{1:1} यह ख़त पौलुस की तरफ़ से है, जो अल्लाह की मर्ज़ी से मसीह ईसा का रसूल है। साथ ही यह भाई तीमुथियुस की तरफ़ से भी है। मैं कुरिन्थुस में अल्लाह की जमाअत और सूबा अख़या में मौजूद तमाम मुक़द्दसीन को यह लिख रहा हूँ। {1:2} ख़ुदा हमारा बाप और ख़ुदावन्द ईसा मसीह आप को फ़ज़्ल और सलामती अता करें। {i1:3} अल्लाह की हम्द-ओ-सना {1:3} हमारे ख़ुदावन्द ईसा मसीह के ख़ुदा और बाप की तम्जीद हो, जो रहम का बाप और तमाम तरह की तसल्ली का ख़ुदा है। {1:4} जब भी हम मुसीबत में फंस जाते हैं तो वह हमें तसल्ली देता है ताकि हम औरों को भी तसल्ली दे सकें। फिर जब वह किसी मुसीबत से दोचार होते हैं तो हम भी उन को उसी तरह तसल्ली दे सकते हैं जिस तरह अल्लाह ने हमें तसल्ली दी है। {1:5} क्यूँकि जितनी कस्रत से मसीह की सी मुसीबतें हम पर आ जाती हैं उतनी कस्रत से अल्लाह मसीह के ज़रीए हमें तसल्ली देता है। {1:6} जब हम मुसीबतों से दोचार होते हैं तो यह बात आप की तसल्ली और नजात का बाइस बनती है। जब हमारी तसल्ली होती है तो यह आप की भी तसल्ली का बाइस बनती है। यूँ आप भी सब्र से वह कुछ बर्दाश्त करने के क़ाबिल बन जाते हैं जो हम बर्दाश्त कर रहे हैं। {1:7} चुनाँचे हमारी आप के बारे में उम्मीद पुख़्ता रहती है। क्यूँकि हम जानते हैं कि जिस तरह आप हमारी मुसीबतों में शरीक हैं उसी तरह आप उस तसल्ली में भी शरीक हैं जो हमें हासिल होती है। {1:8} भाइयो, हम आप को उस मुसीबत से आगाह करना चाहते हैं जिस में हम सूबा आसिया में फंस गए। हम पर दबाओ इतना शदीद था कि उसे बर्दाश्त करना नामुमकिन सा हो गया और हम जान से हाथ धो बैठे। {1:9} हम ने मह्सूस किया कि हमें सज़ा-ए-मौत दी गई है। लेकिन यह इस लिए हुआ ताकि हम अपने आप पर भरोसा न करें बल्कि अल्लाह पर जो मुर्दों को ज़िन्दा कर देता है। {1:10} उसी ने हमें ऐसी हैबतनाक मौत से बचाया और वह आइन्दा भी हमें बचाएगा। और हम ने उस पर उम्मीद रखी है कि वह हमें एक बार फिर बचाएगा। {1:11} आप भी अपनी दुआओं से हमारी मदद कर रहे हैं। यह कितनी ख़ूबसूरत बात है कि अल्लाह बहुतों की दुआओं को सुन कर हम पर मेहरबानी करेगा और नतीजे में बहुतेरे हमारे लिए शुक्र करेंगे। {i1:12} पौलुस के मन्सूबों में तब्दीली {1:12} यह बात हमारे लिए फ़ख़र का बाइस है कि हमारा ज़मीर साफ़ है। क्यूँकि हम ने अल्लाह के सामने सादादिली और ख़ुलूस से ज़िन्दगी गुज़ारी है, और हम ने अपनी इन्सानी हिक्मत पर इन्हिसार नहीं किया बल्कि अल्लाह के फ़ज़्ल पर। दुनिया में और ख़ासकर आप के साथ हमारा रवय्या ऐसा ही रहा है। {1:13} हम तो आप को ऐसी कोई बात नहीं लिखते जो आप पढ़ या समझ नहीं सकते। और मुझे उम्मीद है कि आप को पूरे तौर पर समझ आएगी, {1:14} अगरचे आप फ़िलहाल सब कुछ नहीं समझते। क्यूँकि जब आप को सब कुछ समझ आएगा तब आप ख़ुदावन्द ईसा के दिन हम पर उतना फ़ख़र कर सकेंगे जितना हम आप पर। {1:15} चूँकि मुझे इस का पूरा यक़ीन था इस लिए मैं पहले आप के पास आना चाहता था ताकि आप को दुगनी बरकत मिल जाए। {1:16} ख़याल यह था कि मैं आप के हाँ से हो कर मकिदुनिया जाऊँ और वहाँ से आप के पास वापस आऊँ। फिर आप सूबा यहूदिया के सफ़र के लिए तय्यारियाँ करने में मेरी मदद करके मुझे आगे भेज सकते थे। {1:17} आप मुझे बताएँ कि क्या मैं ने यह मन्सूबा यूँ ही बनाया था? क्या मैं दुनियावी लोगों की तरह मन्सूबे बना लेता हूँ जो एक ही लम्हे में “जी हाँ” और “जी नहीं” कहते हैं? {1:18} लेकिन अल्लाह वफ़ादार है और वह मेरा गवाह है कि हम आप के साथ बात करते वक़्त “नहीं” को “हाँ” के साथ नहीं मिलाते। {1:19} क्यूँकि अल्लाह का फ़र्ज़न्द ईसा मसीह जिस की मुनादी मैं, सीलास और तीमुथियुस ने की वह भी ऐसा नहीं है। उस ने कभी भी “हाँ” को “नहीं” के साथ नहीं मिलाया बल्कि उस में अल्लाह की हत्मी “जी हाँ” वुजूद में आई। {1:20} क्यूँकि वही अल्लाह के तमाम वादों की “हाँ” है। इस लिए हम उसी के वसीले से “आमीन” (जी हाँ) कह कर अल्लाह को जलाल देते हैं। {1:21} और अल्लाह ख़ुद हमें और आप को मसीह में मज़बूत कर देता है। उसी ने हमें मसह करके मख़्सूस किया है। {1:22} उसी ने हम पर अपनी मुहर लगा कर ज़ाहिर किया है कि हम उस की मिलकियत हैं और उसी ने हमें रूह-उल-क़ुद्स दे कर अपने वादों का बयाना अदा किया है। {1:23} अगर मैं झूट बोलूँ तो अल्लाह मेरे ख़िलाफ़ गवाही दे। बात यह है कि मैं आप को बचाने के लिए कुरिन्थुस वापस न आया। {1:24} मतलब यह नहीं कि हम ईमान के मुआमले में आप पर हुकूमत करना चाहते हैं। नहीं, हम आप के साथ मिल कर ख़िदमत करते हैं ताकि आप ख़ुशी से भर जाएँ, क्यूँकि आप तो ईमान की मारिफ़त क़ाइम हैं। {2:1} चुनाँचे मैं ने फ़ैसला किया कि मैं दुबारा आप के पास नहीं आऊँगा, वर्ना आप को बहुत ग़म खाना पड़ेगा। {2:2} क्यूँकि अगर मैं आप को दुख पहुँचाऊँ तो कौन मुझे ख़ुश करेगा? यह वह शख़्स नहीं करेगा जिसे मैं ने दुख पहुँचाया है। {2:3} यही वजह है कि मैं ने आप को यह लिख दिया। मैं नहीं चाहता था कि आप के पास आ कर उन ही लोगों से ग़म खाऊँ जिन्हें मुझे ख़ुश करना चाहिए। क्यूँकि मुझे आप सब के बारे में यक़ीन है कि मेरी ख़ुशी आप सब की ख़ुशी है। {2:4} मैं ने आप को निहायत रंजीदा और परेशान हालत में आँसू बहा बहा कर लिख दिया। मक़्सद यह नहीं था कि आप ग़मगीन हो जाएँ बल्कि मैं चाहता था कि आप जान लें कि मैं आप से कितनी गहरी मुहब्बत रखता हूँ। {i2:5} मुजरिम को मुआफ़ कर दिया जाए {2:5} अगर किसी ने दुख पहुँचाया है तो मुझे नहीं बल्कि किसी हद तक आप सब को (मैं ज़्यादा सख़्ती से बात नहीं करना चाहता)। {2:6} लेकिन मज़कूरा शख़्स के लिए यह काफ़ी है कि उसे जमाअत के अक्सर लोगों ने सज़ा दी है। {2:7} अब ज़रूरी है कि आप उसे मुआफ़ करके तसल्ली दें, वर्ना वह ग़म खा खा कर तबाह हो जाएगा। {2:8} चुनाँचे मैं इस पर ज़ोर देना चाहता हूँ कि आप उसे अपनी मुहब्बत का एहसास दिलाएँ। {2:9} मैं ने यह मालूम करने के लिए आप को लिखा कि क्या आप इम्तिहान में पूरे उतरेंगे और हर बात में ताबे रहेंगे। {2:10} जिसे आप कुछ मुआफ़ करते