{i1:1} नबी की शिकायत : हर तरफ़ नाइन्साफ़ी {1:1} ज़ैल में वह कलाम क़लमबन्द है जो हबक़्क़ूक़ नबी को रोया देख कर मिला। {1:2} ऐ रब, मैं मज़ीद कब तक मदद के लिए पुकारूँ? अब तक तू ने मेरी नहीं सुनी। मैं मज़ीद कब तक चीख़ें मार मार कर कहूँ कि फ़साद हो रहा है? अब तक तू ने हमें छुटकारा नहीं दिया। {1:3} तू क्यूँ होने देता है कि मुझे इतनी नाइन्साफ़ी देखनी पड़े? लोगों को इतना नुक़्सान पहुँचाया जा रहा है, लेकिन तू ख़ामोशी से सब कुछ देखता रहता है। जहाँ भी मैं नज़र डालूँ, वहाँ ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद ही नज़र आता है, मुक़द्दमाबाज़ी और झगड़े सर उठाते हैं। {1:4} नतीजे में शरीअत बेअसर हो गई है, और बा-इन्साफ़ फ़ैसले कभी जारी नहीं होते। बेदीनों ने रास्तबाज़ों को घेर लिया है, इस लिए अदालत में बेहूदा फ़ैसले किए जाते हैं। {i1:5} अल्लाह का जवाब {1:5} “दीगर अक़्वाम पर निगाह डालो, हाँ उन पर ध्यान दो तो हक्का-बक्का रह जाओगे। क्यूँकि मैं तुम्हारे जीते जी एक ऐसा काम करूँगा जिस की जब ख़बर सुनोगे तो तुम्हें यक़ीन नहीं आएगा। {1:6} मैं बाबलियों को खड़ा करूँगा। यह ज़ालिम और तल्ख़रू क़ौम पूरी दुनिया को उबूर करके दूसरे ममालिक पर क़ब्ज़ा करेगी। {1:7} लोग उस से सख़्त दह्शत खाएँगे, हर तरफ़ उसी के क़वानीन और अज़मत माननी पड़ेगी। {1:8} उन के घोड़े चीतों से तेज़ हैं, और शाम के वक़्त शिकार करने वाले भेड़ीए भी उन जैसे फुरतीले नहीं होते। वह सरपट दौड़ कर दूर दूर से आते हैं। जिस तरह उक़ाब लाश पर झपट्टा मारता है उसी तरह वह अपने शिकार पर हम्ला करते हैं। {1:9} सब इसी मक़्सद से आते हैं कि ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद करें। जहाँ भी जाएँ वहाँ आगे बढ़ते जाते हैं। रेत जैसे बेशुमार क़ैदी उन के हाथ में जमा होते हैं। {1:10} वह दीगर बादशाहों का मज़ाक़ उड़ाते हैं, और दूसरों के बुज़ुर्ग उन के तमस्ख़ुर का निशाना बन जाते हैं। हर क़िले को देख कर वह हंस उठते हैं। जल्द ही वह उन की दीवारों के साथ मिट्टी के ढेर लगा कर उन पर क़ब्ज़ा करते हैं। {1:11} फिर वह तेज़ हवा की तरह वहाँ से गुज़र कर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन वह क़ुसूरवार ठहरेंगे, क्यूँकि उन की अपनी ताक़त उन का ख़ुदा है।” {i1:12} ऐ रब, तू क्यूँ ख़ामोश रहता है? {1:12} ऐ रब, क्या तू क़दीम ज़माने से ही मेरा ख़ुदा, मेरा क़ुद्दूस नहीं है? हम नहीं मरेंगे। ऐ रब, तू ने उन्हें सज़ा देने के लिए मुक़र्रर किया है। ऐ चटान, तेरी मर्ज़ी है कि वह हमारी तर्बियत करें। {1:13} तेरी आँखें बिलकुल पाक हैं, इस लिए तू बुरा काम बर्दाश्त नहीं कर सकता, तू ख़ामोशी से ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद