{i1:1} तू मेरा बादशाह है {1:1} सुलेमान की ग़ज़ल-उल-ग़ज़लात। {1:2} वह मुझे अपने मुँह से बोसे दे, क्यूँकि तेरी मुहब्बत मै से कहीं ज़्यादा राहतबख़्श है। {1:3} तेरी इत्र की ख़ुश्बू कितनी मनमोहन है, तेरा नाम छिड़का गया महकदार तेल ही है। इस लिए कुंवारियाँ तुझे प्यार करती हैं। {1:4} आ, मुझे खैंच कर अपने साथ ले जा! आ, हम दौड़ कर चले जाएँ! बादशाह मुझे अपने कमरों में ले जाए, और हम बाग़ बाग़ हो कर तेरी ख़ुशी मनाएँ। हम मै की निस्बत तेरे प्यार की ज़्यादा तारीफ़ करें। मुनासिब है कि लोग तुझ से मुहब्बत करें। {i1:5} मुझे हक़ीर न जानो {1:5} ऐ यरूशलम की बेटियो, मैं सियाहफ़ाम लेकिन मनमोहन हूँ, मैं क़ीदार के ख़ैमों जैसी, सुलेमान के ख़ैमों के पर्दों जैसी ख़ूबसूरत हूँ। {1:6} इस लिए मुझे हक़ीर न जानो कि मैं सियाहफ़ाम हूँ, कि मेरी जिल्द धूप से झुलस गई है। मेरे सगे भाई मुझ से नाराज़ थे, इस लिए उन्हों ने मुझे अंगूर के बाग़ों की देख-भाल करने की ज़िम्मादारी दी, अंगूर के अपने ज़ाती बाग़ की देख-भाल मैं कर न सकी। {i1:7} तू कहाँ है? {1:7} ऐ तू जो मेरी जान का प्यारा है, मुझे बता कि भेड़-बकरियाँ कहाँ चरा रहा है? तू उन्हें दोपहर के वक़्त कहाँ आराम करने बिठाता है? मैं क्यूँ निक़ाबपोश की तरह तेरे साथियों के रेवड़ों के पास ठहरी रहूँ? {1:8} क्या तू नहीं जानती, तू जो औरतों में सब से ख़ूबसूरत है? फिर घर से निकल कर खोज लगा कि मेरी भेड़-बकरियाँ किस तरफ़ चली गई हैं, अपने मेमनों को गल्लाबानों के ख़ैमों के पास चरा। {i1:9} तू कितनी ख़ूबसूरत है {1:9} मेरी मह्बूबा, मैं तुझे किस चीज़ से तश्बीह दूँ? तू फ़िरऔन का शानदार रथ खैंचने वाली घोड़ी है! {1:10} तेरे गाल बालियों से कितने आरास्ता, तेरी गर्दन मोती के गुलूबन्द से कितनी दिलफ़रेब लगती है। {1:11} हम तेरे लिए सोने का ऐसा हार बनवा लेंगे जिस में चाँदी के मोती लगे होंगे। {1:12} जितनी देर बादशाह ज़ियाफ़त में शरीक था मेरे बालछड़ की ख़ुश्बू चारों तरफ़ फैलती रही। {1:13} मेरा मह्बूब गोया मुर की डिबिया है, जो मेरी छातियों के दरमियान पड़ी रहती है। {1:14} मेरा मह्बूब मेरे लिए मेहंदी के फूलों का गुच्छा है, जो ऐन-जदी के अंगूर के बाग़ों से लाया गया है। {1:15} मेरी मह्बूबा, तू कितनी ख़ूबसूरत है, कितनी हसीन! तेरी आँखें कबूतर ही हैं। {1:16} मेरे मह्बूब, तू कितना ख़ूबसूरत है, कितना दिलरुबा! सायादार हरियाली हमारा बिस्तर {1:17} और देवदार के दरख़्त हमारे घर के शहतीर हैं। जूनीपर के दरख़्त तख़्तों का काम देते हैं। {i2:1} तू लासानी है {2:1} मैं मैदान-ए-शारून का फूल और वादियों की सोसन हूँ। {2:2} लड़कियों के दरमियान