हैं उसे मैं भी मुआफ़ करता हूँ। और जो कुछ मैं ने मुआफ़ किया, अगर मुझे कुछ मुआफ़ करने की ज़रूरत थी, वह मैं ने आप की ख़ातिर मसीह के हुज़ूर मुआफ़ किया है {2:11} ताकि इब्लीस हम से फ़ाइदा न उठाए। क्यूँकि हम उस की चालों से ख़ूब वाक़िफ़ हैं। {i2:12} त्रोआस में पौलुस की परेशानी {2:12} जब मैं मसीह की ख़ुशख़बरी सुनाने के लिए त्रोआस गया तो ख़ुदावन्द ने मेरे लिए आगे ख़िदमत करने का एक दरवाज़ा खोल दिया। {2:13} लेकिन जब मुझे अपना भाई तितुस वहाँ न मिला तो मैं बेचैन हो गया और उन्हें ख़ैरबाद कह कर सूबा मकिदुनिया चला गया। {i2:14} मसीह में फ़त्ह {2:14} लेकिन ख़ुदा का शुक्र है! वही हमारे आगे आगे चलता है और हम मसीह के क़ैदी बन कर उस की फ़त्ह मनाते हुए उस के पीछे पीछे चलते हैं। यूँ अल्लाह हमारे वसीले से हर जगह मसीह के बारे में इल्म ख़ुश्बू की तरह फैलाता है। {2:15} क्यूँकि हम मसीह की ख़ुश्बू हैं जो अल्लाह तक पहुँचती है और साथ साथ लोगों में भी फैलती है, नजात पाने वालों में भी और हलाक होने वालों में भी। {2:16} बाज़ लोगों के लिए हम मौत की मोहलक बू हैं जबकि बाज़ के लिए हम ज़िन्दगीबख़्श ख़ुश्बू हैं। तो कौन यह ज़िम्मादारी निभाने के लाइक़ है? {2:17} क्यूँकि हम अक्सर लोगों की तरह अल्लाह के कलाम की तिजारत नहीं करते, बल्कि यह जान कर कि हम अल्लाह के हुज़ूर में हैं और उस के भेजे हुए हैं हम ख़ुलूसदिली से लोगों से बात करते हैं। {i3:1} नए अह्द के ख़ादिम {3:1} क्या हम दुबारा अपनी ख़ूबियों का ढंडोरा पीट रहे हैं? या क्या हम बाज़ लोगों की मानिन्द हैं जिन्हें आप को सिफ़ारिशी ख़त देने या आप से ऐसे ख़त लिखवाने की ज़रूरत होती है? {3:2} नहीं, आप तो ख़ुद हमारा ख़त हैं जो हमारे दिलों पर लिखा हुआ है। सब इसे पहचान और पढ़ सकते हैं। {3:3} यह साफ़ ज़ाहिर है कि आप मसीह का ख़त हैं जो उस ने हमारी ख़िदमत के ज़रीए लिख दिया है। और यह ख़त सियाही से नहीं बल्कि ज़िन्दा ख़ुदा के रूह से लिखा गया, पत्थर की तख़्तियों पर नहीं बल्कि इन्सानी दिलों पर। {3:4} हम यह इस लिए यक़ीन से कह सकते हैं क्यूँकि हम मसीह के वसीले से अल्लाह पर एतिमाद रखते हैं। {3:5} हमारे अन्दर तो कुछ नहीं है जिस की बिना पर हम दावा कर सकते कि हम यह काम करने के लाइक़ हैं। नहीं, हमारी लियाक़त अल्लाह की तरफ़ से है। {3:6} उसी ने हमें नए अह्द के ख़ादिम होने के लाइक़ बना दिया है। और यह अह्द लिखी हुई शरीअत पर मब्नी नहीं है बल्कि रूह पर, क्यूँकि लिखी हुई शरीअत के असर से हम मर जाते हैं जबकि रूह हमें ज़िन्दा कर देता है। {3:7} शरीअत के हुरूफ़ पत्थर की तख़्तियों पर कन्दा किए गए और जब उसे दिया गया तो अल्लाह का जलाल ज़ाहिर हुआ। यह जलाल इतना तेज़ था कि इस्राईली मूसा के चिहरे को लगातार देख न सके। अगर उस चीज़ का जलाल इतना तेज़ था जो अब मन्सूख़ है {3:8} तो क्या रूह के निज़ाम का जलाल इस से कहीं ज़्यादा नहीं होगा? {3:9} अगर पुराना निज़ाम जो हमें मुजरिम ठहराता था जलाली था तो फिर नया निज़ाम जो हमें रास्तबाज़ क़रार देता है कहीं ज़्यादा जलाली होगा। {3:10} हाँ, पहले निज़ाम का जलाल नए निज़ाम के ज़बरदस्त जलाल की निस्बत कुछ भी नहीं है। {3:11} और अगर उस पुराने निज़ाम का जलाल बहुत था जो अब मन्सूख़ है तो फिर उस नए निज़ाम का जलाल कहीं ज़्यादा होगा जो क़ाइम रहेगा। {3:12} पस चूँकि हम ऐसी उम्मीद रखते हैं इस लिए बड़ी दिलेरी से ख़िदमत करते हैं। {3:13} हम मूसा की मानिन्द नहीं हैं जिस ने शरीअत सुनाने के इख़तिताम पर अपने चिहरे पर निक़ाब डाल लिया ताकि इस्राईली उसे तकते न रहें जो अब मन्सूख़ है। {3:14} तो भी वह ज़हनी तौर पर अड़ गए, क्यूँकि आज तक जब पुराने अह्दनामे की तिलावत की जाती है तो यही निक़ाब क़ाइम है। आज तक निक़ाब को हटाया नहीं गया क्यूँकि यह अह्द सिर्फ़ मसीह में मन्सूख़ होता है। {3:15} हाँ, आज तक जब मूसा की शरीअत पढ़ी जाती है तो यह निक़ाब उन के दिलों पर पड़ा रहता है। {3:16} लेकिन जब भी कोई ख़ुदावन्द की तरफ़ रुजू करता है तो यह निक़ाब हटाया जाता है, {3:17} क्यूँकि ख़ुदावन्द रूह है और जहाँ ख़ुदावन्द का रूह है वहाँ आज़ादी है। {3:18} चुनाँचे हम सब जिन के चिहरों से निक़ाब हटाया गया है ख़ुदावन्द का जलाल मुनअकिस करते और क़दम-ब-क़दम जलाल पाते हुए मसीह की सूरत में बदलते जाते हैं। यह ख़ुदावन्द ही का काम है जो रूह है। {i4:1} मिट्टी के बर्तनों में रुहानी ख़ज़ाना {4:1} पस चूँकि हमें अल्लाह के रहम से यह ख़िदमत सौंपी गई है इस लिए हम बेदिल नहीं हो जाते। {4:2} हम ने छुपी हुई शर्मनाक बातें मुस्तरद कर दी हैं। न हम चालाकी से काम करते, न अल्लाह के कलाम में तहरीफ़ करते हैं। बल्कि हमें अपनी सिफ़ारिश की ज़रूरत भी नहीं, क्यूँकि जब हम अल्लाह के हुज़ूर लोगों पर हक़ीक़त को ज़ाहिर करते हैं तो हमारी नेकनामी ख़ुद-ब-ख़ुद हर एक के ज़मीर पर ज़ाहिर हो जाती है। {4:3} और अगर हमारी ख़ुशख़बरी निक़ाब तले छुपी हुई भी हो तो वह सिर्फ़ उन के लिए छुपी हुई है जो हलाक हो रहे हैं। {4:4} इस जहान के शरीर ख़ुदा ने उन के ज़हनों को अंधा कर दिया है जो ईमान नहीं रखते। इस लिए वह अल्लाह की ख़ुशख़बरी की जलाली रौशनी नहीं देख सकते। वह यह पैग़ाम नहीं समझ सकते जो मसीह के जलाल के बारे में है, उस के बारे में जो अल्लाह की सूरत है। {4:5} क्यूँकि हम अपना प्रचार नहीं करते बल्कि ईसा मसीह का पैग़ाम सुनाते हैं कि वह ख़ुदावन्द है। अपने आप को हम ईसा की ख़ातिर आप के ख़ादिम क़रार देते हैं। {4:6} क्यूँकि जिस ख़ुदा ने फ़रमाया, “अंधेरे में से रौशनी चमके,” उस ने हमारे दिलों में अपनी रौशनी चमकने दी ताकि हम अल्लाह का वह जलाल जान लें जो ईसा मसीह के चिहरे से चमकता है। {4:7} लेकिन हम जिन के अन्दर यह ख़ज़ाना है आम मिट्टी के बर्तनों की मानिन्द हैं ताकि ज़ाहिर हो कि यह ज़बरदस्त क़ुव्वत हमारी तरफ़ से नहीं बल्कि अल्लाह की तरफ़ से है। {4:8} लोग हमें चारों तरफ़ से दबाते हैं, लेकिन कोई हमें कुचल कर ख़त्म नहीं कर सकता। हम उलझन में पड़ जाते हैं, लेकिन उम्मीद का दामन हाथ से