पर नज़र नहीं डाल सकता। तो फिर तू इन बेवफ़ाओं की हरकतों को किस तरह बर्दाश्त करता है? जब बेदीन उसे हड़प कर लेता जो उस से कहीं ज़्यादा रास्तबाज़ है तो तू ख़ामोश क्यूँ रहता है? {1:14} तू ने होने दिया है कि इन्सान से मछलियों का सा सुलूक किया जाए, कि उसे उन समुन्दरी जानवरों की तरह पकड़ा जाए, जिन का कोई मालिक नहीं। {1:15} दुश्मन उन सब को काँटे के ज़रीए पानी से निकाल लेता है, अपना जाल डाल कर उन्हें पकड़ लेता है। जब उन का बड़ा ढेर जमा हो जाता है तो वह ख़ुश हो कर शादियाना बजाता है। {1:16} तब वह अपने जाल के सामने बख़ूर जला कर उसे जानवर क़ुर्बान करता है। क्यूँकि उसी के वसीले से वह ऐश-ओ-इश्रत की ज़िन्दगी गुज़ार सकता है। {1:17} क्या वह मुसलसल अपना जाल डालता और क़ौमों को बेरहमी से मौत के घाट उतारता रहे? {2:1} अब मैं पहरा देने के लिए अपनी बुर्जी पर चढ़ जाऊँगा, क़िले की ऊँची जगह पर खड़ा हो कर चारों तरफ़ देखता रहूँगा। क्यूँकि मैं जानना चाहता हूँ कि अल्लाह मुझे क्या कुछ बताएगा, कि वह मेरी शिकायत का क्या जवाब देगा। {i2:2} रब का जवाब {2:2} रब ने मुझे जवाब दिया, “जो कुछ तू ने रोया में देखा है उसे तख़्तों पर यूँ लिख दे कि हर गुज़रने वाला उसे रवानी से पढ़ सके। {2:3} क्यूँकि वह फ़ौरन पूरी नहीं हो जाएगी बल्कि मुक़र्ररा वक़्त पर आख़िरकार ज़ाहिर होगी, वह झूटी साबित नहीं होगी। गो देर भी लगे तो भी सब्र कर। क्यूँकि आने वाला पहुँचेगा, वह देर नहीं करेगा। {2:4} मग़रूर आदमी फूला हुआ है और अन्दर से सीधी राह पर नहीं चलता। लेकिन रास्तबाज़ ईमान ही से जीता रहेगा। {2:5} यक़ीनन मै एक बेवफ़ा साथी है। मग़रूर शख़्स जीता नहीं रहेगा, गो वह अपने मुँह को पाताल की तरह खुला रखता और उस की भूक मौत की तरह कभी नहीं मिटती, वह तमाम अक़्वाम और उम्मतें अपने पास जमा करता है। {i2:6} बेदीनों का अन्जाम {2:6} लेकिन यह सब उस का मज़ाक़ उड़ा कर उसे लान-तान करेंगी। वह कहेंगी, ‘उस पर अफ़्सोस जो दूसरों की चीज़ें छीन कर अपनी मिलकियत में इज़ाफ़ा करता है, जो क़र्ज़दारों की ज़मानत पर क़ब्ज़ा करने से दौलतमन्द हो गया है। यह कार-रवाई कब तक जारी रहेगी?’ {2:7} क्यूँकि अचानक ही ऐसे लोग उठेंगे जो तुझे काटेंगे, ऐसे लोग जाग उठेंगे जिन के सामने तू थरथराने लगेगा। तब तू ख़ुद उन का शिकार बन जाएगा। {2:8} चूँकि तू ने दीगर मुतअद्दिद अक़्वाम को लूट लिया है इस लिए अब बची हुई उम्मतें तुझे ही लूट लेंगी। क्यूँकि तुझ से क़त्ल-ओ-ग़ारत सरज़द हुई है, तू ने दीहात और शहर पर उन के बाशिन्दों समेत शदीद ज़ुल्म किया है। {2:9} उस पर अफ़्सोस जो नाजाइज़ नफ़ा कमा कर अपने घर पर आफ़त लाता है, हालाँकि वह आफ़त से बचने के लिए अपना घोंसला बुलन्दियों पर बना लेता है। {2:10} तेरे