्बानियाँ चढ़ाईं, क्यूँकि उस शहर की ऊँची जगह क़ुर्बानियाँ चढ़ाने का सब से अहम मर्कज़ थी। {3:5} जब वह वहाँ ठहरा हुआ था तो रब ख़्वाब में उस पर ज़ाहिर हुआ और फ़रमाया, “तेरा दिल क्या चाहता है? मुझे बता दे तो मैं तेरी ख़्वाहिश पूरी करूँगा।” {3:6} सुलेमान ने जवाब दिया, “तू मेरे बाप दाऊद पर बड़ी मेहरबानी कर चुका है। वजह यह थी कि तेरा ख़ादिम वफ़ादारी, इन्साफ़ और ख़ुलूसदिली से तेरे हुज़ूर चलता रहा। तेरी उस पर मेहरबानी आज तक जारी रही है, क्यूँकि तू ने उस का बेटा उस की जगह तख़्तनशीन कर दिया है। {3:7} ऐ रब मेरे ख़ुदा, तू ने अपने ख़ादिम को मेरे बाप दाऊद की जगह तख़्त पर बिठा दिया है। लेकिन मैं अभी छोटा बच्चा हूँ जिसे अपनी ज़िम्मादारियाँ सहीह तौर पर सँभालने का तजरिबा नहीं हुआ। {3:8} तो भी तेरे ख़ादिम को तेरी चुनी हुई क़ौम के बीच में खड़ा किया गया है, इतनी अज़ीम क़ौम के दरमियान कि उसे गिना नहीं जा सकता। {3:9} चुनाँचे मुझे सुनने वाला दिल अता फ़रमा ताकि मैं तेरी क़ौम का इन्साफ़ करूँ और सहीह और ग़लत बातों में इम्तियाज़ कर सकूँ। क्यूँकि कौन तेरी इस अज़ीम क़ौम का इन्साफ़ कर सकता है?” {3:10} सुलेमान की यह दरख़्वास्त रब को पसन्द आई, {3:11} इस लिए उस ने जवाब दिया, “मैं ख़ुश हूँ कि तू ने न उम्र की दराज़ी, न दौलत और न अपने दुश्मनों की हलाकत बल्कि इम्तियाज़ करने की सलाहियत माँगी है ताकि सुन कर इन्साफ़ कर सके। {3:12} इस लिए मैं तेरी दरख़्वास्त पूरी करके तुझे इतना दानिशमन्द और समझदार बना दूँगा कि उतना न माज़ी में कोई था, न मुस्तक़बिल में कभी कोई होगा। {3:13} बल्कि तुझे वह कुछ भी दे दूँगा जो तू ने नहीं माँगा, यानी दौलत और इज़्ज़त। तेरे जीते जी कोई और बादशाह तेरे बराबर नहीं पाया जाएगा। {3:14} अगर तू मेरी राहों पर चलता रहे और अपने बाप दाऊद की तरह मेरे अह्काम के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारे तो फिर मैं तेरी उम्र दराज़ करूँगा।” {3:15} सुलेमान जाग उठा तो मालूम हुआ कि मैं ने ख़्वाब देखा है। वह यरूशलम को वापस चला गया और रब के अह्द के सन्दूक़ के सामने खड़ा हुआ। वहाँ उस ने भस्म होने वाली और सलामती की क़ुर्बानियाँ पेश कीं, फिर बड़ी ज़ियाफ़त की जिस में तमाम दरबारी शरीक हुए। {i3:16} दो कस्बियों के बच्चे के बारे में सुलेमान का फ़ैसला {3:16} एक दिन दो कस्बियाँ बादशाह के पास आईं। {3:17} एक बात करने लगी, “मेरे आक़ा, हम दोनों एक ही घर में बसती हैं। कुछ देर पहले इस की मौजूदगी में घर में मेरे बच्चा पैदा हुआ। {3:18} दो दिन के बाद इस के भी बचा हुआ। हम अकेली ही थीं, हमारे सिवा घर में कोई और नहीं था। {3:19} एक रात को मेरी साथी का बच्चा मर गया। माँ ने सोते में करवटें बदलते बदलते अपने बच्चे को दबा दिया था। {3:20} रातों रात इसे मालूम हुआ कि बेटा मर गया है। मैं अभी गहरी नींद सो रही थी। यह देख कर इस ने मेरे बच्चे को उठाया और अपने मुर्दे बेटे को मेरी गोद में रख दिया। फिर वह मेरे बेटे के साथ सो गई। {3:21} सुब्ह के वक़्त जब मैं अपने बेटे को दूध पिलाने के लिए उठी तो देखा कि उस से जान निकल गई है। लेकिन जब दिन मज़ीद चढ़ा और मैं ग़ौर से उसे देख सकी तो क्या देखती हूँ कि यह वह बच्चा नहीं है जिसे मैं ने जन्म दिया है!” {3:22} दूसरी औरत ने उस की बात काट कर कहा, “हरगिज़ नहीं! यह झूट है। मेरा बेटा ज़िन्दा है और तेरा तो मर गया है।” पहली औरत चीख़ उठी, “कभी भी नहीं! ज़िन्दा बच्चा मेरा और मुर्दा बच्चा तेरा है।” ऐसी बातें करते करते दोनों बादशाह के सामने झगड़ती रहीं। {3:23} फिर बादशाह बोला, “सीधी सी बात यह है कि दोनों ही दावा करती हैं कि ज़िन्दा बच्चा मेरा है और मुर्दा बच्चा दूसरी का है। {3:24} ठीक है, फिर मेरे पास तलवार ले आएँ!” उस के पास तलवार लाई गई। {3:25} तब उस ने हुक्म दिया, “ज़िन्दा बच्चे को बराबर के दो हिस्सों में काट कर हर औरत को एक एक हिस्सा दे दें।” {3:26} यह सुन कर बच्चे की हक़ीक़ी माँ ने जिस का दिल अपने बेटे के लिए तड़पता था बादशाह से इल्तिमास की, “नहीं मेरे आक़ा, उसे मत मारें! बराह-ए-करम उसे इसी को दे दीजिए।” लेकिन दूसरी औरत बोली, “ठीक है, उसे काट दें। अगर यह मेरा नहीं होगा तो कम अज़ कम तेरा भी नहीं होगा।” {3:27} यह देख कर बादशाह ने हुक्म दिया, “रुकें! बच्चे पर तलवार मत चलाएँ बल्कि उसे पहली औरत को दे दें जो चाहती है कि ज़िन्दा रहे। वही उस की माँ है।” {3:28} जल्द ही सुलेमान के इस फ़ैसले की ख़बर पूरे मुल्क में फैल गई, और लोगों पर बादशाह का ख़ौफ़ छा गया, क्यूँकि उन्हों ने जान लिया कि अल्लाह ने उसे इन्साफ़ करने की ख़ास हिक्मत अता की है। {i4:1} सुलेमान के सरकारी अफ़्सरों की फ़हरिस्त {4:1} अब सुलेमान पूरे इस्राईल पर हुकूमत करता था। {4:2} यह उस के आला अफ़्सर थे: इमाम-ए-आज़म: अज़रियाह बिन सदोक़, {4:3} मीरमुन्शी: सीसा के बेटे इलीहूरिफ़ और अख़ियाह, बादशाह का मुशीर-ए-ख़ास: यहूसफ़त बिन अख़ीलूद, {4:4} फ़ौज का कमाँडर: बिनायाह बिन यहोयदा, इमाम: सदोक़ और अबियातर, {4:5} ज़िलओं पर मुक़र्रर अफ़्सरों का सरदार: अज़रियाह बिन नातन, बादशाह का क़रीबी मुशीर: इमाम ज़बूद बिन नातन, {4:6} महल का इंचार्ज: अख़ीसर, बेगारियों का इंचार्ज: अदूनीराम बिन अब्दा {4:7} सुलेमान ने मुल्क-ए-इस्राईल को बारह ज़िलओं में तक़्सीम करके हर ज़िला पर एक अफ़्सर मुक़र्रर किया था। इन अफ़्सरों की एक ज़िम्मादारी यह थी कि दरबार की ज़रूरियात पूरी करें। हर अफ़्सर को साल में एक माह की ज़रूरियात पूरी करनी थीं। {4:8} दर्ज-ए-ज़ैल इन अफ़्सरों और उन के इलाक़ों की फ़हरिस्त है। बिन हूर: इफ़्राईम का पहाड़ी इलाक़ा, {4:9} बिन दिक़र: मक़स, साल्बीम, बैत-शम्स और ऐलोन-बैत-हनान, {4:10} बिन हसद: अरुब्बोत, सोका और हिफ़र का इलाक़ा, {4:11} सुलेमान की बेटी ताफ़त का शौहर बिन अबीनदाब: साहिली शहर दोर का पहाड़ी इलाक़ा, {4:12} बाना बिन अख़ीलूद: तानक, मजिद्दो और उस बैत-शान का पूरा इलाक़ा जो ज़र्तान के पड़ोस में यज़्रएल के नीचे वाक़े है, नीज़ बैत-शान से ले कर अबील-महूला तक का पूरा इलाक़ा बशमूल युक़्मिआम, {4:13} बिन जबर: जिलिआद में रामात का इलाक़ा बशमूल याईर बिन मनस्सी की बस्तियाँ, फिर बसन में अर्जूब का इलाक़ा। इस में 60 ऐसे फ़सीलदार शहर शामिल थे जिन के दरवाज़ों पर पीतल के कुंडे लगे थे, {4:14} अख़ीनदाब बिन इद्दू: महनाइम, {4:15} सुलेमान की बेटी बासमत का शौहर अख़ीमाज़: नफ़्ताली का क़बाइली इलाक़ा, {4:16} बाना बिन हूसी: आशर का क़बाइली इलाक़ा और बालोत, {4:17} यहूसफ़त बिन फ़रूह: इश्कार का क़बाइली इलाक़ा, {4:18} सिमई बिन ऐला: बिनयमीन का क़बाइली इलाक़ा, {4:19} जबर बिन ऊरी जिलिआद का वह इलाक़ा जिस पर पहले अमोरी बादशाह सीहोन और बसन के बादशाह ओज की हुकूमत थी। इस पूरे इलाक़े पर सिर्फ़ यही एक अफ़्सर मुक़र्रर था। {i4:20} सुलेमान की हुकूमत की अज़मत {4:20} उस ज़माने में इस्राईल और यहूदाह के लोग साहिल की रेत की मानिन्द बेशुमार थे। लोगों को खाने और पीने की सब चीज़ें दस्तयाब थीं, और वह ख़ुश थे। {4:21} सुलेमान दरया-ए-फ़ुरात से ले कर फ़िलिस्तियों के इलाक़े और मिस्री सरहद तक तमाम ममालिक पर हुकूमत करता था। उस के जीते जी यह ममालिक उस के ताबे रहे और उसे ख़राज देते थे। {4:22} सुलेमान के दरबार की रोज़ाना ज़रूरियात यह थीं: तक़रीबन 5,000 किलोग्राम बारीक मैदा, तक़रीबन 10,000 किलोग्राम आम मैदा, {4:23} 10 मोटे-ताज़े बैल, चरागाहों में पले हुए 20 आम बैल, 100 भेड़-बकरियाँ, और इस के इलावा हिरन, ग़ज़ाल, मृग और मुख़्तलिफ़ क़िस्म के मोटे-ताज़े मुर्ग़। {4:24} जितने ममालिक दरया-ए-फ़ुरात के मग़रिब में थे उन सब पर सुलेमान की हुकूमत थी, यानी तिफ़्सह से ले कर ग़ज़्ज़ा तक। किसी भी पड़ोसी मुल्क से उस का झगड़ा नहीं था, बल्कि सब के साथ सुलह थी। {4:25} उस के जीते जी पूरे यहूदाह और इस्राईल में सुलह-सलामती रही। शिमाल में दान से ले कर जुनूब में बैर-सबा तक हर एक सलामती से अंगूर की अपनी बेल और अन्जीर के अपने दरख़्त के साय में बैठ सकता था। {4:26} अपने रथों के घोड़ों के लिए सुलेमान ने 4,000 थान बनवाए। उस के 12,000 घोड़े थे। {4:27} बारह ज़िलओं पर मुक़र्रर अफ़्सर बाक़ाइदगी से सुलेमान बादशाह और उस के दरबार की ज़रूरियात पूरी करते रहे। हर एक को साल में एक माह के लिए सब कुछ मुहय्या करना था। उन की मेहनत की वजह से दरबार में कोई कमी न हुई। {4:28} बादशाह की हिदायत के मुताबिक़ वह रथों के घोड़ों और दूसरे घोड़ों के लिए दरकार जौ और भूसा बराह-ए-रास्त उन के थानों तक पहुँचाते थे। {4:29} अल्लाह ने सुलेमान को बहुत ज़्यादा हिक्मत और समझ अता की। उसे साहिल की रेत जैसा वसी इल्म हासिल हुआ। {4:30} उस की हिक्मत इस्राईल के मशरिक़ में रहने वाले और मिस्र के आलिमों से कहीं ज़्यादा थी। {4:31} इस लिहाज़ से कोई भी उस के बराबर नहीं था। वह ऐतान इज़्राही और महोल के बेटों हैमान, कल्कूल और दर्दा पर भी सब्क़त ले गया था। उस की शोहरत इर्दगिर्द के तमाम ममालिक में फैल गई। {4:32} उस ने 3,000 कहावतें और 1,005 गीत लिख दिए। {4:33} वह तफ़्सील से मुख़्तलिफ़ क़िस्म के पौदों के बारे में बात कर सकता था, लुबनान में देवदार के बड़े दरख़्त से ले कर छोटे पौदे ज़ूफ़ा तक जो दीवार की दराड़ों में उगता है। वह महारत से चौपाइयों, परिन्दों, रेंगने वाले जानवरों और मछलियों की तफ़्सीलात भी बयान कर सकता था। {4:34} चुनाँचे तमाम ममालिक के बादशाहों ने अपने सफ़ीरों को सुलेमान के पास भेज दिया ताकि उस की हिक्मत सुनें। {i5:1} हीराम बादशाह के साथ सुलेमान का मुआहदा {5:1} सूर का बादशाह हीराम हमेशा दाऊद का अच्छा दोस्त रहा था। जब उसे ख़बर मिली कि दाऊद के बाद सुलेमान को मसह करके बादशाह बनाया गया है तो उस ने अपने सफ़ीरों को उसे मुबारकबाद देने के लिए भेज दिया। {5:2} तब सुलेमान ने हीराम को पैग़ाम भेजा, {5:3} “आप जानते हैं कि मेरे बाप दाऊद रब अपने ख़ुदा के नाम के लिए घर तामीर करना चाहते थे। लेकिन यह उन के बस की बात नहीं थी, क्यूँकि उन के जीते जी इर्दगिर्द के ममालिक उन से जंग करते रहे। गो रब ने दाऊद को तमाम दुश्मनों पर फ़त्ह बख़्शी थी, लेकिन लड़ते लड़ते वह रब का घर न बना सके। {5:4} अब हालात फ़र्क़ हैं: रब मेरे ख़ुदा ने मुझे पूरा सुकून अता किया है। चारों तरफ़ न कोई मुख़ालिफ़ नज़र आता है, न कोई ख़तरा। {5:5} इस लिए मैं रब अपने ख़ुदा के नाम के लिए घर तामीर करना चाहता हूँ। क्यूँकि मेरे बाप दाऊद के जीते जी रब ने उन से वादा किया था, ‘तेरे जिस बेटे को मैं तेरे बाद तख़्त पर बिठाऊँगा वही मेरे नाम के लिए घर बनाएगा।’ {5:6} अब गुज़ारिश है कि आप के लकड़हारे लुबनान में मेरे लिए देवदार के दरख़्त काट दें। मेरे लोग उन के साथ मिल कर काम करेंगे। आप के लोगों की मज़दूरी मैं ही अदा करूँगा। जो कुछ भी आप कहेंगे मैं उन्हें दूँगा। आप तो ख़ूब जानते हैं कि हमारे हाँ सैदा के लक्कड़हारों जैसे माहिर नहीं हैं।” {5:7} जब हीराम को सुलेमान का पैग़ाम मिला तो वह बहुत ख़ुश हो कर बोल उठा, “आज रब की हम्द हो जिस ने दाऊद को इस बड़ी क़ौम पर हुकूमत करने के लिए इतना दानिशमन्द बेटा अता किया है!” {5:8} सुलेमान को हीराम ने जवाब भेजा, “मुझे आप का पैग़ाम मिल गया है, और मैं आप की ज़रूर मदद करूँगा। देवदार और जूनीपर की जितनी लकड़ी आप को चाहिए वह मैं आप के पास पहुँचा दूँगा। {5:9} मेरे लोग दरख़्तों के तने लुबनान के पहाड़ी इलाक़े से नीचे साहिल तक लाएँगे जहाँ हम उन के बेड़े बांध कर समुन्दर पर उस जगह पहुँचा देंगे जो आप मुक़र्रर करेंगे। वहाँ हम तनों के रस्से खोल देंगे, और आप उन्हें ले जा सकेंगे। मुआवज़े में आप मुझे इतनी ख़ुराक मुहय्या करें कि मेरे दरबार की ज़रूरियात पूरी हो जाएँ।” {5:10} चुनाँचे हीराम ने सुलेमान को देवदार और जूनीपर की उतनी लकड़ी मुहय्या की जितनी उसे ज़रूरत थी। {5:11} मुआवज़े में सुलेमान उसे सालाना तक़रीबन 32,50,000 किलोग्राम गन्दुम और तक़रीबन 4,40,000 लिटर ज़ैतून का तेल भेजता रहा। {5:12} इस के इलावा सुलेमान और हीराम ने आपस में सुलह का मुआहदा किया। यूँ रब ने सुलेमान को हिक्मत अता की जिस तरह उस ने उस से वादा किया था। {i5:13} रब का घर बनाने की पहली तय्यारियाँ {5:13} सुलेमान बादशाह ने लुबनान में यह काम करने के लिए इस्राईल में से 30,000 आदमियों की बेगार पर भर्ती की। उस ने अदूनीराम को उन पर {5:14} मुक़र्रर किया। हर माह वह बारी बारी 10,000 अफ़राद को लुबनान में भेजता रहा। यूँ हर मज़दूर एक माह लुबनान में और दो माह घर में रहता। {5:15} सुलेमान ने 80,000 आदमियों को कानों में लगाया ताकि वह पत्थर निकालें। 70,000 अफ़राद यह पत्थर यरूशलम लाते थे। {5:16} उन लोगों पर 3,300 निगरान मुक़र्रर थे। {5:17} बादशाह के हुक्म पर वह कानों से बेहतरीन पत्थर के बड़े बड़े टुकड़े निकाल लाए और उन्हें तराश कर रब के घर की बुन्याद के लिए तय्यार किया। {5:18} जबल के कारीगरों ने सुलेमान और हीराम के कारीगरों की मदद की। उन्हों ने मिल कर पत्थर के बड़े बड़े टुकड़े और लकड़ी को तराश कर रब के घर की तामीर के लिए तय्यार किया। {i6:1} रब के घर की तामीर {6:1} सुलेमान ने अपनी हुकूमत के चौथे साल के दूसरे महीने ज़ीब में रब के घर की तामीर शुरू की। इस्राईल को मिस्र से निकले 480 साल गुज़र चुके थे। {6:2} इमारत की लम्बाई 90 फ़ुट, चौड़ाई 30 फ़ुट और ऊँचाई 45 फ़ुट थी। {6:3} सामने एक बरामदा बनाया गया जो इमारत जितना चौड़ा यानी 30 फ़ुट और आगे की तरफ़ 15 फ़ुट लम्बा था। {6:4} इमारत की दीवारों में खिड़कियाँ थीं जिन पर जंगले लगे थे। {6:5} इमारत से बाहर आ कर सुलेमान ने दाएँ बाएँ की दीवारों और पिछली दीवार के साथ एक ढाँचा खड़ा किया जिस की तीन मन्ज़िलें थीं और जिस में मुख़्तलिफ़ कमरे थे। {6:6} निचली मन्ज़िल की अन्दर की चौड़ाई साढ़े 7 फ़ुट, दरमियानी मन्ज़िल की 9 फ़ुट और ऊपर की मन्ज़िल की साढ़े 10 फ़ुट थी। वजह यह थी कि रब के घर की बैरूनी दीवार की मोटाई मन्ज़िल-ब-मन्ज़िल कम होती गई। इस तरीक़े से बैरूनी ढाँचे की दूसरी और तीसरी मन्ज़िल केे शहतीरों के लिए रब के घर की दीवार में सूराख़ बनाने की ज़रूरत नहीं थी बल्कि उन्हें दीवार पर ही रखा गया। यानी दरमियानी मन्ज़िल की इमारत वाली दीवार निचली की दीवार की निस्बत कम मोटी और ऊपर वाली मन्ज़िल की इमारत वाली दीवार दरमियानी मन्ज़िल की दीवार की निस्बत कम मोटी थी। यूँ इस ढाँचे की छतों के शहतीरों को इमारत की दीवार तोड़ कर उस में लगाने की ज़रूरत नहीं थी बल्कि उन्हें इमारत की दीवार पर ही रखा गया। {6:7} जो पत्थर रब के घर की तामीर के लिए इस्तेमाल हुए उन्हें पत्थर की कान के अन्दर ही तराश कर तय्यार किया गया। इस लिए जब उन्हें ज़ेर-ए-तामीर इमारत के पास ला कर जोड़ा गया तो न हथौड़ों, न छैनी न लोहे के किसी और औज़ार की आवाज़ सुनाई दी। {6:8} इस ढाँचे में दाख़िल होने के लिए इमारत की दहनी दीवार में दरवाज़ा बनाया गया। वहाँ से एक सीढ़ी परस्तार को दरमियानी और ऊपर की मन्ज़िल तक पहुँचाती थी। {6:9} यूँ सुलेमान ने इमारत को तक्मील तक पहुँचाया। छत को देवदार के शहतीरों और तख़्तों से बनाया गया। {6:10} जो ढाँचा इमारत के तीनों तरफ़ खड़ा किया गया उसे देवदार के शहतीरों से इमारत की बाहर वाली दीवार के साथ जोड़ा गया। उस की तीनों मन्ज़िलों की ऊँचाई साढ़े सात सात फ़ुट थी। {6:11} एक दिन रब सुलेमान से हमकलाम हुआ, {6:12} “जहाँ तक मेरी सुकूनतगाह का ताल्लुक़ है जो तू मेरे लिए बना रहा है, अगर तू मेरे तमाम अह्काम और हिदायात के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारे तो मैं तेरे लिए वह कुछ करूँगा जिस का वादा मैं ने तेरे बाप दाऊद से किया है। {6:13} तब मैं इस्राईल के दरमियान रहूँगा और अपनी क़ौम को कभी तर्क नहीं करूँगा।” {i6:14} रब के घर का अन्दरूनी हिस्सा {6:14} जब इमारत की दीवारें और छत मुकम्मल हुईं {6:15} तो अन्दरूनी दीवारों पर फ़र्श से ले कर छत तक देवदार के तख़्ते लगाए गए। फ़र्श पर जूनीपर के तख़्ते लगाए गए। {6:16} अब तक इमारत का एक ही कमरा था, लेकिन अब उस ने देवदार के तख़्तों से फ़र्श से ले कर छत तक दीवार खड़ी करके पिछले हिस्से में अलग कमरा बना दिया जिस की लम्बाई 30 फ़ुट थी। यह मुक़द्दसतरीन कमरा बन गया। {6:17} जो हिस्सा सामने रह गया उसे मुक़द्दस कमरा मुक़र्रर किया गया। उस की लम्बाई 60 फ़ुट थी। {6:18} इमारत की तमाम अन्दरूनी दीवारों पर देवदार के तख़्ते यूँ लगे थे कि कहीं भी पत्थर नज़र न आया। तख़्तों पर तूँबे और फूल कन्दा किए गए थे। {6:19} पिछले कमरे में रब के अह्द का सन्दूक़ रखना था। {6:20} इस कमरे की लम्बाई 30 फ़ुट, चौड़ाई 30 फ़ुट और ऊँचाई 30 फ़ुट थी। सुलेमान ने इस की तमाम दीवारों और फ़र्श पर ख़ालिस सोना चढ़ाया। मुक़द्दसतरीन कमरे के सामने देवदार की क़ुर्बानगाह थी। उस पर भी सोना मंढा गया {6:21} बल्कि इमारत के सामने वाले