जाने नहीं देते। {4:9} लोग हमें ईज़ा देते हैं, लेकिन हमें अकेला नहीं छोड़ा जाता। लोगों के धक्कों से हम ज़मीन पर गिर जाते हैं, लेकिन हम तबाह नहीं होते। {4:10} हर वक़्त हम अपने बदन में ईसा की मौत लिए फिरते हैं ताकि ईसा की ज़िन्दगी भी हमारे बदन में ज़ाहिर हो जाए। {4:11} क्यूँकि हर वक़्त हमें ज़िन्दा हालत में ईसा की ख़ातिर मौत के हवाले कर दिया जाता है ताकि उस की ज़िन्दगी हमारे फ़ानी बदन में ज़ाहिर हो जाए। {4:12} यूँ हम में मौत का असर काम करता है जबकि आप में ज़िन्दगी का असर। {4:13} कलाम-ए-मुक़द्दस में लिखा है, “मैं ईमान लाया और इस लिए बोला।” हमें ईमान का यही रूह हासिल है इस लिए हम भी ईमान लाने की वजह से बोलते हैं। {4:14} क्यूँकि हम जानते हैं कि जिस ने ख़ुदावन्द ईसा को मुर्दों में से ज़िन्दा कर दिया है वह ईसा के साथ हमें भी ज़िन्दा करके आप लोगों समेत अपने हुज़ूर खड़ा करेगा। {4:15} यह सब कुछ आप के फ़ाइदे के लिए है। यूँ अल्लाह का फ़ज़्ल आगे बढ़ते बढ़ते मज़ीद बहुत से लोगों तक पहुँच रहा है और नतीजे में वह अल्लाह को जलाल दे कर शुक्रगुज़ारी की दुआओं में बहुत इज़ाफ़ा कर रहे हैं। {i4:16} ईमान की ज़िन्दगी {4:16} इसी वजह से हम बेदिल नहीं हो जाते। बेशक ज़ाहिरी तौर पर हम ख़त्म हो रहे हैं, लेकिन अन्दर ही अन्दर रोज़-ब-रोज़ हमारी तज्दीद होती जा रही है। {4:17} क्यूँकि हमारी मौजूदा मुसीबत हल्की और पल भर की है, और वह हमारे लिए एक ऐसा अबदी जलाल पैदा कर रही है जिस की निस्बत मौजूदा मुसीबत कुछ भी नहीं। {4:18} इस लिए हम देखी हुई चीज़ों पर ग़ौर नहीं करते बल्कि अनदेखी चीज़ों पर। क्यूँकि देखी हुई चीज़ें आरिज़ी हैं, जबकि अनदेखी चीज़ें अबदी हैं। {5:1} हम तो जानते हैं कि जब हमारी दुनियावी झोंपड़ी जिस में हम रहते हैं गिराई जाएगी तो अल्लाह हमें आसमान पर एक मकान देगा, एक ऐसा अबदी घर जिसे इन्सानी हाथों ने नहीं बनाया होगा। {5:2} इस लिए हम इस झोंपड़ी में कराहते हैं और आसमानी घर पहन लेने की शदीद आर्ज़ू रखते हैं, {5:3} क्यूँकि जब हम उसे पहन लेंगे तो हम नंगे नहीं पाए जाएंगे। {5:4} इस झोंपड़ी में रहते हुए हम बोझ तले कराहते हैं। क्यूँकि हम अपना फ़ानी लिबास उतारना नहीं चाहते बल्कि उस पर आसमानी घर का लिबास पहन लेना चाहते हैं ताकि ज़िन्दगी वह कुछ निगल जाए जो फ़ानी है। {5:5} अल्लाह ने ख़ुद हमें इस मक़्सद के लिए तय्यार किया है और उसी ने हमें रूह-उल-क़ुद्स को आने वाले जलाल के बैआने के तौर पर दे दिया है। {5:6} चुनाँचे हम हमेशा हौसला रखते हैं। हम जानते हैं कि जब तक अपने बदन में रिहाइशपज़ीर हैं उस वक़्त तक ख़ुदावन्द के घर से दूर हैं। {5:7} हम ज़ाहिरी चीज़ों पर भरोसा नहीं करते बल्कि ईमान पर चलते हैं। {5:8} हाँ, हमारा हौसला बुलन्द है बल्कि हम ज़्यादा यह चाहते हैं कि अपने जिस्मानी घर से रवाना हो कर ख़ुदावन्द के घर में रहें। {5:9} लेकिन ख़्वाह हम अपने बदन में हों या न, हम इसी कोशिश में रहते हैं कि ख़ुदावन्द को पसन्द आएँ। {5:10} क्यूँकि लाज़िम है कि हम सब मसीह के तख़्त-ए-अदालत के सामने हाज़िर हो जाएँ। वहाँ हर एक को उस काम का अज्र मिलेगा जो उस ने अपने बदन में रहते हुए किया है, ख़्वाह वह अच्छा था या बुरा। {i5:11} मसीह के वसीले से हमारी अल्लाह के साथ दोस्ती {5:11} अब हम ख़ुदावन्द के ख़ौफ़ को जान कर लोगों को समझाने की कोशिश करते हैं। हम तो अल्लाह के सामने पूरे तौर पर ज़ाहिर हैं। और मैं उम्मीद रखता हूँ कि हम आप के ज़मीर के सामने भी ज़ाहिर हैं। {5:12} क्या हम यह बात करके दुबारा अपनी सिफ़ारिश कर रहे हैं? नहीं, आप को हम पर फ़ख़र करने का मौक़ा दे रहे हैं ताकि आप उन के जवाब में कुछ कह सकें जो ज़ाहिरी बातों पर शेख़ी मारते और दिली बातें नज़रअन्दाज़ करते हैं। {5:13} क्यूँकि अगर हम बेख़ुद हुए तो अल्लाह की ख़ातिर, और अगर होश में हैं तो आप की ख़ातिर। {5:14} बात यह है कि मसीह की मुहब्बत हमें मज्बूर कर देती है, क्यूँकि हम इस नतीजे पर पहुँच गए हैं कि एक सब के लिए मुआ। इस का मतलब है कि सब ही मर गए हैं। {5:15} और वह सब के लिए इस लिए मुआ ताकि जो ज़िन्दा हैं वह अपने लिए न जिएँ बल्कि उस के लिए जो उन की ख़ातिर मुआ और फिर जी उठा। {5:16} इस वजह से हम अब से किसी को भी दुनियावी निगाह से नहीं देखते। पहले तो हम मसीह को भी इस ज़ावीए से देखते थे, लेकिन यह वक़्त गुज़र गया है। {5:17} चुनाँचे जो मसीह में है वह नया मख़्लूक़ है। पुरानी ज़िन्दगी जाती रही और नई ज़िन्दगी शुरू हो गई है। {5:18} यह सब कुछ अल्लाह की तरफ़ से है जिस ने मसीह के वसीले से अपने साथ हमारा मेल-मिलाप कर लिया है। और उसी ने हमें मेल-मिलाप कराने की ख़िदमत की ज़िम्मादारी दी है। {5:19} इस ख़िदमत के तहत हम यह पैग़ाम सुनाते हैं कि अल्लाह ने मसीह के वसीले से अपने साथ दुनिया की सुलह कराई और लोगों के गुनाहों को उन के ज़िम्मे न लगाया। सुलह कराने का यह पैग़ाम उस ने हमारे सपुर्द कर दिया। {5:20} पस हम मसीह के एलची हैं और अल्लाह हमारे वसीले से लोगों को समझाता है। हम मसीह के वास्ते आप से मिन्नत करते हैं कि अल्लाह की सुलह की पेशकश को क़बूल करें ताकि उस की आप के साथ सुलह हो जाए। {5:21} मसीह बेगुनाह था, लेकिन अल्लाह ने उसे हमारी ख़ातिर गुनाह ठहराया ताकि हमें उस में रास्तबाज़ क़रार दिया जाए। {6:1} अल्लाह के हमख़िदमत होते हुए हम आप से मिन्नत करते हैं कि जो फ़ज़्ल आप को मिला है वह ज़ाए न जाए। {6:2} क्यूँकि अल्लाह फ़रमाता है, “क़बूलियत के वक़्त मैं ने तेरी सुनी, नजात के दिन तेरी मदद की।” सुनें! अब क़बूलियत का वक़्त आ गया है, अब नजात का दिन है। {6:3} हम किसी के लिए भी ठोकर का बाइस नहीं बनते ताकि लोग हमारी ख़िदमत में नुक़्स न निकाल सकें। {6:4} हाँ, हमें सिफ़ारिश की ज़रूरत ही नहीं, क्यूँकि अल्लाह के ख़ादिम होते हुए हम हर हालत में अपनी नेकनामी ज़ाहिर करते हैं: जब हम सब्र से मुसीबतें, मुश्किलात और आफ़तें बर्दाश्त करते हैं, {6:5} जब लोग हमें मारते और क़ैद में डालते हैं, जब हम बेकाबू हुजूमों का सामना