मन्सूबों से मुतअद्दिद क़ौमें तबाह हुई हैं, लेकिन यह तेरे ही घराने के लिए शर्म का बाइस बन गया है। इस गुनाह से तू अपने आप पर मौत की सज़ा लाया है। {2:11} यक़ीनन दीवारों के पत्थर चीख़ कर इल्तिजा करेंगे और लकड़ी के शहतीर जवाब में आह-ओ-ज़ारी करेंगे। {2:12} उस पर अफ़्सोस जो शहर को क़त्ल-ओ-ग़ारत के ज़रीए तामीर करता, जो आबादी को नाइन्साफ़ी की बुन्याद पर क़ाइम करता है। {2:13} रब्ब-उल-अफ़्वाज ने मुक़र्रर किया है कि जो कुछ क़ौमों ने बड़ी मेहनत-मशक़्क़त से हासिल किया उसे नज़र-ए-आतिश होना है, जो कुछ पाने के लिए उम्मतें थक जाती हैं वह बेकार ही है। {2:14} क्यूँकि जिस तरह समुन्दर पानी से भरा हुआ है, उसी तरह दुनिया एक दिन रब के जलाल के इर्फ़ान से भर जाएगी। {2:15} उस पर अफ़्सोस जो अपना प्याला ज़हरीली शराब से भर कर उसे अपने पड़ोसियों को पिला देता है ताकि उन्हें नशे में ला कर उन की बरहनगी से लुत्फ़अन्दोज़ हो जाए। {2:16} लेकिन अब तेरी बारी भी आ गई है! तेरी शान-ओ-शौकत ख़त्म हो जाएगी, और तेरा मुँह काला हो जाएगा। अब ख़ुद पी ले! नशे में आ कर अपने कपड़े उतार ले। ग़ज़ब का जो प्याला रब के दहने हाथ में है वह तेरे पास भी पहुँचेगा। तब तेरी इतनी रुस्वाई हो जाएगी कि तेरी शान का नाम-ओ-निशान तक नहीं रहेगा। {2:17} जो ज़ुल्म तू ने लुबनान पर किया वह तुझ पर ही ग़ालिब आएगा, जिन जानवरों को तू ने वहाँ तबाह किया उन की दह्शत तुझ ही पर तारी हो जाएगी। क्यूँकि तुझ से क़त्ल-ओ-ग़ारत सरज़द हुई है, तू ने दीहात और शहरों पर उन के बाशिन्दों समेत शदीद ज़ुल्म किया है। {2:18} बुत का क्या फ़ाइदा? आख़िर किसी माहिर कारीगर ने उसे तराशा या ढाल लिया है, और वह झूट ही झूट की हिदायात देता है। कारीगर अपने हाथों के बुत पर भरोसा रखता है, हालाँकि वह बोल भी नहीं सकता! {2:19} उस पर अफ़्सोस जो लकड़ी से कहता है, ‘जाग उठ!’ और ख़ामोश पत्थर से, ‘खड़ा हो जा!’ क्या यह चीज़ें हिदायत दे सकती हैं? हरगिज़ नहीं! उन में जान ही नहीं, ख़्वाह उन पर सोना या चाँदी क्यूँ न चढ़ाई गई हो। {2:20} लेकिन रब अपने मुक़द्दस घर में मौजूद है। उस के हुज़ूर पूरी दुनिया ख़ामोश रहे।” {i3:1} हबक़्क़ूक़ की दुआ {3:1} ज़ैल में हबक़्क़ूक़ नबी की दुआ है। इसे ‘शिगियूनोत’ के तर्ज़ पर गाना है। {3:2} ऐ रब, मैं ने तेरा पैग़ाम सुना है। ऐ रब, तेरा काम देख कर मैं डर गया हूँ। हमारे जीते जी उसे वुजूद में ला, जल्द ही उसे हम पर ज़ाहिर कर। जब तुझे हम पर ग़ुस्सा आए तो अपना रहम याद कर। {3:3} अल्लाह तेमान से आ रहा है, क़ुद्दूस फ़ारान के पहाड़ी इलाक़े से पहुँच रहा है। (सिलाह) उस का जलाल पूरे आसमान पर छा गया है, ज़मीन उस की हम्द-ओ-सना से भरी हुई है। {3:4} तब उस की शान सूरज की तरह चमकती, उस