कमरे की दीवारों, छत और फ़र्श पर भी सोना मंढा गया। मुक़द्दसतरीन कमरे के दरवाज़े पर सोने की ज़न्जीरें लगाई गईं। {6:22} चुनाँचे इमारत की तमाम अन्दरूनी दीवारों, छत और फ़र्श पर सोना मंढा गया, और इसी तरह मुक़द्दसतरीन कमरे के सामने की क़ुर्बानगाह पर भी। {6:23} फिर सुलेमान ने ज़ैतून की लकड़ी से दो करूबी फ़रिश्ते बनवाए जिन्हें मुक़द्दसतरीन कमरे में रखा गया। इन मुजस्समों का क़द 15 फ़ुट था। {6:24} दोनों शक्ल-ओ-सूरत में एक जैसे थे। हर एक के दो पर थे, और हर पर की लम्बाई साढ़े सात {6:25} सात फ़ुट थी। चुनाँचे एक पर के सिरे से दूसरे पर के सिरे तक का फ़ासिला 15 फ़ुट था। {6:26} हर एक का क़द 15 फ़ुट था। {6:27} उन्हें मुक़द्दसतरीन कमरे में यूँ एक दूसरे के साथ खड़ा किया गया कि हर फ़रिश्ते का एक पर दूसरे के पर से लगता जबकि दाईं और बाईं तरफ़ हर एक का दूसरा पर दीवार के साथ लगता था। {6:28} इन फ़रिश्तों पर भी सोना मंढा गया। {6:29} मुक़द्दस और मुक़द्दसतरीन कमरों की दीवारों पर करूबी फ़रिश्ते, खजूर के दरख़्त और फूल कन्दा किए गए। {6:30} दोनों कमरों के फ़र्श पर भी सोना मंढा गया। {6:31} सुलेमान ने मुक़द्दसतरीन कमरे का दरवाज़ा ज़ैतून की लकड़ी से बनवाया। उस के दो किवाड़ थे, और चौखट की लकड़ी के पाँच कोने थे। {6:32} दरवाज़े के किवाड़ों पर करूबी फ़रिश्ते, खजूर के दरख़्त और फूल कन्दा किए गए। इन किवाड़ों पर भी फ़रिश्तों और खजूर के दरख़्तों समेत सोना मंढा गया। {6:33} सुलेमान ने इमारत में दाख़िल होने वाले दरवाज़े के लिए भी ज़ैतून की लकड़ी से चौखट बनवाई, लेकिन उस की लकड़ी के चार कोने थे। {6:34} इस दरवाज़े के दो किवाड़ जूनीपर की लकड़ी के बने हुए थे। दोनों किवाड़ दीवार तक घूम सकते थे। {6:35} इन किवाड़ों पर भी करूबी फ़रिश्ते, खजूर के दरख़्त और फूल कन्दा किए गए थे। फिर उन पर सोना यूँ मंढा गया कि वह अच्छी तरह इन बेल-बूटों के साथ लग गया। {6:36} इमारत के सामने एक अन्दरूनी सहन बनाया गया जिस की चारदीवारी यूँ तामीर हुई कि पत्थर के हर तीन रद्दों के बाद देवदार के शहतीरों का एक रद्दा लगाया गया। {6:37} रब के घर की बुन्याद सुलेमान की हुकूमत के चौथे साल के दूसरे महीने ज़ीब में डाली गई, {6:38} और उस की हुकूमत के ग्यारवें साल के आठवें महीने बूल में इमारत मुकम्मल हुई। सब कुछ नक़्शे के ऐन मुताबिक़ बना। इस काम पर कुल सात साल सर्फ़ हुए। {i7:1} सुलेमान का महल {7:1} जो महल सुलेमान ने बनवाया वह 13 साल के बाद मुकम्मल हुआ। {7:2} उस की एक इमारत का नाम ‘लुबनान का जंगल’ था। इमारत की लम्बाई 150 फ़ुट, चौड़ाई 75 फ़ुट और ऊँचाई 45 फ़ुट थी। निचली मन्ज़िल एक बड़ा हाल था जिस के देवदार की लकड़ी के 45 सतून थे। पंद्रह पंद्रह सतूनों {7:3} को तीन क़तारों में खड़ा किया गया था। सतूनों पर शहतीर थे जिन पर दूसरी मन्ज़िल के फ़र्श के लिए देवदार के तख़्ते लगाए गए थे। दूसरी मन्ज़िल के मुख़्तलिफ़ कमरे थे, और छत भी देवदार की लकड़ी से बनाई गई थी। {7:4} हाल की दोनों लम्बी दीवारों में तीन तीन खिड़कियाँ थीं, और एक दीवार की खिड़कियाँ दूसरी दीवार की खिड़कियों के बिलकुल मुक़ाबिल थीं। {7:5} इन दीवारों के तीन तीन दरवाज़े भी एक दूसरे के मुक़ाबिल थे। उन की चौखटों की लकड़ी के चार चार कोने थे। {7:6} इस के इलावा सुलेमान ने सतूनों का हाल बनवाया जिस की लम्बाई 75 फ़ुट और चौड़ाई 45 फ़ुट थी। हाल के सामने सतूनों का बरामदा था। {7:7} उस ने दीवान भी तामीर किया जो दीवान-ए-अदल कहलाता था। उस में उस का तख़्त था, और वहाँ वह लोगों की अदालत करता था। दीवान की चारों दीवारों पर फ़र्श से ले कर छत तक देवदार के तख़्ते लगे हुए थे। {7:8} दीवान के पीछे सहन था जिस में बादशाह का रिहाइशी महल था। महल का डिज़ाइन दीवान जैसा था। उस की मिस्री बीवी फ़िरऔन की बेटी का महल भी डिज़ाइन में दीवान से मुताबिक़त रखता था। {7:9} यह तमाम इमारतें बुन्यादों से ले कर छत तक और बाहर से ले कर बड़े सहन तक आला क़िस्म के पत्थरों से बनी हुई थीं, ऐसे पत्थरों से जो चारों तरफ़ आरी से नाप के ऐन मुताबिक़ काटे गए थे। {7:10} बुन्यादों के लिए उम्दा क़िस्म के बड़े बड़े पत्थर इस्तेमाल हुए। बाज़ की लम्बाई 12 और बाज़ की 15 फ़ुट थी। {7:11} इन पर आला क़िस्म के पत्थरों की दीवारें खड़ी की गईं। दीवारों में देवदार के शहतीर भी लगाए गए। {7:12} बड़े सहन की चारदीवारी यूँ बनाई गई कि पत्थरों के हर तीन रद्दों के बाद देवदार के शहतीरों का एक रद्दा लगाया गया था। जो अन्दरूनी सहन रब के घर के इर्दगिर्द था उस की चारदीवारी भी इसी तरह ही बनाई गई, और इसी तरह रब के घर के बरामदे की दीवारें भी। {i7:13} रब के घर के सामने के दो ख़ास सतून {7:13} फिर सुलेमान बादशाह ने सूर के एक आदमी को बुलाया जिस का नाम हीराम था। {7:14} उस की माँ इस्राईली क़बीले नफ़्ताली की बेवा थी जबकि उस का बाप सूर का रहने वाला और पीतल का कारीगर था। हीराम बड़ी हिक्मत, समझदारी और महारत से पीतल की हर चीज़ बना सकता था। इस क़िस्म का काम करने के लिए वह सुलेमान बादशाह के पास आया। {7:15} पहले उस ने पीतल के दो सतून ढाल दिए। हर सतून की ऊँचाई 27 फ़ुट और घेरा 18 फ़ुट था। {7:16} फिर उस ने हर सतून के लिए पीतल का बालाई हिस्सा ढाल दिया जिस की ऊँचाई साढ़े 7 फ़ुट थी। {7:17} हर बालाई हिस्से को एक दूसरे के साथ ख़ूबसूरती से मिलाई गई सात ज़न्जीरों से आरास्ता किया गया। {7:18} इन ज़न्जीरों के ऊपर हीराम ने हर बालाई हिस्से को पीतल के 200 अनारों से {7:19} सजाया जो दो क़तारों में लगाए गए। फिर बालाई हिस्से सतूनों पर लगाए गए। बालाई {7:20} हिस्सों की सोसन के फूल की सी शक्ल थी, और यह फूल 6 फ़ुट ऊँचे थे। {7:21} हीराम ने दोनों सतून रब के घर के बरामदे के सामने खड़े किए। दहने हाथ के सतून का नाम उस ने ‘यकीन’ और बाएँ हाथ के सतून का नाम ‘बोअज़’ रखा। {7:22} बालाई हिस्से सोसन-नुमा थे। चुनाँचे काम मुकम्मल हुआ। {i7:23} पीतल का हौज़ {7:23} इस के बाद हीराम ने पीतल का बड़ा गोल हौज़ ढाल दिया जिस का नाम ‘समुन्दर’ रखा गया। उस की ऊँचाई साढ़े 7 फ़ुट, उस का मुँह 15 फ़ुट चौड़ा और उस का घेरा तक़रीबन 45 फ़ुट था। {7:24} हौज़ के किनारे के नीचे तूँबों की दो क़तारें थीं। फ़ी फ़ुट तक़रीबन 6 तूँबे थे। तूँबे और हौज़ मिल कर ढाले गए थे। {7:25} हौज़ को बैलों के 12 मुजस्समों पर रखा गया। तीन बैलों का रुख़ शिमाल की तरफ़, तीन का रुख़ मग़रिब की तरफ़, तीन का रुख़ जुनूब की तरफ़ और तीन का रुख़ मशरिक़ की तरफ़ था। उन के पिछले हिस्से हौज़ की तरफ़ थे, और हौज़ उन के कंधों पर पड़ा था। {7:26} हौज़ का किनारा प्याले बल्कि सोसन के फूल की तरह बाहर की तरफ़ मुड़ा हुआ था। उस की दीवार तक़रीबन तीन इंच मोटी थी, और हौज़ में पानी के तक़रीबन 44,000 लिटर समा जाते थे। {i7:27} पानी के बासन उठाने की हथगाड़ियाँ {7:27} फिर हीराम ने पानी के बासन उठाने के लिए पीतल की हथगाड़ियाँ बनाईं। हर गाड़ी की लम्बाई 6 फ़ुट, चौड़ाई 6 फ़ुट और ऊँचाई साढ़े 4 फ़ुट थी। {7:28} हर गाड़ी का ऊपर का हिस्सा सरियों से मज़बूत किया गया फ़्रेम था। {7:29} फ़्रेम के बैरूनी पहलू शेरबबरों, बैलों और करूबी फ़रिश्तों से सजे हुए थे। शेरों और बैलों के ऊपर और नीचे पीतल के सेहरे लगे हुए थे। {7:30} हर गाड़ी के चार पहिए और दो धुरे थे। यह भी पीतल के थे। चारों कोनों पर पीतल के ऐसे टुकड़े लगे थे जिन पर बासन रखे जाते थे। यह टुकड़े भी सेहरों से सजे हुए थे। {7:31} फ़्रेम के अन्दर जिस जगह बासन को रखा जाता था वह गोल थी। उस की ऊँचाई डेढ़ फ़ुट थी, और उस का मुँह सवा दो फ़ुट चौड़ा था। उस के बैरूनी पहलू पर चीज़ें कन्दा की गई थीं। गाड़ी का फ़्रेम गोल नहीं बल्कि चौरस था। {7:32} गाड़ी के फ़्रेम के नीचे मज़कूरा चार पहिए थे जो धुरों से जुड़े थे। धुरे फ़्रेम के साथ ही ढल गए थे। हर पहिया सवा दो फ़ुट चौड़ा था। {7:33} पहिए रथों के पहियों की मानिन्द थे। उन के धुरे, किनारे, तार और नाभें सब के सब पीतल से ढाले गए थे। {7:34} गाड़ियों के चार कोनों पर दस्ते लगे थे जो फ़्रेम के साथ मिल कर ढाले गए थे। {7:35} हर गाड़ी के ऊपर का किनारा नौ इंच ऊँचा था। कोनों पर लगे दस्ते और फ़्रेम के पहलू हर {7:36} जगह करूबी फ़रिश्तों, शेरबबरों और खजूर के दरख़्तों से सजे हुए थे। चारों तरफ़ सेहरे भी कन्दा किए गए। {7:37} हीराम ने दसों गाड़ियों को एक ही साँचे में ढाला, इस लिए सब एक जैसी थीं। {7:38} हीराम ने हर गाड़ी के लिए पीतल का बासन ढाल दिया। हर बासन 6 फ़ुट चौड़ा था, और उस में 880 लिटर पानी समा जाता था। {7:39} उस ने पाँच गाड़ियाँ रब के घर के दाएँ हाथ और पाँच उस के बाएँ हाथ खड़ी कीं। हौज़ बनाम समुन्दर को उस ने रब के घर के जुनूब-मशरिक़ में रख दिया। {i7:40} उस सामान की फ़हरिस्त जो हीराम ने बनाया {7:40} हीराम ने बासन, बेलचे और छिड़काओ के कटोरे भी बनाए। यूँ उस ने रब के घर में वह सारा काम मुकम्मल किया जिस के लिए सुलेमान बादशाह ने उसे बुलाया था। उस ने ज़ैल की चीज़ें बनाईं: {7:41} दो सतून, सतूनों पर लगे प्यालानुमा बालाई हिस्से, बालाई हिस्सों पर लगी ज़न्जीरों का डिज़ाइन, {7:42} ज़न्जीरों के ऊपर लगे अनार (फ़ी बालाई हिस्सा 200 अदद), {7:43} 10 हथगाड़ियाँ, इन पर के पानी के 10 बासन, {7:44} हौज़ बनाम समुन्दर, इसे उठाने वाले बैल के 12 मुजस्समे, {7:45} बालटियाँ, बेलचे और छिड़काओ के कटोरे। यह तमाम सामान जो हीराम ने सुलेमान के हुक्म पर रब के घर के लिए बनाया पीतल से ढाल कर पालिश किया गया था। {7:46} बादशाह ने उसे वादी-ए-यर्दन में सुक्कात और ज़र्तान के दरमियान ढलवाया। वहाँ एक फ़ौंडरी थी जहाँ हीराम ने गारे के साँचे बना कर हर चीज़ ढाल दी। {7:47} इस सामान के लिए सुलेमान बादशाह ने इतना ज़्यादा पीतल इस्तेमाल किया कि उस का कुल वज़न मालूम न हो सका। {i7:48} रब के घर के अन्दर सोने का सामान {7:48} रब के घर के अन्दर के लिए सुलेमान ने दर्ज-ए-ज़ैल सामान बनवाया: सोने की क़ुर्बानगाह, सोने की वह मेज़ जिस पर रब के लिए मख़्सूस रोटियाँ पड़ी रहती थीं, {7:49} ख़ालिस सोने के 10 शमादान जो मुक़द्दसतरीन कमरे के सामने रखे गए, पाँच दरवाज़े के दहने हाथ और पाँच उस के बाएँ हाथ, सोने के वह फूल जिन से शमादान आरास्ता थे, सोने के चराग़ और बत्ती को बुझाने के औज़ार, {7:50} ख़ालिस सोने के बासन, चराग़ को कतरने के औज़ार, छिड़काओ के कटोरे और प्याले, जलते हुए कोएले के लिए ख़ालिस सोने के बर्तन, मुक़द्दसतरीन कमरे और बड़े हाल के दरवाज़ों के क़ब्ज़े। {7:51} रब के घर की तक्मील पर सुलेमान बादशाह ने वह सोना-चाँदी और बाक़ी तमाम क़ीमती चीज़ें रब के घर के ख़ज़ानों में रखवा दीं जो उस के बाप दाऊद ने रब के लिए मख़्सूस की थीं। {i8:1} अह्द का सन्दूक़ रब के घर में लाया जाता है {8:1} फिर सुलेमान ने इस्राईल के तमाम बुज़ुर्गों और क़बीलों और कुंबों के तमाम सरपरस्तों को अपने पास यरूशलम में बुलाया, क्यूँकि रब के अह्द का सन्दूक़ अब तक यरूशलम के उस हिस्से में था जो ‘दाऊद का शहर’ या सिय्यून कहलाता है। सुलेमान चाहता था कि क़ौम के नुमाइन्दे हाज़िर हों जब सन्दूक़ को वहाँ से रब के घर में पहुँचाया जाए। {8:2} चुनाँचे इस्राईल के तमाम मर्द साल के सातवें महीने इतानीम में सुलेमान बादशाह के पास यरूशलम में जमा हुए। इसी महीने में झोंपड़ियों की ईद मनाई जाती थी। {8:3} जब सब जमा हुए तो इमाम रब के सन्दूक़ को उठा कर {8:4} रब के घर में लाए। लावियों के साथ मिल कर उन्हों ने मुलाक़ात के ख़ैमे को भी उस के तमाम मुक़द्दस सामान समेत रब के घर में पहुँचाया। {8:5} वहाँ सन्दूक़ के सामने सुलेमान बादशाह और बाक़ी तमाम जमा हुए इस्राईलियों ने इतनी भेड़-बकरियाँ और गाय-बैल क़ुर्बान किए कि उन की तादाद गिनी नहीं जा सकती थी। {8:6} इमामों ने रब के अह्द का सन्दूक़ पिछले यानी मुक़द्दसतरीन कमरे में ला कर करूबी फ़रिश्तों के परों के नीचे रख दिया। {8:7} फ़रिश्तों के पर पूरे सन्दूक़ पर उस की उठाने की लकड़ियों समेत फैले रहे। {8:8} तो भी उठाने की यह लकड़ियाँ इतनी लम्बी थीं कि उन के सिरे सामने वाले यानी मुक़द्दस कमरे से नज़र आते थे। लेकिन वह बाहर से देखे नहीं जा सकते थे। आज तक वह वहीं मौजूद हैं। {8:9} सन्दूक़ में सिर्फ़ पत्थर की वह दो तख़्तियाँ थीं जिन को मूसा ने होरिब यानी कोह-ए-सीना के दामन में उस में रख दिया था, उस वक़्त जब रब ने मिस्र से निकले हुए इस्राईलियों के साथ अह्द बांधा था। {8:10} जब इमाम मुक़द्दस कमरे से निकल कर सहन में आए तो रब का घर एक बादल से भर गया। इमाम {8:11} अपनी ख़िदमत अन्जाम न दे सके, क्यूँकि रब का घर उस के जलाल के बादल से मामूर हो गया था। {8:12} यह देख कर सुलेमान ने दुआ की, “रब ने फ़रमाया है कि मैं घने बादल के अंधेरे में रहूँगा। {8:13} यक़ीनन मैं ने तेरे लिए अज़ीम सुकूनतगाह बनाई है, एक मक़ाम जो तेरी अबदी सुकूनत के लाइक़ है।” {i8:14} रब के घर की मख़्सूसियत पर सुलेमान की तक़रीर {8:14} फिर बादशाह ने मुड़ कर रब के घर के सामने खड़ी इस्राईल की पूरी जमाअत की तरफ़ रुख़ किया। उस ने उन्हें बरकत दे कर कहा, {8:15} “रब इस्राईल के ख़ुदा की तारीफ़ हो जिस ने वह वादा पूरा किया है जो उस ने मेरे बाप दाऊद से किया था। क्यूँकि उस ने फ़रमाया, {8:16} ‘जिस दिन मैं अपनी क़ौम इस्राईल को मिस्र से निकाल लाया उस दिन से ले कर आज तक मैं ने कभी न फ़रमाया कि इस्राईली क़बीलों के किसी शहर में मेरे नाम की ताज़ीम में घर बनाया जाए। लेकिन मैं ने दाऊद को अपनी क़ौम इस्राईल का बादशाह बनाया है।’ {8:17} मेरे बाप दाऊद की बड़ी ख़्वाहिश थी कि रब इस्राईल के ख़ुदा के नाम की ताज़ीम में घर बनाए। {8:18} लेकिन रब ने एतिराज़ किया, ‘मैं ख़ुश हूँ कि तू मेरे नाम की ताज़ीम में घर तामीर करना चाहता है, {8:19} लेकिन तू नहीं बल्कि तेरा बेटा ही उसे बनाएगा।’ {8:20} और वाक़ई, रब ने अपना वादा पूरा किया है। मैं रब के वादे के ऐन मुताबिक़ अपने बाप दाऊद की जगह इस्राईल का बादशाह बन कर तख़्त पर बैठ गया हूँ। और अब मैं ने रब इस्राईल के ख़ुदा के नाम की ताज़ीम में घर भी बनाया है। {8:21} उस में मैं ने उस सन्दूक़ के लिए मक़ाम तय्यार कर रखा है जिस में शरीअत की तख़्तियाँ पड़ी हैं, उस अह्द की तख़्तियाँ जो रब ने हमारे बापदादा से मिस्र से निकालते वक़्त बांधा था।” {i8:22} रब के घर की मख़्सूसियत पर सुलेमान की दुआ {8:22} फिर सुलेमान इस्राईल की पूरी जमाअत के देखते देखते रब की क़ुर्बानगाह के सामने खड़ा हुआ। उस ने अपने हाथ आसमान की तरफ़ उठा कर {8:23} दुआ की, “ऐ रब इस्राईल के ख़ुदा, तुझ जैसा कोई ख़ुदा नहीं है, न आसमान और न ज़मीन पर। तू अपना वह अह्द क़ाइम रखता है जिसे तू ने अपनी क़ौम के साथ बांधा है और अपनी मेहरबानी उन सब पर ज़ाहिर करता है जो पूरे दिल से तेरी राह पर चलते हैं। {8:24} तू ने अपने ख़ादिम दाऊद से किया हुआ वादा पूरा किया है। जो बात तू ने अपने मुँह से मेरे बाप से की वह तू ने अपने हाथ से आज ही पूरी की है। {8:25} ऐ रब इस्राईल के ख़ुदा, अब अपनी दूसरी बात भी पूरी कर जो तू ने अपने ख़ादिम दाऊद से की थी। क्यूँकि तू ने मेरे बाप से वादा किया था, ‘अगर तेरी औलाद तेरी तरह अपने चाल-चलन पर ध्यान दे कर मेरे हुज़ूर चलती रहे तो इस्राईल पर उस की हुकूमत हमेशा तक क़ाइम रहेगी।’ {8:26} ऐ इस्राईल के ख़ुदा, अब बराह-ए-करम अपना यह वादा पूरा कर जो तू ने अपने ख़ादिम मेरे बाप दाऊद से किया है। {8:27} लेकिन क्या अल्लाह वाक़ई ज़मीन पर सुकूनत करेगा? नहीं, तू तो बुलन्दतरीन आसमान में भी समा नहीं सकता! तो फिर यह मकान जो मैं ने बनाया है किस तरह तेरी सुकूनतगाह बन सकता है? {8:28} ऐ रब मेरे ख़ुदा, तो भी अपने ख़ादिम की दुआ और इल्तिजा सुन जब मैं आज तेरे हुज़ूर पुकारते हुए इल्तिमास करता हूँ {8:29} कि बराह-ए-करम दिन रात इस इमारत की निगरानी कर! क्यूँकि यह वह जगह है जिस के बारे में तू ने ख़ुद फ़रमाया, ‘यहाँ मेरा नाम सुकूनत करेगा।’ चुनाँचे अपने ख़ादिम की गुज़ारिश सुन जो मैं इस मक़ाम की तरफ़ रुख़ किए हुए करता हूँ। {8:30} जब हम इस मक़ाम की तरफ़ रुख़ करके दुआ करें तो अपने ख़ादिम और अपनी क़ौम की इल्तिजा सुन। आसमान पर अपने तख़्त से हमारी सुन। और जब सुनेगा तो हमारे गुनाहों को मुआफ़ कर! {8:31} अगर किसी पर इल्ज़ाम लगाया जाए और उसे यहाँ तेरी क़ुर्बानगाह के सामने लाया जाए ताकि हलफ़ उठा कर वादा करे कि मैं बेक़ुसूर हूँ {8:32} तो बराह-ए-करम आसमान पर से सुन कर अपने ख़ादिमों का इन्साफ़ कर। क़ुसूरवार को मुजरिम ठहरा कर उस के अपने सर पर वह कुछ आने दे जो उस से सरज़द हुआ है, और बेक़ुसूर को बेइल्ज़ाम क़रार दे कर उस की रास्तबाज़ी का बदला दे। {8:33} हो सकता है किसी वक़्त तेरी क़ौम इस्राईल तेरा गुनाह करे और नतीजे में दुश्मन के सामने शिकस्त खाए। अगर इस्राईली आख़िरकार तेरे पास लौट आएँ और तेरे नाम की तम्जीद करके यहाँ इस घर में तुझ से दुआ और इल्तिमास करें {8:34} तो आसमान पर से उन की फ़र्याद सुन लेना। अपनी क़ौम इस्राईल का गुनाह मुआफ़ करके उन्हें दुबारा उस मुल्क में वापस लाना जो तू ने उन के बापदादा को दे दिया था। {8:35} हो सकता है इस्राईली तेरा इतना संगीन गुनाह करें कि काल पड़े और बड़ी देर तक बारिश न बरसे। अगर वह आख़िरकार इस घर की तरफ़ रुख़ करके तेरे नाम की तम्जीद करें और तेरी सज़ा के बाइस अपना गुनाह छोड़ कर लौट आएँ {8:36} तो आसमान पर से उन की फ़र्याद सुन लेना। अपने ख़ादिमों और अपनी क़ौम इस्राईल को मुआफ़ कर, क्यूँकि तू ही उन्हें अच्छी राह की तालीम देता है। तब उस मुल्क पर दुबारा बारिश बरसा दे जो तू ने अपनी क़ौम को मीरास में दे दिया है। {8:37} हो सकता है इस्राईल में काल पड़ जाए, अनाज की फ़सल किसी बीमारी, फफूँदी, टिड्डियों या कीड़ों से मुतअस्सिर हो जाए, या दुश्मन किसी शहर का मुहासरा करे। जो भी मुसीबत या बीमारी हो, {8:38} अगर कोई इस्राईली या तेरी पूरी क़ौम उस का सबब जान कर अपने हाथों को इस घर की तरफ़ बढ़ाए और तुझ से इल्तिमास करे {8:39} तो आसमान पर अपने तख़्त से उन की फ़र्याद सुन लेना। उन्हें मुआफ़ करके वह कुछ कर जो ज़रूरी है। हर एक को उस की तमाम हरकतों का बदला दे, क्यूँकि सिर्फ़ तू ही हर इन्सान के दिल को जानता है। {8:40} फिर जितनी देर वह उस मुल्क में ज़िन्दगी गुज़ारेंगे जो तू ने हमारे बापदादा को दिया था उतनी देर वह तेरा ख़ौफ़ मानेंगे। {8:41} आइन्दा परदेसी भी तेरे नाम के सबब से दूरदराज़ ममालिक से आएँगे। अगरचे वह तेरी क़ौम इस्राईल के नहीं होंगे {8:42} तो भी वह तेरे अज़ीम नाम, तेरी बड़ी क़ुदरत और तेरे ज़बरदस्त कामों के बारे में सुन कर आएँगे और इस घर की तरफ़ रुख़ करके दुआ करेंगे। {8:43} तब आसमान पर से उन की फ़र्याद सुन लेना। जो भी दरख़्वास्त वह पेश करें वह पूरी करना ताकि दुनिया की तमाम अक़्वाम तेरा नाम जान कर तेरी क़ौम इस्राईल की तरह ही तेरा ख़ौफ़ मानें और जान लें कि जो इमारत मैं ने तामीर की है उस पर तेरे ही नाम का ठप्पा लगा है। {8:44} हो सकता है तेरी क़ौम के मर्द तेरी हिदायत के मुताबिक़ अपने दुश्मन से लड़ने के लिए निकलें। अगर वह तेरे चुने हुए शहर और उस इमारत की तरफ़ रुख़ करके दुआ करें जो मैं ने तेरे नाम के लिए तामीर की है {8:45} तो आसमान पर से उन की दुआ और इल्तिमास सुन कर उन के हक़ में इन्साफ़ क़ाइम रखना। {8:46} हो सकता है वह तेरा गुनाह करें, ऐसी हरकतें तो हम सब से सरज़द होती रहती हैं, और नतीजे में तू नाराज़ हो कर उन्हें दुश्मन के हवाले कर दे जो उन्हें क़ैद करके अपने किसी दूरदराज़ या क़रीबी मुल्क में ले जाए। {8:47} शायद वह जिलावतनी में तौबा करके दुबारा तेरी तरफ़ रुजू करें और तुझ से इल्तिमास करें, ‘हम ने गुनाह किया है, हम से ग़लती हुई है, हम ने बेदीन हरकतें की हैं।’ {8:48} अगर वह ऐसा करके दुश्मन के मुल्क में अपने पूरे दिल-ओ-जान से दुबारा तेरी तरफ़ रुजू करें और तेरी तरफ़ से बापदादा को दिए गए मुल्क, तेरे चुने हुए शहर और उस इमारत की तरफ़ रुख़ करके दुआ करें जो मैं ने तेरे नाम के लिए तामीर की है {8:49} तो आसमान पर अपने तख़्त से उन की दुआ और इल्तिमास सुन लेना। उन के हक़ में इन्साफ़ क़ाइम करना, {8:50} और अपनी क़ौम के गुनाहों को मुआफ़ कर देना। जिस भी जुर्म से उन्हों ने तेरा गुनाह किया है वह मुआफ़ कर देना। बख़्श दे कि उन्हें गिरिफ़्तार करने वाले उन पर रहम करें। {8:51} क्यूँकि यह तेरी ही क़ौम के अफ़राद हैं, तेरी ही मीरास जिसे तू मिस्र के भड़कते भट्टे से निकाल लाया। {8:52} ऐ अल्लाह, तेरी आँखें मेरी इल्तिजाओं और तेरी क़ौम इस्राईल की फ़र्यादों के लिए खुली रहें। जब भी वह मदद के लिए तुझे पुकारें तो उन की सुन लेना! {8:53} क्यूँकि तू, ऐ रब क़ादिर-ए-मुतलक़ ने इस्राईल को दुनिया की तमाम क़ौमों से अलग करके अपनी ख़ास मिलकियत बना लिया है। हमारे बापदादा को मिस्र से निकालते वक़्त तू ने मूसा की मारिफ़त इस हक़ीक़त का एलान किया।” {i8:54} आख़िरी दुआ और बरकत {8:54} इस दुआ के बाद सुलेमान खड़ा हुआ, क्यूँकि दुआ के दौरान उस ने रब की क़ुर्बानगाह के सामने अपने घुटने टेके और अपने हाथ आसमान की तरफ़ उठाए हुए थे। {8:55} अब वह इस्राईल की पूरी जमाअत के सामने खड़ा हुआ और बुलन्द आवाज़ से उसे बरकत दी, {8:56} “रब की तम्जीद हो जिस ने अपने वादे के ऐन मुताबिक़ अपनी क़ौम इस्राईल को आराम-ओ-सुकून फ़राहम किया है। जितने भी ख़ूबसूरत वादे उस ने अपने ख़ादिम मूसा की मारिफ़त किए हैं वह सब के सब पूरे हो गए हैं। {8:57} जिस तरह रब हमारा ख़ुदा हमारे बापदादा के साथ था उसी तरह वह हमारे साथ भी रहे। न वह हमें छोड़े, न तर्क करे {8:58} बल्कि हमारे दिलों को अपनी तरफ़ माइल करे ताकि हम उस की तमाम राहों पर चलें और उन तमाम अह्काम और हिदायात के ताबे रहें जो उस ने हमारे बापदादा को दी हैं। {8:59} रब के हुज़ूर मेरी यह फ़र्याद दिन रात रब हमारे ख़ुदा के क़रीब रहे ताकि वह मेरा और अपनी क़ौम का इन्साफ़ क़ाइम रखे और हमारी रोज़ाना ज़रूरियात पूरी करे। {8:60} तब तमाम अक़्वाम जान लेंगी कि रब ही ख़ुदा है और कि उस के सिवा कोई और माबूद नहीं है। {8:61} लेकिन लाज़िम है कि आप रब हमारे ख़ुदा के पूरे दिल से वफ़ादार रहें। हमेशा उस की हिदायात और अह्काम के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारें, बिलकुल उसी तरह जिस तरह आप आज कर रहे हैं।” {i8:62} रब के घर की मख़्सूसियत पर जश्न {8:62} फिर बादशाह और तमाम इस्राईल ने रब के हुज़ूर क़ुर्बानियाँ पेश करके रब के घर को मख़्सूस किया। इस {8:63} सिलसिले में सुलेमान ने 22,000 गाय-बैलों और 1,20,000 भेड़-बकरियों को सलामती की क़ुर्बानियों के तौर पर ज़बह किया। {8:64} उसी दिन बादशाह ने सहन का दरमियानी हिस्सा क़ुर्बानियाँ चढ़ाने के लिए मख़्सूस किया। वजह यह थी कि पीतल की क़ुर्बानगाह इतनी क़ुर्बानियाँ पेश करने के लिए छोटी थी, क्यूँकि भस्म होने वाली क़ुर्बानियों और ग़ल्ला की नज़रों की तादाद बहुत ज़्यादा थी। इस के इलावा सलामती की बेशुमार क़ुर्बानियों की चर्बी को भी जलाना था। {8:65} ईद 14 दिन तक मनाई गई। पहले हफ़्ते में सुलेमान और तमाम इस्राईल ने रब के घर की मख़्सूसियत मनाई और दूसरे हफ़्ते में झोंपड़ियों की ईद। बहुत ज़्यादा लोग शरीक हुए। वह दूरदराज़ इलाक़ों से यरूशलम आए थे, शिमाल में लबो-हमात से ले कर जुनूब में उस वादी तक जो मिस्र की सरहद थी। {8:66} दो हफ़्तों के बाद सुलेमान ने इस्राईलियों को रुख़्सत किया। बादशाह को बरकत दे कर वह अपने अपने घर चले गए। सब शादमान और दिल से ख़ुश थे कि रब ने अपने ख़ादिम दाऊद और अपनी क़ौम इस्राईल पर इतनी मेहरबानी की है। {i9:1} रब सुलेमान से हमकलाम होता है {9:1} चुनाँचे सुलेमान ने रब के घर और शाही महल को तक्मील तक पहुँचाया। जो कुछ भी उस ने ठान लिया था वह पूरा हुआ। {9:2} उस वक़्त रब दुबारा उस पर ज़ाहिर हुआ, उस तरह जिस तरह वह जिबऊन में उस पर ज़ाहिर हुआ था। {9:3} उस ने सुलेमान से कहा, “जो दुआ और इल्तिजा तू ने मेरे हुज़ूर की उसे मैं ने सुन कर इस इमारत को जो तू ने बनाई है अपने लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस कर लिया है। उस में मैं अपना नाम अबद तक क़ाइम रखूँगा। मेरी आँखें और दिल अबद तक वहाँ हाज़िर रहेंगे। {9:4} जहाँ तक तेरा ताल्लुक़ है, अपने बाप दाऊद की तरह दयानतदारी और रास्ती से मेरे हुज़ूर चलता रह। क्यूँकि अगर तू मेरे तमाम अह्काम और हिदायात की पैरवी करता रहे {9:5} तो मैं तेरी इस्राईल पर हुकूमत हमेशा तक क़ाइम रखूँगा। फिर मेरा वह वादा क़ाइम रहेगा जो मैं ने तेरे बाप दाऊद से किया था कि इस्राईल पर तेरी औलाद की हुकूमत हमेशा तक क़ाइम रहेगी। {9:6} लेकिन ख़बरदार! अगर तू या तेरी औलाद मुझ से दूर हो कर मेरे दिए गए अह्काम और हिदायात के ताबे न रहे बल्कि दीगर माबूदों की तरफ़ रुजू करके उन की ख़िदमत और परस्तिश करे {9:7} तो मैं इस्राईल को उस मुल्क में से मिटा दूँगा जो मैं ने उन को दे दिया था। न सिर्फ़ यह बल्कि मैं इस घर को भी रद्द कर दूँगा जो मैं ने अपने नाम के लिए मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस कर लिया है। उस वक़्त इस्राईल तमाम अक़्वाम में मज़ाक़ और लान-तान का निशाना बन जाएगा। {9:8} इस शानदार घर की बुरी हालत देख कर यहाँ से गुज़रने वाले तमाम लोगों के रोंगटे खड़े हो जाएंगे, और वह अपनी हिक़ारत का इज़हार करके पूछेंगे, ‘रब ने इस मुल्क और इस घर से ऐसा सुलूक क्यूँ किया?’ {9:9} तब लोग जवाब देंगे, ‘इस लिए कि गो रब उन का ख़ुदा उन के बापदादा को मिस्र से निकाल कर यहाँ लाया तो भी यह लोग उसे तर्क करके दीगर माबूदों से चिमट गए हैं। चूँकि वह उन की परस्तिश और ख़िदमत करने से बाज़ न आए इस लिए रब ने उन्हें इस सारी मुसीबत में डाल दिया है’।” {i9:10} हीराम की मदद का सिला {9:10} रब के घर और शाही महल को तामीर करने में 20 साल सर्फ़ हुए थे। {9:11} उस दौरान सूर का बादशाह हीराम सुलेमान को देवदार और जूनीपर की उतनी लकड़ी और उतना सोना भेजता रहा जितना सुलेमान चाहता था। जब इमारतें तक्मील तक पहुँच गईं तो सुलेमान ने हीराम को मुआवज़े में गलील के 20 शहर दे दिए। {9:12} लेकिन जब हीराम उन का मुआइना करने के लिए सूर से गलील आया तो वह उसे पसन्द न आए। {9:13} उस ने सवाल किया, “मेरे भाई, यह कैसे शहर हैं जो आप ने मुझे दिए हैं?” और उस ने उस इलाक़े का नाम काबूल यानी ‘कुछ भी नहीं’ रखा। यह नाम आज तक राइज है। {9:14} बात यह थी कि हीराम ने इस्राईल के बादशाह को तक़रीबन 4,000 किलोग्राम सोना भेजा था। {i9:15} सुलेमान की मुख़्तलिफ़ मुहिम्मात {9:15} सुलेमान ने अपने तामीरी काम के लिए बेगारी लगाए। ऐसे ही लोगों की मदद से उस ने न सिर्फ़ रब का घर, अपना महल, इर्दगिर्द के चबूतरे और यरूशलम की फ़सील बनवाई बल्कि तीनों शहर हसूर, मजिद्दो और जज़र को भी। {9:16} जज़र शहर पर मिस्र के बादशाह फ़िरऔन ने हम्ला करके क़ब्ज़ा कर लिया था। उस के कनआनी बाशिन्दों को क़त्ल करके उस ने पूरे शहर को जला दिया था। जब सुलेमान की फ़िरऔन की बेटी से शादी हुई तो मिस्री बादशाह ने जहेज़ के तौर पर उसे यह इलाक़ा दे दिया। {9:17} अब सुलेमान ने जज़र का शहर दुबारा तामीर किया। इस के इलावा उस ने नशेबी बैत-हौरून, {9:18} बालात और रेगिस्तान के शहर तदमूर में बहुत सा तामीरी काम कराया। {9:19} सुलेमान ने अपने गोदामों के लिए और अपने रथों और घोड़ों को रखने के लिए भी शहर बनवाए। जो कुछ भी वह यरूशलम, लुबनान या अपनी सल्तनत की किसी और जगह बनवाना चाहता था वह उस ने बनवाया। {9:20} जिन आदमियों की सुलेमान ने बेगार पर भर्ती की वह इस्राईली नहीं थे बल्कि अमोरी, हित्ती, फ़रिज़्ज़ी, हिव्वी और यबूसी यानी कनआन के पहले बाशिन्दों की वह औलाद थे जो बाक़ी रह {9:21} गए थे। मुल्क पर क़ब्ज़ा करते वक़्त इस्राईली इन क़ौमों को पूरे तौर पर मिटा न सके, और आज तक इन की औलाद को इस्राईल के लिए बेगार में काम करना पड़ता है। {9:22} लेकिन सुलेमान ने इस्राईलियों में से किसी को भी ऐसे काम करने पर मज्बूर न किया बल्कि वह उस के फ़ौजी, सरकारी अफ़्सर, फ़ौज के अफ़्सर और रथों के फ़ौजी बन गए, और उन्हें उस के रथों और घोड़ों पर मुक़र्रर किया गया। {9:23} सुलेमान के तामीरी काम पर भी 550 इस्राईली मुक़र्रर थे जो ज़िलओं पर मुक़र्रर अफ़्सरों के ताबे थे। यह लोग तामीरी काम करने वालों की निगरानी करते थे। {9:24} जब फ़िरऔन की बेटी यरूशलम के पुराने हिस्से बनाम ‘दाऊद का शहर’ से उस महल में मुन्तक़िल हुई जो सुलेमान ने उस के लिए तामीर किया था तो वह इर्दगिर्द के चबूतरे बनवाने लगा। {9:25} सुलेमान साल में तीन बार रब को भस्म होने वाली और सलामती की क़ुर्बानियाँ पेश करता था। वह उन्हें रब के घर की उस क़ुर्बानगाह पर चढ़ाता था जो उस ने रब के लिए बनवाई थी। साथ साथ वह बख़ूर भी जलाता था। यूँ उस ने रब के घर को तक्मील तक पहुँचाया। {9:26} इस के इलावा सुलेमान बादशाह ने बहरी जहाज़ों का बेड़ा भी बनवाया। इस काम का मर्कज़ ऐलात के क़रीब शहर अस्यून-जाबर था। यह बन्दरगाह मुल्क-ए-अदोम में बहर-ए-क़ुल्ज़ुम के साहिल पर है। {9:27} हीराम बादशाह ने उसे तजरिबाकार मल्लाह भेजे ताकि वह सुलेमान के आदमियों के साथ मिल कर जहाज़ों को चलाएँ। {9:28} उन्हों ने ओफ़ीर तक सफ़र किया और वहाँ से तक़रीबन 14,000 किलोग्राम सोना सुलेमान के पास ले आए। {i10:1} सबा की मलिका सुलेमान से मिलती है {10:1} सुलेमान की शोहरत सबा की मलिका तक पहुँच गई। जब उस ने उस के बारे में सुना और यह भी कि उस ने रब के नाम के लिए क्या कुछ किया है तो वह सुलेमान से मिलने के लिए रवाना हुई ताकि उसे मुश्किल पहेलियाँ पेश करके उस की दानिशमन्दी जाँच ले। {10:2} वह निहायत बड़े क़ाफ़िले के साथ यरूशलम पहुँची जिस के ऊँट बल्सान, कस्रत के सोने और क़ीमती जवाहिर से लदे हुए थे। मलिका की सुलेमान से मुलाक़ात हुई तो उस ने उस से वह तमाम मुश्किल सवालात पूछे जो उस के ज़हन में थे। {10:3} सुलेमान उस के हर सवाल का जवाब दे सका। कोई भी बात इतनी पेचीदा नहीं थी कि बादशाह उस का मतलब मलिका को बता न सकता। {10:4} सबा की मलिका सुलेमान की वसी हिक्मत और उस के नए महल से बहुत मुतअस्सिर हुई। {10:5} उस ने बादशाह की मेज़ों पर के मुख़्तलिफ़ खाने देखे और यह कि उस के अफ़्सर किस तरतीब से उस पर बिठाए जाते थे। उस ने बैरों की ख़िदमत, उन की शानदार वर्दियों और साक़ियों पर भी ग़ौर किया। जब उस ने इन बातों के इलावा भस्म होने वाली वह क़ुर्बानियाँ भी देखीं जो सुलेमान रब के घर में चढ़ाता था तो मलिका हक्का-बक्का रह गई। {10:6} वह बोल उठी, “वाक़ई, जो कुछ मैं ने अपने मुल्क में आप के शाहकारों और हिक्मत के बारे में सुना था वह दुरुस्त है। {10:7} जब तक मैं ने ख़ुद आ कर यह सब कुछ अपनी आँखों से न देखा मुझे यक़ीन नहीं आता था। बल्कि हक़ीक़त में मुझे आप के बारे में आधा भी नहीं बताया गया था। आप की हिक्मत और दौलत उन रिपोर्टों से कहीं ज़्यादा है जो मुझ तक पहुँची थीं। {10:8} आप के लोग कितने मुबारक हैं! आप के अफ़्सर कितने मुबारक हैं जो मुसलसल आप के सामने खड़े रहते और आप की दानिश भरी बातें सुनते हैं! {10:9} रब आप के ख़ुदा की तम्जीद हो जिस ने आप को पसन्द करके इस्राईल के तख़्त पर बिठाया है। रब इस्राईल से अबदी मुहब्बत रखता है, इसी लिए उस ने आप को बादशाह बना दिया है ताकि इन्साफ़ और रास्तबाज़ी क़ाइम रखें।” {10:10} फिर मलिका ने सुलेमान को तक़रीबन 4,000 किलोग्राम सोना, बहुत ज़्यादा बल्सान और जवाहिर दिए। बाद में कभी भी उतना बल्सान इस्राईल में नहीं लाया गया जितना उस वक़्त सबा की मलिका लाई। {10:11} हीराम के जहाज़ ओफ़ीर से न सिर्फ़ सोना लाए बल्कि उन्हों ने क़ीमती लकड़ी और जवाहिर भी बड़ी मिक़्दार में इस्राईल तक पहुँचाए। {10:12} जितनी क़ीमती लकड़ी उन दिनों में दरआमद हुई उतनी आज तक कभी यहूदाह में नहीं लाई गई। इस लकड़ी से बादशाह ने रब के घर और अपने महल के लिए कटहरे बनवाए। यह मौसीक़ारों के सरोद और सितार बनाने के लिए भी इस्तेमाल हुई। {10:13} सुलेमान बादशाह ने अपनी तरफ़ से सबा की मलिका को बहुत से तोह्फ़े दिए। नीज़, जो कुछ भी मलिका चाहती थी या उस ने माँगा वह उसे दिया गया। फिर वह अपने नौकर-चाकरों और अफ़्सरों के हमराह अपने वतन वापस चली गई। {i10:14} सुलेमान की दौलत और शोहरत {10:14} जो सोना सुलेमान को सालाना मिलता था उस का वज़न तक़रीबन 23,000 किलोग्राम था। {10:15} इस में वह टैक्स शामिल नहीं थे जो उसे सौदागरों, ताजिरों, अरब बादशाहों और ज़िलओं के अफ़्सरों से मिलते थे। {10:16} सुलेमान बादशाह ने 200 बड़ी और 300 छोटी ढालें बनवाईं। उन पर सोना मंढा गया। हर बड़ी ढाल के लिए तक़रीबन 7 किलोग्राम {10:17} सोना इस्तेमाल हुआ और हर छोटी ढाल के लिए तक़रीबन साढ़े 3 किलोग्राम। सुलेमान ने उन्हें ‘लुबनान का जंगल’ नामी महल में मह्फ़ूज़ रखा। {10:18} इन के इलावा बादशाह ने हाथीदाँत से आरास्ता एक बड़ा तख़्त बनवाया जिस पर ख़ालिस सोना चढ़ाया गया। {10:19} तख़्त की पुश्त का ऊपर का हिस्सा गोल था, और उस के हर बाज़ू के साथ शेरबबर का मुजस्समा था। तख़्त कुछ ऊँचा था, और बादशाह छः पाए वाली सीढ़ी {10:20} पर चढ़ कर उस पर बैठता था। दाईं और बाईं तरफ़ हर पाए पर शेरबबर का मुजस्समा था। इस क़िस्म का तख़्त किसी और सल्तनत में नहीं पाया जाता था। {10:21} सुलेमान के तमाम प्याले सोने के थे, बल्कि ‘लुबनान का जंगल’ नामी महल में तमाम बर्तन ख़ालिस सोने के थे। कोई भी चीज़ चाँदी की नहीं थी, क्यूँकि सुलेमान के ज़माने में चाँदी की कोई क़दर नहीं थी। {10:22} बादशाह के अपने बहरी जहाज़ थे जो हीराम के जहाज़ों के साथ मिल कर मुख़्तलिफ़ जगहों पर जाते थे। हर तीन साल के बाद वह सोने-चाँदी, हाथीदाँत, बन्दरों और मोरों से लदे हुए वापस आते थे। {10:23} सुलेमान की दौलत और हिक्मत दुनिया के तमाम बादशाहों से कहीं