करते हैं, जब हम मेहनत-मशक़्क़त करते, रात के वक़्त जागते और भूके रहते हैं, {6:6} जब हम अपनी पाकीज़गी, इल्म, सब्र और मेहरबान सुलूक का इज़हार करते हैं, जब हम रूह-उल-क़ुद्स के वसीले से हक़ीक़ी मुहब्बत रखते, {6:7} सच्ची बातें करते और अल्लाह की क़ुदरत से लोगों की ख़िदमत करते हैं। हम अपनी नेकनामी इस में भी ज़ाहिर करते हैं कि हम दोनों हाथों से रास्तबाज़ी के हथियार थामे रखते हैं। {6:8} हम अपनी ख़िदमत जारी रखते हैं, चाहे लोग हमारी इज़्ज़त करें चाहे बेइज़्ज़ती, चाहे वह हमारी बुरी रिपोर्ट दें चाहे अच्छी। अगरचे हमारी ख़िदमत सच्ची है, लेकिन लोग हमें दग़ाबाज़ क़रार देते हैं। {6:9} अगरचे लोग हमें जानते हैं तो भी हमें नज़रअन्दाज़ किया जाता है। हम मरते मरते ज़िन्दा रहते हैं और लोग हमें मार मार कर क़त्ल नहीं कर सकते। {6:10} हम ग़म खा खा कर हर वक़्त ख़ुश रहते हैं, हम ग़रीब हालत में बहुतों को दौलतमन्द बना देते हैं। हमारे पास कुछ नहीं है, तो भी हमें सब कुछ हासिल है। {6:11} कुरिन्थुस के अज़ीज़ो, हम ने खुल कर आप से बात की है, हमारा दिल आप के लिए कुशादा हो गया है। {6:12} जो जगह हम ने दिल में आप को दी है वह अब तक कम नहीं हुई। लेकिन आप के दिलों में हमारे लिए कोई जगह नहीं रही। {6:13} अब मैं आप से जो मेरे बच्चे हैं दरख़्वास्त करता हूँ कि जवाब में हमें भी अपने दिलों में जगह दें। {i6:14} ग़ैरमसीही असरात से ख़बरदार {6:14} ग़ैरईमानदारों के साथ मिल कर एक जूए तले ज़िन्दगी न गुज़ारें, क्यूँकि रास्ती का नारास्ती से क्या वास्ता है? या रौशनी तारीकी के साथ क्या ताल्लुक़ रख सकती है? {6:15} मसीह और इब्लीस के दरमियान क्या मुताबिक़त हो सकती है? ईमानदार का ग़ैरईमानदार के साथ क्या वास्ता है? {6:16} अल्लाह के मक़्दिस और बुतों में क्या इत्तिफ़ाक़ हो सकता है? हम तो ज़िन्दा ख़ुदा का घर हैं। अल्लाह ने यूँ फ़रमाया है, “मैं उन के दरमियान सुकूनत करूँगा और उन में फिरूँगा। मैं उन का ख़ुदा हूँगा, और वह मेरी क़ौम होंगे।” {6:17} चुनाँचे रब फ़रमाता है, “इस लिए उन में से निकल आओ और उन से अलग हो जाओ। किसी नापाक चीज़ को न छूना, तो फिर मैं तुम्हें क़बूल करूँगा। {6:18} मैं तुम्हारा बाप हूँगा और तुम मेरे बेटे-बेटियाँ होगे, रब क़ादिर-ए-मुतलक़ फ़रमाता है।” {7:1} मेरे अज़ीज़ो, यह तमाम वादे हम से किए गए हैं। इस लिए आएँ, हम अपने आप को हर उस चीज़ से पाक-साफ़ करें जो जिस्म और रूह को आलूदा कर देती है। और हम ख़ुदा के ख़ौफ़ में मुकम्मल तौर पर मुक़द्दस बनने के लिए कोशाँ रहें। {i7:2} पौलुस की ख़ुशी {7:2} हमें अपने दिल में जगह दें। न हम ने किसी से नाइन्साफ़ी की, न किसी को बिगाड़ा या उस से ग़लत फ़ाइदा उठाया। {7:3} मैं यह बात आप को मुजरिम ठहराने के लिए नहीं कह रहा। मैं आप को पहले बता चुका हूँ कि आप हमें इतने अज़ीज़ हैं कि हम आप के साथ मरने और जीने के लिए तय्यार हैं। {7:4} इस लिए मैं आप से खुल कर बात करता हूँ और मैं आप पर बड़ा फ़ख़र भी करता हूँ। इस नाते से मुझे पूरी तसल्ली है, और हमारी तमाम मुसीबतों के बावुजूद मेरी ख़ुशी की इन्तिहा नहीं। {7:5} क्यूँकि जब हम मकिदुनिया पहुँचे तो हम जिस्म के लिहाज़ से आराम न कर सके। मुसीबतों ने हमें हर तरफ़ से घेर लिया। दूसरों की तरफ़ से झगड़ों से और दिल में तरह तरह के डर से निपटना पड़ा। {7:6} लेकिन अल्लाह ने जो दबे हुओं को तसल्ली बख़्शता है तितुस के आने से हमारी हौसलाअफ़्ज़ाई की। {7:7} हमारा हौसला न सिर्फ़ उस के आने से बढ़ गया बल्कि उन हौसलाअफ़्ज़ा बातों से भी जिन से आप ने उसे तसल्ली दी। उस ने हमें आप की आर्ज़ू, आप की आह-ओ-ज़ारी और मेरे लिए आप की सरगर्मी के बारे में रिपोर्ट दी। यह सुन कर मेरी ख़ुशी मज़ीद बढ़ गई। {7:8} क्यूँकि अगरचे मैं ने आप को अपने ख़त से दुख पहुँचाया तो भी मैं पछताता नहीं। पहले तो मैं ख़त लिखने से पछताया, लेकिन अब मैं देखता हूँ कि जो दुख उस ने आप को पहुँचाया वह सिर्फ़ आरिज़ी था {7:9} और उस ने आप को तौबा तक पहुँचाया। यह सुन कर मैं अब ख़ुशी मनाता हूँ, इस लिए नहीं कि आप को दुख उठाना पड़ा है बल्कि इस लिए कि इस दुख ने आप को तौबा तक पहुँचाया। अल्लाह ने यह दुख अपनी मर्ज़ी पूरी कराने के लिए इस्तेमाल किया, इस लिए आप को हमारी तरफ़ से कोई नुक़्सान न पहुँचा। {7:10} क्यूँकि जो दुख अल्लाह अपनी मर्ज़ी पूरी कराने के लिए इस्तेमाल करता है उस से तौबा पैदा होती है और उस का अन्जाम नजात है। इस में पछताने की गुन्जाइश ही नहीं। इस के बरअक्स दुनियावी दुख का अन्जाम मौत है। {7:11} आप ख़ुद देखें कि अल्लाह के इस दुख ने आप में क्या पैदा किया है: कितनी सन्जीदगी, अपना दिफ़ा करने का कितना जोश, ग़लत हरकतों पर कितना ग़ुस्सा, कितना ख़ौफ़, कितनी चाहत, कितनी सरगर्मी। आप सज़ा देने के लिए कितने तय्यार थे! आप ने हर लिहाज़ से साबित किया है कि आप इस मुआमले में बेक़ुसूर हैं। {7:12} ग़रज़, अगरचे मैं ने आप को लिखा, लेकिन मक़्सद यह नहीं था कि ग़लत हरकतें करने वाले के बारे में लिखूँ या उस के बारे में जिस के साथ ग़लत काम किया गया। नहीं, मक़्सद यह था कि अल्लाह के हुज़ूर आप पर ज़ाहिर हो जाए कि आप हमारे लिए कितने सरगर्म हैं। {7:13} यही वजह है कि हमारा हौसला बढ़ गया है। लेकिन न सिर्फ़ हमारी हौसलाअफ़्ज़ाई हुई है बल्कि हम यह देख कर बेइन्तिहा ख़ुश हुए कि तितुस कितना ख़ुश था। वह क्यूँ ख़ुश था? इस लिए कि उस की रूह आप सब से तर-ओ-ताज़ा हुई। {7:14} उस के सामने मैं ने आप पर फ़ख़र किया था, और मैं शर्मिन्दा नहीं हुआ क्यूँकि यह बात दुरुस्त साबित हुई है। जिस तरह हम ने आप को हमेशा सच्ची बातें बताई हैं उसी तरह तितुस के सामने आप पर हमारा फ़ख़र भी दुरुस्त निकला। {7:15} आप उसे निहायत अज़ीज़ हैं क्यूँकि वह आप सब की फ़रमाँबरदारी याद करता है, कि आप ने डरते और काँपते हुए उसे ख़ुशआमदीद कहा। {7:16} मैं ख़ुश हूँ कि मैं हर लिहाज़ से आप पर एतिमाद कर सकता हूँ। {i8:1} यहूदिया के ग़रीबों के लिए हदिया {8:1} भाइयो, हम आप की तवज्जुह उस फ़ज़्ल की तरफ़ दिलाना