के हाथ से तेज़ किरनें निकलती हैं जिन में उस की क़ुदरत पिनहाँ होती है। {3:5} मोहलक बीमारी उस के आगे आगे फैलती, वबाई मर्ज़ उस के नक़्श-ए-क़दम पर चलता है। {3:6} जहाँ भी क़दम उठाए, वहाँ ज़मीन हिल जाती, जहाँ भी नज़र डाले वहाँ अक़्वाम लरज़ उठती हैं। तब क़दीम पहाड़ फट जाते, पुरानी पहाड़ियाँ दबक जाती हैं। उस की राहें अज़ल से ऐसी ही रही हैं। {3:7} मैं ने कूशान के ख़ैमों को मुसीबत में देखा, मिदियान के तम्बू काँप रहे थे। {3:8} ऐ रब, क्या तू दरयाओं और नदियों से ग़ुस्से था? क्या तेरा ग़ज़ब समुन्दर पर नाज़िल हुआ जब तू अपने घोड़ों और फ़त्हमन्द रथों पर सवार हो कर निकला? {3:9} तू ने अपनी कमान को निकाल लिया, तेरी लानतें तीरों की तरह बरसने लगी हैं। (सिलाह) तू ज़मीन को फाड़ कर उन जगहों पर दरया बहने देता है। {3:10} तुझे देख कर पहाड़ काँप उठते, मूसलाधार बारिश बरसने लगती और पानी की गहराइयाँ गरजती हुई अपने हाथ आसमान की तरफ़ उठाती हैं। {3:11} सूरज और चाँद अपनी बुलन्द रिहाइशगाह में रुक जाते हैं। तेरे चमकते तीरों के सामने वह माँद पड़ जाते, तेरे नेज़ों की झिलमिलाती रौशनी में ओझल हो जाते हैं। {3:12} तू ग़ुस्से में दुनिया में से गुज़रता, तैश से दीगर अक़्वाम को मार कर गाह लेता है। {3:13} तू अपनी क़ौम को रिहा करने के लिए निकला, अपने मसह किए हुए ख़ादिम की मदद करने आया है। तू ने बेदीन का घर छत से ले कर बुन्याद तक गिरा दिया, अब कुछ नज़र नहीं आता। (सिलाह) {3:14} उस के अपने नेज़ों से तू ने उस के सर को छेद डाला। पहले उस के दस्ते कितनी ख़ुशी से हम पर टूट पड़े ताकि हमें मुन्तशिर करके मुसीबतज़दा को पोशीदगी में खा सकें! लेकिन अब वह ख़ुद भूसे की तरह हवा में उड़ गए हैं। {3:15} तू ने अपने घोड़ों से समुन्दर को यूँ कुचल दिया कि गहरा पानी झाग निकालने लगा। {i3:16} अल्लाह मुझे तक़वियत देता है {3:16} यह सब कुछ सुन कर मेरा जिस्म लरज़ उठा। इतना शोर था कि मेरे दाँत बजने लगे, मेरी हड्डियाँ सड़ने लगीं, मेरे घुटने काँप उठे। अब मैं उस दिन के इन्तिज़ार में रहूँगा जब आफ़त उस क़ौम पर आएगी जो हम पर हम्ला कर रही है। {3:17} अभी तक कोंपलें अन्जीर के दरख़्त पर नज़र नहीं आतीं, अंगूर की बेलें बेफल हैं। अभी तक ज़ैतून के दरख़्त फल से महरूम हैं और खेतों में फ़सलें नहीं उगतीं। बाड़ों में न भेड़-बकरियाँ, न मवेशी हैं। {3:18} ताहम मैं रब की ख़ुशी मनाऊँगा, अपने नजातदहिन्दा अल्लाह के बाइस शादियाना बजाऊँगा। {3:19} रब क़ादिर-ए-मुतलक़ मेरी क़ुव्वत है। वही मुझे हिरनों के से तेज़रौ पाँओ मुहय्या करता है, वही मुझे बुलन्दियों पर से गुज़रने देता है। दर्ज-ए-बाला गीत मौसीक़ी के राहनुमा के लिए है। इसे मेरे तर्ज़ के तारदार साज़ों के साथ गाना है।