ज़्यादा थी। {10:24} पूरी दुनिया उस से मिलने की कोशिश करती रही ताकि वह हिक्मत सुन ले जो अल्लाह ने उस के दिल में डाल दी थी। {10:25} साल-ब-साल जो भी सुलेमान के दरबार में आता वह कोई न कोई तोह्फ़ा लाता। यूँ उसे सोने-चाँदी के बर्तन, क़ीमती लिबास, हथियार, बल्सान, घोड़े और ख़च्चर मिलते रहे। {10:26} सुलेमान के 1,400 रथ और 12,000 घोड़े थे। कुछ उस ने रथों के लिए मख़्सूस किए गए शहरों में और कुछ यरूशलम में अपने पास रखे। {10:27} बादशाह की सरगर्मियों के बाइस चाँदी पत्थर जैसी आम हो गई और देवदार की क़ीमती लकड़ी यहूदाह के मग़रिब के नशेबी पहाड़ी इलाक़े की अन्जीर-तूत की सस्ती लकड़ी जैसी आम हो गई। {10:28} बादशाह अपने घोड़े मिस्र और क़ूए यानी किलिकिया से दरआमद करता था। उस के ताजिर इन जगहों पर जा कर उन्हें ख़रीद लाते थे। {10:29} बादशाह के रथ मिस्र से दरआमद होते थे। हर रथ की क़ीमत चाँदी के 600 सिक्के और हर घोड़े की क़ीमत चाँदी के 150 सिक्के थी। सुलेमान के ताजिर यह घोड़े बरआमद करते हुए तमाम हित्ती और अरामी बादशाहों तक भी पहुँचाते थे। {i11:1} सुलेमान रब से दूर हो जाता है {11:1} लेकिन सुलेमान बहुत सी ग़ैरमुल्की ख़वातीन से मुहब्बत करता था। फ़िरऔन की बेटी के इलावा उस की शादी मोआबी, अम्मोनी, अदोमी, सैदानी और हित्ती औरतों से हुई। {11:2} इन क़ौमों के बारे में रब ने इस्राईलियों को हुक्म दिया था, “न तुम इन के घरों में जाओ और न यह तुम्हारे घरों में आएँ, वर्ना यह तुम्हारे दिल अपने देवताओं की तरफ़ माइल कर देंगे।” तो भी सुलेमान बड़े प्यार से अपनी इन बीवियों से लिपटा रहा। {11:3} उस की शाही ख़ानदानों से ताल्लुक़ रखने वाली 700 बीवियाँ और 300 दाश्ताएँ थीं। इन औरतों ने आख़िरकार उस का दिल रब से दूर कर दिया। {11:4} जब वह बूढ़ा हो गया तो उन्हों ने उस का दिल दीगर माबूदों की तरफ़ माइल कर दिया। यूँ वह बुढ़ापे में अपने बाप दाऊद की तरह पूरे दिल से रब का वफ़ादार न रहा {11:5} बल्कि सैदानियों की देवी अस्तारात और अम्मोनियों के देवता मिल्कूम की पूजा करने लगा। {11:6} ग़रज़ उस ने ऐसा काम किया जो रब को नापसन्द था। वह वफ़ादारी न रही जिस से उस के बाप दाऊद ने रब की ख़िदमत की थी। {11:7} यरूशलम के मशरिक़ में सुलेमान ने एक पहाड़ी पर दो मन्दिर बनाए, एक मोआब के घिनौने देवता कमोस के लिए और एक अम्मोन के घिनौने देवता मलिक यानी मिल्कूम के लिए। {11:8} ऐसे मन्दिर उस ने अपनी तमाम ग़ैरमुल्की बीवियों के लिए तामीर किए ताकि वह अपने देवताओं को बख़ूर और ज़बह की क़ुर्बानियाँ पेश कर सकें। {11:9} रब को सुलेमान पर बड़ा ग़ुस्सा आया, क्यूँकि वह इस्राईल के ख़ुदा से दूर हो गया था, हालाँकि रब उस पर दो बार ज़ाहिर हुआ था। {11:10} गो उस ने उसे दीगर माबूदों की पूजा करने से साफ़ मना किया था तो भी सुलेमान ने उस का हुक्म न माना। {11:11} इस लिए रब ने उस से कहा, “चूँकि तू मेरे अह्द और अह्काम के मुताबिक़ ज़िन्दगी नहीं गुज़ारता, इस लिए मैं बादशाही को तुझ से छीन कर तेरे किसी अफ़्सर को दूँगा। यह बात यक़ीनी है। {11:12} लेकिन तेरे बाप दाऊद की ख़ातिर मैं यह तेरे जीते जी नहीं करूँगा बल्कि बादशाही को तेरे बेटे ही से छीनूँगा। {11:13} और मैं पूरी मम्लकत उस के हाथ से नहीं लूँगा बल्कि अपने ख़ादिम दाऊद और अपने चुने हुए शहर यरूशलम की ख़ातिर उस के लिए एक क़बीला छोड़ दूँगा।” {i11:14} सुलेमान के दुश्मन हदद और रज़ून {11:14} फिर रब ने अदोम के शाही ख़ानदान में से एक आदमी बनाम हदद को बरपा किया जो सुलेमान का सख़्त मुख़ालिफ़ बन गया। {11:15} वह यूँ सुलेमान का दुश्मन बन गया कि चन्द साल पहले जब दाऊद ने अदोम को शिकस्त दी तो उस का फ़ौजी कमाँडर योआब मैदान-ए-जंग में पड़ी तमाम इस्राईली लाशों को दफ़नाने के लिए अदोम आया। जहाँ भी गया वहाँ उस ने हर अदोमी मर्द को मार डाला। {11:16} वह छः माह तक अपने फ़ौजियों के साथ हर जगह फिरा और तमाम अदोमी मर्दों को मारता गया। {11:17} हदद उस वक़्त बच गया और अपने बाप के चन्द एक सरकारी अफ़्सरों के साथ फ़रार हो कर मिस्र में पनाह ले सका। {11:18} रास्ते में उन्हें दश्त-ए-फ़ारान के मुल्क-ए-मिदियान से गुज़रना पड़ा। वहाँ वह मज़ीद कुछ आदमियों को जमा कर सके और सफ़र करते करते मिस्र पहुँच गए। हदद मिस्र के बादशाह फ़िरऔन के पास गया तो उस ने उसे घर, कुछ ज़मीन और ख़ुराक मुहय्या की। {11:19} हदद फ़िरऔन को इतना पसन्द आया कि उस ने उस की शादी अपनी बीवी मलिका तह्फ़नीस की बहन के साथ कराई। {11:20} इस बहन के बेटा पैदा हुआ जिस का नाम जनूबत रखा गया। तह्फ़नीस ने उसे शाही महल में पाला जहाँ वह फ़िरऔन के बेटों के साथ परवान चढ़ा। {11:21} एक दिन हदद को ख़बर मिली कि दाऊद और उस का कमाँडर योआब फ़ौत हो गए हैं। तब उस ने फ़िरऔन से इजाज़त माँगी, “मैं अपने मुल्क लौट जाना चाहता हूँ, बराह-ए-करम मुझे जाने दें।” {11:22} फ़िरऔन ने एतिराज़ किया, “यहाँ क्या कमी है कि तुम अपने मुल्क वापस जाना चाहते हो?” हदद ने जवाब दिया, “मैं किसी भी चीज़ से महरूम नहीं रहा, लेकिन फिर भी मुझे जाने दीजिए।” {11:23} अल्लाह ने एक और आदमी को भी सुलेमान के ख़िलाफ़ बरपा किया। उस का नाम रज़ून बिन इल्यदा था। पहले वह ज़ोबाह के बादशाह हददअज़र की ख़िदमत अन्जाम देता था, लेकिन एक दिन उस ने अपने मालिक से भाग कर {11:24} कुछ आदमियों को अपने गिर्द जमा किया और डाकुओं के जथ्थे का सरग़ना बन गया। जब दाऊद ने ज़ोबाह को शिकस्त दे दी तो रज़ून अपने आदमियों के साथ दमिश्क़ गया और वहाँ आबाद हो कर अपनी हुकूमत क़ाइम कर ली। {11:25} होते होते वह पूरे शाम का हुक्मरान बन गया। वह इस्राईलियों से नफ़रत करता था और सुलेमान के जीते जी इस्राईल का ख़ास दुश्मन बना रहा। हदद की तरह वह भी इस्राईल को तंग करता रहा। {i11:26} यरुबिआम और अख़ियाह नबी {11:26} सुलेमान का एक सरकारी अफ़्सर भी उस के ख़िलाफ़ उठ खड़ा हुआ। उस का नाम यरुबिआम बिन नबात था, और वह इफ़्राईम के शहर सरीदा का था। उस की माँ सरूआ बेवा थी। {11:27} जब यरुबिआम बाग़ी हुआ तो उन दिनों में सुलेमान इर्दगिर्द के चबूतरे और फ़सील का आख़िरी हिस्सा तामीर कर रहा था। {11:28} उस ने देखा कि यरुबिआम माहिर और मेहनती जवान है, इस लिए उस ने उसे इफ़्राईम और मनस्सी के क़बीलों के तमाम बेगार में काम करने वालों पर मुक़र्रर किया। {11:29} एक दिन यरुबिआम शहर से निकल रहा था तो उस की मुलाक़ात सैला के नबी अख़ियाह से हुई। अख़ियाह नई चादर ओढ़े फिर रहा था। खुले मैदान में जहाँ कोई और नज़र न आया {11:30} अख़ियाह ने अपनी चादर को पकड़ कर बारह टुकड़ों में फाड़ लिया {11:31} और यरुबिआम से कहा, “चादर के दस टुकड़े अपने पास रखें! क्यूँकि रब इस्राईल का ख़ुदा फ़रमाता है, इस वक़्त मैं इस्राईल की बादशाही को सुलेमान से छीनने वाला हूँ। जब ऐसा होगा तो मैं उस के दस क़बीले तेरे हवाले कर दूँगा। {11:32} एक ही क़बीला उस के पास रहेगा, और यह भी सिर्फ़ उस के बाप दाऊद और उस शहर की ख़ातिर जिसे मैं ने तमाम क़बीलों में से चुन लिया है। {11:33} इस तरह मैं सुलेमान को सज़ा दूँगा, क्यूँकि वह और उस के लोग मुझे तर्क करके सैदानियों की देवी अस्तारात की, मोआबियों के देवता कमोस की और अम्मोनियों के देवता मिल्कूम की पूजा करने लगे हैं। वह मेरी राहों पर नहीं चलते बल्कि वही कुछ करते हैं जो मुझे बिलकुल नापसन्द है। जिस तरह दाऊद मेरे अह्काम और हिदायात की पैरवी करता था उस तरह उस का बेटा नहीं करता। {11:34} लेकिन मैं इस वक़्त पूरी बादशाही सुलेमान के हाथ से नहीं छीनूँगा। अपने ख़ादिम दाऊद की ख़ातिर जिसे मैं ने चुन लिया और जो मेरे अह्काम और हिदायात के ताबे रहा मैं सुलेमान के जीते जी यह नहीं करूँगा। वह ख़ुद बादशाह रहेगा, {11:35} लेकिन उस के बेटे से मैं बादशाही छीन कर दस क़बीले तेरे हवाले कर दूँगा। {11:36} सिर्फ़ एक क़बीला सुलेमान के बेटे के सपुर्द रहेगा ताकि मेरे ख़ादिम दाऊद का चराग़ हमेशा मेरे हुज़ूर यरूशलम में जलता रहे, उस शहर में जो मैं ने अपने नाम की सुकूनत के लिए चुन लिया है। {11:37} लेकिन तुझे, ऐ यरुबिआम, मैं इस्राईल पर बादशाह बना दूँगा। जो कुछ भी तेरा जी चाहता है उस पर तू हुकूमत करेगा। {11:38} उस वक़्त अगर तू मेरे ख़ादिम दाऊद की तरह मेरी हर बात मानेगा, मेरी राहों पर चलेगा और मेरे अह्काम और हिदायात के ताबे रह कर वह कुछ करेगा जो मुझे पसन्द है तो फिर मैं तेरे साथ रहूँगा। फिर मैं तेरा शाही ख़ानदान उतना ही क़ाइम-ओ-दाइम कर दूँगा जितना मैं ने दाऊद का किया है, और इस्राईल तेरे ही हवाले रहेगा। {11:39} यूँ मैं सुलेमान के गुनाह के बाइस दाऊद की औलाद को सज़ा दूँगा, अगरचे यह अबदी सज़ा नहीं होगी।” {11:40} इस के बाद सुलेमान ने यरुबिआम को मरवाने की कोशिश की, लेकिन यरुबिआम ने फ़रार हो कर मिस्र के बादशाह सीसक़ के पास पनाह ली। वहाँ वह सुलेमान की मौत तक रहा। {i11:41} सुलेमान की मौत {11:41} सुलेमान की ज़िन्दगी और हिक्मत के बारे में मज़ीद बातें ‘सुलेमान के आमाल’ की किताब में बयान की गई हैं। {11:42} सुलेमान 40 साल पूरे इस्राईल पर हुकूमत करता रहा। उस का दार-उल-हकूमत यरूशलम था। {11:43} जब वह मर कर अपने बापदादा से जा मिला तो उसे यरूशलम के उस हिस्से में दफ़न किया गया जो ‘दाऊद का शहर’ कहलाता है। फिर उस का बेटा रहुबिआम तख़्तनशीन हुआ। {i12:1} शिमाली क़बीले अलग हो जाते हैं {12:1} रहुबिआम सिकम गया, क्यूँकि वहाँ तमाम इस्राईली उसे बादशाह मुक़र्रर करने के लिए जमा हो गए थे। {12:2} यरुबिआम बिन नबात यह ख़बर सुनते ही मिस्र से जहाँ उस ने सुलेमान बादशाह से भाग कर पनाह ली थी इस्राईल वापस आया। {12:3} इस्राईलियों ने उसे बुलाया ताकि उस के साथ सिकम जाएँ। जब पहुँचा तो इस्राईल की पूरी जमाअत यरुबिआम के साथ मिल कर रहुबिआम से मिलने गई। उन्हों ने बादशाह से कहा, {12:4} “जो जूआ आप के बाप ने हम पर डाल दिया था उसे उठाना मुश्किल था, और जो वक़्त और पैसे हमें बादशाह की ख़िदमत में सर्फ़ करने थे वह नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त थे। अब दोनों को कम कर दें। फिर हम ख़ुशी से आप की ख़िदमत करेंगे।” {12:5} रहुबिआम ने जवाब दिया, “मुझे तीन दिन की मुहलत दें, फिर दुबारा मेरे पास आएँ।” चुनाँचे लोग चले गए। {12:6} फिर रहुबिआम बादशाह ने उन बुज़ुर्गों से मश्वरा किया जो सुलेमान के जीते जी बादशाह की ख़िदमत करते रहे थे। उस ने पूछा, “आप का क्या ख़याल है? मैं इन लोगों को क्या जवाब दूँ?” {12:7} बुज़ुर्गों ने जवाब दिया, “हमारा मश्वरा है कि इस वक़्त उन का ख़ादिम बन कर उन की ख़िदमत करें और उन्हें नर्म जवाब दें। अगर आप ऐसा करें तो वह हमेशा आप के वफ़ादार ख़ादिम बने रहेंगे।” {12:8} लेकिन रहुबिआम ने बुज़ुर्गों का मश्वरा रद्द करके उस की ख़िदमत में हाज़िर उन जवानों से मश्वरा किया जो उस के साथ परवान चढ़े थे। {12:9} उस ने पूछा, “मैं इस क़ौम को क्या जवाब दूँ? यह तक़ाज़ा कर रहे हैं कि मैं वह जूआ हल्का कर दूँ जो मेरे बाप ने उन पर डाल दिया।” {12:10} जो जवान उस के साथ परवान चढ़े थे उन्हों ने कहा, “अच्छा, यह लोग तक़ाज़ा कर रहे हैं कि आप के बाप का जूआ हल्का किया जाए? उन्हें बता देना, ‘मेरी छोटी उंगली मेरे बाप की कमर से ज़्यादा मोटी है! {12:11} बेशक जो जूआ उस ने आप पर डाल दिया उसे उठाना मुश्किल था, लेकिन मेरा जूआ और भी भारी होगा। जहाँ मेरे बाप ने आप को कोड़े लगाए वहाँ मैं आप की बिच्छूओं से तादीब करूँगा’!” {12:12} तीन दिन के बाद जब यरुबिआम तमाम इस्राईलियों के साथ रहुबिआम का फ़ैसला सुनने के लिए वापस आया {12:13} तो बादशाह ने उन्हें सख़्त जवाब दिया। बुज़ुर्गों का मश्वरा रद्द करके {12:14} उस ने उन्हें जवानों का जवाब दिया, “बेशक जो जूआ मेरे बाप ने आप पर डाल दिया उसे उठाना मुश्किल था, लेकिन मेरा जूआ और भी भारी होगा। जहाँ मेरे बाप ने आप को कोड़े लगाए वहाँ मैं आप की बिच्छूओं से तादीब करूँगा!” {12:15} यूँ रब की मर्ज़ी पूरी हुई कि रहुबिआम लोगों की बात नहीं मानेगा। क्यूँकि अब रब की वह पेशगोई पूरी हुई जो सैला के नबी अख़ियाह ने यरुबिआम बिन नबात को बताई थी। {12:16} जब इस्राईलियों ने देखा कि बादशाह हमारी बात सुनने के लिए तय्यार नहीं है तो उन्हों ने उस से कहा, “न हमें दाऊद से मीरास में कुछ मिलेगा, न यस्सी के बेटे से कुछ मिलने की उम्मीद है। ऐ इस्राईल, सब अपने अपने घर वापस चलें! ऐ दाऊद, अब अपना घर ख़ुद सँभाल लो!” यह कह कर वह सब चले गए। {12:17} सिर्फ़ यहूदाह के क़बीले के शहरों में रहने वाले इस्राईली रहुबिआम के तहत रहे। {12:18} फिर रहुबिआम बादशाह ने बेगारियों पर मुक़र्रर अफ़्सर अदूनीराम को शिमाली क़बीलों के पास भेज दिया, लेकिन उसे देख कर तमाम लोगों ने उसे संगसार किया। तब रहुबिआम जल्दी से अपने रथ पर सवार हुआ और भाग कर यरूशलम पहुँच गया। {12:19} यूँ इस्राईल के शिमाली क़बीले दाऊद के शाही घराने से अलग हो गए और आज तक उस की हुकूमत नहीं मानते। {12:20} जब ख़बर शिमाली इस्राईल में फैली कि यरुबिआम मिस्र से वापस आ गया है तो लोगों ने क़ौमी इज्लास मुनअक़िद करके उसे बुलाया और वहाँ उसे अपना बादशाह बना लिया। सिर्फ़ यहूदाह का क़बीला रहुबिआम और उस के घराने का वफ़ादार रहा। {i12:21} रहुबिआम को इस्राईल से जंग करने की इजाज़त नहीं मिलती {12:21} जब रहुबिआम यरूशलम पहुँचा तो उस ने यहूदाह और बिनयमीन के क़बीलों के चीदा चीदा फ़ौजियों को इस्राईल से जंग करने के लिए बुलाया। 1,80,000 मर्द जमा हुए ताकि रहुबिआम बिन सुलेमान के लिए इस्राईल पर दुबारा क़ाबू पाएँ। {12:22} लेकिन ऐन उस वक़्त मर्द-ए-ख़ुदा समायाह को अल्लाह की तरफ़ से पैग़ाम मिला, {12:23} “यहूदाह के बादशाह रहुबिआम बिन सुलेमान, यहूदाह और बिनयमीन के तमाम अफ़राद और बाक़ी लोगों को इत्तिला दे, {12:24} ‘रब फ़रमाता है कि अपने इस्राईली भाइयों से जंग मत करना। हर एक अपने अपने घर वापस चला जाए, क्यूँकि जो कुछ हुआ है वह मेरे हुक्म पर हुआ है’।” तब वह रब की सुन कर अपने अपने घर वापस चले गए। {i12:25} यरुबिआम के सोने के बछड़े {12:25} यरुबिआम इफ़्राईम के पहाड़ी इलाक़े के शहर सिकम को मज़बूत करके वहाँ आबाद हुआ। बाद में उस ने फ़नूएल शहर की भी क़िलाबन्दी की और वहाँ मुन्तक़िल हुआ। {12:26} लेकिन दिल में अन्देशा रहा कि कहीं इस्राईल दुबारा दाऊद के घराने के हाथ में न आ जाए। {12:27} उस ने सोचा, “लोग बाक़ाइदगी से यरूशलम आते जाते हैं ताकि वहाँ रब के घर में अपनी क़ुर्बानियाँ पेश करें। अगर यह सिलसिला तोड़ा न जाए तो आहिस्ता आहिस्ता उन के दिल दुबारा यहूदाह के बादशाह रहुबिआम की तरफ़ माइल हो जाएंगे। आख़िरकार वह मुझे क़त्ल करके रहुबिआम को अपना बादशाह बना लेंगे।” {12:28} अपने अफ़्सरों के मश्वरे पर उस ने सोने के दो बछड़े बनवाए। लोगों के सामने उस ने एलान किया, “हर क़ुर्बानी के लिए यरूशलम जाना मुश्किल है! ऐ इस्राईल देख, यह तेरे देवता हैं जो तुझे मिस्र से निकाल लाए।” {12:29} एक बुत उस ने जुनूबी शहर बैत-एल में खड़ा किया और दूसरा शिमाली शहर दान में। {12:30} यूँ यरुबिआम ने इस्राईलियों को गुनाह करने पर उकसाया। लोग दान तक सफ़र किया करते थे ताकि वहाँ के बुत की पूजा करें। {12:31} इस के इलावा यरुबिआम ने बहुत सी ऊँची जगहों पर मन्दिर बनवाए। उन्हें सँभालने के लिए उस ने ऐसे लोग मुक़र्रर किए जो लावी के क़बीले के नहीं बल्कि आम लोग थे। {12:32} उस ने एक नई ईद भी राइज की जो यहूदाह में मनाने वाली झोंपड़ियों की ईद की मानिन्द थी। यह ईद आठवें माह के पंद्रहवें दिन मनाई जाती थी। बैत-एल में उस ने ख़ुद क़ुर्बानगाह पर जा कर अपने बनवाए हुए बछड़ों को क़ुर्बानियाँ पेश कीं, और वहीं उस ने अपने उन मन्दिरों के इमामों को मुक़र्रर किया जो उस ने ऊँची जगहों पर तामीर किए थे। {i12:33} नबी यरुबिआम को बुरी ख़बर पहुँचाता है {12:33} चुनाँचे यरुबिआम के मुक़र्ररकरदा दिन यानी आठवें महीने के पंद्रहवें दिन इस्राईलियों ने बैत-एल में ईद मनाई। तमाम मेहमानों के सामने यरुबिआम क़ुर्बानगाह पर चढ़ गया ताकि क़ुर्बानियाँ पेश करे। {13:1} वह अभी क़ुर्बानगाह के पास खड़ा अपनी क़ुर्बानियाँ पेश करना ही चाहता था कि एक मर्द-ए-ख़ुदा आन पहुँचा। रब ने उसे यहूदाह से बैत-एल भेज दिया था। {13:2} बुलन्द आवाज़ से वह क़ुर्बानगाह से मुख़ातिब हुआ, “ऐ क़ुर्बानगाह! ऐ क़ुर्बानगाह! रब फ़रमाता है, ‘दाऊद के घराने से बेटा पैदा होगा जिस का नाम यूसियाह होगा। तुझ पर वह उन इमामों को क़ुर्बान कर देगा जो ऊँची जगहों के मन्दिरों में ख़िदमत करते और यहाँ क़ुर्बानियाँ पेश करने के लिए आते हैं। तुझ पर इन्सानों की हड्डियाँ जलाई जाएँगी’।” {13:3} फिर मर्द-ए-ख़ुदा ने इलाही निशान भी पेश किया। उस ने एलान किया, “एक निशान साबित करेगा कि रब मेरी मारिफ़त बात कर रहा है! यह क़ुर्बानगाह फट जाएगी, और इस पर मौजूद चर्बी मिली राख ज़मीन पर बिखर जाएगी।” {13:4} यरुबिआम बादशाह अब तक क़ुर्बानगाह के पास खड़ा