चाहते हैं जो अल्लाह ने सूबा मकिदुनिया की जमाअतों पर किया। {8:2} जिस मुसीबत में वह फंसे हुए हैं उस से उन की सख़्त आज़माइश हुई। तो भी उन की बेइन्तिहा ख़ुशी और शदीद ग़ुर्बत का नतीजा यह निकला कि उन्हों ने बड़ी फ़य्याज़दिली से हदिया दिया। {8:3} मैं गवाह हूँ कि जितना वह दे सके उतना उन्हों ने दे दिया बल्कि इस से भी ज़्यादा। अपनी ही तरफ़ से {8:4} उन्हों ने बड़े ज़ोर से हम से मिन्नत की कि हमें भी यहूदिया के मुक़द्दसीन की ख़िदमत करने का मौक़ा दें, हम भी देने के फ़ज़्ल में शरीक होना चाहते हैं। {8:5} और उन्हों ने हमारी उम्मीद से कहीं ज़्यादा किया! अल्लाह की मर्ज़ी से उन का पहला क़दम यह था कि उन्हों ने अपने आप को ख़ुदावन्द के लिए मख़्सूस किया। उन का दूसरा क़दम यह था कि उन्हों ने अपने आप को हमारे लिए मख़्सूस किया। {8:6} इस पर हम ने तितुस की हौसलाअफ़्ज़ाई की कि वह आप के पास भी हदिया जमा करने का वह सिलसिला अन्जाम तक पहुँचाए जो उस ने शुरू किया था। {8:7} आप के पास सब कुछ कस्रत से पाया जाता है, ख़्वाह ईमान हो, ख़्वाह कलाम, इल्म, मुकम्मल सरगर्मी या हम से मुहब्बत हो। अब इस बात का ख़याल रखें कि आप यह हदिया देने में भी अपनी कसीर दौलत का इज़हार करें। {8:8} मेरी तरफ़ से यह कोई हुक्म नहीं है। लेकिन दूसरों की सरगर्मी के पेश-ए-नज़र मैं आप की भी मुहब्बत परख रहा हूँ कि वह कितनी हक़ीक़ी है। {8:9} आप तो जानते हैं कि हमारे ख़ुदावन्द ईसा मसीह ने आप पर कैसा फ़ज़्ल किया है, कि अगरचे वह दौलतमन्द था तो भी वह आप की ख़ातिर ग़रीब बन गया ताकि आप उस की ग़ुर्बत से दौलतमन्द बन जाएँ। {8:10} इस मुआमले में मेरा मश्वरा सुनें, क्यूँकि वह आप के लिए मुफ़ीद साबित होगा। पिछले साल आप पहली जमाअत थे जो न सिर्फ़ हदिया देने लगी बल्कि इसे देना भी चाहती थी। {8:11} अब उसे तक्मील तक पहुँचाएँ जो आप ने शुरू कर रखा है। देने का जो शौक़ आप रखते हैं वह अमल में लाया जाए। उतना दें जितना आप दे सकें। {8:12} क्यूँकि अगर आप देने का शौक़ रखते हैं तो फिर अल्लाह आप का हदिया उस बिना पर क़बूल करेगा जो आप दे सकते हैं, उस बिना पर नहीं जो आप नहीं दे सकते। {8:13} कहने का मतलब यह नहीं कि दूसरों को आराम दिलाने के बाइस आप ख़ुद मुसीबत में पड़ जाएँ। बात सिर्फ़ यह है कि लोगों के हालात कुछ बराबर होने चाहिएँ। {8:14} इस वक़्त तो आप के पास बहुत है और आप उन की ज़रूरत पूरी कर सकते हैं। बाद में किसी वक़्त जब उन के पास बहुत होगा तो वह आप की ज़रूरत भी पूरी कर सकेंगे। यूँ आप के हालात कुछ बराबर रहेंगे, {8:15} जिस तरह कलाम-ए-मुक़द्दस में भी लिखा है, “जिस ने ज़्यादा जमा किया था उस के पास कुछ न बचा। लेकिन जिस ने कम जमा किया था उस के पास भी काफ़ी था।” {i8:16} तितुस और उस के साथी {8:16} ख़ुदा का शुक्र है जिस ने तितुस के दिल में वही जोश पैदा किया है जो मैं आप के लिए रखता हूँ। {8:17} जब हम ने उस की हौसलाअफ़्ज़ाई की कि वह आप के पास जाए तो वह न सिर्फ़ इस के लिए तय्यार हुआ बल्कि बड़ा सरगर्म हो कर ख़ुद-ब-ख़ुद आप के पास जाने के लिए रवाना हुआ। {8:18} हम ने उस के साथ उस भाई को भेज दिया जिस की ख़िदमत की तारीफ़ तमाम जमाअतें करती हैं, क्यूँकि उसे अल्लाह की ख़ुशख़बरी सुनाने की नेमत मिली है। {8:19} उसे न सिर्फ़ आप के पास जाना है बल्कि जमाअतों ने उसे मुक़र्रर किया है कि जब हम हदिए को यरूशलम ले जाएंगे तो वह हमारे साथ जाए। यूँ हम यह ख़िदमत अदा करते वक़्त ख़ुदावन्द को जलाल देंगे और अपनी सरगर्मी का इज़हार करेंगे। {8:20} क्यूँकि उस बड़े हदिए के पेश-ए-नज़र जो हम ले जाएंगे हम इस से बचना चाहते हैं कि किसी को हम पर शक करने का मौक़ा मिले। {8:21} हमारी पूरी कोशिश यह है कि वही कुछ करें जो न सिर्फ़ ख़ुदावन्द की नज़र में दुरुस्त है बल्कि इन्सान की नज़र में भी। {8:22} उन के साथ हम ने एक और भाई को भी भेज दिया जिस की सरगर्मी हम ने कई मौक़ों पर परखी है। अब वह मज़ीद सरगर्म हो गया है, क्यूँकि वह आप पर बड़ा एतिमाद करता है। {8:23} जहाँ तक तितुस का ताल्लुक़ है, वह मेरा साथी और हमख़िदमत है। और जो भाई उस के साथ हैं उन्हें जमाअतों ने भेजा है। वह मसीह के लिए इज़्ज़त का बाइस हैं। {8:24} उन पर अपनी मुहब्बत का इज़हार करके यह ज़ाहिर करें कि हम आप पर क्यूँ फ़ख़र करते हैं। फिर यह बात ख़ुदा की दीगर जमाअतों को भी नज़र आएगी। {i9:1} मुक़द्दसीन की मदद {9:1} असल में इस की ज़रूरत नहीं कि मैं आप को उस काम के बारे में लिखूँ जो हमें यहूदिया के मुक़द्दसीन की ख़िदमत में करना है। {9:2} क्यूँकि मैं आप की गर्मजोशी जानता हूँ, और मैं मकिदुनिया के ईमानदारों के सामने आप पर फ़ख़र करता रहा हूँ कि “अख़या के लोग पिछले साल से देने के लिए तय्यार थे।” यूँ आप की सरगर्मी ने ज़्यादातर लोगों को ख़ुद देने के लिए उभारा। {9:3} अब मैं ने इन भाइयों को भेज दिया है ताकि हमारा आप पर फ़ख़र बेबुन्याद न निकले बल्कि जिस तरह मैं ने कहा था आप तय्यार रहें। {9:4} ऐसा न हो कि जब मैं मकिदुनिया के कुछ भाइयों को साथ ले कर आप के पास पहुँचूँगा तो आप तय्यार न हूँ। उस वक़्त मैं, बल्कि आप भी शर्मिन्दा होंगे कि मैं ने आप पर इतना एतिमाद किया है। {9:5} इस लिए मैं ने इस बात पर ज़ोर देना ज़रूरी समझा कि भाई पहले ही आप के पास आ कर उस हदिए का इन्तिज़ाम करें जिस का वादा आप ने किया है। क्यूँकि मैं चाहता हूँ कि मेरे आने तक यह हदिया जमा किया गया हो और ऐसा न लगे जैसा इसे मुश्किल से आप से निकालना पड़ा। इस के बजाए आप की सख़ावत ज़ाहिर हो जाए। {9:6} याद रहे कि जो शख़्स बीज को बचा बचा कर बोता है उस की फ़सल भी उतनी कम होगी। लेकिन जो बहुत बीज बोता है उस की फ़सल भी बहुत ज़्यादा होगी। {9:7} हर एक उतना दे जितना देने के लिए उस ने पहले अपने दिल में ठहरा लिया है। वह इस में तक्लीफ़ या मज्बूरी मह्सूस न करे, क्यूँकि अल्लाह उस से मुहब्बत रखता है जो ख़ुशी से देता है। {9:8} और अल्लाह इस क़ाबिल है कि आप को आप की ज़रूरियात से कहीं ज़्यादा दे। फिर आप के पास हर वक़्त और हर लिहाज़ से काफ़ी होगा बल्कि इतना ज़्यादा कि आप हर क़िस्म का नेक काम कर सकेंगे। {9:9} चुनाँचे कलाम-ए-मुक़द्दस में यह भी लिखा है, “उस ने फ़य्याज़ी से ज़रूरतमन्दों में ख़ैरात बिखेर दी, उस की रास्तबाज़ी हमेशा तक क़ाइम रहेगी।” {9:10} ख़ुदा ही बीज बोने वाले को बीज मुहय्या करता और उसे खाने के लिए रोटी देता है। और वह आप को भी बीज दे कर उस में इज़ाफ़ा करेगा और आप की रास्तबाज़ी की फ़सल उगने देगा। {9:11} हाँ, वह आप को हर लिहाज़ से दौलतमन्द बना देगा और आप हर मौक़े पर फ़य्याज़ी से दे सकेंगे। चुनाँचे जब हम आप का हदिया उन के पास ले जाएंगे जो ज़रूरतमन्द हैं तो वह ख़ुदा का शुक्र करेंगे। {9:12} यूँ आप न सिर्फ़ मुक़द्दसीन की ज़रूरियात पूरी करेंगे बल्कि वह आप की इस ख़िदमत से इतने मुतअस्सिर हो जाएंगे कि वह बड़े जोश से ख़ुदा का भी शुक्रिया अदा करेंगे। {9:13} आप की ख़िदमत के नतीजे में वह अल्लाह को जलाल देंगे। क्यूँकि आप की उन पर और तमाम ईमानदारों पर सख़ावत का इज़हार साबित करेगा कि आप मसीह की ख़ुशख़बरी न सिर्फ़ तस्लीम करते हैं बल्कि उस के ताबे भी रहते हैं। {9:14} और जब वह आप के लिए दुआ करेंगे तो आप के आरज़ूमन्द रहेंगे, इस लिए कि अल्लाह ने आप को कितना बड़ा फ़ज़्ल दे दिया है। {9:15} अल्लाह का उस की नाक़ाबिल-ए-बयान बख़्शिश के लिए शुक्र हो! {i10:1} पौलुस अपनी ख़िदमत का दिफ़ा करता है {10:1} मैं आप से अपील करता हूँ, मैं पौलुस जिस के बारे में कहा जाता है कि मैं आप के रू-ब-रू आजिज़ होता हूँ और सिर्फ़ आप से दूर हो कर दिलेर होता हूँ। मसीह की हलीमी और नर्मी के नाम में {10:2} मैं आप से मिन्नत करता हूँ कि मुझे आप के पास आ कर इतनी दिलेरी से उन लोगों से निपटना न पड़े जो समझते हैं कि हमारा चाल-चलन दुनियावी है। क्यूँकि फ़िलहाल ऐसा लगता है कि इस की ज़रूरत होगी। {10:3} बेशक हम इन्सान ही हैं, लेकिन हम दुनिया की तरह जंग नहीं लड़ते। {10:4} और जो हथियार हम इस जंग में इस्तेमाल करते हैं वह इस दुनिया के नहीं हैं, बल्कि उन्हें अल्लाह की तरफ़ से क़िले ढा देने की क़ुव्वत हासिल है। इन से हम ग़लत ख़यालात के ढाँचे {10:5} और हर ऊँची चीज़ ढा देते हैं जो अल्लाह के इल्म-ओ-इर्फ़ान के ख़िलाफ़ खड़ी हो जाती है। और हम हर ख़याल को क़ैद करके मसीह के ताबे कर देते हैं। {10:6} हाँ, आप के पूरे तौर पर ताबे हो जाने पर हम हर नाफ़रमानी की सज़ा देने के लिए तय्यार होंगे। {10:7} आप सिर्फ़ ज़ाहिरी बातों पर ग़ौर कर रहे हैं। अगर किसी को इस बात का एतिमाद हो कि वह मसीह का है तो वह इस का भी ख़याल करे कि हम भी उसी की तरह मसीह के हैं। {10:8} क्यूँकि अगर मैं उस इख़तियार पर मज़ीद फ़ख़र भी करूँ जो ख़ुदावन्द ने हमें दिया है तो भी मैं शर्मिन्दा नहीं हूँगा। ग़ौर करें कि उस ने हमें आप को ढा देने का नहीं बल्कि आप की रुहानी तामीर करने का इख़तियार दिया है। {10:9} मैं नहीं चाहता कि ऐसा लगे जैसे मैं आप को अपने ख़तों से डराने की कोशिश कर रहा हूँ। {10:10} क्यूँकि बाज़ कहते हैं, “पौलुस के ख़त ज़ोरदार और ज़बरदस्त हैं, लेकिन जब वह ख़ुद हाज़िर होता है तो वह कमज़ोर और उस के बोलने का तर्ज़ हिक़ारतआमेज़ है।” {10:11} ऐसे लोग इस बात का ख़याल करें कि जो बातें हम आप से दूर होते हुए अपने ख़तों में पेश करते हैं उन ही बातों पर हम अमल करेंगे जब आप के पास आएँगे। {10:12} हम तो अपने आप को उन में शुमार नहीं करते जो अपनी तारीफ़ करके अपनी सिफ़ारिश करते रहते हैं, न अपना उन के साथ मुवाज़ना करते हैं। वह कितने बेसमझ हैं जब वह अपने आप को मेयार बना कर उसी पर अपने आप को जाँचते हैं और अपना मुवाज़ना अपने आप से करते हैं। {10:13} लेकिन हम मुनासिब हद से ज़्यादा फ़ख़र नहीं करेंगे बल्कि सिर्फ़ उस हद तक जो अल्लाह ने हमारे लिए मुक़र्रर किया है। और आप भी इस हद के अन्दर आ जाते हैं। {10:14} इस में हम मुनासिब हद से ज़्यादा फ़ख़र नहीं कर रहे, क्यूँकि हम तो मसीह की ख़ुशख़बरी ले कर आप तक पहुँच गए हैं। अगर ऐसा न होता तो फिर और बात होती। {10:15} हम ऐसे काम पर फ़ख़र नहीं करते जो दूसरों की मेहनत से सरअन्जाम दिया गया है। इस में भी हम मुनासिब हद्दों के अन्दर रहते हैं, बल्कि हम यह उम्मीद रखते हैं कि आप का ईमान बढ़ जाए और यूँ हमारी क़दर-ओ-क़ीमत भी अल्लाह की मुक़र्ररा हद तक बढ़ जाए। ख़ुदा करे कि आप में हमारा यह काम इतना बढ़ जाए {10:16} कि हम अल्लाह की ख़ुशख़बरी आप से आगे जा कर भी सुना सकें। क्यूँकि हम उस काम पर फ़ख़र नहीं करना चाहते जिसे दूसरे कर चुके हैं। {10:17} कलाम-ए-मुक़द्दस में लिखा है, “फ़ख़र करने वाला ख़ुदावन्द ही पर फ़ख़र करे।” {10:18} जब लोग अपनी तारीफ़ करके अपनी सिफ़ारिश करते हैं तो इस में क्या है! इस से वह सहीह साबित नहीं होते, बल्कि अहम बात यह है कि ख़ुदावन्द ही इस की तस्दीक़ करे। {i11:1} पौलुस और झूटे रसूल {11:1} ख़ुदा करे कि जब मैं अपनी हमाक़त का कुछ इज़हार करता हूँ तो आप मुझे बर्दाश्त करें। हाँ, ज़रूर मुझे बर्दाश्त करें, {11:2} क्यूँकि मैं आप के लिए अल्लाह की सी ग़ैरत रखता हूँ। मैं ने आप का रिश्ता एक ही मर्द के साथ बांधा, और मैं आप को पाकदामन कुंवारी की हैसियत से उस मर्द मसीह के हुज़ूर पेश करना चाहता था। {11:3} लेकिन अफ़्सोस, मुझे डर है कि आप हव्वा की तरह गुनाह में गिर जाएंगे, कि जिस तरह साँप ने अपनी चालाकी से हव्वा को धोका दिया उसी तरह आप की सोच भी बिगड़ जाएगी और वह ख़ुलूसदिली और पाक लगन ख़त्म हो जाएगी जो आप मसीह के लिए मह्सूस करते हैं। {11:4} क्यूँकि आप ख़ुशी से हर एक को बर्दाश्त करते हैं जो आप के पास आ कर एक फ़र्क़ क़िस्म का ईसा पेश करता है, एक ऐसा ईसा जो हम ने आप को पेश नहीं किया था। और आप एक ऐसी रूह और ऐसी “ख़ुशख़बरी” क़बूल करते हैं जो उस रूह और ख़ुशख़बरी से बिलकुल फ़र्क़ है जो आप को हम से मिली थी। {11:5} मेरा नहीं ख़याल कि मैं इन नाम-निहाद ‘ख़ास’ रसूलों की निस्बत कम हूँ। {11:6} हो सकता है कि मैं बोलने में माहिर नहीं हूँ, लेकिन यह मेरे इल्म के बारे में नहीं कहा जा सकता। यह हम ने