मेरी मह्बूबा काँटेदार पौदों में सोसन की मानिन्द है। {2:3} जवान आदमियों में मेरा मह्बूब जंगल में सेब के दरख़्त की मानिन्द है। मैं उस के साय में बैठने की कितनी आरज़ूमन्द हूँ, उस का फल मुझे कितना मीठा लगता है। {i2:4} मैं इश्क़ के मारे बीमार हो गई हूँ {2:4} वह मुझे मैकदे में लाया है, मेरे ऊपर उस का झंडा मुहब्बत है। {2:5} किशमिश की टिक्कियों से मुझे तर-ओ-ताज़ा करो, सेबों से मुझे तक़वियत दो, क्यूँकि मैं इश्क़ के मारे बीमार हो गई हूँ। {2:6} उस का बायाँ बाज़ू मेरे सर के नीचे होता और दहना बाज़ू मुझे गले लगाता है। {2:7} ऐ यरूशलम की बेटियो, ग़ज़ालों और खुले मैदान की हिरनियों की क़सम खाओ कि जब तक मुहब्बत ख़ुद न चाहे तुम उसे न जगाओगी, न बेदार करोगी। {i2:8} बहार आ गई है {2:8} सुनो, मेरा मह्बूब आ रहा है। वह देखो, वह पहाड़ों पर फलाँगता और टीलों पर से उछलता कूदता आ रहा है। {2:9} मेरा मह्बूब ग़ज़ाल या जवान हिरन की मानिन्द है। अब वह हमारे घर की दीवार के सामने रुक कर खिड़कियों में से झाँक रहा, जंगले में से तक रहा है। {2:10} वह मुझ से कहता है, “ऐ मेरी ख़ूबसूरत मह्बूबा, उठ कर मेरे साथ चल! {2:11} देख, सर्दियों का मौसम गुज़र गया है, बारिशें भी ख़त्म हो गई हैं। {2:12} ज़मीन से फूल फूट निकले हैं और गीत का वक़्त आ गया है, कबूतरों की ग़ूँ ग़ूँ हमारे मुल्क में सुनाई देती है। {2:13} अन्जीर के दरख़्तों पर पहली फ़सल का फल पक रहा है, और अंगूर की बेलों के फूल ख़ुश्बू फैला रहे हैं। चुनाँचे आ मेरी हसीन मह्बूबा, उठ कर आ जा! {2:14} ऐ मेरी कबूतरी, चटान की दराड़ों में छुपी न रह, पहाड़ी पत्थरों में पोशीदा न रह बल्कि मुझे अपनी शक्ल दिखा, मुझे अपनी आवाज़ सुनने दे, क्यूँकि तेरी आवाज़ शीरीं, तेरी शक्ल ख़ूबसूरत है।” {2:15} हमारे लिए लोमड़ियों को पकड़ लो, उन छोटी लोमड़ियों को जो अंगूर के बाग़ों को तबाह करती हैं। क्यूँकि हमारी बेलों से फूल फूट निकले हैं। {2:16} मेरा मह्बूब मेरा ही है, और मैं उसी की हूँ, उसी की जो सोसनों में चरता है। {2:17} ऐ मेरे मह्बूब, इस से पहले कि शाम की हवा चले और साय लम्बे हो कर फ़रार हो जाएँ ग़ज़ाल या जवान हिरन की तरह संगलाख़ पहाड़ों का रुख़ कर! {i3:1} रात को मह्बूब की आर्ज़ू {3:1} रात को जब मैं बिस्तर पर लेटी थी तो मैं ने उसे ढूँडा जो मेरी जान का प्यारा है, मैं ने उसे ढूँडा लेकिन न पाया। {3:2} मैं बोली, “अब मैं उठ कर शहर में घूमती, उस की गलियों और चौकों में फिर कर उसे तलाश करती हूँ जो मेरी जान का प्यारा है।” मैं ढूँडती रही लेकिन वह न मिला। {3:3} जो चौकीदार शहर में गश्त करते हैं उन्हों ने मुझे देखा। मैं ने