था। जब उस ने बैत-एल की क़ुर्बानगाह के ख़िलाफ़ मर्द-ए-ख़ुदा की बात सुनी तो वह हाथ से उस की तरफ़ इशारा करके गरजा, “उसे पकड़ो!” लेकिन जूँ ही बादशाह ने अपना हाथ बढ़ाया वह सूख गया, और वह उसे वापस न खैंच सका। {13:5} उसी लम्हे क़ुर्बानगाह फट गई और उस पर मौजूद राख ज़मीन पर बिखर गई। बिलकुल वही कुछ हुआ जिस का एलान मर्द-ए-ख़ुदा ने रब की तरफ़ से किया था। {13:6} तब बादशाह इल्तिमास करने लगा, “रब अपने ख़ुदा का ग़ुस्सा ठंडा करके मेरे लिए दुआ करें ताकि मेरा हाथ बहाल हो जाए।” मर्द-ए-ख़ुदा ने उस की शफ़ाअत की तो यरुबिआम का हाथ फ़ौरन बहाल हो गया। {13:7} तब यरुबिआम बादशाह ने मर्द-ए-ख़ुदा को दावत दी, “आएँ, मेरे घर में खाना खा कर ताज़ादम हो जाएँ। मैं आप को तोह्फ़ा भी दूँगा।” {13:8} लेकिन उस ने इन्कार किया, “मैं आप के पास नहीं आऊँगा, चाहे आप मुझे अपनी मिलकियत का आधा हिस्सा क्यूँ न दें। मैं यहाँ न रोटी खाऊँगा, न कुछ पियूँगा। {13:9} क्यूँकि रब ने मुझे हुक्म दिया है, ‘रास्ते में न कुछ खा और न कुछ पी। और वापस जाते वक़्त वह रास्ता न ले जिस पर से तू बैत-एल पहुँचा है’।” {13:10} यह कह कर वह फ़र्क़ रास्ता इख़तियार करके अपने घर के लिए रवाना हुआ। {i13:11} नबी की नाफ़रमानी {13:11} बैत-एल में एक बूढ़ा नबी रहता था। जब उस के बेटे उस दिन घर वापस आए तो उन्हों ने उसे सब कुछ कह सुनाया जो मर्द-ए-ख़ुदा ने बैत-एल में किया और यरुबिआम बादशाह को बताया था। {13:12} बाप ने पूछा, “वह किस तरफ़ गया?” बेटों ने उसे वह रास्ता बताया जो यहूदाह के मर्द-ए-ख़ुदा ने लिया था। {13:13} बाप ने हुक्म दिया, “मेरे गधे पर जल्दी से ज़ीन कसो!” बेटों ने ऐसा किया तो वह उस पर बैठ कर {13:14} मर्द-ए-ख़ुदा को ढूँडने गया। चलते चलते मर्द-ए-ख़ुदा बलूत के दरख़्त के साय में बैठा नज़र आया। बुज़ुर्ग ने पूछा, “क्या आप वही मर्द-ए-ख़ुदा हैं जो यहूदाह से बैत-एल आए थे?” उस ने जवाब दिया, “जी, मैं वही हूँ।” {13:15} बुज़ुर्ग नबी ने उसे दावत दी, “आएँ, मेरे साथ। मैं घर में आप को कुछ खाना खिलाता हूँ।” {13:16} लेकिन मर्द-ए-ख़ुदा ने इन्कार किया, “नहीं, न मैं आप के साथ वापस जा सकता हूँ, न मुझे यहाँ खाने-पीने की इजाज़त है। {13:17} क्यूँकि रब ने मुझे हुक्म दिया, ‘रास्ते में न कुछ खा और न कुछ पी। और वापस जाते वक़्त वह रास्ता न ले जिस पर से तू बैत-एल पहुँचा है’।” {13:18} बुज़ुर्ग नबी ने एतिराज़ किया, “मैं भी आप जैसा नबी हूँ! एक फ़रिश्ते ने मुझे रब का नया पैग़ाम पहुँचा कर कहा, ‘उसे अपने साथ घर ले जा कर रोटी खिला और पानी पिला’।” बुज़ुर्ग झूट बोल रहा था, {13:19} लेकिन मर्द-ए-ख़ुदा उस के साथ वापस गया और उस के घर में कुछ खाया और पिया। {13:20} वह अभी वहाँ बैठे खाना खा रहे थे कि बुज़ुर्ग पर रब का कलाम नाज़िल हुआ। {13:21} उस ने बुलन्द आवाज़ से यहूदाह के मर्द-ए-ख़ुदा से कहा, “रब फ़रमाता है, ‘तू ने रब के कलाम की ख़िलाफ़वरज़ी की है! जो हुक्म रब तेरे ख़ुदा ने तुझे दिया था वह तू ने नज़रअन्दाज़ किया है। {13:22} गो उस ने फ़रमाया था कि यहाँ न कुछ खा और न कुछ पी तो भी तू ने वापस आ कर यहाँ रोटी खाई और पानी पिया है। इस लिए मरते वक़्त तुझे तेरे बापदादा की क़ब्र में दफ़नाया नहीं जाएगा’।” {13:23} खाने के बाद बुज़ुर्ग के गधे पर ज़ीन कसा गया और मर्द-ए-ख़ुदा को उस पर बिठाया गया। {13:24} वह दुबारा रवाना हुआ तो रास्ते में एक शेरबबर ने उस पर हम्ला करके उसे मार डाला। लेकिन उस ने लाश को न छेड़ा बल्कि वह वहीं रास्ते में पड़ी रही जबकि गधा और शेर दोनों ही उस के पास खड़े रहे। {13:25} कुछ लोग वहाँ से गुज़रे। जब उन्हों ने लाश को रास्ते में पड़े और शेरबबर को उस के पास खड़े देखा तो उन्हों ने बैत-एल जहाँ बुज़ुर्ग नबी रहता था आ कर लोगों को इत्तिला दी। {13:26} जब बुज़ुर्ग को ख़बर मिली तो उस ने कहा, “वही मर्द-ए-ख़ुदा है जिस ने रब के फ़रमान की ख़िलाफ़वरज़ी की। अब वह कुछ हुआ है जो रब ने उसे फ़रमाया था यानी उस ने उसे शेरबबर के हवाले कर दिया ताकि वह उसे फाड़ कर मार डाले।” {13:27} बुज़ुर्ग ने अपने बेटों को गधे पर ज़ीन कसने का हुक्म दिया, {13:28} और वह उस पर बैठ कर रवाना हुआ। जब वहाँ पहुँचा तो देखा कि लाश अब तक रास्ते में पड़ी है और गधा और शेर दोनों ही उस के पास खड़े हैं। शेरबबर ने न लाश को छेड़ा और न गधे को फाड़ा था। {13:29} बुज़ुर्ग नबी ने लाश को उठा कर अपने गधे पर रखा और उसे बैत-एल लाया ताकि उस का मातम करके उसे वहाँ दफ़नाए। {13:30} उस ने लाश को अपनी ख़ानदानी क़ब्र में दफ़न किया, और लोगों ने “हाय, मेरे भाई” कह कर उस का मातम किया। {13:31} जनाज़े के बाद बुज़ुर्ग नबी ने अपने बेटों से कहा, “जब मैं कूच कर जाऊँगा तो मुझे मर्द-ए-ख़ुदा की क़ब्र में दफ़नाना। मेरी हड्डियों को उस की हड्डियों के पास ही रखें। {13:32} क्यूँकि जो बातें उस ने रब के हुक्म पर बैत-एल की क़ुर्बानगाह और सामरिया के शहरों की ऊँची जगहों के मन्दिरों के बारे में की हैं वह यक़ीनन पूरी हो जाएँगी।” {i13:33} यरुबिआम फिर भी नाफ़रमान रहता है {13:33} इन वाक़िआत के बावुजूद यरुबिआम अपनी शरीर हरकतों से बाज़ न आया। आम लोगों को इमाम बनाने का सिलसिला जारी रहा। जो कोई भी इमाम बनना चाहता उसे वह ऊँची जगहों के मन्दिरों में ख़िदमत करने के लिए मख़्सूस करता था। {13:34} यरुबिआम के घराने के इस संगीन गुनाह की वजह से वह आख़िरकार तबाह हुआ और रू-ए-ज़मीन पर से मिट गया। {i14:1} यरुबिआम को इलाही सज़ा मिलती है {14:1} एक दिन यरुबिआम का बेटा अबियाह बहुत बीमार हुआ। {14:2} तब यरुबिआम ने अपनी बीवी से कहा, “जा कर अपना भेस बदलें ताकि कोई न पहचाने कि आप मेरी बीवी हैं। फिर सैला जाएँ। वहाँ अख़ियाह नबी रहता है जिस ने मुझे इत्तिला दी थी कि मैं इस क़ौम का बादशाह बन जाऊँगा। {14:3} उस के पास दस रोटियाँ, कुछ बिस्कुट और शहद का मर्तबान ले जाएँ। वह आदमी आप को ज़रूर बता देगा कि लड़के के साथ क्या हो जाएगा।” {14:4} चुनाँचे यरुबिआम की बीवी अपना भेस बदल कर रवाना हुई और चलते चलते सैला में अख़ियाह के घर पहुँच गई। अख़ियाह उम्ररसीदा होने के बाइस देख नहीं सकता था। {14:5} लेकिन रब ने उसे आगाह कर दिया, “यरुबिआम की बीवी तुझ से मिलने आ रही है ताकि अपने बीमार बेटे के बारे में मालूमात हासिल करे। लेकिन वह अपना भेस बदल कर आएगी ताकि उसे पहचाना न जाए।” फिर रब ने नबी को बताया कि उसे क्या जवाब देना है। {14:6} जब अख़ियाह ने औरत के क़दमों की आहट सुनी तो बोला, “यरुबिआम की बीवी, अन्दर आएँ! रूप भरने की क्या ज़रूरत? मुझे आप को बुरी ख़बर पहुँचानी है। {14:7} जाएँ, यरुबिआम को रब इस्राईल के ख़ुदा की तरफ़ से पैग़ाम दें, ‘मैं ने तुझे लोगों में से चुन कर खड़ा किया और अपनी क़ौम इस्राईल पर बादशाह बना दिया। {14:8} मैं ने बादशाही को दाऊद के घराने से छीन कर तुझे दे दिया। लेकिन अफ़्सोस, तू मेरे ख़ादिम दाऊद की तरह ज़िन्दगी नहीं गुज़ारता जो मेरे अह्काम के ताबे रह कर पूरे दिल से मेरी पैरवी करता रहा और हमेशा वह कुछ करता था जो मुझे पसन्द था। {14:9} जो तुझ से पहले थे उन की निस्बत तू ने कहीं ज़्यादा बदी की, क्यूँकि तू ने बुत ढाल कर अपने लिए दीगर माबूद बनाए हैं और यूँ मुझे तैश दिलाया। चूँकि तू ने अपना मुँह मुझ से फेर लिया {14:10} इस लिए मैं तेरे ख़ानदान को मुसीबत में डाल दूँगा। इस्राईल में मैं यरुबिआम के तमाम मर्दों को हलाक कर दूँगा, ख़्वाह वह बच्चे हों या बालिग़। जिस तरह गोबर को झाड़ू दे कर दूर किया जाता है उसी तरह यरुबिआम के घराने का नाम-ओ-निशान मिट जाएगा। {14:11} तुम में से जो शहर में मरेंगे उन्हें कुत्ते खा जाएंगे, और जो खुले मैदान में मरेंगे उन्हें परिन्दे चट कर जाएंगे। क्यूँकि यह रब का फ़रमान है’।” {14:12} फिर अख़ियाह ने यरुबिआम की बीवी से कहा, “आप अपने घर वापस चली जाएँ। जूँ ही आप शहर में दाख़िल होंगी लड़का फ़ौत हो जाएगा। {14:13} पूरा इस्राईल उस का मातम करके उसे दफ़न करेगा। वह आप के ख़ानदान का वाहिद फ़र्द होगा जिसे सहीह तौर से दफ़नाया जाएगा। क्यूँकि रब इस्राईल के ख़ुदा ने सिर्फ़ उसी में कुछ पाया जो उसे पसन्द था। {14:14} रब इस्राईल पर एक बादशाह मुक़र्रर करेगा जो यरुबिआम के ख़ानदान को हलाक करेगा। आज ही से यह सिलसिला शुरू हो जाएगा। {14:15} रब इस्राईल को भी सज़ा देगा, क्यूँकि वह यसीरत देवी के खम्बे बना कर उन की पूजा करते हैं। चूँकि वह रब को तैश दिलाते रहे हैं, इस लिए वह उन्हें मारेगा, और वह पानी में सरकंडे की तरह हिल जाएंगे। रब उन्हें इस अच्छे मुल्क से उखाड़ कर दरया-ए-फ़ुरात के पार मुन्तशिर कर देगा। {14:16} यूँ वह इस्राईल को उन गुनाहों के बाइस तर्क करेगा जो यरुबिआम ने किए और इस्राईल को करने पर उकसाया है।” {14:17} यरुबिआम की बीवी तिर्ज़ा में अपने घर वापस चली गई। और घर के दरवाज़े में दाख़िल होते ही उस का बेटा मर गया। {14:18} तमाम इस्राईल ने उसे दफ़ना कर उस का मातम किया। सब कुछ वैसे हुआ जैसे रब ने अपने ख़ादिम अख़ियाह नबी की मारिफ़त फ़रमाया था। {i14:19} यरुबिआम की मौत {14:19} बाक़ी जो कुछ यरुबिआम की ज़िन्दगी के बारे में लिखा है वह ‘शाहान-ए-इस्राईल की तारीख़’ की किताब में दर्ज है। उस किताब में पढ़ा जा सकता है कि वह किस तरह हुकूमत करता था और उस ने कौन कौन सी जंगें कीं। {14:20} यरुबिआम 22 साल बादशाह रहा। जब वह मर कर अपने बापदादा से जा मिला तो उस का बेटा नदब तख़्तनशीन हुआ। {i14:21} यहूदाह का बादशाह रहुबिआम {14:21} यहूदाह में रहुबिआम बिन सुलेमान हुकूमत करता था। उस की माँ नामा अम्मोनी थी। 41 साल की उम्र में वह तख़्तनशीन हुआ और 17 साल बादशाह रहा। उस का दार-उल-हकूमत यरूशलम था, वह शहर जिसे रब ने तमाम इस्राईली क़बीलों में से चुन लिया ताकि उस में अपना नाम क़ाइम करे। {14:22} लेकिन यहूदाह के बाशिन्दे भी ऐसी हरकतें करते थे जो रब को नापसन्द थीं। अपने गुनाहों से वह उसे तैश दिलाते रहे, क्यूँकि उन के यह गुनाह उन के बापदादा के गुनाहों से कहीं ज़्यादा संगीन थे। {14:23} उन्हों ने भी ऊँची जगहों पर मन्दिर बनाए। हर ऊँची पहाड़ी पर और हर घने दरख़्त के साय में उन्हों ने मख़्सूस पत्थर या यसीरत देवी के खम्बे खड़े किए, {14:24} यहाँ तक कि मन्दिरों में जिस्मफ़रोश मर्द और औरतें थे। ग़रज़, उन्हों ने उन क़ौमों के तमाम घिनौने रस्म-ओ-रिवाज अपना लिए जिन को रब ने इस्राईलियों के आगे आगे निकाल दिया था। {14:25} रहुबिआम बादशाह की हुकूमत के पाँचवें साल में मिस्र के बादशाह सीसक़ ने यरूशलम पर हम्ला करके {14:26} रब के घर और शाही महल के तमाम ख़ज़ाने लूट लिए। सोने की वह ढालें भी छीन ली गईं जो सुलेमान ने बनवाई थीं। {14:27} इन की जगह रहुबिआम ने पीतल की ढालें बनवाईं और उन्हें उन मुहाफ़िज़ों के अफ़्सरों के सपुर्द किया जो शाही महल के दरवाज़े की पहरादारी करते थे। {14:28} जब भी बादशाह रब के घर में जाता तब मुहाफ़िज़ यह ढालें उठा कर साथ ले जाते। इस के बाद वह उन्हें पहरेदारों के कमरे में वापस ले जाते थे। {14:29} बाक़ी जो कुछ रहुबिआम बादशाह की हुकूमत के दौरान हुआ और जो कुछ उस ने किया वह ‘शाहान-ए-यहूदाह की तारीख़’ की किताब में दर्ज है। {14:30} दोनों बादशाहों रहुबिआम और यरुबिआम के जीते जी उन के दरमियान जंग जारी रही। {14:31} जब रहुबिआम मर कर अपने बापदादा से जा मिला तो उसे यरूशलम के उस हिस्से में जो ‘दाऊद का शहर’ कहलाता है ख़ानदानी क़ब्र में दफ़नाया गया। उस की माँ नामा अम्मोनी थी। फिर रहुबिआम का बेटा अबियाह तख़्तनशीन हुआ। {i15:1} यहूदाह का बादशाह अबियाह {15:1} अबियाह इस्राईल के बादशाह यरुबिआम बिन नबात की हुकूमत के 18वें साल में यहूदाह का बादशाह बना। {15:2} वह तीन साल बादशाह रहा, और उस का दार-उल-हकूमत यरूशलम था। उस की माँ माका बिन्त अबीसलूम थी। {15:3} अबियाह से वही गुनाह सरज़द हुए जो उस के बाप ने किए थे, और वह पूरे दिल से रब अपने ख़ुदा का वफ़ादार न रहा। गो वह इस में अपने परदादा दाऊद से फ़र्क़ था {15:4} तो भी रब उस के ख़ुदा ने अबियाह का यरूशलम में चराग़ जलने दिया। दाऊद की ख़ातिर उस ने उसे जानशीन अता किया और यरूशलम को क़ाइम रखा, {15:5} क्यूँकि दाऊद ने वह कुछ किया था जो रब को पसन्द था। जीते जी वह रब के अह्काम के ताबे रहा, सिवाए उस जुर्म के जब उस ने ऊरियाह हित्ती के सिलसिले में ग़लत क़दम उठाए थे। {15:6} रहुबिआम और यरुबिआम के दरमियान की जंग अबियाह की हुकूमत के दौरान भी जारी रही। {15:7} बाक़ी जो कुछ अबियाह की हुकूमत के दौरान हुआ और जो कुछ उस ने किया वह ‘शाहान-ए-यहूदाह की तारीख़’ की किताब में दर्ज है। {15:8} जब वह मर कर अपने बापदादा से जा मिला तो उसे यरूशलम के उस हिस्से में दफ़न किया गया जो ‘दाऊद का शहर’ कहलाता है। फिर उस का बेटा आसा तख़्तनशीन हुआ। {i15:9} यहूदाह का बादशाह आसा {15:9} आसा इस्राईल के बादशाह यरुबिआम के 20वें साल में यहूदाह का बादशाह बन गया। {15:10} उस की हुकूमत का दौरानिया 41 साल था, और उस का दार-उल-हकूमत यरूशलम था। माँ का नाम माका था, और वह अबीसलूम की बेटी थी। {15:11} अपने परदादा दाऊद की तरह आसा भी वह कुछ करता रहा जो रब को पसन्द था। {15:12} उस ने उन जिस्मफ़रोश मर्दों और औरतों को निकाल दिया जो मन्दिरों में नाम-निहाद ख़िदमत करते थे और उन तमाम बुतों को तबाह कर दिया जो उस के बापदादा ने बनाए थे। {15:13} और गो उस की माँ बादशाह की माँ होने के बाइस बहुत असर-ओ-रसूख़ रखती थी, ताहम आसा ने यह उह्दा ख़त्म कर दिया जब माँ ने यसीरत देवी का घिनौना खम्बा बनवा लिया। आसा ने यह बुत कटवा कर वादी-ए-क़िद्रोन में जला दिया। {15:14} अफ़्सोस कि उस ने ऊँची जगहों के मन्दिरों को दूर न किया। तो भी आसा जीते जी पूरे दिल से रब का वफ़ादार रहा। {15:15} सोना-चाँदी और बाक़ी जितनी चीज़ें उस के बाप और उस ने रब के लिए मख़्सूस की थीं उन सब को वह रब के घर में लाया। {15:16} यहूदाह के बादशाह आसा और इस्राईल के बादशाह बाशा के दरमियान ज़िन्दगी भर जंग जारी रही। {15:17} एक दिन बाशा बादशाह ने यहूदाह पर हम्ला करके रामा शहर की क़िलाबन्दी की। मक़्सद यह था कि न कोई यहूदाह के मुल्क में दाख़िल हो सके, न कोई वहाँ से निकल सके। {15:18} जवाब में आसा ने शाम के बादशाह बिन-हदद के पास वफ़द भेजा। बिन-हदद का बाप ताबरिम्मोन बिन हज़्यून था, और उस का दार-उल-हकूमत दमिश्क़ था। आसा ने रब के घर और शाही महल के ख़ज़ानों का तमाम बचा हुआ सोना और चाँदी वफ़द के सपुर्द करके दमिश्क़ के बादशाह को पैग़ाम भेजा, {15:19} “मेरा आप के साथ अह्द है जिस तरह मेरे बाप का आप के बाप के साथ अह्द था। गुज़ारिश है कि आप सोने-चाँदी का यह तोह्फ़ा क़बूल करके इस्राईल के बादशाह बाशा के साथ अपना अह्द मन्सूख़ कर दें ताकि वह मेरे मुल्क से निकल जाए।” {15:20} बिन-हदद मुत्तफ़िक़ हुआ। उस ने अपने फ़ौजी अफ़्सरों को इस्राईल के शहरों पर हम्ला करने के लिए भेज दिया तो उन्हों ने ऐय्यून, दान, अबील-बैत-माका, तमाम किन्नरत और नफ़्ताली पर क़ब्ज़ा कर लिया। {15:21} जब बाशा को इस की ख़बर मिली तो वह रामा की क़िलाबन्दी करने से बाज़ आया और तिर्ज़ा वापस चला गया। {15:22} फिर आसा बादशाह ने यहूदाह के तमाम मर्दों की भर्ती करके उन्हें रामा भेज दिया ताकि वह उन तमाम पत्थरों और शहतीरों को उठा कर ले जाएँ जिन से बाशा बादशाह रामा की क़िलाबन्दी करना चाहता था। तमाम मर्दों को वहाँ जाना पड़ा, एक को भी छुट्टी न मिली। इस सामान से आसा ने बिनयमीन के शहर जिबा और मिस्फ़ाह की क़िलाबन्दी की। {15:23} बाक़ी जो कुछ आसा की हुकूमत के दौरान हुआ और जो कुछ उस ने किया वह ‘शाहान-ए-यहूदाह की तारीख़’ की किताब में दर्ज है। उस में उस की कामयाबियों और उस के तामीर किए गए शहरों का ज़िक्र है। बुढ़ापे में उस के पाँओ को बीमारी लग गई। {15:24} जब वह मर कर अपने बापदादा से जा मिला तो उसे यरूशलम के उस हिस्से में जो ‘दाऊद का शहर’ कहलाता है ख़ानदानी क़ब्र में दफ़नाया गया। फिर उस का बेटा यहूसफ़त उस की जगह तख़्तनशीन हुआ। {i15:25} इस्राईल का बादशाह नदब {15:25} नदब बिन यरुबिआम यहूदाह के बादशाह आसा की हुकूमत के दूसरे साल में इस्राईल का बादशाह बना। उस की हुकूमत का दौरानिया दो साल था। {15:26} उस का तर्ज़-ए-ज़िन्दगी रब को पसन्द नहीं था, क्यूँकि वह अपने बाप के नमूने पर चलता रहा। जो बदी यरुबिआम ने इस्राईल को करने पर उकसाया था उस से नदब भी दूर न हुआ। {15:27} एक दिन जब नदब इस्राईली फ़ौज के साथ फ़िलिस्ती शहर जिब्बतून का मुहासरा किए हुए था तो इश्कार के क़बीले के बाशा बिन अख़ियाह ने उस {15:28} के ख़िलाफ़ साज़िश करके उसे मार डाला और ख़ुद इस्राईल का बादशाह बन गया। यह यहूदाह के बादशाह आसा की हुकूमत के तीसरे साल में हुआ। {15:29} तख़्त पर बैठते ही बाशा ने यरुबिआम के पूरे ख़ानदान को मरवा दिया। उस ने एक को भी ज़िन्दा न छोड़ा। यूँ वह बात पूरी हुई जो रब ने सैला के रहने वाले अपने ख़ादिम