आप को साफ़ साफ़ और हर लिहाज़ से दिखाया है। {11:7} मैं ने अल्लाह की ख़ुशख़बरी सुनाने के लिए आप से कोई भी मुआवज़ा न लिया। यूँ मैं ने अपने आप को नीचा कर दिया ताकि आप को सरफ़राज़ कर दिया जाए। क्या इस में मुझ से ग़लती हुई? {11:8} जब मैं आप की ख़िदमत कर रहा था तो मुझे ख़ुदा की दीगर जमाअतों से पैसे मिल रहे थे, यानी आप की मदद करने के लिए मैं उन्हें लूट रहा था। {11:9} और जब मैं आप के पास था और ज़रूरतमन्द था तो मैं किसी पर बोझ न बना, क्यूँकि जो भाई मकिदुनिया से आए उन्हों ने मेरी ज़रूरियात पूरी कीं। माज़ी में मैं आप पर बोझ न बना और आइन्दा भी नहीं बनूँगा। {11:10} मसीह की उस सच्चाई की क़सम जो मेरे अन्दर है, अख़या के पूरे सूबे में कोई मुझे इस पर फ़ख़र करने से नहीं रोकेगा। {11:11} मैं यह क्यूँ कह रहा हूँ? इस लिए कि मैं आप से मुहब्बत नहीं रखता? ख़ुदा ही जानता है कि मैं आप से मुहब्बत रखता हूँ। {11:12} और जो कुछ मैं अब कर रहा हूँ वही करता रहूँगा, ताकि मैं नाम-निहाद रसूलों को वह मौक़ा न दूँ जो वह ढूँड रहे हैं। क्यूँकि यही उन का मक़्सद है कि वह फ़ख़र करके यह कह सकें कि वह हम जैसे हैं। {11:13} ऐसे लोग तो झूटे रसूल हैं, धोकेबाज़ मज़दूर जिन्हों ने मसीह के रसूलों का रूप धार लिया है। {11:14} और क्या अजब, क्यूँकि इब्लीस भी नूर के फ़रिश्ते का रूप धार कर घूमता फिरता है। {11:15} तो फिर यह बड़ी बात नहीं कि उस के चेले रास्तबाज़ी के ख़ादिम का रूप धार कर घूमते फिरते हैं। उन का अन्जाम उन के आमाल के मुताबिक़ ही होगा। {i11:16} रसूल होने की वजह से पौलुस की ईज़ारसानी {11:16} मैं दुबारा कहता हूँ कि कोई मुझे अहमक़ न समझे। लेकिन अगर आप यह सोचें भी तो कम अज़ कम मुझे अहमक़ की हैसियत से क़बूल करें ताकि मैं भी थोड़ा बहुत अपने आप पर फ़ख़र करूँ। {11:17} असल में जो कुछ मैं अब बयान कर रहा हूँ वह ख़ुदावन्द को पसन्द नहीं है, बल्कि मैं अहमक़ की तरह बात कर रहा हूँ। {11:18} लेकिन चूँकि इतने लोग जिस्मानी तौर पर फ़ख़र कर रहे हैं इस लिए मैं भी फ़ख़र करूँगा। {11:19} बेशक आप ख़ुद इतने दानिशमन्द हैं कि आप अहमक़ों को ख़ुशी से बर्दाश्त करते हैं। {11:20} हाँ, बल्कि आप यह भी बर्दाश्त करते हैं जब लोग आप को ग़ुलाम बनाते, आप को लूटते, आप से ग़लत फ़ाइदा उठाते, नख़रे करते और आप को थप्पड़ मारते हैं। {11:21} यह कह कर मुझे शर्म आती है कि हम इतने कमज़ोर थे कि हम ऐसा न कर सके। लेकिन अगर कोई किसी बात पर फ़ख़र करने की जुरअत करे (मैं अहमक़ की सी बात कर रहा हूँ) तो मैं भी उतनी ही जुरअत करूँगा। {11:22} क्या वह इब्रानी हैं? मैं भी हूँ। क्या वह इस्राईली हैं? मैं भी हूँ। क्या वह इब्राहीम की औलाद हैं? मैं भी हूँ। {11:23} क्या वह मसीह के ख़ादिम हैं? (अब तो मैं गोया बेख़ुद हो गया हूँ कि इस तरह की बातें कर रहा हूँ!) मैं उन से ज़्यादा मसीह की ख़िदमत करता हूँ। मैं ने उन से कहीं ज़्यादा मेहनत-मशक़्क़त की, ज़्यादा दफ़ा जेल में रहा, मेरे ज़्यादा सख़्ती से कोड़े लगाए गए और मैं बार बार मरने के खतरों में रहा हूँ। {11:24} मुझे यहूदियों से पाँच दफ़ा 39 कोड़ों की सज़ा मिली है। {11:25} तीन दफ़ा रोमियों ने मुझे लाठी से मारा। एक बार मुझे संगसार किया गया। जब मैं समुन्दर में सफ़र कर रहा था तो तीन मर्तबा मेरा जहाज़ तबाह हुआ। हाँ, एक दफ़ा मुझे जहाज़ के तबाह होने पर एक पूरी रात और दिन समुन्दर में गुज़ारना पड़ा। {11:26} मेरे बेशुमार सफ़रों के दौरान मुझे कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ा, दरयाओं और डाकुओं का ख़तरा, अपने हमवतनों और ग़ैरयहूदियों के हम्लों का ख़तरा। जहाँ भी मैं गया हूँ वहाँ यह ख़तरे मौजूद रहे, ख़्वाह मैं शहर में था, ख़्वाह ग़ैरआबाद इलाक़े में या समुन्दर में। झूटे भाइयों की तरफ़ से भी ख़तरे रहे हैं। {11:27} मैं ने जाँफ़िशानी से सख़्त मेहनत-मशक़्क़त की है और कई रात जागता रहा हूँ, मैं भूका और प्यासा रहा हूँ, मैं ने बहुत रोज़े रखे हैं। मुझे सर्दी और नंगेपन का तजरिबा हुआ है। {11:28} और यह उन फ़िक्रों के इलावा है जो मैं ख़ुदा की तमाम जमाअतों के लिए मह्सूस करता हूँ और जो मुझे दबाती रहती हैं। {11:29} जब कोई कमज़ोर है तो मैं अपने आप को भी कमज़ोर मह्सूस करता हूँ। जब किसी को ग़लत राह पर लाया जाता है तो मैं उस के लिए शदीद रंजिश मह्सूस करता हूँ। {11:30} अगर मुझे फ़ख़र करना पड़े तो मैं उन चीज़ों पर फ़ख़र करूँगा जो मेरी कमज़ोर हालत ज़ाहिर करती हैं। {11:31} हमारा ख़ुदा और ख़ुदावन्द ईसा का बाप (उस की हम्द-ओ-सना अबद तक हो) जानता है कि मैं झूट नहीं बोल रहा। {11:32} जब मैं दमिश्क़ शहर में था तो बादशाह अरितास के गवर्नर ने शहर के तमाम दरवाज़ों पर अपने पहरेदार मुक़र्रर किए ताकि वह मुझे गिरिफ़्तार करें। {11:33} लेकिन शहर की फ़सील में एक दरीचा था, और मुझे एक टोकरे में रख कर वहाँ से उतारा गया। यूँ मैं उस के हाथों से बच निकला। {i12:1} पौलुस पर कई बातों का इन्किशाफ़ {12:1} लाज़िम है कि मैं कुछ और फ़ख़र करूँ। अगरचे इस का कोई फ़ाइदा नहीं, लेकिन अब मैं उन रोयाओं और इन्किशाफ़ात का ज़िक्र करूँगा जो ख़ुदावन्द ने मुझ पर ज़ाहिर किए। {12:2} मैं मसीह में एक आदमी को जानता हूँ जिसे चौदह साल हुए छीन कर तीसरे आसमान तक पहुँचाया गया। मुझे नहीं पता कि उसे यह तजरिबा जिस्म में या इस के बाहर हुआ। ख़ुदा जानता है। {12:3} हाँ, ख़ुदा ही जानता है कि वह जिस्म में था या नहीं। लेकिन यह मैं जानता हूँ {12:4} कि उसे छीन कर फ़िर्दौस में लाया गया जहाँ उस ने नाक़ाबिल-ए-बयान बातें सुनीं, ऐसी बातें जिन का ज़िक्र करना इन्सान के लिए रवा नहीं। {12:5} इस क़िस्म के आदमी पर मैं फ़ख़र करूँगा, लेकिन अपने आप पर नहीं। मैं सिर्फ़ उन बातों पर फ़ख़र करूँगा जो मेरी कमज़ोर हालत को ज़ाहिर करती हैं। {12:6} अगर मैं फ़ख़र करना चाहता तो इस में अहमक़ न होता, क्यूँकि मैं हक़ीक़त बयान करता। लेकिन मैं यह नहीं करूँगा, क्यूँकि मैं चाहता हूँ कि सब की मेरे बारे में राय सिर्फ़ उस पर मुन्हसिर हो जो मैं