पूछा, “क्या आप ने उसे देखा है जो मेरी जान का प्यारा है?” {3:4} आगे निकलते ही मुझे वह मिल गया जो मेरी जान का प्यारा है। मैं ने उसे पकड़ लिया। अब मैं उसे नहीं छोड़ूँगी जब तक उसे अपनी माँ के घर में न ले जाऊँ, उस के कमरे में न पहुँचाऊँ जिस ने मुझे जन्म दिया था। {3:5} ऐ यरूशलम की बेटियो, ग़ज़ालों और खुले मैदान की हिरनियों की क़सम खाओ कि जब तक मुहब्बत ख़ुद न चाहे तुम उसे न जगाओगी, न बेदार करोगी। {i3:6} दूल्हा अपने लोगों के साथ आता है {3:6} यह कौन है जो धुएँ के सतून की तरह सीधा हमारे पास चला आ रहा है? उस से चारों तरफ़ मुर, बख़ूर और ताजिर की तमाम खूशबूएँ फैल रही हैं। {3:7} यह तो सुलेमान की पालकी है जो इस्राईल के 60 पहलवानों से घिरी हुई है। {3:8} सब तलवार से लेस और तजरिबाकार फ़ौजी हैं। हर एक ने अपनी तलवार को रात के हौलनाक खतरों का सामना करने के लिए तय्यार कर रखा है। {3:9} सुलेमान बादशाह ने ख़ुद यह पालकी लुबनान के देवदार की लकड़ी से बनवाई। {3:10} उस ने उस के पाए चाँदी से, पुश्त सोने से, और निशस्त अर्ग़वानी रंग के कपड़े से बनवाई। यरूशलम की बेटियों ने बड़े प्यार से उस का अन्दरूनी हिस्सा मुरस्साकारी से आरास्ता किया है। {3:11} ऐ सिय्यून की बेटियो, निकल आओ और सुलेमान बादशाह को देखो। उस के सर पर वह ताज है जो उस की माँ ने उस की शादी के दिन उस के सर पर पहनाया, उस दिन जब उस का दिल बाग़ बाग़ हुआ। {i4:1} तू कितनी हसीन है! {4:1} मेरी मह्बूबा, तू कितनी ख़ूबसूरत, कितनी हसीन है! निक़ाब के पीछे तेरी आँखों की झलक कबूतरों की मानिन्द है। तेरे बाल उन बकरियों की मानिन्द हैं जो उछलती कूदती कोह-ए-जिलिआद से उतरती हैं। {4:2} तेरे दाँत अभी अभी कतरी और नहलाई हुई भेड़ों जैसे सफ़ेद हैं। हर दाँत का जुड़वाँ है, एक भी गुम नहीं हुआ। {4:3} तेरे होंट क़िर्मिज़ी रंग का डोरा हैं, तेरा मुँह कितना प्यारा है। निक़ाब के पीछे तेरे गालों की झलक अनार के टुकड़ों की मानिन्द दिखाई देती है। {4:4} तेरी गर्दन दाऊद के बुर्ज जैसी दिलरुबा है। जिस तरह इस गोल और मज़बूत बुर्ज से पहलवानों की हज़ार ढालें लटकी हैं उस तरह तेरी गर्दन भी ज़ेवरात से आरास्ता है। {4:5} तेरी छातियाँ सोसनों में चरने वाले ग़ज़ाल के जुड़वाँ बच्चों की मानिन्द हैं। {4:6} इस से पहले कि शाम की हवा चले और साय लम्बे हो कर फ़रार हो जाएँ मैं मुर के पहाड़ और बख़ूर की पहाड़ी के पास चलूँगा। {4:7} मेरी मह्बूबा, तेरा हुस्न कामिल है, तुझ में कोई नुक़्स नहीं है। {i4:8} दुल्हन का जादू {4:8} आ मेरी दुल्हन, लुबनान से मेरे साथ आ! हम कोह-ए-अमाना की चोटी से, सनीर और हर्मून की चोटियों से उतरें, शेरों की मान्दों