अख़ियाह की मारिफ़त फ़रमाई थी। {15:30} क्यूँकि जो गुनाह यरुबिआम ने किए और इस्राईल को करने पर उकसाया था उन से उस ने रब इस्राईल के ख़ुदा को तैश दिलाया था। {15:31} बाक़ी जो कुछ नदब की हुकूमत के दौरान हुआ और जो कुछ उस ने किया वह ‘शाहान-ए-इस्राईल की तारीख़’ की किताब में दर्ज है। {i15:32} इस्राईल का बादशाह बाशा {15:32} बाशा बिन अख़ियाह यहूदाह के बादशाह आसा की हुकूमत के तीसरे साल में इस्राईल का बादशाह बना। उस की हुकूमत का दौरानिया {15:33} 24 साल था, और उस का दार-उल-हकूमत तिर्ज़ा रहा। उस के और यहूदाह के बादशाह आसा के दरमियान ज़िन्दगी भर जंग जारी रही। {15:34} लेकिन वह भी ऐसा काम करता था जो रब को नापसन्द था, क्यूँकि उस ने यरुबिआम के नमूने पर चल कर वह गुनाह जारी रखे जो करने पर यरुबिआम ने इस्राईल को उकसाया था। {16:1} एक दिन रब ने याहू बिन हनानी को बाशा के पास भेज कर फ़रमाया, {16:2} “पहले तू कुछ नहीं था, लेकिन मैं ने तुझे ख़ाक में से उठा कर अपनी क़ौम इस्राईल का हुक्मरान बना दिया। तो भी तू ने यरुबिआम के नमूने पर चल कर मेरी क़ौम इस्राईल को गुनाह करने पर उकसाया और मुझे तैश दिलाया है। {16:3} इस लिए मैं तेरे घराने के साथ वही कुछ करूँगा जो यरुबिआम बिन नबात के घराने के साथ किया था। बाशा की पूरी नस्ल हलाक हो जाएगी। {16:4} ख़ानदान के जो अफ़राद शहर में मरेंगे उन्हें कुत्ते खा जाएंगे, और जो खुले मैदान में मरेंगे उन्हें परिन्दे चट कर जाएंगे।” {16:5} बाक़ी जो कुछ बाशा की हुकूमत के दौरान हुआ, जो कुछ उस ने किया और जो कामयाबियाँ उसे हासिल हुईं वह ‘शाहान-ए-इस्राईल की तारीख़’ की किताब में दर्ज हैं। {16:6} जब वह मर कर अपने बापदादा से जा मिला तो उसे तिर्ज़ा में दफ़न किया गया। फिर उस का बेटा ऐला तख़्तनशीन हुआ। {16:7} रब की सज़ा का जो पैग़ाम हनानी के बेटे याहू नबी ने बाशा और उस के ख़ानदान को सुनाया उस की दो वुजूहात थीं। पहले, बाशा ने यरुबिआम के ख़ानदान की तरह वह कुछ किया जो रब को नापसन्द था और उसे तैश दिलाया। दूसरे, उस ने यरुबिआम के पूरे ख़ानदान को हलाक कर दिया था। {i16:8} इस्राईल का बादशाह ऐला {16:8} ऐला बिन बाशा यहूदाह के बादशाह आसा की हुकूमत के 26वें साल में इस्राईल का बादशाह बना। उस की हुकूमत के दो साल के दौरान उस का दार-उल-हकूमत तिर्ज़ा रहा। {16:9} ऐला का एक अफ़्सर बनाम ज़िम्री था। ज़िम्री रथों के आधे हिस्से पर मुक़र्रर था। अब वह बादशाह के ख़िलाफ़ साज़िशें करने लगा। एक दिन ऐला तिर्ज़ा में महल के इंचार्ज अर्ज़ा के घर में बैठा मै पी रहा था। जब नशे में धुत हुआ {16:10} तो ज़िम्री ने अन्दर जा कर उसे मार डाला। फिर वह ख़ुद तख़्त पर बैठ गया। यह यहूदाह के बादशाह आसा की हुकूमत के 27वें साल में हुआ। {16:11} तख़्त पर बैठते ही ज़िम्री ने बाशा के पूरे ख़ानदान को हलाक कर दिया। उस ने किसी भी मर्द को ज़िन्दा न छोड़ा, ख़्वाह वह दूर का रिश्तेदार था, ख़्वाह दोस्त। {16:12} यूँ वही कुछ हुआ जो रब ने याहू नबी की मारिफ़त बाशा को फ़रमाया था। {16:13} क्यूँकि बाशा और उस के बेटे ऐला से संगीन गुनाह सरज़द हुए थे, और साथ साथ उन्हों ने इस्राईल को भी यह करने पर उकसाया था। अपने बातिल देवताओं से उन्हों ने रब इस्राईल के ख़ुदा को तैश दिलाया था। {16:14} बाक़ी जो कुछ ऐला की हुकूमत के दौरान हुआ और जो कुछ उस ने किया वह ‘शाहान-ए-इस्राईल की तारीख़’ की किताब में दर्ज है। {i16:15} इस्राईल का बादशाह ज़िम्री {16:15} ज़िम्री यहूदाह के बादशाह आसा की हुकूमत के 27वें साल में इस्राईल का बादशाह बना। लेकिन तिर्ज़ा में उस की हुकूमत सिर्फ़ सात दिन तक क़ाइम रही। उस वक़्त इस्राईली फ़ौज फ़िलिस्ती शहर जिब्बतून का मुहासरा कर रही थी। {16:16} जब फ़ौज में ख़बर फैल गई कि ज़िम्री ने बादशाह के ख़िलाफ़ साज़िश करके उसे क़त्ल किया है तो तमाम इस्राईलियों ने लश्करगाह में आ कर उसी दिन अपने कमाँडर उम्री को बादशाह बना दिया। {16:17} तब उम्री तमाम फ़ौजियों के साथ जिब्बतून को छोड़ कर तिर्ज़ा का मुहासरा करने लगा। {16:18} जब ज़िम्री को पता चला कि शहर दूसरों के क़ब्ज़े में आ गया है तो उस ने महल के बुर्ज में जा कर उसे आग लगाई। यूँ वह जल कर मर गया। {16:19} इस तरह उसे भी मुनासिब सज़ा मिल गई, क्यूँकि उस ने भी वह कुछ किया था जो रब को नापसन्द था। यरुबिआम के नमूने पर चल कर उस ने वह तमाम गुनाह किए जो यरुबिआम ने किए और इस्राईल को करने पर उकसाया था। {16:20} जो कुछ ज़िम्री की हुकूमत के दौरान हुआ और जो साज़िशें उस ने कीं वह ‘शाहान-ए-इस्राईल की तारीख़’ की किताब में दर्ज हैं। {i16:21} इस्राईल का बादशाह उम्री {16:21} ज़िम्री की मौत के बाद इस्राईली दो फ़िर्क़ों में बट गए। एक फ़िर्क़ा तिब्नी बिन जीनत को बादशाह बनाना चाहता था, दूसरा उम्री को। {16:22} लेकिन उम्री का फ़िर्क़ा तिब्नी के फ़िर्क़े की निस्बत ज़्यादा ताक़तवर निकला। चुनाँचे तिब्नी मर गया और उम्री पूरी क़ौम पर बादशाह बन गया। {16:23} उम्री यहूदाह के बादशाह आसा की हुकूमत के 31वें साल में इस्राईल का बादशाह बना। उस की हुकूमत का दौरानिया 12 साल था। पहले छः साल दार-उल-हकूमत तिर्ज़ा रहा। {16:24} इस के बाद उस ने एक आदमी बनाम समर को चाँदी के 6,000 सिक्के दे कर उस से सामरिया पहाड़ी ख़रीद ली और वहाँ अपना नया दार-उल-हकूमत तामीर किया। पहले मालिक समर की याद में उस ने शहर का नाम सामरिया रखा। {16:25} लेकिन उम्री ने भी वही कुछ किया जो रब को नापसन्द था, बल्कि उस ने माज़ी के बादशाहों की निस्बत ज़्यादा बदी की। {16:26} उस ने यरुबिआम बिन नबात के नमूने पर चल कर वह तमाम गुनाह किए जो यरुबिआम ने किए और इस्राईल को करने पर उकसाया था। नतीजे में इस्राईली रब अपने ख़ुदा को अपने बातिल देवताओं से तैश दिलाते रहे। {16:27} बाक़ी जो कुछ उम्री की हुकूमत के दौरान हुआ, जो कुछ उस ने किया और जो कामयाबियाँ उसे हासिल हुईं वह ‘शाहान-ए-इस्राईल की तारीख़’ की किताब में बयान की गई हैं। {16:28} जब उम्री मर कर अपने बापदादा से जा मिला तो उसे सामरिया में दफ़नाया गया। फिर उस का बेटा अख़ियब तख़्तनशीन हुआ। {i16:29} इस्राईल का बादशाह अख़ियब {16:29} अख़ियब बन उम्री यहूदाह के बादशाह आसा के 38वें साल में इस्राईल का बादशाह बना। उस की हुकूमत का दौरानिया 22 साल था, और उस का दार-उल-हकूमत सामरिया रहा। {16:30} अख़ियब ने भी ऐसे काम किए जो रब को नापसन्द थे, बल्कि माज़ी के बादशाहों की निस्बत उस के गुनाह ज़्यादा संगीन थे। {16:31} यरुबिआम के नमूने पर चलना उस के लिए काफ़ी नहीं था बल्कि उस ने इस से बढ़ कर सैदा के बादशाह इत्बاल की बेटी ईज़बिल से शादी भी की। नतीजे में वह उस के देवता बाल के सामने झुक कर उस की पूजा करने लगा। {16:32} सामरिया में उस ने बाल का मन्दिर तामीर किया और देवता के लिए क़ुर्बानगाह बना कर उस में रख दिया। {16:33} अख़ियब ने यसीरत देवी का बुत भी बनवा दिया। यूँ उस ने अपने घिनौने कामों से माज़ी के तमाम इस्राईली बादशाहों की निस्बत कहीं ज़्यादा रब इस्राईल के ख़ुदा को तैश दिलाया। {16:34} अख़ियब की हुकूमत के दौरान बैत-एल के रहने वाले हीएल ने यरीहू शहर को नए सिरे से तामीर किया। जब उस की बुन्याद रखी गई तो उस का सब से बड़ा बेटा अबीराम मर गया, और जब उस ने शहर के दरवाज़े लगा दिए तो उस के सब से छोटे बेटे सजूब को अपनी जान देनी पड़ी। यूँ रब की वह बात पूरी हुई जो उस ने यशूअ बिन नून की मारिफ़त फ़रमाई थी। {i17:1} कव्वे इल्यास नबी को खाना खिलाते हैं {17:1} एक दिन इल्यास नबी ने जो जिलिआद के शहर तिश्बी का था अख़ियब बादशाह से कहा, “रब इस्राईल के ख़ुदा की क़सम जिस की ख़िदमत मैं करता हूँ, आने वाले सालों में न ओस, न बारिश पड़ेगी जब तक मैं न कहूँ।” {17:2} फिर रब ने इल्यास से कहा, {17:3} “यहाँ से चला जा! मशरिक़ की तरफ़ सफ़र करके वादी-ए-करीत में छुप जा जिस की नदी दरया-ए-यर्दन में बहती है। {17:4} पानी तू नदी से पी सकता है, और मैं ने कव्वों को तुझे वहाँ खाना खिलाने का हुक्म दिया है।” {17:5} इल्यास रब की सुन कर रवाना हुआ और वादी-ए-करीत में रहने लगा जिस की नदी दरया-ए-यर्दन में बहती है। {17:6} सुब्ह-ओ-शाम कव्वे उसे रोटी और गोश्त पहुँचाते रहे, और पानी वह नदी से पीता था। {i17:7} इल्यास सारपत की बेवा के पास {17:7} इस पूरे अर्से में बारिश न हुई, इस लिए नदी आहिस्ता आहिस्ता सूख गई। जब उस का पानी बिलकुल ख़त्म हो गया {17:8} तो रब दुबारा इल्यास से हमकलाम हुआ, {17:9} “यहाँ से रवाना हो कर सैदा के शहर सारपत में जा बस। मैं ने वहाँ की एक बेवा को तुझे खाना खिलाने का हुक्म दिया है।” {17:10} चुनाँचे इल्यास सारपत के लिए रवाना हुआ। सफ़र करते करते वह शहर के दरवाज़े के पास पहुँच गया। वहाँ एक बेवा जलाने के लिए लकड़ियाँ चुन कर जमा कर रही थी। उसे बुला कर इल्यास ने कहा, “ज़रा किसी बर्तन में पानी भर कर मुझे थोड़ा सा पिलाएँ।” {17:11} वह अभी पानी लाने जा रही थी कि इल्यास ने उस के पीछे आवाज़ दे कर कहा, “मेरे लिए रोटी का टुकड़ा भी लाना!” {17:12} यह सुन कर बेवा रुक गई और बोली, “रब आप के ख़ुदा की क़सम, मेरे पास कुछ नहीं है। बस, एक बर्तन में मुट्ठी भर मैदा और दूसरे में थोड़ा सा तेल रह गया है। अब मैं जलाने के लिए चन्द एक लकड़ियाँ चुन रही हूँ ताकि अपने और अपने बेटे के लिए आख़िरी खाना पकाऊँ। इस के बाद हमारी मौत यक़ीनी है।” {17:13} इल्यास ने उसे तसल्ली दी, “डरें मत! बेशक वह कुछ करें जो आप ने कहा है। लेकिन पहले मेरे लिए छोटी सी रोटी बना कर मेरे पास ले आएँ। फिर जो बाक़ी रह गया हो उस से अपने और अपने बेटे के लिए रोटी बनाएँ। {17:14} क्यूँकि रब इस्राईल का ख़ुदा फ़रमाता है, ‘जब तक रब बारिश बरसने न दे तब तक मैदे और तेल के बर्तन ख़ाली नहीं होंगे’।” {17:15} औरत ने जा कर वैसा ही किया जैसा इल्यास ने उसे कहा था। वाक़ई मैदा और तेल कभी ख़त्म न हुआ। रोज़-ब-रोज़ इल्यास, {17:16} बेवा और उस के बेटे के लिए खाना दस्तयाब रहा। सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा रब ने इल्यास की मारिफ़त फ़रमाया था। {17:17} एक दिन बेवा का बेटा बीमार हो गया। उस की तबीअत बहुत ख़राब हुई, और होते होते उस की जान निकल गई। {17:18} तब बेवा इल्यास से शिकायत करने लगी, “मर्द-ए-ख़ुदा, मेरा आप के साथ क्या वास्ता? आप तो सिर्फ़ इस मक़्सद से यहाँ आए हैं कि रब को मेरे गुनाह की याद दिला कर मेरे बेटे को मार डालें!” {17:19} इल्यास ने जवाब में कहा, “अपने बेटे को मुझे दे दें।” वह लड़के को औरत की गोद में से उठा कर छत पर अपने कमरे में ले गया और वहाँ उसे चारपाई पर रख कर {17:20} दुआ करने लगा, “ऐ रब मेरे ख़ुदा, तू ने इस बेवा को जिस का मेहमान मैं हूँ ऐसी मुसीबत में क्यूँ डाल दिया है? तू ने उस के बेटे को मरने क्यूँ दिया?” {17:21} वह तीन बार लाश पर दराज़ हुआ और साथ साथ रब से इल्तिमास करता रहा, “ऐ रब मेरे ख़ुदा, बराह-ए-करम बच्चे की जान को उस में वापस आने दे!” {17:22} रब ने इल्यास की सुनी, और लड़के की जान उस में वापस आई। {17:23} इल्यास उसे उठा कर नीचे ले आया और उसे उस की माँ को वापस दे कर बोला, “देखें, आप का बेटा ज़िन्दा है!” {17:24} औरत ने जवाब दिया, “अब मैं ने जान लिया है कि आप अल्लाह के पैग़म्बर हैं और कि जो कुछ आप रब की तरफ़ से बोलते हैं वह सच है।” {i18:1} इल्यास इस्राईल वापस जाता है {18:1} बहुत दिन गुज़र गए। फिर काल के तीसरे साल में रब इल्यास से हमकलाम हुआ, “अब जा कर अपने आप को अख़ियब के सामने पेश कर। मैं बारिश का सिलसिला दुबारा शुरू कर दूँगा।” {18:2} चुनाँचे इल्यास अख़ियब से मिलने के लिए इस्राईल चला गया। उस वक़्त सामरिया काल की सख़्त गिरिफ़्त में था, {18:3} इस लिए अख़ियब ने महल के इंचार्ज अबदियाह को बुलाया। (अबदियाह रब का ख़ौफ़ मानता था। {18:4} जब ईज़बिल ने रब के तमाम नबियों को क़त्ल करने की कोशिश की थी तो अबदियाह ने 100 नबियों को दो ग़ारों में छुपा दिया था। हर ग़ार में 50 नबी रहते थे, और अबदियाह उन्हें खाने-पीने की चीज़ें पहुँचाता रहता था।) {18:5} अब अख़ियब ने अबदियाह को हुक्म दिया, “पूरे मुल्क में से गुज़र कर तमाम चश्मों और वादियों का मुआइना करें। शायद कहीं कुछ घास मिल जाए जो हम अपने घोड़ों और ख़च्चरों को खिला कर उन्हें बचा सकें। ऐसा न हो कि हमें खाने की क़िल्लत के बाइस कुछ जानवरों को ज़बह करना पड़े।” {18:6} उन्हों ने मुक़र्रर किया कि अख़ियब कहाँ जाएगा और अबदियाह कहाँ, फिर दोनों एक दूसरे से अलग हो गए। {18:7} चलते चलते अबदियाह को अचानक इल्यास उस की तरफ़ आते हुए नज़र आया। जब अबदियाह ने उसे पहचाना तो वह मुँह के बल झुक कर बोला, “मेरे आक़ा इल्यास, क्या आप ही हैं?” {18:8} इल्यास ने जवाब दिया, “जी, मैं ही हूँ। जाएँ, अपने मालिक को इत्तिला दें कि इल्यास आ गया है।” {18:9} अबदियाह ने एतिराज़ किया, “मुझ से क्या ग़लती हुई है कि आप मुझे अख़ियब से मरवाना चाहते हैं? {18:10} रब आप के ख़ुदा की क़सम, बादशाह ने अपने बन्दों को हर क़ौम और मुल्क में भेज दिया है ताकि आप को ढूँड निकालें। और जहाँ जवाब मिला कि इल्यास यहाँ नहीं है वहाँ लोगों को क़सम खानी पड़ी कि हम इल्यास का खोज लगाने में नाकाम रहे हैं। {18:11} और अब आप चाहते हैं कि मैं बादशाह के पास जा कर उसे बताऊँ कि इल्यास यहाँ है? {18:12} ऐन मुमकिन है कि जब मैं आप को छोड़ कर चला जाऊँ तो रब का रूह आप को उठा कर किसी नामालूम जगह ले जाए। अगर बादशाह मेरी यह इत्तिला सुन कर यहाँ आए और आप को न पाए तो मुझे मार डालेगा। याद रहे कि मैं जवानी से ले कर आज तक रब का ख़ौफ़ मानता आया हूँ। {18:13} क्या मेरे आक़ा तक यह ख़बर नहीं पहुँची कि जब ईज़बिल रब के नबियों को क़त्ल कर रही थी तो मैं ने क्या किया? मैं दो ग़ारों में पचास पचास नबियों को छुपा कर उन्हें खाने-पीने की चीज़ें पहुँचाता रहा। {18:14} और अब आप चाहते हैं कि मैं अख़ियब के पास जा कर उसे इत्तिला दूँ कि इल्यास यहाँ आ गया है? वह मुझे ज़रूर मार डालेगा।” {18:15} इल्यास ने कहा, “रब्ब-उल-अफ़्वाज की हयात की क़सम जिस की ख़िदमत मैं करता हूँ, आज मैं अपने आप को ज़रूर बादशाह को पेश करूँगा।” {18:16} तब अबदियाह चला गया और बादशाह को इल्यास की ख़बर पहुँचाई। यह सुन कर अख़ियब इल्यास से मिलने के लिए आया। {i18:17} क्या बाल हक़ीक़ी माबूद है या रब? {18:17} इल्यास को देखते ही अख़ियब बोला, “ऐ इस्राईल को मुसीबत में डालने वाले, क्या आप वापस आ गए हैं?” {18:18} इल्यास ने एतिराज़ किया, “मैं तो इस्राईल के लिए मुसीबत का बाइस नहीं बना बल्कि आप और आप के बाप का घराना। आप रब के अह्काम छोड़ कर बाल के बुतों के पीछे लग गए हैं। {18:19} अब मैं आप को चैलेंज देता हूँ, तमाम इस्राईल को बुला कर कर्मिल पहाड़ पर जमा करें। साथ साथ बाल देवता के 450 नबियों को और ईज़बिल की मेज़ पर शरीक होने वाले यसीरत देवी के 400 नबियों को भी बुलाएँ।” {18:20} अख़ियब मान गया। उस ने तमाम इस्राईलियों और नबियों को बुलाया। जब वह कर्मिल पहाड़ पर जमा हो गए {18:21} तो इल्यास उन के सामने जा खड़ा हुआ और कहा, “आप कब तक कभी इस तरफ़, कभी उस तरफ़ लंगड़ाते रहेंगे? अगर रब ख़ुदा है तो सिर्फ़ उसी की पैरवी करें, लेकिन अगर बाल वाहिद ख़ुदा है तो उसी के पीछे लग जाएँ।” लोग ख़ामोश रहे। {18:22} इल्यास ने बात जारी रखी, “रब के नबियों में से सिर्फ़ मैं ही बाक़ी रह गया हूँ। दूसरी तरफ़ बाल देवता के यह 450 नबी खड़े हैं। {18:23} अब दो बैल ले आएँ। बाल के नबी एक को पसन्द करें और फिर उसे टुकड़े टुकड़े करके अपनी क़ुर्बानगाह की लकड़ियों पर रख दें। लेकिन वह लकड़ियों को आग न लगाएँ। मैं दूसरे बैल को तय्यार करके अपनी क़ुर्बानगाह की लकड़ियों पर रख दूँगा। लेकिन मैं भी उन्हें आग नहीं लगाऊँगा। {18:24} फिर आप अपने देवता का नाम पुकारें जबकि मैं रब का नाम पुकारूँगा। जो माबूद क़ुर्बानी को जला कर जवाब देगा वही ख़ुदा है।” तमाम लोग बोले, “आप ठीक कहते हैं।” {18:25} फिर इल्यास ने बाल के नबियों से कहा, “शुरू करें, क्यूँकि आप बहुत हैं। एक बैल को चुन कर उसे तय्यार करें। लेकिन उसे आग मत लगाना बल्कि अपने देवता का नाम पुकारें ताकि वह आग भेज दे।” {18:26} उन्हों ने बैलों में से एक को चुन कर उसे तय्यार किया, फिर बाल का नाम पुकारने लगे। सुब्ह से ले कर दोपहर तक वह मुसलसल चीख़ते चिल्लाते रहे, “ऐ बाल, हमारी सुन!” साथ साथ वह उस क़ुर्बानगाह के इर्दगिर्द नाचते रहे जो उन्हों ने बनाई थी। लेकिन न कोई आवाज़ सुनाई दी, न किसी ने जवाब दिया। {18:27} दोपहर के वक़्त इल्यास उन का मज़ाक़ उड़ाने लगा, “ज़्यादा ऊँची आवाज़ से बोलें! शायद वह सोचों में ग़र्क़ हो या अपनी हाजत रफ़ा करने के लिए एक तरफ़ गया हो। यह भी हो सकता है कि वह कहीं सफ़र कर रहा हो। या शायद वह गहरी नींद सो गया हो और उसे जगाने की ज़रूरत है।” {18:28} तब वह मज़ीद ऊँची आवाज़ से चीख़ने-चिल्लाने लगे। मामूल के