करता या बयान करता हूँ। कोई मुझे इस से ज़्यादा न समझे। {12:7} लेकिन मुझे इन आला इन्किशाफ़ात की वजह से एक काँटा चुभो दिया गया, एक तक्लीफ़दिह चीज़ जो मेरे जिस्म में धंसी रहती है ताकि मैं फूल न जाऊँ। इब्लीस का यह पैग़म्बर मेरे मुक्के मारता रहता है ताकि मैं मग़रूर न हो जाऊँ। {12:8} तीन बार मैं ने ख़ुदावन्द से इल्तिजा की कि वह इसे मुझ से दूर करे। {12:9} लेकिन उस ने मुझे यही जवाब दिया, “मेरा फ़ज़्ल तेरे लिए काफ़ी है, क्यूँकि मेरी क़ुदरत का पूरा इज़हार तेरी कमज़ोर हालत ही में होता है।” इस लिए मैं मज़ीद ख़ुशी से अपनी कमज़ोरियों पर फ़ख़र करूँगा ताकि मसीह की क़ुदरत मुझ पर ठहरी रहे। {12:10} यही वजह है कि मैं मसीह की ख़ातिर कमज़ोरियों, गालियों, मज्बूरियों, ईज़ारसानियों और परेशानियों में ख़ुश हूँ, क्यूँकि जब मैं कमज़ोर होता हूँ तब ही मैं ताक़तवर होता हूँ। {i12:11} पौलुस की कुरिन्थियों के लिए फ़िक्र {12:11} मैं बेवुक़ूफ़ बन गया हूँ, लेकिन आप ने मुझे मज्बूर कर दिया है। चाहिए था कि आप ही दूसरों के सामने मेरे हक़ में बात करते। क्यूँकि बेशक मैं कुछ भी नहीं हूँ, लेकिन इन नाम-निहाद ख़ास रसूलों के मुक़ाबले में मैं किसी भी लिहाज़ से कम नहीं हूँ। {12:12} जो मुतअद्दिद इलाही निशान, मोजिज़े और ज़बरदस्त काम मेरे वसीले से हुए वह साबित करते हैं कि मैं रसूल हूँ। हाँ, वह बड़ी साबितक़दमी से आप के दरमियान किए गए। {12:13} जो ख़िदमत मैं ने आप के दरमियान की, क्या वह ख़ुदा की दीगर जमाअतों में मेरी ख़िदमत की निस्बत कम थी? हरगिज़ नहीं! इस में फ़र्क़ सिर्फ़ यह था कि मैं आप के लिए माली बोझ न बना। मुझे मुआफ़ करें अगर मुझ से इस में ग़लती हुई है। {12:14} अब मैं तीसरी बार आप के पास आने के लिए तय्यार हूँ। इस मर्तबा भी मैं आप के लिए बोझ का बाइस नहीं बनूँगा, क्यूँकि मैं आप का माल नहीं बल्कि आप ही को चाहता हूँ। आख़िर बच्चों को माँ-बाप की मदद के लिए माल जमा नहीं करना चाहिए बल्कि माँ-बाप को बच्चों के लिए। {12:15} मैं तो बड़ी ख़ुशी से आप के लिए हर ख़र्चा उठा लूँगा बल्कि अपने आप को भी ख़र्च कर दूँगा। क्या आप मुझे कम प्यार करेंगे अगर मैं आप से ज़्यादा मुहब्बत रखूँ? {12:16} ठीक है, मैं आप के लिए बोझ न बना। लेकिन बाज़ सोचते हैं कि मैं चालाक हूँ और आप को धोके से अपने जाल में फंसा लिया। {12:17} किस तरह? जिन लोगों को मैं ने आप के पास भेजा क्या मैं ने उन में से किसी के ज़रीए आप से ग़लत फ़ाइदा उठाया? {12:18} मैं ने तितुस की हौसलाअफ़्ज़ाई की कि वह आप के पास जाए और दूसरे भाई को भी साथ भेज दिया। क्या तितुस ने आप से ग़लत फ़ाइदा उठाया? हरगिज़ नहीं! क्यूँकि हम दोनों एक ही रूह में एक ही राह पर चलते हैं। {12:19} आप काफ़ी देर से सोच रहे होंगे कि हम आप के सामने अपना दिफ़ा कर रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं है बल्कि हम मसीह में होते हुए अल्लाह के हुज़ूर ही यह कुछ बयान कर रहे हैं। और मेरे अज़ीज़ो, जो कुछ भी हम करते हैं हम आप की तामीर करने के लिए करते हैं। {12:20} मुझे डर है कि जब मैं आऊँगा तो न आप की हालत मुझे पसन्द आएगी, न मेरी हालत आप को। मुझे डर है कि आप में झगड़ा, हसद, ग़ुस्सा, ख़ुदग़रज़ी, बुह्तान, गपबाजी, ग़ुरूर और बेतरतीबी पाई जाएगी। {12:21} हाँ, मुझे डर है कि अगली दफ़ा जब आऊँगा तो अल्लाह मुझे आप के सामने नीचा दिखाएगा, और मैं उन बहुतों के लिए ग़म खाऊँगा जिन्हों ने माज़ी में गुनाह करके अब तक अपनी नापाकी, ज़िनाकारी और अय्याशी से तौबा नहीं की। {i13:1} आख़िरी तम्बीह और सलाम {13:1} अब मैं तीसरी दफ़ा आप के पास आ रहा हूँ। कलाम-ए-मुक़द्दस के मुताबिक़ लाज़िम है कि हर इल्ज़ाम की तस्दीक़ दो या तीन गवाहों से की जाए। {13:2} जब मैं दूसरी दफ़ा आप के पास आया था तो मैं ने पहले से आप को आगाह किया था। अब मैं आप से दूर यह बात दुबारा कहता हूँ कि जब मैं वापस आऊँगा तो न वह बचेंगे जिन्हों ने पहले गुनाह किया था न दीगर लोग। {13:3} जो भी सबूत आप माँग रहे हैं कि मसीह मेरे ज़रीए बोलता है वह मैं आप को दूँगा। आप के साथ सुलूक में मसीह कमज़ोर नहीं है। नहीं, वह आप के दरमियान ही अपनी क़ुव्वत का इज़हार करता है। {13:4} क्यूँकि अगरचे उसे कमज़ोर हालत में मस्लूब किया गया, लेकिन अब वह अल्लाह की क़ुदरत से ज़िन्दा है। इसी तरह हम भी उस में कमज़ोर हैं, लेकिन अल्लाह की क़ुदरत से हम आप की ख़िदमत करते वक़्त उस के साथ ज़िन्दा हैं। {13:5} अपने आप को जाँच कर मालूम करें कि क्या आप का ईमान क़ाइम है? ख़ुद अपने आप को परखें। क्या आप नहीं जानते कि ईसा मसीह आप में है? अगर नहीं तो इस का मतलब होता कि आप का ईमान नामक़्बूल साबित होता। {13:6} लेकिन मुझे उम्मीद है कि आप इतना पहचान लेंगे कि जहाँ तक हमारा ताल्लुक़ है हम नामक़्बूल साबित नहीं हुए हैं। {13:7} हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि आप से कोई ग़लती न हो जाए। बात यह नहीं कि लोगों के सामने हम सहीह निकलें बल्कि यह कि आप सहीह काम करें, चाहे लोग हमें ख़ुद नाकाम क्यूँ न क़रार दें। {13:8} क्यूँकि हम हक़ीक़त के ख़िलाफ़ खड़े नहीं हो सकते बल्कि सिर्फ़ उस के हक़ में। {13:9} हम ख़ुश हैं जब आप ताक़तवर हैं गो हम ख़ुद कमज़ोर हैं। और हमारी दुआ यह है कि आप कामिल हो जाएँ। {13:10} यही वजह है कि मैं आप से दूर रह कर लिखता हूँ। फिर जब मैं आऊँगा तो मुझे अपना इख़तियार इस्तेमाल करके आप पर सख़्ती नहीं करनी पड़ेगी। क्यूँकि ख़ुदावन्द ने मुझे यह इख़तियार आप को ढा देने के लिए नहीं बल्कि आप को तामीर करने के लिए दिया है। {13:11} भाइयो, आख़िर में मैं आप को सलाम कहता हूँ। सुधर जाएँ, एक दूसरे की हौसलाअफ़्ज़ाई करें, एक ही सोच रखें और सुलह-सलामती के साथ ज़िन्दगी गुज़ारें। फिर मुहब्बत और सलामती का ख़ुदा आप के साथ होगा। {13:12} एक दूसरे को मुक़द्दस बोसा देना। {13:13} तमाम मुक़द्दसीन आप को सलाम कहते हैं। {13:14} ख़ुदावन्द ईसा मसीह का फ़ज़्ल, अल्लाह की मुहब्बत और रूह-उल-क़ुद्स की रिफ़ाक़त आप सब के साथ होती रहे।