और चीतों के पहाड़ों से उतरें। {4:9} मेरी बहन, मेरी दुल्हन, तू ने मेरा दिल चुरा लिया है, अपनी आँखों की एक ही नज़र से, अपने गुलूबन्द के एक ही जौहर से तू ने मेरा दिल चुरा लिया है। {4:10} मेरी बहन, मेरी दुल्हन, तेरी मुहब्बत कितनी मनमोहन है! तेरा प्यार मै से कहीं ज़्यादा पसन्दीदा है। बल्सान की कोई भी ख़ुश्बू तेरी महक का मुक़ाबला नहीं कर सकती। {4:11} मेरी दुल्हन, जिस तरह शहद छत्ते से टपकता है उसी तरह तेरे होंटों से मिठास टपकती है। दूध और शहद तेरी ज़बान तले रहते हैं। तेरे कपड़ों की ख़ुश्बू सूँघ कर लुबनान की ख़ुश्बू याद आती है। {i4:12} दुल्हन नफ़ीस बाग़ है {4:12} मेरी बहन, मेरी दुल्हन, तू एक बाग़ है जिस की चारदीवारी किसी और को अन्दर आने नहीं देती, एक बन्द किया गया चश्मा जिस पर मुहर लगी है। {4:13} बाग़ में अनार के दरख़्त लगे हैं जिन पर लज़ीज़ फल पक रहा है। मेहंदी के पौदे भी उग रहे हैं। {4:14} बालछड़, ज़ाफ़रान, ख़ुश्बूदार बेद, दारचीनी, बख़ूर की हर क़िस्म का दरख़्त, मुर, ऊद और हर क़िस्म का बल्सान बाग़ में फलता फूलता है। {4:15} तू बाग़ का उबलता चश्मा है, एक ऐसा मम्बा जिस का ताज़ा पानी लुबनान से बह कर आता है। {4:16} ऐ शिमाली हवा, जाग उठ! ऐ जुनूबी हवा, आ! मेरे बाग़ में से गुज़र जा ताकि वहाँ से चारों तरफ़ बल्सान की ख़ुश्बू फैल जाए। मेरा मह्बूब अपने बाग़ में आ कर उस के लज़ीज़ फलों से खाए। {5:1} मेरी बहन, मेरी दुल्हन, अब मैं अपने बाग़ में दाख़िल हो गया हूँ। मैं ने अपना मुर अपने बल्सान समेत चुन लिया, अपना छत्ता शहद समेत खा लिया, अपनी मै अपने दूध समेत पी ली है। खाओ, मेरे दोस्तो, खाओ और पियो, मुहब्बत से सरशार हो जाओ! {i5:2} रात को मह्बूब की तलाश {5:2} मैं सो रही थी, लेकिन मेरा दिल बेदार रहा। सुन! मेरा मह्बूब दस्तक दे रहा है, “ऐ मेरी बहन, मेरी साथी, मेरे लिए दरवाज़ा खोल दे! ऐ मेरी कबूतरी, मेरी कामिल साथी, मेरा सर ओस से तर हो गया है, मेरी ज़ुल्फ़ें रात की शबनम से भीग गई हैं।” {5:3} “मैं अपना लिबास उतार चुकी हूँ, अब मैं किस तरह उसे दुबारा पहन लूँ? मैं अपने पाँओ धो चुकी हूँ, अब मैं उन्हें किस तरह दुबारा मैला करूँ?” {5:4} मेरे मह्बूब ने अपना हाथ दीवार के सूराख़ में से अन्दर डाल दिया। तब मेरा दिल तड़प उठा। {5:5} मैं उठी ताकि अपने मह्बूब के लिए दरवाज़ा खोलूँ। मेरे हाथ मुर से, मेरी उंगलियाँ मुर की ख़ुश्बू से टपक रही थीं जब मैं कुंडी खोलने आई। {5:6} मैं ने अपने मह्बूब के लिए दरवाज़ा खोल दिया, लेकिन वह मुड़ कर चला गया था। मुझे सख़्त सदमा हुआ। मैं ने उसे तलाश किया लेकिन न मिला। मैं ने उसे आवाज़ दी, लेकिन जवाब न