मुताबिक़ वह छुरियों और नेज़ों से अपने आप को ज़ख़्मी करने लगे, यहाँ तक कि ख़ून बहने लगा। {18:29} दोपहर गुज़र गई, और वह शाम के उस वक़्त तक वज्द में रहे जब ग़ल्ला की नज़र पेश की जाती है। लेकिन कोई आवाज़ न सुनाई दी। न किसी ने जवाब दिया, न उन के तमाशे पर तवज्जुह दी। {18:30} फिर इल्यास इस्राईलियों से मुख़ातिब हुआ, “आएँ, सब यहाँ मेरे पास आएँ!” सब क़रीब आए। वहाँ रब की एक क़ुर्बानगाह थी जो गिराई गई थी। अब इल्यास ने वह दुबारा खड़ी की। {18:31} उस ने याक़ूब से निकले हर क़बीले के लिए एक एक पत्थर चुन लिया। (बाद में रब ने याक़ूब का नाम इस्राईल रखा था)। {18:32} इन बारह पत्थरों को ले कर इल्यास ने रब के नाम की ताज़ीम में क़ुर्बानगाह बनाई। इस के इर्दगिर्द उस ने इतना चौड़ा गढ़ा खोदा कि उस में तक़रीबन 15 लिटर पानी समा सकता था। {18:33} फिर उस ने क़ुर्बानगाह पर लकड़ियों का ढेर लगाया और बैल को टुकड़े टुकड़े करके लकड़ियों पर रख दिया। इस के बाद उस ने हुक्म दिया, “चार घड़े पानी से भर कर क़ुर्बानी और लकड़ियों पर उंडेल दें!” {18:34} जब उन्हों ने ऐसा किया तो उस ने दुबारा ऐसा करने का हुक्म दिया, फिर तीसरी बार। {18:35} आख़िरकार इतना पानी था कि उस ने चारों तरफ़ क़ुर्बानगाह से टपक कर गढ़े को भर दिया। {18:36} शाम के वक़्त जब ग़ल्ला की नज़र पेश की जाती है इल्यास ने क़ुर्बानगाह के पास जा कर बुलन्द आवाज़ से दुआ की, “ऐ रब, ऐ इब्राहीम, इस्हाक़ और इस्राईल के ख़ुदा, आज लोगों पर ज़ाहिर कर कि इस्राईल में तू ही ख़ुदा है और कि मैं तेरा ख़ादिम हूँ। साबित कर कि मैं ने यह सब कुछ तेरे हुक्म के मुताबिक़ किया है। {18:37} ऐ रब, मेरी दुआ सुन! मेरी सुन ताकि यह लोग जान लें कि तू, ऐ रब, ख़ुदा है और कि तू ही उन के दिलों को दुबारा अपनी तरफ़ माइल कर रहा है।” {18:38} अचानक आसमान से रब की आग नाज़िल हुई। आग ने न सिर्फ़ क़ुर्बानी और लकड़ी को भस्म कर दिया बल्कि क़ुर्बानगाह के पत्थरों और उस के नीचे की मिट्टी को भी। गढ़े में पानी भी एक दम सूख गया। {18:39} यह देख कर इस्राईली औंधे मुँह गिर कर पुकारने लगे, “रब ही ख़ुदा है! रब ही ख़ुदा है!” {18:40} फिर इल्यास ने उन्हें हुक्म दिया, “बाल के नबियों को पकड़ लें। एक भी बचने न पाए!” लोगों ने उन्हें पकड़ लिया तो इल्यास उन्हें नीचे वादी-ए-क़ैसोन में ले गया और वहाँ सब को मौत के घाट उतार दिया। {i18:41} बारिश होती है {18:41} फिर इल्यास ने अख़ियब से कहा, “अब जा कर कुछ खाएँ और पिएँ, क्यूँकि मूसलाधार बारिश का शोर सुनाई दे रहा है।” {18:42} चुनाँचे अख़ियब खाने-पीने के लिए चला गया जबकि इल्यास कर्मिल पहाड़ की चोटी पर चढ़ गया। वहाँ उस ने झुक कर अपने सर को दोनों घुटनों के बीच में छुपा लिया। {18:43} अपने नौकर को उस ने हुक्म दिया, “जाओ, समुन्दर की तरफ़ देखो।” नौकर गया और समुन्दर की तरफ़ देखा, फिर वापस आ कर इल्यास को इत्तिला दी, “कुछ भी नज़र नहीं आता।” लेकिन इल्यास ने उसे दुबारा देखने के लिए भेज दिया। इस दफ़ा भी कुछ मालूम न हो सका। सात बार इल्यास ने नौकर को देखने के लिए भेजा। {18:44} आख़िरकार जब नौकर सातवीं दफ़ा गया तो उस ने वापस आ कर इत्तिला दी, “एक छोटा सा बादल समुन्दर में से निकल कर ऊपर चढ़ रहा है। वह आदमी के हाथ के बराबर है।” तब इल्यास ने हुक्म दिया, “जाओ, अख़ियब को इत्तिला दो, ‘घोड़ों को फ़ौरन रथ में जोत कर घर चले जाएँ, वर्ना बारिश आप को रोक लेगी’।” {18:45} नौकर इत्तिला देने चला गया तो जल्द ही आँधी आई, आसमान पर काले काले बादल छा गए और मूसलाधार बारिश बरसने लगी। अख़ियब जल्दी से रथ पर सवार हो कर यज़्रएल के लिए रवाना हो गया। {18:46} उस वक़्त रब ने इल्यास को ख़ास ताक़त दी। सफ़र के लिए कमरबस्ता हो कर वह अख़ियब के रथ के आगे आगे दौड़ कर उस से पहले यज़्रएल पहुँच गया। {i19:1} इल्यास भाग जाता है {19:1} अख़ियब ने ईज़बिल को सब कुछ सुनाया जो इल्यास ने कहा था, यह भी कि उस ने बाल के नबियों को किस तरह तलवार से मार दिया था। {19:2} तब ईज़बिल ने क़ासिद को इल्यास के पास भेज कर उसे इत्तिला दी, “देवता मुझे सख़्त सज़ा दें अगर मैं कल इस वक़्त तक आप को उन नबियों की सी सज़ा न दूँ।” {19:3} इल्यास सख़्त डर गया और अपनी जान बचाने के लिए भाग गया। चलते चलते वह यहूदाह के शहर बैर-सबा तक पहुँच गया। वहाँ वह अपने नौकर को छोड़ कर {19:4} आगे रेगिस्तान में जा निकला। एक दिन के सफ़र के बाद वह सींक की झाड़ी के पास पहुँच गया और उस के साय में बैठ कर दुआ करने लगा, “ऐ रब, मुझे मरने दे। बस अब काफ़ी है। मेरी जान ले ले, क्यूँकि मैं अपने बापदादा से बेहतर नहीं हूँ।” {19:5} फिर वह झाड़ी के साय में लेट कर सो गया। अचानक एक फ़रिश्ते ने उसे छू कर कहा, “उठ, खाना खा ले!” {19:6} जब उस ने अपनी आँखें खोलीं तो देखा कि सिरहाने के क़रीब कोएलों पर बनाई गई रोटी और पानी की सुराही पड़ी है। उस ने रोटी खाई, पानी पिया और दुबारा सो गया। {19:7} लेकिन रब का फ़रिश्ता एक बार फिर आया और उसे हाथ लगा कर कहा, “उठ, खाना खा ले, वर्ना आगे का लम्बा सफ़र तेरे बस की बात नहीं होगी।” {19:8} तब इल्यास ने उठ कर दुबारा खाना खाया और पानी पिया। इस ख़ुराक ने उसे इतनी तक़वियत दी कि वह चालीस दिन और चालीस रात सफ़र करते करते अल्लाह के पहाड़ होरिब यानी सीना तक पहुँच गया। {19:9} वहाँ वह रात गुज़ारने के लिए एक ग़ार में चला गया। ग़ार में रब उस से हमकलाम हुआ। उस ने पूछा, “इल्यास, तू यहाँ क्या कर रहा है?” {i19:10} रब इल्यास की हौसलाअफ़्ज़ाई करता है {19:10} इल्यास ने जवाब दिया, “मैं ने रब, आसमानी लश्करों के ख़ुदा की ख़िदमत करने की सिरतोड़ कोशिश की है, क्यूँकि इस्राईलियों ने तेरे अह्द को तर्क कर दिया है। उन्हों ने तेरी क़ुर्बानगाहों को गिरा कर तेरे नबियों को तलवार से क़त्ल कर दिया है। मैं अकेला ही बचा हूँ, और वह मुझे भी मार डालने के दरपै हैं।” {19:11} जवाब में रब ने फ़रमाया, “ग़ार से निकल कर पहाड़ पर रब के सामने खड़ा हो जा!” फिर रब वहाँ से गुज़रा। उस के आगे आगे बड़ी और ज़बरदस्त आँधी आई जिस ने पहाड़ों को चीर कर चटानों को टुकड़े टुकड़े कर दिया। लेकिन रब आँधी में नहीं था। {19:12} इस के बाद ज़ल्ज़ला आया, लेकिन रब ज़ल्ज़ले में नहीं था। {19:13} ज़ल्ज़ले के बाद भड़कती हुई आग वहाँ से गुज़री, लेकिन रब आग में भी नहीं था। फिर नर्म हवा की धीमी धीमी आवाज़ सुनाई दी। यह आवाज़ सुन कर इल्यास ने अपने चिहरे को चादर से ढाँप लिया और निकल कर ग़ार के मुँह पर खड़ा हो गया। एक आवाज़ उस से मुख़ातिब हुई, “इल्यास, तू यहाँ क्या कर रहा है?” {19:14} इल्यास ने जवाब दिया, “मैं ने रब, आसमानी लश्करों के ख़ुदा की ख़िदमत करने की सिरतोड़ कोशिश की है, क्यूँकि इस्राईलियों ने तेरे अह्द को तर्क कर दिया है। उन्हों ने तेरी क़ुर्बानगाहों को गिरा कर तेरे नबियों को तलवार से क़त्ल कर दिया है। मैं अकेला ही बचा हूँ, और वह मुझे भी मार डालने के दरपै हैं।” {19:15} रब ने जवाब में कहा, “रेगिस्तान में उस रास्ते से हो कर वापस जा जिस ने तुझे यहाँ पहुँचाया है। फिर दमिश्क़ चला जा। वहाँ हज़ाएल को तेल से मसह करके शाम का बादशाह क़रार दे। {19:16} इसी तरह याहू बिन निम्सी को मसह करके इस्राईल का बादशाह क़रार दे और अबील-महूला के रहने वाले इलीशा बिन साफ़त को मसह करके अपना जानशीन मुक़र्रर कर। {19:17} जो हज़ाएल की तलवार से बच जाएगा उसे याहू मार देगा, और जो याहू की तलवार से बच जाएगा उसे इलीशा मार देगा। {19:18} लेकिन मैं ने अपने लिए इस्राईल में 7,000 अफ़राद को बचा लिया है, उन तमाम लोगों को जो अब तक न बाल देवता के सामने झुके, न उस के बुत को बोसा दिया है।” {i19:19} इल्यास इलीशा को अपना जानशीन मुक़र्रर करता है {19:19} इल्यास वहाँ से चला गया। इस्राईल में वापस आ कर उसे इलीशा बिन साफ़त मिला जो बैलों की बारह जोड़ियों की मदद से हल चला रहा था। ख़ुद वह बारहवीं जोड़ी के साथ चल रहा था। इल्यास ने उस के पास आ कर अपनी चादर उस के कंधों पर डाल दी और रुके बग़ैर आगे निकल गया। {19:20} इलीशा फ़ौरन अपने बैलों को छोड़ कर इल्यास के पीछे भागा। उस ने कहा, “पहले मुझे अपने माँ-बाप को बोसा दे कर ख़ैरबाद कहने दीजिए। फिर मैं आप के पीछे हो लूँगा।” इल्यास ने जवाब दिया, “चलें, वापस जाएँ। लेकिन वह कुछ याद रहे जो मैं ने आप के साथ किया है।” {19:21} तब इलीशा वापस चला गया। बैलों की एक जोड़ी को ले कर उस ने दोनों को ज़बह किया। हल चलाने का सामान उस ने गोश्त पकाने के लिए जला दिया। जब गोश्त तय्यार था तो उस ने उसे लोगों में तक़्सीम करके उन्हें खिला दिया। इस के बाद इलीशा इल्यास के पीछे हो कर उस की ख़िदमत करने लगा। {i20:1} शाम की फ़ौज सामरिया का मुहासरा करती है {20:1} एक दिन शाम के बादशाह बिन-हदद ने अपनी पूरी फ़ौज को जमा किया। 32 इत्तिहादी बादशाह भी अपने रथों और घोड़ों को ले कर आए। इस बड़ी फ़ौज के साथ बिन-हदद ने सामरिया का मुहासरा करके इस्राईल से जंग का एलान किया। {20:2} उस ने अपने क़ासिदों को शहर में भेज कर इस्राईल के बादशाह अख़ियब को इत्तिला दी, {20:3} “अब से आप का सोना, चाँदी, ख़वातीन और बेटे मेरे ही हैं।” {20:4} इस्राईल के बादशाह ने जवाब दिया, “मेरे आक़ा और बादशाह, आप की मर्ज़ी। मैं और जो कुछ मेरा है आप की मिलकियत है।” {20:5} थोड़ी देर के बाद क़ासिद बिन-हदद की नई ख़बर ले कर आए, “मैं ने आप से सोने, चाँदी, ख़वातीन और बेटों का तक़ाज़ा किया है। {20:6} अब ग़ौर करें! कल इस वक़्त मैं अपने मुलाज़िमों को आप के पास भेज दूँगा, और वह आप के महल और आप के अफ़्सरों के घरों की तलाशी लेंगे। जो कुछ भी आप को प्यारा है उसे वह ले जाएंगे।” {20:7} तब अख़ियब बादशाह ने मुल्क के तमाम बुज़ुर्गों को बुला कर उन से बात की, “देखें यह आदमी कितना बुरा इरादा रखता है। जब उस ने मेरी ख़वातीन, बेटों, सोने और चाँदी का तक़ाज़ा किया तो मैं ने इन्कार न किया।” {20:8} बुज़ुर्गों और बाक़ी लोगों ने मिल कर मश्वरा दिया, “उस की न सुनें, और जो कुछ वह माँगता है उस पर राज़ी न हो जाएँ।” {20:9} चुनाँचे बादशाह ने क़ासिदों से कहा, “मेरे आक़ा बादशाह को जवाब देना, जो कुछ आप ने पहली मर्तबा माँग लिया वह मैं आप को देने के लिए तय्यार हूँ, लेकिन यह आख़िरी तक़ाज़ा मैं पूरा नहीं कर सकता।” जब क़ासिदों ने बिन-हदद को यह ख़बर पहुँचाई {20:10} तो उस ने अख़ियब को फ़ौरन ख़बर भेज दी, “देवता मुझे सख़्त सज़ा दें अगर मैं सामरिया को नेस्त-ओ-नाबूद न कर दूँ। इतना भी नहीं रहेगा कि मेरा हर फ़ौजी मुट्ठी भर ख़ाक अपने साथ वापस ले जा सके!” {20:11} इस्राईल के बादशाह ने क़ासिदों को जवाब दिया, “उसे बता देना कि जो अभी जंग की तय्यारियाँ कर रहा है वह फ़त्ह के नारे न लगाए।” {20:12} जब बिन-हदद को यह इत्तिला मिली तो वह लश्करगाह में अपने इत्तिहादी बादशाहों के साथ मै पी रहा था। उस ने अपने अफ़्सरों को हुक्म दिया, “हम्ला करने के लिए तय्यारियाँ करो!” चुनाँचे वह शहर पर हम्ला करने की तय्यारियाँ करने लगे। {i20:13} शाम की फ़ौज से पहली जंग {20:13} इस दौरान एक नबी अख़ियब बादशाह के पास आया और कहा, “रब फ़रमाता है, ‘क्या तुझे दुश्मन की यह बड़ी फ़ौज नज़र आ रही है? तो भी मैं इसे आज ही तेरे हवाले कर दूँगा। तब तू जान लेगा कि मैं ही रब हूँ’।” {20:14} अख़ियब ने सवाल किया, “रब यह किस के वसीले से करेगा?” नबी ने जवाब दिया, “रब फ़रमाता है कि ज़िलओं पर मुक़र्रर अफ़्सरों के जवान यह फ़त्ह पाएँगे।” बादशाह ने मज़ीद पूछा, “लड़ाई में कौन पहला क़दम उठाए?” नबी ने कहा, “तू ही।” {20:15} चुनाँचे अख़ियब ने ज़िलओं पर मुक़र्रर अफ़्सरों के जवानों को बुलाया। 232 अफ़राद थे। फिर उस ने बाक़ी इस्राईलियों को जमा किया। 7,000 अफ़राद थे। {20:16} दोपहर को वह लड़ने के लिए निकले। ज़िलओं पर मुक़र्रर अफ़्सरों के जवान सब से आगे थे। बिन-हदद और 32 इत्तिहादी बादशाह लश्करगाह में बैठे नशे में धुत {20:17} मै पी रहे थे कि अचानक शहर का जाइज़ा लेने के लिए बिन-हदद के भेजे गए सिपाही अन्दर आए और कहने लगे, “सामरिया से आदमी निकल रहे हैं।” {20:18} बिन-हदद ने हुक्म दिया, “हर सूरत में उन्हें ज़िन्दा पकड़ें, ख़्वाह वह अम्नपसन्द इरादा रखते हों या न।” {20:19} लेकिन उन्हें यह करने का मौक़ा न मिला, क्यूँकि इस्राईल के ज़िलओं पर मुक़र्रर अफ़्सरों और बाक़ी फ़ौजियों ने शहर से निकल कर {20:20} फ़ौरन उन पर हम्ला कर दिया। और जिस भी दुश्मन का मुक़ाबला हुआ उसे मारा गया। तब शाम की पूरी फ़ौज भाग गई। इस्राईलियों ने उन का ताक़्क़ुब किया, लेकिन शाम का बादशाह बिन-हदद घोड़े पर सवार हो कर चन्द एक घुड़सवारों के साथ बच निकला। {20:21} उस वक़्त इस्राईल का बादशाह जंग के लिए निकला और घोड़ों और रथों को तबाह करके अरामियों को ज़बरदस्त शिकस्त दी। {i20:22} शाम की फ़ौज से दूसरी जंग {20:22} बाद में मज़कूरा नबी दुबारा इस्राईल के बादशाह के पास आया। वह बोला, “अब मज़बूत हो कर बड़े ध्यान से सोचें कि आने वाले दिनों में क्या क्या तय्यारियाँ करनी चाहिएँ, क्यूँकि अगले बहार के मौसम में शाम का बादशाह दुबारा आप पर हम्ला करेगा।” {20:23} शाम के बादशाह को भी मश्वरा दिया गया। उस के बड़े अफ़्सरों ने ख़याल पेश किया, “इस्राईलियों के देवता पहाड़ी देवता हैं, इस लिए वह हम पर ग़ालिब आ गए हैं। लेकिन अगर हम मैदानी इलाक़े में उन से लड़ें तो हर सूरत में जीतेंगे। {20:24} लेकिन हमारा एक और मश्वरा भी है। 32 बादशाहों को हटा कर उन की जगह अपने अफ़्सरों को मुक़र्रर करें। {20:25} फिर एक नई फ़ौज तय्यार करें जो तबाहशुदा पुरानी फ़ौज जैसी ताक़तवर हो। उस के उतने ही रथ और घोड़े हों जितने पहले थे। फिर जब हम मैदानी इलाक़े में उन से लड़ेंगे तो उन पर ज़रूर ग़ालिब आएँगे।” बादशाह उन की बात मान कर तय्यारियाँ करने लगा। {20:26} जब बहार का मौसम आया तो वह शाम के फ़ौजियों को जमा करके इस्राईल से लड़ने के लिए अफ़ीक़ शहर गया। {20:27} इस्राईली फ़ौज भी लड़ने के लिए जमा हुई। खाने-पीने की अश्या का बन्द-ओ-बस्त किया गया, और वह दुश्मन से लड़ने के लिए निकले। जब वहाँ पहुँचे तो उन्हों ने अपने ख़ैमों को दो जगहों पर लगाया। यह दो गुरोह शाम की वसी फ़ौज के मुक़ाबले में बकरियों के दो छोटे रेवड़ों जैसे लग रहे थे, क्यूँकि पूरा मैदान शाम के फ़ौजियों से भरा था। {20:28} फिर मर्द-ए-ख़ुदा ने अख़ियब के पास आ कर कहा, “रब फ़रमाता है, ‘शाम के लोग ख़याल करते हैं कि रब पहाड़ी देवता है इस लिए मैदानी इलाक़े में नाकाम रहेगा। चुनाँचे मैं उन की ज़बरदस्त फ़ौज को तेरे हवाले कर दूँगा। तब तू जान लेगा कि मैं ही रब हूँ’।” {20:29} सात दिन तक दोनों फ़ौजें एक दूसरे के मुक़ाबिल सफ़आरा रहीं। सातवें दिन लड़ाई का आग़ाज़ हुआ। इस्राईली इस मर्तबा भी शाम की फ़ौज पर ग़ालिब आए। उस दिन उन्हों ने उन के एक लाख पियादा फ़ौजियों को मार दिया। {20:30} बाक़ी फ़रार हो कर अफ़ीक़ शहर में घुस गए। तक़रीबन 27,000 आदमी थे। लेकिन अचानक शहर की फ़सील उन पर गिर गई, तो वह भी हलाक हो गए। बिन-हदद बादशाह भी अफ़ीक़ में फ़रार हुआ था। अब वह कभी इस कमरे में, कभी उस में खिसक कर छुपने की कोशिश कर रहा था। {i20:31} अख़ियब शाम के बादशाह पर रहम करता है {20:31} फिर उस के अफ़्सरों ने उसे मश्वरा दिया, “सुना है कि इस्राईल के बादशाह नर्मदिल होते हैं। क्यूँ न हम टाट ओढ़ कर और अपनी गरदनों में रस्से डाल कर इस्राईल के बादशाह के पास जाएँ? शायद वह आप को ज़िन्दा छोड़ दे।” {20:32} चुनाँचे बिन-हदद के अफ़्सर टाट ओढ़ कर और अपनी गरदनों में रस्से डाल कर इस्राईल के बादशाह के पास आए। उन्हों ने कहा, “आप का ख़ादिम बिन-हदद गुज़ारिश करता है कि मुझे ज़िन्दा छोड़ दें।” अख़ियब ने सवाल किया, “क्या वह अब तक ज़िन्दा है? वह तो मेरा भाई है!” {20:33} जब बिन-हदद के अफ़्सरों ने जान लिया कि अख़ियब का रुज्हान किस तरफ़ है तो उन्हों ने जल्दी से इस की तस्दीक़ की, “जी, बिन-हदद आप का भाई है!” अख़ियब ने हुक्म दिया, “जा कर उसे बुला लाएँ।” तब बिन-हदद निकल आया, और अख़ियब ने उसे अपने रथ पर सवार होने की दावत दी। {20:34} बिन-हदद ने अख़ियब से कहा, “मैं आप को वह तमाम शहर वापस कर देता हूँ जो मेरे बाप ने आप के बाप से छीन लिए थे। आप हमारे दार-उल-हकूमत दमिश्क़ में तिजारती मराकिज़ भी क़ाइम कर सकते हैं, जिस तरह मेरे बाप ने पहले सामरिया में किया था।” अख़ियब बोला, “ठीक है। इस के बदले में मैं आप को रिहा कर दूँगा।” उन्हों ने मुआहदा किया, फिर अख़ियब ने शाम के बादशाह को रिहा कर दिया। {i20:35} नबी अख़ियब को मलामत करता है {20:35} उस वक़्त रब ने नबियों में से एक को हिदायत की, “जा कर अपने साथी को कह दे कि वह तुझे मारे।” नबी ने ऐसा किया, लेकिन साथी ने इन्कार किया। {20:36} फिर नबी बोला, “चूँकि आप ने रब की नहीं सुनी, इस लिए जूँ ही आप मुझ से चले जाएंगे शेरबबर आप को फाड़ डालेगा।” और ऐसा ही हुआ। जब साथी वहाँ से निकला तो शेरबबर ने उस पर हम्ला करके उसे फाड़ डाला। {20:37} नबी की मुलाक़ात किसी और से हुई तो उस ने उस से भी कहा, “मेहरबानी करके मुझे मारें!” उस आदमी ने नबी को मार मार कर ज़ख़्मी कर दिया। {20:38} तब नबी ने अपनी आँखों पर पट्टी बांधी ताकि उसे पहचाना न जाए, फिर रास्ते के किनारे पर अख़ियब बादशाह के इन्तिज़ार में खड़ा हो गया। {20:39} जब बादशाह वहाँ से गुज़रा तो नबी चिल्ला कर उस से मुख़ातिब हुआ, “जनाब, मैं मैदान-ए-जंग में लड़ रहा था कि अचानक किसी आदमी ने मेरे पास आ कर अपने क़ैदी को मेरे हवाले कर दिया। उस ने कहा, ‘इस की निगरानी करना। अगर यह किसी भी वजह से भाग जाए तो आप को उस की जान के इवज़ अपनी जान देनी पड़ेगी या आप को एक मन चाँदी अदा करनी पड़ेगी।’ {20:40} लेकिन मैं इधर उधर मसरूफ़ रहा, और इतने में क़ैदी ग़ाइब हो गया।” अख़ियब बादशाह ने जवाब दिया, “आप ने ख़ुद अपने बारे में फ़ैसला दिया है। अब आप को इस का नतीजा भुगतना पड़ेगा।” {20:41} फिर नबी ने जल्दी से पट्टी को अपनी आँखों पर से उतार दिया, और बादशाह ने पहचान लिया कि यह नबियों में से एक है। {20:42} नबी ने कहा, “रब फ़रमाता है, ‘मैं ने मुक़र्रर किया था कि बिन-हदद को मेरे लिए मख़्सूस करके हलाक करना है, लेकिन तू ने उसे रिहा कर दिया है। अब उस की जगह तू ही मरेगा, और उस की क़ौम की जगह तेरी क़ौम को नुक़्सान पहुँचेगा’।” {20:43} इस्राईल का बादशाह बड़े ग़ुस्से और बदमिज़ाजी के आलम में सामरिया में अपने महल में चला गया। {i21:1} ईज़बिल के हाथों नबोत का क़त्ल {21:1} इस के बाद एक और क़ाबिल-ए-ज़िक्र बात हुई। यज़्रएल में सामरिया के बादशाह अख़ियब का एक महल था। महल की ज़मीन के साथ साथ अंगूर का बाग़ था। मालिक का नाम नबोत था। {21:2} एक दिन अख़ियब ने नबोत से बात की, “अंगूर का आप का बाग़ मेरे महल के क़रीब ही है। उसे मुझे दे दें, क्यूँकि मैं उस में सब्ज़ियाँ लगाना चाहता हूँ। मुआवज़े में मैं आप को उस से अच्छा अंगूर का बाग़ दे दूँगा। लेकिन अगर आप पैसे को तर्जीह दें तो आप को उस की पूरी रक़म अदा कर दूँगा।” {21:3} लेकिन नबोत ने जवाब दिया, “अल्लाह न करे कि मैं आप को वह मौरूसी ज़मीन दूँ जो मेरे बापदादा ने मेरे सपुर्द की है!” {21:4} अख़ियब बड़े ग़ुस्से में अपने घर वापस चला गया। वह बेज़ार था कि नबोत अपने बापदादा की मौरूसी ज़मीन बेचना नहीं चाहता। वह पलंग पर लेट गया और अपना मुँह दीवार की तरफ़ करके खाना खाने से इन्कार किया। {21:5} उस की बीवी ईज़बिल उस के पास आई और पूछने लगी, “क्या बात है? आप क्यूँ इतने बेज़ार हैं कि खाना भी नहीं खाना चाहते?” {21:6} अख़ियब ने जवाब दिया, “यज़्रएल का रहने वाला नबोत मुझे अंगूर का बाग़ नहीं देना चाहता। गो मैं उसे पैसे देना चाहता था बल्कि उसे इस की जगह कोई और बाग़ देने के लिए तय्यार था तो भी वह बज़िद रहा।” {21:7} ईज़बिल बोली, “क्या आप इस्राईल के बादशाह हैं कि नहीं? अब उठें! खाएँ, पिएँ और अपना दिल बहलाएँ। मैं ही आप को नबोत यज़्रएली का अंगूर का बाग़ दिला दूँगी।” {21:8} उस ने अख़ियब के नाम से ख़ुतूत लिख कर उन पर बादशाह की मुहर लगाई और उन्हें नबोत के शहर के बुज़ुर्गों और शुरफ़ा को भेज दिया। {21:9} ख़तों में ज़ैल की ख़बर लिखी थी, “शहर में एलान करें कि एक दिन का रोज़ा रखा जाए। जब लोग उस दिन जमा हो जाएंगे तो नबोत को लोगों के सामने इज़्ज़त की कुर्सी पर बिठा दें। {21:10} लेकिन उस के मुक़ाबिल दो बदमआशों को बिठा देना। इजतिमा के दौरान यह आदमी सब के सामने नबोत पर इल्ज़ाम लगाएँ, ‘इस शख़्स ने अल्लाह और बादशाह पर लानत भेजी है! हम इस के गवाह हैं।’ फिर उसे शहर से बाहर ले जा कर संगसार करें।” {21:11} यज़्रएल के बुज़ुर्गों और शुरफ़ा ने ऐसा ही किया। {21:12} उन्हों ने रोज़े के दिन का एलान किया। जब लोग मुक़र्ररा दिन जमा हुए तो नबोत को लोगों के सामने इज़्ज़त की कुर्सी पर बिठा दिया गया। {21:13} फिर दो बदमआश आए और उस के मुक़ाबिल बैठ गए। इजतिमा के दौरान यह आदमी सब के सामने नबोत पर इल्ज़ाम लगाने लगे, “इस शख़्स ने अल्लाह और बादशाह पर लानत भेजी है! हम इस के गवाह हैं।” तब नबोत को शहर से बाहर ले जा कर संगसार कर दिया गया। {21:14} फिर शहर के बुज़ुर्गों ने ईज़बिल को इत्तिला दी, “नबोत मर गया है, उसे संगसार किया गया है।” {21:15} यह ख़बर मिलते ही ईज़बिल ने अख़ियब से बात की, “जाएँ, नबोत यज़्रएली के उस बाग़ पर क़ब्ज़ा करें जो वह आप को बेचने से इन्कार कर रहा था। अब वह आदमी ज़िन्दा नहीं रहा बल्कि मर गया है।” {21:16} यह सुन कर अख़ियब फ़ौरन नबोत के अंगूर के बाग़ पर क़ब्ज़ा करने के लिए रवाना हुआ। {i21:17} इल्यास अख़ियब को सज़ा सुनाता है {21:17} तब रब इल्यास तिश्बी से हमकलाम हुआ, {21:18} “इस्राईल के बादशाह अख़ियब से जो सामरिया में रहता है मिलने जा। इस वक़्त वह नबोत के अंगूर के बाग़ में है, क्यूँकि वह उस पर क़ब्ज़ा करने के लिए वहाँ पहुँचा है। {21:19} उसे बता देना, ‘रब फ़रमाता है कि तू ने एक आदमी को बिलावजह क़त्ल करके उस की मिलकियत पर क़ब्ज़ा कर लिया है। रब फ़रमाता है कि जहाँ कुत्तों ने नबोत का ख़ून चाटा है वहाँ वह तेरा ख़ून भी चाटेंगे’।” {21:20} जब इल्यास अख़ियब के पास पहुँचा तो बादशाह बोला, “मेरे दुश्मन, क्या आप ने मुझे ढूँड निकाला है?” इल्यास ने जवाब दिया, “जी, मैं ने आप को ढूँड निकाला है, क्यूँकि आप ने अपने आप को बदी के हाथ में बेच कर ऐसा काम किया है जो रब को नापसन्द है। {21:21} अब सुनें रब का फ़रमान, ‘मैं तुझे यूँ मुसीबत में डाल दूँगा कि तेरा नाम-ओ-निशान तक नहीं रहेगा। मैं इस्राईल में से तेरे ख़ानदान के हर मर्द को मिटा दूँगा, ख़्वाह वह बालिग़ हो या बच्चा। {21:22} तू ने मुझे बड़ा तैश दिलाया और इस्राईल को गुनाह करने पर उकसाया है। इस लिए मेरा तेरे घराने के साथ वही सुलूक होगा जो मैं ने यरुबिआम बिन नबात और बाशा बिन अख़ियाह के साथ किया है।’ {21:23} ईज़बिल पर भी रब की सज़ा आएगी। रब फ़रमाता है, ‘कुत्ते यज़्रएल की फ़सील के पास ईज़बिल को खा जाएंगे। {21:24} अख़ियब के ख़ानदान में से जो शहर में मरेंगे उन्हें कुत्ते खा जाएंगे, और जो खुले मैदान में मरेंगे उन्हें परिन्दे चट कर जाएंगे’।” {21:25} और यह हक़ीक़त है कि अख़ियब जैसा ख़राब शख़्स कोई नहीं था। क्यूँकि ईज़बिल के उकसाने पर उस ने अपने आप को बदी के हाथ में बेच कर ऐसा काम किया जो रब को नापसन्द था। {21:26} सब से घिनौनी बात यह थी कि वह बुतों के पीछे लगा रहा, बिलकुल उन अमोरियों की तरह जिन्हें रब ने इस्राईल से निकाल दिया था। {21:27} जब अख़ियब ने इल्यास की यह बातें सुनीं तो उस ने अपने कपड़े फाड़ कर टाट ओढ़ लिया। रोज़ा रख कर वह ग़मगीन हालत में फिरता रहा। टाट उस ने सोते वक़्त भी न उतारा। {21:28} तब रब दुबारा इल्यास तिश्बी से हमकलाम हुआ, {21:29} “क्या तू ने ग़ौर किया है कि अख़ियब ने अपने आप को मेरे सामने कितना पस्त कर दिया है? चूँकि उस ने अपनी आजिज़ी का इज़हार किया है इस लिए मैं उस के जीते जी उस के ख़ानदान को मज़कूरा मुसीबत में नहीं डालूँगा बल्कि उस वक़्त जब उस का बेटा तख़्त पर बैठेगा।” {i22:1} झूटे नबियों और मीकायाह का मुक़ाबला {22:1} तीन साल तक शाम और इस्राईल के दरमियान सुलह रही। {22:2} तीसरे साल यहूदाह का बादशाह यहूसफ़त इस्राईल के बादशाह अख़ियब से मिलने गया। {22:3} उस वक़्त इस्राईल के बादशाह ने अपने अफ़्सरों से बात की, “देखें, रामात-जिलिआद हमारा ही शहर है। तो फिर हम क्यूँ कुछ नहीं कर रहे? हमें उसे शाम के बादशाह के क़ब्ज़े से छुड़वाना चाहिए।” {22:4} उस ने यहूसफ़त से सवाल किया, “क्या आप मेरे साथ रामात-जिलिआद जाएंगे ताकि उस पर क़ब्ज़ा करें?” यहूसफ़त ने जवाब दिया, “जी ज़रूर। हम तो भाई हैं। मेरी क़ौम को अपनी क़ौम और मेरे घोड़ों को अपने घोड़े समझें! {22:5} लेकिन मेहरबानी करके पहले रब की मर्ज़ी मालूम कर लें।” {22:6} इस्राईल के बादशाह ने तक़रीबन 400 नबियों को बुला कर उन से पूछा, “क्या मैं रामात-जिलिआद पर हम्ला करूँ या इस इरादे से बाज़ रहूँ?” नबियों ने जवाब दिया, “जी करें, क्यूँकि रब उसे बादशाह के हवाले कर देगा।” {22:7} लेकिन यहूसफ़त मुत्मइन न हुआ। उस ने पूछा, “क्या यहाँ रब का कोई नबी नहीं जिस से हम दरयाफ़्त कर सकें?” {22:8} इस्राईल का बादशाह बोला, “हाँ, एक तो है जिस के ज़रीए हम रब की मर्ज़ी मालूम कर सकते हैं। लेकिन मैं उस से नफ़रत करता हूँ, क्यूँकि वह मेरे बारे में कभी भी अच्छी पेशगोई नहीं करता। वह हमेशा बुरी पेशगोइयाँ सुनाता है। उस का नाम मीकायाह बिन इम्ला है।” यहूसफ़त ने एतिराज़ किया, “बादशाह ऐसी बात न कहे!” {22:9} तब इस्राईल के बादशाह ने किसी मुलाज़िम को बुला कर हुक्म दिया, “मीकायाह बिन इम्ला को फ़ौरन हमारे पास पहुँचा देना!” {22:10} अख़ियब और यहूसफ़त अपने शाही लिबास पहने हुए सामरिया के दरवाज़े के क़रीब अपने अपने तख़्त पर बैठे थे। यह ऐसी खुली जगह थी जहाँ अनाज गाहा जाता था। तमाम 400 नबी वहाँ उन के सामने अपनी पेशगोइयाँ पेश कर रहे थे। {22:11} एक नबी बनाम सिदक़ियाह बिन कनआना ने अपने लिए लोहे के सींग बना कर एलान किया, “रब फ़रमाता है कि इन सींगों से तू शाम के फ़ौजियों को मार मार कर हलाक कर देगा।” {22:12} दूसरे नबी भी इस क़िस्म की पेशगोइयाँ कर रहे थे, “रामात-जिलिआद पर हम्ला करें, क्यूँकि आप ज़रूर कामयाब हो जाएंगे। रब शहर को आप के हवाले कर देगा।” {22:13} जिस मुलाज़िम को मीकायाह को बुलाने के लिए भेजा गया था उस ने रास्ते में उसे समझाया, “देखें, बाक़ी तमाम नबी मिल कर कह रहे हैं कि बादशाह को कामयाबी हासिल होगी। आप भी ऐसी ही बातें करें, आप भी फ़त्ह की पेशगोई करें!” {22:14} लेकिन मीकायाह ने एतिराज़ किया, “रब की हयात की क़सम, मैं बादशाह को सिर्फ़ वही कुछ बताऊँगा जो रब मुझे फ़रमाएगा।” {22:15} जब मीकायाह अख़ियब के सामने खड़ा हुआ तो बादशाह ने पूछा, “मीकायाह, क्या हम रामात-जिलिआद पर हम्ला करें या मैं इस इरादे से बाज़ रहूँ?” मीकायाह ने जवाब दिया, “उस पर हम्ला करें, क्यूँकि रब शहर को आप के हवाले करके आप को कामयाबी बख़्शेगा।” {22:16} बादशाह नाराज़ हुआ, “मुझे कितनी दफ़ा आप को समझाना पड़ेगा कि आप क़सम खा कर मुझे रब के नाम में सिर्फ़ वह कुछ सुनाएँ जो हक़ीक़त है।” {22:17} तब मीकायाह ने जवाब में कहा, “मुझे तमाम इस्राईल गल्लाबान से महरूम भेड़-बकरियों की तरह पहाड़ों पर बिखरा हुआ नज़र आया। फिर रब मुझ से हमकलाम हुआ, ‘इन का कोई मालिक नहीं है। हर एक सलामती से अपने घर वापस चला जाए’।” {22:18} इस्राईल के बादशाह ने यहूसफ़त से कहा, “लो, क्या मैं ने आप को नहीं बताया था कि यह शख़्स हमेशा मेरे बारे में बुरी पेशगोइयाँ करता है?” {22:19} लेकिन मीकायाह ने अपनी बात जारी रखी, “रब का फ़रमान सुनें! मैं ने रब को उस के तख़्त पर बैठे देखा। आसमान की पूरी फ़ौज उस के दाएँ और बाएँ हाथ खड़ी थी। {22:20} रब ने पूछा, ‘कौन अख़ियब को रामात-जिलिआद पर हम्ला करने पर उकसाएगा ताकि वह वहाँ जा कर मर जाए?’ एक ने यह मश्वरा दिया, दूसरे ने वह। {22:21} आख़िरकार एक रूह रब के सामने खड़ी हुई और कहने लगी, ‘मैं उसे उकसाऊँगी।’ {22:22} रब ने सवाल किया, ‘किस तरह?’ रूह ने जवाब दिया, ‘मैं निकल कर उस के तमाम नबियों पर यूँ क़ाबू पाऊँगी कि वह झूट ही बोलेंगे।’ रब ने फ़रमाया, ‘तू कामयाब होगी। जा और यूँ ही कर!’ {22:23} ऐ बादशाह, रब ने आप पर आफ़त लाने का फ़ैसला कर लिया है, इस लिए उस ने झूटी रूह को आप के इन तमाम नबियों के मुँह में डाल दिया है।” {22:24} तब सिदक़ियाह बिन कनआना ने आगे बढ़ कर मीकायाह के मुँह पर थप्पड़ मारा और बोला, “रब का रूह किस तरह मुझ से निकल गया ताकि तुझ से बात करे?” {22:25} मीकायाह ने जवाब दिया, “जिस दिन आप कभी इस कमरे में, कभी उस में खिसक कर छुपने की कोशिश करेंगे उस दिन आप को पता चलेगा।” {22:26} तब अख़ियब बादशाह ने हुक्म दिया, “मीकायाह को शहर पर मुक़र्रर अफ़्सर अमून और मेरे बेटे यूआस के पास वापस भेज दो! {22:27} उन्हें बता देना, ‘इस आदमी को जेल में डाल कर मेरे सहीह-सलामत वापस आने तक कम से कम रोटी और पानी दिया करें’।” {22:28} मीकायाह बोला, “अगर आप सहीह-सलामत वापस आएँ तो मतलब होगा कि रब ने मेरी मारिफ़त बात नहीं की।” फिर वह साथ खड़े लोगों से मुख़ातिब हुआ, “तमाम लोग ध्यान दें!” {i22:29} अख़ियब रामात के क़रीब मर जाता है {22:29} इस के बाद इस्राईल का बादशाह अख़ियब और यहूदाह का बादशाह यहूसफ़त मिल कर रामात-जिलिआद पर हम्ला करने के लिए रवाना हुए। {22:30} जंग से पहले अख़ियब ने यहूसफ़त से कहा, “मैं अपना भेस बदल कर मैदान-ए-जंग में जाऊँगा। लेकिन आप अपना शाही लिबास न उतारें।” चुनाँचे इस्राईल का बादशाह अपना भेस बदल कर मैदान-ए-जंग में आया। {22:31} शाम के बादशाह ने रथों पर मुक़र्रर अपने 32 अफ़्सरों को हुक्म दिया था, “सिर्फ़ और सिर्फ़ बादशाह पर हम्ला करें। किसी और से मत लड़ना, ख़्वाह वह छोटा हो या बड़ा।” {22:32} जब लड़ाई छिड़ गई तो रथों के अफ़्सर यहूसफ़त पर टूट पड़े, क्यूँकि उन्हों ने कहा, “यक़ीनन यही इस्राईल का बादशाह है!” लेकिन जब यहूसफ़त मदद के लिए चिल्ला उठा {22:33} तो दुश्मनों को मालूम हुआ कि यह अख़ियब बादशाह नहीं है, और वह उस का ताक़्क़ुब करने से बाज़ आए। {22:34} लेकिन किसी ने ख़ास निशाना बांधे बग़ैर अपना तीर चलाया तो वह अख़ियब को ऐसी जगह जा लगा जहाँ ज़िराबक्तर का जोड़ था। बादशाह ने अपने रथबान को हुक्म दिया, “रथ को मोड़ कर मुझे मैदान-ए-जंग से बाहर ले जाओ! मुझे चोट लग गई है।” {22:35} लेकिन चूँकि उस पूरे दिन शदीद क़िस्म की लड़ाई जारी रही, इस लिए बादशाह अपने रथ में टेक लगा कर दुश्मन के मुक़ाबिल खड़ा रहा। ख़ून ज़ख़्म से रथ के फ़र्श पर टपकता रहा, और शाम के वक़्त अख़ियब मर गया। {22:36} जब सूरज ग़ुरूब होने लगा तो इस्राईली फ़ौज में बुलन्द आवाज़ से एलान किया गया, “हर एक अपने शहर और अपने इलाक़े में वापस चला जाए!” {22:37} बादशाह की मौत के बाद उस की लाश को सामरिया ला कर दफ़नाया गया। {22:38} शाही रथ को सामरिया के एक तालाब के पास लाया गया जहाँ कस्बियों की नहाने की जगह थी। वहाँ उसे धोया गया। कुत्ते भी आ कर ख़ून को चाटने लगे। यूँ रब का फ़रमान पूरा हुआ। {22:39} बाक़ी जो कुछ अख़ियब की हुकूमत के दौरान हुआ वह ‘शाहान-ए-इस्राईल की तारीख़’ की किताब में दर्ज है। उस में बादशाह का तामीरकरदा हाथीदाँत का महल और वह शहर बयान किए गए हैं जिन की क़िलाबन्दी उस ने की। {22:40} जब वह मर कर अपने बापदादा से जा मिला तो उस का बेटा अख़ज़ियाह तख़्तनशीन हुआ। {i22:41} यहूदाह का बादशाह यहूसफ़त {22:41} आसा का बेटा यहूसफ़त इस्राईल के बादशाह अख़ियब की हुकूमत के चौथे साल में यहूदाह का बादशाह बना। {22:42} उस वक़्त उस की उम्र 35 साल थी। उस का दार-उल-हकूमत यरूशलम रहा, और उस की हुकूमत का दौरानिया 25 साल था। माँ का नाम अज़ूबा बिन्त सिल्ही था। {22:43} वह हर काम में अपने बाप आसा के नमूने पर चलता और वह कुछ करता रहा जो रब को पसन्द था। लेकिन उस ने भी ऊँचे मक़ामों के मन्दिरों को ख़त्म न किया। ऐसी जगहों पर जानवरों को क़ुर्बान करने और बख़ूर जलाने का इन्तिज़ाम जारी रहा। {22:44} यहूसफ़त और इस्राईल के बादशाह के दरमियान सुलह क़ाइम रही। {22:45} बाक़ी जो कुछ यहूसफ़त की हुकूमत के दौरान हुआ वह ‘शाहान-ए-यहूदाह की तारीख़’ की किताब में दर्ज है। उस की कामयाबियाँ और जंगें सब उस में बयान की गई हैं। {22:46} जो जिस्मफ़रोश मर्द और औरतें आसा के ज़माने में बच गए थे उन्हें यहूसफ़त ने मुल्क में से मिटा दिया। {22:47} उस वक़्त मुल्क-ए-अदोम का बादशाह न था बल्कि यहूदाह का एक अफ़्सर उस पर हुक्मरानी करता था। {22:48} यहूसफ़त ने बहरी जहाज़ों का बेड़ा बनवाया ताकि वह तिजारत करके ओफ़ीर से सोना लाएँ। लेकिन वह कभी इस्तेमाल न हुए बल्कि अपनी ही बन्दरगाह अस्यून-जाबर में तबाह हो गए। {22:49} तबाह होने से पहले इस्राईल के बादशाह अख़ज़ियाह बिन अख़ियब ने यहूसफ़त से दरख़्वास्त की थी कि इस्राईल के कुछ लोग जहाज़ों पर साथ चलें। लेकिन यहूसफ़त ने इन्कार किया था। {22:50} जब यहूसफ़त मर कर अपने बापदादा से जा मिला तो उसे यरूशलम के हिस्से में जो ‘दाऊद का शहर’ कहलाता है ख़ानदानी क़ब्र में दफ़नाया गया। फिर उस का बेटा यहूराम तख़्तनशीन हुआ। {i22:51} इस्राईल का बादशाह अख़ज़ियाह {22:51} अख़ियब का बेटा अख़ज़ियाह यहूदाह के बादशाह यहूसफ़त की हुकूमत के 17वें साल में इस्राईल का बादशाह बना। वह दो साल तक इस्राईल पर हुक्मरान रहा। सामरिया उस का दार-उल-हकूमत था। {22:52} जो कुछ उस ने किया वह रब को नापसन्द था, क्यूँकि वह अपने माँ-बाप और यरुबिआम बिन नबात के नमूने पर चलता रहा, उसी यरुबिआम के नमूने पर जिस ने इस्राईल को गुनाह करने पर उकसाया था। {22:53} अपने बाप की तरह बाल देवता की ख़िदमत और पूजा करने से उस ने रब, इस्राईल के ख़ुदा को तैश दिलाया।