मिला। {5:7} जो चौकीदार शहर में गश्त करते हैं उन से मेरा वास्ता पड़ा, उन्हों ने मेरी पिटाई करके मुझे ज़ख़्मी कर दिया। फ़सील के चौकीदारों ने मेरी चादर भी छीन ली। {5:8} ऐ यरूशलम की बेटियो, क़सम खाओ कि अगर मेरा मह्बूब मिला तो उसे इत्तिला दोगी, मैं मुहब्बत के मारे बीमार हो गई हूँ। {5:9} तू जो औरतों में सब से हसीन है, हमें बता, तेरे मह्बूब की क्या ख़ासियत है जो दूसरों में नहीं है? तेरा मह्बूब दूसरों से किस तरह सब्क़त रखता है कि तू हमें ऐसी क़सम खिलाना चाहती है? {5:10} मेरे मह्बूब की जिल्द गुलाबी और सफ़ेद है। हज़ारों के साथ उस का मुक़ाबला करो तो उस का आला किरदार नुमायाँ तौर पर नज़र आएगा। {5:11} उस का सर ख़ालिस सोने का है, उस के बाल खजूर के फूलदार गुच्छों की मानिन्द और कव्वे की तरह सियाह हैं। {5:12} उस की आँखें नदियों के किनारे के कबूतरों की मानिन्द हैं, जो दूध में नहलाए और कस्रत के पानी के पास बैठे हैं। {5:13} उस के गाल बल्सान की क्यारी की मानिन्द, उस के होंट मुर से टपकते सोसन के फूलों जैसे हैं। {5:14} उस के बाज़ू सोने की सलाखें हैं जिन में पुखराज जड़े हुए हैं, उस का जिस्म हाथीदाँत का शाहकार है जिस में संग-ए-लाजवर्द के पत्थर लगे हैं। {5:15} उस की रानें मरमर के सतून हैं जो ख़ालिस सोने के पाइयों पर लगे हैं। उस का हुल्या लुबनान और देवदार के दरख़्तों जैसा उम्दा है। {5:16} उस का मुँह मिठास ही है, ग़रज़ वह हर लिहाज़ से पसन्दीदा है। ए यरूशलम की बेटियो, यह है मेरा मह्बूब, मेरा दोस्त। {6:1} ऐ तू जो औरतों में सब से ख़ूबसूरत है, तेरा मह्बूब किधर चला गया है? उस ने कौन सी सिम्त इख़तियार की ताकि हम तेरे साथ उस का खोज लगाएँ? {6:2} मेरा मह्बूब यहाँ से उतर कर अपने बाग़ में चला गया है, वह बल्सान की क्यारियों के पास गया है ताकि बाग़ों में चरे और सोसन के फूल चुने। {6:3} मैं अपने मह्बूब की ही हूँ, और वह मेरा ही है, वह जो सोसनों में चरता है। {i6:4} तू कितनी ख़ूबसूरत है {6:4} मेरी मह्बूबा, तू तिर्ज़ा शहर जैसी हसीन, यरूशलम जैसी ख़ूबसूरत और अलमबरदार दस्तों जैसी रोबदार है। {6:5} अपनी नज़रों को मुझ से हटा ले, क्यूँकि वह मुझ में उलझन पैदा कर रही हैं। तेरे बाल उन बकरियों की मानिन्द हैं जो उछलती कूदती कोह-ए-जिलिआद से उतरती हैं। {6:6} तेरे दाँत अभी अभी नहलाई हुई भेड़ों जैसे सफ़ेद हैं। हर दाँत का जुड़वाँ है, एक भी गुम नहीं हुआ। {6:7} निक़ाब के पीछे तेरे गालों की झलक अनार के टुकड़ों की मानिन्द दिखाई देती है। {6:8} गो बादशाह की 60 बीवियाँ, 80 दाश्ताएँ और बेशुमार कुंवारियाँ हों {6:9} लेकिन मेरी कबूतरी, मेरी कामिल साथी लासानी है। वह अपनी माँ की वाहिद बेटी है, जिस ने उसे जन्म दिया उस की पाक लाडली है। बेटियों ने उसे देख कर उसे मुबारक कहा, रानियों और दाश्ताओं ने उस की तारीफ़ की, {6:10} “यह कौन है जो तुलू-ए-सुब्ह की तरह चमक उठी, जो चाँद जैसी ख़ूबसूरत, आफ़्ताब जैसी पाक और अलमबरदार दस्तों जैसी रोबदार है?” {i6:11} मह्बूबा के लिए आर्ज़ू {6:11} मैं अख़रोट के बाग़ में उतर आया ताकि वादी में फूटने वाले पौदों का मुआइना करूँ। मैं यह भी मालूम करना चाहता था कि क्या अंगूर की कोंपलें निकल आई या अनार के फूल लग गए हैं। {6:12} लेकिन चलते चलते न जाने क्या हुआ, मेरी आर्ज़ू ने मुझे मेरी शरीफ़ क़ौम के रथों के पास पहुँचाया। {i6:13} मह्बूबा की दिलकशी {6:13} ऐ शूलम्मीत, लौट आ, लौट आ! मुड़ कर लौट आ ताकि हम तुझ पर नज़र करें। तुम शूलम्मीत को क्यूँ देखना चाहती हो? हम लश्करगाह का लोकनाच देखना चाहती हैं! {7:1} ऐ रईस की बेटी, जूतों में चलने का तेरा अन्दाज़ कितना मनमोहन है! तेरी ख़ुशवज़ा रानें माहिर कारीगर के ज़ेवरात की मानिन्द हैं। {7:2} तेरी नाफ़ प्याला है जो मै से कभी नहीं महरूम रहती। तेरा जिस्म गन्दुम का ढेर है जिस का इहाता सोसन के फूलों से किया गया है। {7:3} तेरी छातियाँ ग़ज़ाल के जुड़वाँ बच्चों की मानिन्द हैं। {7:4} तेरी गर्दन हाथीदाँत का मीनार, तेरी आँखें हस्बोन शहर के तालाब हैं, वह जो बत-रब्बीम के दरवाज़े के पास हैं। तेरी नाक मीनार-ए-लुबनान की मानिन्द है जिस का मुँह दमिश्क़ की तरफ़ है। {7:5} तेरा सर कोह-ए-कर्मिल की मानिन्द है, तेरे खुले बाल अर्ग़वान की तरह क़ीमती और दिलकश हैं। बादशाह तेरी ज़ुल्फ़ों की ज़न्जीरों में जकड़ा रहता है। {i7:6} मह्बूबा के लिए आर्ज़ू {7:6} ऐ ख़ुशियों से लबरेज़ मुहब्बत, तू कितनी हसीन है, कितनी दिलरुबा! {7:7} तेरा क़द-ओ-क़ामत खजूर के दरख़्त सा, तेरी छातियाँ अंगूर के गुच्छों जैसी हैं। {7:8} मैं बोला, “मैं खजूर के दरख़्त पर चढ़ कर उस के फूलदार गुच्छों पर हाथ लगाऊँगा।” तेरी छातियाँ अंगूर के गुच्छों की मानिन्द हों, तेरे साँस की ख़ुश्बू सेबों की ख़ुश्बू जैसी हो। {7:9} तेरा मुँह बेहतरीन मै हो, ऐसी मै जो सीधी मेरे मह्बूब के मुँह में जा कर नर्मी से होंटों और दाँतों में से गुज़र जाए। {i7:10} मह्बूब के लिए आर्ज़ू {7:10} मैं अपने मह्बूब की ही हूँ, और वह मुझे चाहता है। {7:11} आ, मेरे मह्बूब, हम शहर से निकल कर दीहात में रात गुज़ारें। {7:12} आ, हम सुब्ह-सवेरे अंगूर के बाग़ों में जा कर मालूम करें कि क्या बेलों से कोंपलें निकल आई हैं और फूल लगे हैं, कि क्या अनार के दरख़्त खिल रहे हैं। वहाँ मैं तुझ पर अपनी मुहब्बत का इज़हार करूँगी। {7:13} मर्दुमगयाह की ख़ुश्बू फैल रही, और हमारे दरवाज़े पर हर क़िस्म का लज़ीज़ फल है, नई फ़सल का भी और गुज़री का भी। क्यूँकि मैं ने यह चीज़ें तेरे लिए, अपने मह्बूब के लिए मह्फ़ूज़ रखी हैं। {i8:1} काश हम अकेले हों {8:1} काश तू मेरा सगा भाई होता, तब अगर बाहर तुझ से मुलाक़ात होती तो मैं तुझे बोसा देती और कोई न होता जो यह देख कर मुझे हक़ीर जानता। {8:2} मैं तेरी राहनुमाई करके तुझे अपनी माँ के घर में ले जाती, उस के घर में जिस ने मुझे तालीम दी। वहाँ मैं तुझे मसालेदार मै और अपने अनारों का रस पिलाती। {8:3} उस का बायाँ बाज़ू मेरे सर के नीचे होता और दायाँ बाज़ू मुझे गले लगाता है। {8:4} ऐ यरूशलम की बेटियो, क़सम खाओ कि जब तक मुहब्बत ख़ुद न चाहे तुम उसे न जगाओगी, न बेदार करोगी। {i8:5} मह्बूब की आख़िरी बात {8:5} यह कौन है जो अपने मह्बूब का सहारा ले कर रेगिस्तान से चढ़ी आ रही है? सेब के दरख़्त तले मैं ने तुझे जगा दिया, वहाँ जहाँ तेरी माँ ने तुझे जन्म दिया, जहाँ उस ने दर्द-ए-ज़ह में मुब्तला हो कर तुझे पैदा किया। {8:6} मुझे मुहर की तरह अपने दिल पर, अपने बाज़ू पर लगाए रख! क्यूँकि मुहब्बत मौत जैसी ताक़तवर, और उस की सरगर्मी पाताल जैसी बेलचक है। वह दहकती आग, रब का भड़कता शोला है। {8:7} पानी का बड़ा सैलाब भी मुहब्बत को बुझा नहीं सकता, बड़े दरया भी उसे बहा कर ले जा नहीं सकते। और अगर कोई मुहब्बत को पाने के लिए अपने घर की तमाम दौलत पेश भी करे तो भी उसे जवाब में हक़ीर ही जाना जाएगा। {i8:8} मह्बूबा की आख़िरी बात {8:8} हमारी छोटी बहन की छातियाँ नहीं हैं। हम अपनी बहन के लिए क्या करें अगर कोई उस से रिश्ता बांधने आए? {8:9} अगर वह दीवार हो तो हम उस पर चाँदी का क़िलाबन्द इन्तिज़ाम बनाएँगे। अगर वह दरवाज़ा हो तो हम उसे देवदार के तख़्ते से मह्फ़ूज़ रखेंगे। {8:10} मैं दीवार हूँ, और मेरी छातियाँ मज़बूत मीनार हैं। अब मैं उस की नज़र में ऐसी ख़ातून बन गई हूँ जिसे सलामती हासिल हुई है। {i8:11} सुलेमान से ज़्यादा दौलतमन्द {8:11} बाल-हामून में सुलेमान का अंगूर का बाग़ था। इस बाग़ को उस ने पहरेदारों के हवाले कर दिया। हर एक को उस की फ़सल के लिए चाँदी के हज़ार सिक्के देने थे। {8:12} लेकिन मेरा अपना अंगूर का बाग़ मेरे सामने ही मौजूद है। ऐ सुलेमान, चाँदी के हज़ार सिक्के तेरे लिए हैं, और 200 सिक्के उन के लिए जो उस की फ़सल की पहरादारी करते हैं। {i8:13} मुझे ही पुकार {8:13} ऐ बाग़ में बसने वाली, मेरे साथी तेरी आवाज़ पर तवज्जुह दे रहे हैं। मुझे ही अपनी आवाज़ सुनने दे। {8:14} ऐ मेरे मह्बूब, ग़ज़ाल या जवान हिरन की तरह बल्सान के पहाड़ों की जानिब भाग जा!।